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चुनाव तंत्र

एक दल बोलता है हमको थमा दो देश हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं एक दल बोलता है हमको थमा दो देश जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल जनता को सपने हसीन बेच देते हैं जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं ✍️ चिराग़...

प्रतीक्षा

ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ...

लोक और तंत्र की रस्साकशी

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं – विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता। विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को...

इतिहास : एक कठपुतली

भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं। जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई...

संघर्ष का जयगान

लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया...

द्यूतक्रीड़ा

फिर से द्यूत सजा बैठा है फिर बदले शकुनि ने पासे फिर से चूक हुई विदुरों से फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की फिर पांचाली चीख रही है,...
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