Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
जब घिरे सवाल तो निदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
लोग जो परोपकार की मिसाल हो गए
दूसरों का दर्द ओढ़कर निहाल हो गए
उन प्रजातियों का ख़ानदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
प्रीति की प्रतीतियों में लीन राधिका हुई
प्रेम की हवाओं में विलीन साधिका हुई
ज्ञानवान प्रीति के प्रमाण खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
गौण हो गईं तमाम नीतियाँ ज़मीन पर
सत्य का असर हुआ न न्याय की मशीन पर
सुर्ख़ियों में रोज़ संविधान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
कर्मशील, भाग्यवान से परास्त हो गया
योग युद्ध का बना, तभी नसीब सो गया
तीर हाथ में रहा, कमान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Reviews, Unpublished
स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”।
हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा रहा है, और फ़िल्म में ये दोनों रंग बख़ूबी भरे भी गए हैं, लेकिन फिल्मकार ने चुपके से स्त्री की वर्तमान परिस्थितियों का संदेश भी इन रंगों में मिला दिया है।
फ़िल्म में नायक राजकुमार राव ने एक संवाद बोला है- “हमारा सामना एक ऐसी चुड़ैल से है जो पढ़ी-लिखी है, और आज्ञाकारी भी है। हम अपनी पर आ जाएं तो इससे जो चाहे करा सकते हैं।” बस यही संवाद स्त्री की सामाजिक स्थिति का संपूर्ण ग्रंथ है। स्त्री की स्थिति आज भी ठीक पहले जैसी ही है। बस अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि पहले जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तो पुरुष उसे मार-पीट कर अपनी मनमानी करता था और आज जब वह पढ़-लिख गई है तो हम सभ्यता से दीवार पर लिख देते हैं- “ओ स्त्री कल आना”; बस इसे पढ़कर सदियों से आज्ञाकारी रही स्त्री कल का इंतज़ार करने लगती है, और पुरुष उसे टरका कर अपने जश्न में मशगूल हो जाता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में चौकीदार रात में पहरा देते हुए पुरुष प्रधान समाज पर एक और तीखा प्रहार करते हुए आवाज़ लगाता है -“ओ स्त्री, मत आना! इस शहर में कोई मर्द नहीं है।” यह एक वाक्य समाज की अंतरात्मा को झखझोरने वाला वाक्य है। पुरुष को मर्दानगी के वास्तविक मआनी बताने वाला महामंत्र है यह वाक्य। स्त्री की अपेक्षाओं के समक्ष पुरुष की दुर्बलता का तमाचा है यह एक वाक्य।
फ़िल्म में श्रद्धा कपूर स्त्री सशक्तिकरण के अभियानों पर व्यंग्य करते हुए कहती है कि- “स्त्री अपने घर में बहुत शक्तिशाली होती है, उसे घर से बाहर लाओ, फिर मारो।” अद्भुत कटाक्ष है यह। समाज में नारी को उसकी भूमिका निर्वाह करने से रोककर उसे अर्थोपार्जन की मशीन बना देने के कुत्सित षड्यंत्रों पर कुठाराघात किया है इस संवाद ने।
स्त्री के स्त्रीत्व को भी फिल्मकार ने बख़ूबी समाहित किया है। “स्त्री की शक्ति उसकी चोटी में है, चोटी काट दो तो वह मरेगी नहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाएगी।” यह वाक्य स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लेने की कहानी कहता है।
स्त्री के मन को स्वर देते हुए फ़िल्म कहती है कि “आज तक इस शहर ने उसे दो चीज़ें नहीं दी, एक प्यार और दूसरी इज़्ज़त। वह इन्हीं दो चीज़ों की भूखी है।” यह बात समझ कर फिल्मकार ने पुनः एक करारा कटाक्ष करते हुए दिखाया कि पुरुषों ने एक इबारत लिखकर आज की पढ़ी-लिखी स्त्री से अपनी मनमानी करवा ली और लिखवा दिया “ओ स्त्री रक्षा करो”। यहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है क्योंकि समाज आश्वस्त है कि इस वाक्य को पढ़कर स्त्री समाज की रक्षा करने लगेगी।
फ़िल्म के निर्माता की सोच को प्रणाम करने का दिल करता है। साथ ही दर्शकों की समझ पर मन भर आता है कि जिन संवादों का ज़िक्र मैंने ऊपर किया था उन सब पर हॉल में ठहाके गूंज रहे थे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
माली ने
माला बनानी चाही
झखझोरी गईं डालियाँ .
बेन्धे गए फूल
लदता रहा धागा।
शिल्पी ने मूर्ति गढ़नी चाही
टूटते रहे पत्थर
घिसती रही छैनी
चीखती रही हथौड़ी।
माँ ने रोटी सेंकनी चाही
पीसा गया गेहूँ
गूंदा गया आटा
जलता रहा तवा।
कवि ने कविता लिखनी चाही
तो शब्द अपने अर्थों में सिमट गए
भाषा, व्याकरण की ओट में दुबक गई
और कवि झेलता रहा
यादों की चुभन
भावों का वेग
संबंधों की टूटन
अभिव्यक्ति की चीख़
पिघलता रहा उसका मन
आसान नहीं है कविता लिखना
खौलते तेल में
जलेबी छोड़ने का अनुभव चाहिए हुज़ूर
गति और यति
एकदम सही
ज़रा सी भी कम ज़्यादा हुई .
तो थप्पा सा तल जाएगा ख़मीर का
फिर इन बारीक़ नखरीली चकरियों को
चाशनी में पगाना
क्या मज़ाल कि एक भी जलेबी टूट जाए!
कारीगरी है साहब
तभी तो कानों में
करारी मिठास सी घोल जाती हैं
….ग़ालिब की ग़ज़लें
….तुलसी की चौपाइयां!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
हार का ख़ौफ़ गुनहगार बना देता है
जीत की चाह कभी वार नहीं कर सकती
हाथ वहशत की ग़ुलामी पे अड़े थे, वरना
फूल का क़त्ल तो तलवार नहीं कर सकती
बेच दी होगी चकाचौंध में ग़ैरत उसने
भूख इंसान को ग़द्दार नहीं कर सकती
रौशनी नूर तो आलम पे लुटा सकती है
पर अंधेरे को गिरफ़्तार नहीं कर सकती
अश्क़ अशआर के लहज़े में बयां होते हैं
आशिक़ी दर्द को अख़बार नहीं कर सकती
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
ख़र्च ही भेजना रिश्ता नहीं साबित करता
प्यार कितना है, ये पैसा नहीं साबित करता
बस यही बात उसे सबसे बड़ा करती है
वो किसी शख़्स को छोटा नहीं साबित करता
ख़ुद ही दिख जाती है परबत की बुलन्दी सबको
ख़ुद को आकाश भी ऊँचा नहीं साबित करता
सच तो अपनी ही हक़ीक़त बयान करता है
वो किसी और को झूठा नहीं साबित करता
सबको आगोश में भर लेता है आगे बढ़कर
कौन क़तरा है, ये दरिया नहीं साबित करता
रौशनी कितनी है ये बात बताता है ’चिराग़’
कितना गहरा था अंधेरा, नहीं साबित करता।
✍️ चिराग़ जैन