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व्यंग्यकार और व्यंग्य

व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है।
किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के लिए आवश्यक है कि मौन रहकर चर्चाकारों के शब्द और उससे भी अधिक उनके मनोभाव को सुना जाए। कई बार व्यंग्यकार चर्चा में इतना वाचाल हो उठता है कि चर्चाकार बोल भी नहीं पाते। ऐसे में व्यंग्य निकालने के प्रयास व्यंग्यकार को निकालने की स्थिति के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अनेक वरिष्ठ व्यंग्यकारों को सीधे-सादे विषय के भीतर से इस प्रकार व्यंग्योक्ति निकालने का प्रयास करते देखा है जैसे कोई प्यासा कौआ पुरानी कहानी से प्रेरित होकर घड़े में कंकर डाल डाल कर प्यास बुझाने की तपस्या कर रहा हो। लेकिन इस प्रयास में काक यह भूल जाता है कि जिस घड़े में कंकर डाले जाएं उसकी तली में इतना जल होना आवश्यक है जो कंकरों का बदन तर करने के बाद चोंच के भीतर आ सकने को पूरा पड़े।
जबरन व्यंग्यकार बनने की चेष्टा में अक्सर कुछ लोग भरी महफिल में कोई जुमला उछालते हैं। जुमला उछालने की प्रक्रिया पूर्ण होते ही वे सदन को मुस्कुरा कर यह भी बताते हैं कि मेरे इस जुमले पर आप सबको इस प्रकार मुस्कुराना चाहिए था। इस सोपान के उपरान्त वे एक एक सदस्य की आँखों में इस भाव से देखते हैं कि इतने सारे मूढ़ों में एक आप तो मुस्कुरा कर मेरी श्रेष्ठ व्यंग्योक्ति समझने की क्षमता सिद्ध करें। अंतिम सदस्य तक पहुँचते-पहुँचते उनकी दृष्टि रिरियाने लगती है। लेकिन इस अपमान से वे हतोत्साहित नहीं होते। बल्कि अपने मुखमंडल पर अजीब सी इतराहत लाकर यह बताते हैं कि अगर तुम अल्पज्ञों में एक भी समझदार मेरे व्यंग्य को समझ लेता तो अब मैं इस प्रकार इतरा रहा होता।
व्यंग्य समाज को आइना दिखा सकता है लेकिन कई व्यंग्यकार उस आईने में चोंच मार मर कर उसे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ते।
एक समय के बाद वे ये अपेक्षा रखने लगते हैं कि उनके बोलने, हंसने, मुस्कुराने, देखने और यहां तक कि उठने-बैठने तक को व्यंग्य समझ कर लोग खींस निपोरते रहें। यदि उनकी एकाध उक्ति प्रचलित हो जाए तो वे आदमी को आदमी क्या शब्द को शब्द नहीं समझते। उनकी सहजता में बैठा व्यंग्यकार उनकी चेष्टाओं में फूलते बदजुबान के आगे धराशायी हो जाता है। इस स्थिति में व्यंग्यकार आनंद कम और कष्ट अधिक देता है। पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाली छैनी भौंथरी होकर कला, कृति और कलाकार तीनों को नष्ट कर डालती है।
✍️ चिराग़ जैन

अलविदा 2016

कड़वी यादों के संग बीता दो हज़ार सोलह का साल
ऐसी उथल-पुथल थी इसमें, कोई पाया नहीं संभाल
अभी साल प्रारंभ हुआ था, चढ़े दूसरे सूरजदेव
वायुसैनिकों के सम्मुख थे आतंकों के अधम कुटेव
पश्चिम में आतंक चढ़ा तो पूरब में दहला इम्फाल
भारत भर को स्तब्ध कर गया, तीन जनवरी का भूचाल
अभी संभल भी नहीं सके थे, काश्मीर तक पसरा क्लांत
सात जनवरी उगी, हो गए मुख्यमंत्री मुफ्ती शांत
दस दिन बीते सत्रह तारीख आई तो गहराया घाव
छोड़ गए दुनिया सिक्किम के राज्यपाल वी रामाराव
लुप्त हो गया मृणालिनी संग कत्थक का गुजराती कोष
तबला सिसक-सिसक कर रोया छोड़ गए जब शंकर घोष
क्रूर काल ने इतने भर से किंचित पाया नहीं विराम
छीन लिया हमसे किसान का योग्य पूत जाखड़ बलराम
व्यंग्य चित्र गंभीर हो गए चले गए तैलंग सुधीर
निदा फ़ाज़ली छोड़ गए फिर खड़ी रह गई ग़ज़ल अधीर
इसी बीच जेएनयू सुलगा, देशद्रोह की फैली आग
चंद लफंगों ने आ नोचा, भारत माँ का सुभग सुहाग
छाती पर बर्फीला पर्वत झेल गए जो पच्चीस फीट
झेल न पाए वो हनुमनथप्पा दिल्ली की मैली छींट
देशद्रोह का शोर-शराबा बढ़ता रहा, सरे-बाज़ार
राजनीति ने देशप्रेम को बना लिया वोटिंग औज़ार
काश्मीर में दंगे भड़के, घायल होते रहे जवान
दंगइयों का नायक बनकर उभर गया वानी बुरहान
हिंसा, पत्थरबाज़ी, कफर््यू और राजनीति की ओट
घाटी नर्क बन गई पूरी, हुई अमन के तन पर चोट
इसी बीच हो गया उड़ी में सैन्य शिविर पर हमला हाय
भारत का धीरज तब डोला, दिया पाक को पाठ पढ़ाय
घर में घुसकर ध्वस्त कर दिए आतंकों के काले काक
दिया धूर्त को उत्तर ऐसा रहा झाँकता बगलें पाक
बजा चुनावी बिगुल लखनऊ की थी हर मर्यादा पार
चाचा और भतीजा झगड़े, शर्मिंदा पूरा परिवार
आ पहुँचा तब आठ नवम्बर, बजे रात के साढ़े आठ
पीएम ने कुछ ऐसा बोला, नोट हो गए बारह बाट
काले धन पर चोट हुई या आतंकों की खुल गई पोल
ठीक हुआ है, ग़लत हुआ है, सबके अपने-अपने ढोल
नकदी का संकट गहराया, ठप्प हो गया सब व्यापार
बैंकों के भीतर हैं घपले, मुल्क बन गया सिर्फ कतार
समझ नहीं पाया है कोई, अर्थतंत्र का अद्भुत खेल
पूरा देश कतार बन गया, और पटरी से उतरी रेल
मिले सूर जो थारो-म्हारो से हर कर जग की तृष्णा
बंद हुआ आलाप चले गए, एम बालामुरलीकृष्णा
फिर उर्दू-हिन्दी के बेटे, बेकल उत्साही का शोक
जयललिता की हुई विदाई, लगा बिलखने दक्षिणलोक
पीड़ा का अम्बार वर्ष भर हर दिन दूना-दून हुआ
अनुपम मिश्र हुए माटी और बिन पानी सब सून हुआ
इसी वर्ष में दो प्रांतों के मुखिया बने काल के ग्रास
इसी वर्ष में दो-दो सीडी आई बरपा नैतिक ह्रास
इसी वर्ष में भारत माँ का हुआ कष्टदायी अपमान
इसी वर्ष जैन संत की भूषा पर भी उठा बयान
भारत की जनता पर इतनी कृपा करो मेरे भगवान
बीत गई सो बात गई अब नवल वर्ष हो नवल विहान

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम के इक ताल में

आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में
आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ

बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित
किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक
अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है
मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक
भाग्य है जिसका चुभन स्वीकार कर शृंगार करना
आजकल मैं उस कढ़े रूमाल में उतरा हुआ हूँ

कल्पना शालीनता के छोर से आगे बढ़ी है
प्रेम मन की देहरी को लांघ तन पर छा रहा है
कनखियों से देख कर वो झट पलट लेती निगाहें
इस झिझक को देख मेरा मन प्रफुल्लन पा रहा है
दृष्टि मेरी भाँप कर वो ढाँपती जिससे स्वयं को
मैं अभी उस लाल ऊनी शाॅल में उतरा हुआ हूँ

✍️ चिराग़ जैन

श्रद्धांजलि : अनुपम मिश्र जी को

सूखी बावड़ी
बिलख कर रोई है आज;
सूखे कुओं की कागलें
क्षण भर छलछला कर
सूख गई हैं फिर से;
जर्जर तालाबों की मिट्टी
बैठ गई है थक कर!

पानी की पीर को
बानी देने वाली आवाज़
ख़ामोश हो गई है आज।
सूखे स्रोतों से बतिया कर
जो तर कर देता था उनका दामन
वो निःशब्द हो गया है।

एक पानीदार कहानी
अचानक
गुम हो गई है
किसी पुरानी अभागी नदी की तरह।
धाराओं की बीमारियाँ
तलाशती उँगलियाँ
टटोल नहीं पाईं
अपनी काया को जकड़ रहे
केकड़े का शिकंजा।

किसी मीठे तालाब की
आख़िरी बूंद सूखने जैसा है ये पल
किसी मीठी बावड़ी के
पाट दिए जाने जैसा है
ये समाचार
किसी लबालब कुँए के
रीत जाने जैसा है ये अवसाद

…अनुपम मिश्र को
जिन्होंने जाना है
उनकी आँखें छलकी नहीं हैं;
सूख गई हैं!

✍️ चिराग़ जैन

केदारनाथ धाम का उलाहना

देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!

जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!

✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्र के चार स्तम्भ

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा।
विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी युवतियों को ढँक-ओढ़ कर रहना सिखाने लगे। एक दल का नेता हमें बताता है कि उसकी जेब में राजीव गांधी के ख़िलाफ़ सबूत हैं। हम उसकी बात मानकर उसे प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह काग़ज़ देश के भविष्य की तरह कोरा निकलता है। फिर कोई आता है और हमें कहता है कि वह राम मंदिर का निर्माण कराएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह बस में बैठकर लाहौर की यात्रा पर निकल जाता है। राम जीऔर देश के रामलाल उसकी लीलाएं देखकर ताली पीटते रह जाते हैं। फिर एक व्यक्ति आता है और हमको कहता है कि देश को आर्थिक सम्पन्नता मिलेगी। देश का ग़रीब से ग़रीब शख्स भरपेट खाना खाएगा। हम उसके कहने पर किसी को भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। कोयले से लेकर तकनीक तक की दलाली में घोटाले होने लगते हैं। रोज़ एक नया घोटाला सामने आता है। ग़रीब के हाथ का आख़िरी निवाला भी भ्रष्टाचारियों के गले से नीचे उतर जाता है। ग़रीब विकास करके भुखमरा बन जाता है। सरकारी ईमानदारी का डंका पीटते हुए कलमाड़ी जेल जाते हैं और सरकारी बेईमानी की सुरंग से चुप्पी साध कर छूट जाते हैं। जनता देखती रह जाती है। फिर कोई आता है और हमें बताता है कि वह काला धन हर भारतीय के खाते में डलवा देगा। वह जमाई बाबू को जेल भिजवा देगा। वह स्विस बैंकों में जमा भारत का पैसा वापस लाएगा। वह अच्छे दिन लाएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। वह प्रधानमंत्री बनते ही कुर्सी की जगह हवाई जहाज में बैठता है। स्विस बैंकों का पैसा छोड़ कर छोटे-छोटे बच्चों के पिगी बैंक तुड़वा देता है। जमाई बाबू को गिरफ्तार नहीं कर पाता। जनता उससे पूछती है कि हमारे बैंक खाते में पैसा कब आएगा तो वह कह देता है कि वो तो चुनावी जुमला था। हम ठगे से खड़े रह जाते हैं। वह बोलता हैकि आज से लाइन में खड़े होना है। हम लाइन में खड़े हो जाते हैं। वह कहता है भूखे मरो ताकि विदेशों में देश का नाम हो सके। हम भूखे मरने को तैयार हो जाते हैं।
कुछ लोग पिस-पिस कर मीडिया के पास त्राहिमाम करते हुए जाते हैं। मीडिया उनकी मार्केट वैल्यू के अनुसार उनकी बात सुनता है। फिर अचानक चीखने लगता है। हम खुश हो जाते हैं। मीडिया हमें बोलता है कि सुभाष चंद्र बोस की फ़ाइल मांगो, उससे खुशहाली आएगी। हम फ़ाइल का हल्ला मचा देते हैं। फ़ाइल खुल जाती है। न किसी को जेल होती न खुशहाली आती। हम फिर पूछते हैं, अब क्या करें। मीडिया बोलता है कि राम वाले बयान पर माफ़ी मांगने को बोलो। हम धरने पर बैठ जाते हैं। कुछ दिन तक बैठे रहने के बाद मीडिया हमसे बोर हो जाता है। वह प्रधानमंत्री जी के साथ बेल्जियम जाकर आइसक्रीम खाने लगता है और हम वहीं बैठे रह जाते हैं।
फिर हम सिविल सोसाइटी के पास जाते हैं। एक बूढ़ा बाबा जंतर-मंतर पर बैठ जाता है। हम “जनलोकपाल” के गीत गाने लगते हैं। बूढ़ा फेमस हो जाता है। उसके गुर्गे उसके कन्धों पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। वे हमें बताते हैं कि जनलोकपाल बिल पास कराने के लिए चुनाव लड़ना ज़रूरी है। वे कहते हैं कि वे VIP संस्कृति ख़त्म करेंगे। वे सरकारी कोठी नहीं लेंगे। वे सबकी पोल खोलेंगे। वे फ्री वाई फाई देंगे। वे आम आदमी की गुहार सुनेंगे। हम उन्हें मुख्यमंत्री बना देते हैं। अगले ही दिन वे सायरन बजाती गाड़ियों के काफिले में बैठ नई कोठी से निकलकर विधानसभा जाते हैं और जनलोकपाल के साथ अन्ना बाबा को विदाई देते हैं। हम उसकी खाँसी पर चुटकुले सुन-सुनाकर सन्तोष कर लेते हैं।
कई साल तक सुनवाई के बाद निचली अदालत एक सेलिब्रिटी को अपराधी कहती है। उसके दो घंटे के भीतर ऊँची अदालत केस फ़ाइल करने से लेकर जाँच करने तक और गवाहों की गवाही से लेकर सबूतों की प्रमाणिकता तक सब संपन्न करके उसे रिहा कर देती है। हम बिंधे हुए हिरन से चकित रह जाते हैं।
हम धृतराष्ट्र की तरह संजय रूपी मीडिया कीआँखों से देश का कुरुक्षेत्र देख रहे हैं। संजय बोलता है कोसी में बाढ़ आ रही है। हम भागने लगते हैं। संजय बोलता है नदियां सूख रही हैं, हम प्यासे मरने लगते हैं। संजय बोलता है पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो रहा है। हम इन्वर्टर चार्जिंग करने लगते हैं। संजय बोलता है राहुल गांधी पप्पू है, हम उस पर लतीफ़े गढ़ने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी घुमंतू हो रहे हैं, हम उनकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी शेर हैं, हम उनसे डरने लगते हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों की जनता नेतृत्व और सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में अपनी सूझ-बूझ को भौंथरा कर बैठी है। ख़बर तो दूर की बात है, हम सोशल मिडिया की अफवाहों को प्रमाणिक मानने से पूर्व बुद्धि का प्रयोग करना भूल चुके हैं। ऐसे में कतारों में खड़ा वर्तमान अपने भविष्य की आशंकाओं के लिए राजसत्ता या मीडिया की ओर निहारते समय यह क्यों भूल जाता है कि राजनीति की शतरंज पर कोई प्यादा यदि अनवरत विकास करते हुए विपक्षी हाथी के घर तक पहुँच जाता है तो वह स्वयं भी हाथी बन जाता है और फिर वह प्यादे की सीमाएं भूलकर हाथी जैसा आचरण करने लगता है।

✍️ चिराग़ जैन

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