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चंद्रग्रहण

कई रोज़ से देख रहा था
कि बादल के आगोश से निकल कर
और ख़ूबसूरत लगता था चाँद
और बढ़ जाती थी उसकी चमक
जैसे किसी ने फेशियल कर दिया हो
प्यार का!

लेकिन कल रात
तमतमाया हुआ था चाँद का चेहरा
शोले टपक रहे थे उसकी आँखों से
क्योंकि कल रात
जिस साये ने जकड़ लिया था चाँद को
उसकी छुअन में प्यार नहीं
सिर्फ़ ज़िद्द थी
किसी नफ़रत
किसी चिढ़
या किसी जलन से भरी
…..एक वहशी ज़िद्द!

और ज़िद्द
मुँह तो काला कर सकती है
पर मन हरा नहीं कर सकती
मौसम ग़ुलाबी नहीं कर सकती!

✍️ चिराग़ जैन

गुनाहों का एहतराम

दिल में उग आए गुनाहों का एहतराम करें
काम यूँ झूठे दिखावे का हम तमाम करें

बाद मरने के क़सीदे तो पढ़ेंगे सब ही
लोग कुछ हों, जो हमें जीते जी सलाम करें

ज़ीस्त! हम कर चुके जो तेरे साथ करना था
मौत अब आ मरे तो उसका इंतज़ाम करें

इस तरह अक़्ल पे तारी हो नश्अ बोतल का
वाइज़ आए कोई मिलने तो राम-राम करें

हमने तहज़ीब में जिन-जिन से करी है तौबा
वो सारे काम करें, और सुब्हो-शाम करें

✍️ चिराग़ जैन

वादा खि़लाफ़ी

सागर
मुक़द्दमा कर रहा है नदी पर
वादाखि़लाफ़ी का।
कहता है
मिलने का वादा करके
पहुँची ही नहीं
अब कोई प्रश्न नहीं है मुआफ़ी का।
नदी बेचारी
पर्वत की कृपणता
और मरुथल की वासना के बीच
बून्द-बून्द सिमटती रही
घाट-घाट घटती रही।
नदी के भीतर उग आई
सभ्यताओं ने
कठघरे में खड़ी नदी को
दोषी क़रार दिया
फ़ैसला सुनकर
पर्वत ने नदी से
मुँह फेर लिया
मरुथल ने उसके मुँह पर
धूल का तमाचा मार दिया।
और सागर…
…वह निरंतर
एक मीठी छुअन के अभाव में
मर रहा है
किसी नदी के वादा निभाने की
प्रतीक्षा कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

संजू

आरोप को अपराध मानकर किसी के प्रति राय क़ायम कर लेने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति किसी के जीवन को किस हद्द तक चुनौतियों से बेन्ध सकती है -इसी तथ्य की प्रामाणिक कथा है संजू। मीडिया इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर जनमानस की मानसिक लतों का पोषण करता हुआ अपना गुजर-बसर कर रहा है।
हम कुछ परंपरागत अफवाहों को सच मानते हुए अपनी कई पीढ़ियाँ बर्बाद कर चुके हैं। अफवाहों के इसी हवनकुण्ड में कई महत्वपूर्ण जिंदगियां स्वाहा करने में हम कभी हिचकते भी नहीं हैं। संजय दत्त ऐसे ही हवन कुंड में भस्म हुई एक ऐसी प्रतिभा का नाम है जिसने उतार-चढ़ाव के अनेक आश्चर्यजनक दौर जिये।
संजू फ़िल्म हर उस ख़बर पर एक प्रश्नचिन्ह है जिसने डेढ़ मिनिट की सनसनी के चक्कर में एक मुकम्मल ज़िन्दगी तबाह कर डाली। सामाजिक जीवन जीने वालों के व्यक्तिगत चरित्र की पड़ताल करना और उसके विषय में कहानियों की फसलें बोने में हमे बड़ा मजा आता है। आश्चर्य यह है कि किसी पर आरोप लगाकर उसकी चरित्र-हत्या करने वाला मीडिया आज तक कभी किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद क्षमायाचना करने भी प्रकट न हो सका।
अदालतों में चल रही सुनवाई को दरकिनार कर फैसले सुनाने वाले मीडिया की घिनौनी तस्वीर का पर्दाफाश किया गया है इस फ़िल्म ने। फ़िल्म को देखकर संजय दत्त के प्रति संवेदना जन्मती है और सुनील दत्त के प्रति सम्मान। चुनौतियों से जूझने की प्रवृत्ति और कभी न थकने का जज़्बा उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसे अब से पहले न तो किसी न्यूज़ चैनल ने स्पेशल स्टोरी बनाकर दिखाया था न ही किसी गॉसिप मैगज़ीन ने। कमलेश उर्फ परेश जैसे किसी दोस्त का रिश्ता संजय दत्त की किस्मत से ईर्ष्या उत्पन्न करता है।
मज़े की बात यह है कि संजय दत्त के रोम-रोम पर नज़र रखने वाली मीडिया को उनके इस साए का कभी आभास न हुआ। ड्रग पेडलर्स कैसे काम करते हैं और बचपन पर अधिक अनुशासन कैसा असर डालता है -इन दोनों सवालों को बहुत करीने से फ़िल्म में पेश किया गया है। सिल्क स्मिता के बाद सम्भवतः पहली बार किसी भारतीय सिने स्टार की बायोपिक बनी है। बदनाम ज़िन्दगियों के अनकहे पहलुओं को उजागर करती ये दोनों ही फिल्में यह तो सिद्ध करती हैं कि अखबारों के समझाने पर जिसे हम बुरा आदमी कहकर छोड़ देते हैं उसके भीतर भी काफ़ी कुछ अच्छा छुपा होता है जिसे देखने के लिए उसके साथ कुछ वक़्त बिताने की दरकार होती है।

✍️ चिराग़ जैन

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