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वसंतोत्सव

सृष्टि के समस्त सर्जकों को सृजन की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अनवरत आशीष मिले!
वसंत की पहली दस्तक और सरस्वती पूजन के पर्व का सुयोग इस बात का द्योतक है कि सौंदर्य और सकारात्मकता ही सृजन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं।
प्रकृति पर आच्छादित वासंती रंग की सुवास श्वास के साथ घुलकर मन को स्वस्थ करे ताकि सृजन का मानस स्वस्थ हो और तूलिका, लेखनी, वाद्य, कण्ठ, अंगुलियाँ, हथेलियां और ओष्ठ सब कुछ सकारात्मक हो उठे!
बाँस को बाँसुरी न बनाया गया तो वह या तो हथियार बन जाएगा या ज्वाला को जन्म देगा!

✍️ चिराग़ जैन

सफ़र

आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

हो रही है थकान पानी को

किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को

कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को

चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को

रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को

सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को

✍️ चिराग़ जैन

उसको बदनामी से डर लगता था

पलकों में पलते सपनों की नाकामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

मैं उसकी आँखों में गुम था, वो सबकी नज़रें पढ़ती थी
मैंने प्यार किया बिन मतलब, वो बिन कारण के लड़ती थी
दुनिया भर की बातें सुनकर आँखों में पानी भरती थी
मैं उसको समझाता था तब जाने क्या सोचा करती थी
जीना-मरना साथ करूँगा, इस हामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

दुनियावाले क्या सोचेंगे -इसका सोच-विचार बहुत था
हिम्मत करने से बचती थी, वैसे उसको प्यार बहुत था
किस रंग के दरवाज़े होंगे, क्या दीवारों का रंग होगा
कितनी फुलवारी फूलेगी, कैसा फूलों का ढंग होगा
सपनों के इस सुंदर घर की नीलामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

जब भी प्यार किया जाता है, सोच-विचार नहीं करते हैं
सोच-समझने वाले अक्सर, पूरा प्यार नहीं करते हैं
मर-मिटने का ख़ौफ़ नहीं हो, तब जीना अच्छा लगता है
सपनों में जीकर तो देखो, हर सपना सच्चा लगता है
हर ख़ूबी की चाह थी उसको, हर ख़ामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

✍️ चिराग़ जैन

विविधता में एकता

भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।

हमें ऐसे बहुत सारे चैनल नहीं चाहियें जो समाज में परस्पर द्वेष की भावना भरकर आग भड़काएँ, हमारे लिए वह एक चैनल पर्याप्त है जो प्यार और भाईचारे का संदेश देकर देश को मिल-जुलकर रहना सिखाए

✍️ चिराग़ जैन

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