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क्षमा : एक पर्व

क्षमावाणी मनुष्य इतिहास का सर्वाधिक वैज्ञानिक पर्व है। यह मनुष्यता के लिए सबसे आवश्यक त्योहार है। ‘क्षमा’ मानव के चरित्र निर्माण का सर्वाधिक प्रबल यंत्र है।
क्षमादान कठिन है किन्तु क्षमायाचना उससे भी अधिक कठिन है। क्षमा करनेवाले के पास कहीं न कहीं बड़प्पन का कोई अहंकार हो सकता है, किंतु क्षमा याचना करनेवाला तो हर अहम् से मुक्त होता है। क्षमा मांगने के लिए अहम् को तिरोहित कर देना अपरिहार्य है। जिसने यह कर लिया वह उत्सव का अनुभव कर सकता है।
‘क्षमा’ – लिखना कठिन है, बोलना और भी कठिन है, अनुभूत करना इससे भी अधिक कठिन है और क्षमा कर पाना सबसे कठिन है। व्यवहारिक धरातल पर जब हम जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, उस समय स्थितप्रज्ञ रहकर विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहजता को अक्षुण्ण रखना बेहद दूभर होता है। कई बार आपकी क्षमाशीलता को आपकी दुर्बलता समझ कर विपरीत पक्ष आपको प्रतिक्रिया हेतु विवश करता है। ज्ञानी कहते हैं कि सामनेवाला कुछ भी करे, आपको क्षमाशील बने रहना है। किन्तु मेरा मत है कि मनुष्य ने जितने भी संबंध निर्मित किये हैं, उनमें ‘क्षमा’ का संबंध एक ऐसा संबंध है जिसका द्विपक्षीय होना अपरिहार्य है।
यदि दूसरा पक्ष क्षमा के सूत्र में बंधने को तैयार न हो, और हम इकतरफ़ा क्षमा करते रहें तो धीरे-धीरे क्षमा करने वाले व्यक्ति में स्वयं के महान होने का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगता है। इसके जन्मते ही वह दूसरे को पहले मूर्ख और फिर तुच्छ समझने लगता है। और आगे बढ़ने पर घृणा जन्म लेती है, और अंततः स्थिति पुनः कटुता की ओर बढ़ जाती है। इसलिए क्षमा के संबंध को साधना है तो इकतरफ़ा निबाह से काम नहीं चल सकता।
साँप के काटने पर अहिंसक रहनेवाले तथागत का उदाहरण हमें याद रखना चाहिए किन्तु सौ गालियाँ देने वाले शिशुपाल का उदाहरण भी हमें नहीं बिसारना चाहिए। यह केवल अपने लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु ‘क्षमाभाव’ के वैभव हेतु भी अपरिहार्य है। यदि थोड़ा-सा ध्यान करेंगे तो हमें ऐसी परिस्थितियों के अनेक उदाहरण अपनी ही ज़िन्दगी के आसपास मिल जाएंगे।
जिस शस्त्र से शत्रु को परास्त करना हो, उसकी साधना और उसकी पड़ताल बेहद आवश्यक हैं। हमने ‘मुआफ़ी‘; ‘सॉरी’; ‘क्षमा’ जैसे शब्दों को इतना बेमआनी बनाकर रख दिया है कि न तो बोलनेवाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही सुननेवाले को।
जैनियों के पर्युषण पर्व इस शब्द को प्राणवान करने की साधना है। दस दिन के ये पर्व अवचेतन तक क्षमा के पहुँचने का मार्ग हैं। पहले दिन क्षमा का अर्थ समझना होता है, उसके बाद मार्दव, आर्जव आदि के माध्यम से चित्त को क्षमा मांगने योग्य बनाया जाता है, तब कहीं जाकर क्षमा ‘वाणी’ में साकार होती है।
एक बार मुख पर क्षमा विराजित हुई कि त्योहार हो गया, एक बार जिव्हा ने क्षमा चख ली तो फिर मन इतना हल्का हो गया कि वह नाच उठा। फिर अलग से ढोल-नगाड़े नहीं बुलाने पड़ते। फिर तो भीतर का संगीत झूम उठता है। जिन ग्रंथियों ने मन को जकड़ रखा था, वे इस एक शब्द की गूँज से विलीन हो गईं।
यह प्रयोग बेहद सार्थक है। यह आपने भी यकीनन कभी न कभी आज़माया ही होगा। यदि न आज़माया होता तो आप आज जीवित न होते। क्षमा के अभाव में जीवित रहना असंभव है। क्षमा के बिना जीवन ऐसे ही है जैसे किसी झल्लीवाले की पीठ पर लगातार बोझा बढ़ता रहे और उसे उतारने का कोई उपाय ही न किया जाए। फिर अधिक देर तक पीठ बोझा उठा न सकेगी। यह तो कमर टूट जाएगी या लकवा मार जाएगा। बोझा उतारा न गया तो झल्लीवाला यकीनन मर जाएगा।
हमारा मानस संसार में खड़ा यही झल्लीवाला है। दिन-प्रतिदिन के व्यावहार में इस पर बोझा बढ़ता जाता है। क्षमा मन का बोझा उतार देने का उपाय है। भीतर सड़ांध मारती ग्रंथियों से मुक्त होकर जीवन की सुवास भोगने का ज़रिया है। यही कारण है क्षमादान उतना आवश्यक नहीं जान पड़ता, जितना आवश्यक क्षमा याचना है।
अपने भीतर जो कचरा भर गया है, उसे कचरा मानने के लिए तैयार होना कठिन है। उसकी पहचान करके यह स्वीकार कर पाना कि हमने अपने भीतर कचरा रख लिया था- यह आसान काम नहीं है। इस मूर्खता के लिए सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी पड़ती है। इस विद्रूपता के लिए अपने आप पर हँसना पड़ता है। यह आसान नहीं होता। दूसरे पर हँसना बहुत आसान है, किंतु अपने आप पर हँसना बड़ा श्रमसाध्य काम है। लेकिन इस सोपान के बिना क्षमा का सुख भोगना नामुमकिन होगा।
‘क्षमावाणी’ पर्व के अवसर पर एकांत में बैठकर अपनी ग़लतियों को याद करना। अपने भीतर भरे द्वेष और घृणा के कचरे की पहचान करने का प्रयास करना। जिसके प्रति क्षोभ या अपराध बोध हो, उसके साथ घटित हुई सर्वाधिक कड़वी घटना को याद करना और फिर जिससे मांगनी हो, उसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पूरे चैतन्य मन से क्षमा याचना करना। अगर आज भी रेडीमेड क्षमा मांग ली तो यह पर्व निरर्थक रह जाएगा। अगर आज भी प्राणहीन क्षमा कर के रह गए तो पीठ का बोझा न उतर सकेगा। अगर आज भी खोखली औपचारिकता में फँसे रह गए तो मन को निर्ग्रंथ करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से जाता रहेगा।

✍️ चिराग़ जैन

नीरज नहीं मरा करता है

बीसवीं सदी की समग्र गुनगुनाहट की कहानी, जिस एक जिल्द में सिमटकर पूर्ण होती है उसका शीर्षक है- ‘गोपालदास नीरज’! पीड़ा की अनुभूति को उत्सव के शिल्प में अभिव्यक्त करते किसी भरपूर गीत की जन्मकुण्डली बनाई जाए, तो वह नीरज की जन्मकुंडली होगी।
नीरज का जीवन एक ऐसा बेहतरीन उपन्यास है, जो अनेक रोचक लघुकथाओं से मिलकर बनता है। नीरज की कविता किसी चमचमाते हुए पत्थर का वह टुकड़ा है, जिसके निर्माण में सदियों की पीड़ा का श्रम सम्मिलित है। वे अक्सर कवि-सम्मेलन के मंच पर एक शेर पढ़ते थे- ‘इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, तुमको लग जाएंगी सदियाँ हमें भुलाने में’। इसे पढ़ते समय उनके अधर एक विशेष मुद्रा में खिल-खिल जाते थे और आँखों में एक उपहास ठहाका लगाने लगता था। ऐसा जान पड़ता था, मानो वे अपने कष्टों की पराजय पर जीत का जश्न मना रहे हों।
गीतकार होने के लिए पीड़ा को जिस सीमा तक सुर-ताल के तटबंध का भान होना चाहिए, दर्द को जिस सलीके से छंद की यति-गति का शऊर आना चाहिए वह नीरज जी के यहाँ ख़ूब समझ आता है। वे अपने हर गीत में किसी अमूर्त से बतियाते नज़र आते हैं। इस अमूर्त की बिल्कुल सही पहचान कर पाना असंभव है। कभी वे भाग्य की आँखों में आँखें डालकर अपनी फक्कड़ बेफ़िक्री का बयान दर्ज कराते हैं; तो कभी एक नज़र में सारे ज़माने को चिढ़ाते हुए, अपनी गुनगुनाहट पर इतराने लगते हैं। कभी समस्याओं का गिरेबान पकड़कर समाधान का परिचय पत्र दिखाते फिरते हैं; तो कभी निराशा पर ठहाका लगाते हुए जिजीविषा के हस्ताक्षर जड़ देते हैं।
नीरज का विफल प्रेमी भी अपने प्रयासों की शत प्रतिशत ईमानदारी के एहसास से भरकर संतुष्टिलोक के किसी दुर्लभ आनंद में निमग्न दीख पड़ता है। नीरज का समर्पण उनके प्रेम को देह से विदेह तक की यात्रा कराने में समर्थ है। वे सौंदर्य की पोर-पोर को भोगते हुए भी अपनी कविताओं के ऋष्यमूक पर उसकी लिप्सा के प्रकोप से अछूते रह पाते हैं।
नीरज की जवाबदेही स्वयं के प्रति है। वे अपने किसी कृत्य अथवा विचार के लिए सफ़ाई पेश नहीं करते। वे अपनी प्रत्येक श्वासोच्छवास के लिए अपने आप के सम्मुख कोई अकाट्य तर्क लेकर प्रस्तुत होते हैं। उनकी इसी प्रवृत्ति के आगे मृत्यु भी उनके एक इशारे पर दोनों हाथ बांधे उनके अंतिम गीत के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर लेती है। उनकी इसी अलमस्त फ़क़ीरी के सम्मोहन में मृत्यु का दूत भी अपना कर्त्तव्य बिसार कर कई वर्ष तक यह गीत सुनता रहता है कि-

ऐसी क्या बात है, चलता हूँ अभी चलता हूँ
गीत इक और ज़रा झूम के गा लूँ, तो चलूँ

बाद मेरे जो यहाँ और हैं गानेवाले
सुर की थपकी से पहाड़ों को सुलानेवाले
उजाड़ बाग़, बियाबान, सूनसानों में
छंद की गंध से फूलों को खिलानेवाले
उनके पैरों के फफोले न कहीं फूट पड़ें
उनकी राहों के ज़रा शूल हटा लूँ, तो चलूँ
ऐसी क्या बात है, चलता हूँ अभी चलता हूँ

…गाते गाते, सचमुच चले गए नीरज जी! उनके बाद छंद की गंध से फूलों को खिलानेवाले उदास हैं। उनके बाद सुर की थपकी से पहाड़ सो नहीं पा रहे हैं लेकिन उनके गीत इस उदासी में उनके अमरत्व की तान छेड़कर दिलासा देते हैं- ‘छुप-छुप अश्रु बहानेवालो! मोती व्यर्थ लुटानेवालो! कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।’

✍️ चिराग़ जैन

युद्ध के बाद

दो देश आमने-सामने खड़े हैं। सीमा पर तनाव है। नभ, थल और जल में होनेवाली हर आहट किसी अनहोनी की आशंका से मन कँपा रही है। यह कंपन, भय का कंपन कतई नहीं है। देश की रक्षा में तैनात वीर बेटों को मृत्यु से भयभीत होने की फ़ुर्सत होती ही कहाँ है।
मीडिया, युद्ध के उन्माद को भुनाकर टीआरपी बटोर रहा है। अपने आरामदायक बिस्तर पर लेटकर दर्शक किसी एक्शन फिल्म की तरह इन बुलेटिन्स को देखते हुए उन्मादी हो रहे हैं। टीवी की स्क्रीन से नज़र हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाओ तो सोशल मीडिया पर युद्ध की उतावली दिखाई देने लगती है। पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय पायलट की दुर्दशा का वीडियो क्लिप फॉरवर्ड करके हर कोई अपने मोबाइल में दर्ज संपर्कों पर यह इम्प्रेशन जमा रहे हैं कि मेरे पास सबसे पुख्ता और लेटेस्ट जानकारियाँ हैं।
इससे शायद हमारा कोई सूक्ष्म अहंकार पुष्ट होता होगा लेकिन एक पल के लिए उस परिवार के प्रति करुणा भी जागनी चाहिए जिसका बेटा इस वीडियो में दुश्मनों के बीच घिरा दिखाई दे रहा है। हम शेखचिल्ली की तरह वीरता की बड़बोली बातें करते समय यह कल्पना ही नहीं कर पाते कि इस अपरिचित पायलट की जगह हमारा अपना कोई इस वीडियो में दिखाई दे रहा होता तो शायद उंगलियाँ रूह से पहले काँप जातीं।
दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुकने के बाद यूरोप ने युद्ध से तौबा कर ली है। पूरा यूरोप सीमाविहीन हो चला है। युद्ध, अफ़वाह, शौर्य के खोखले जुमले, बदला, हमला, विध्वंस और खून-ख़राबे में नष्ट होनेवाले संसाधन मानव के जीवन स्तर को सुधारने में व्यय हो रहे हैं। कहते हैं कि कलिंग का रक्तपात देखकर राजहठ का शौर्य भी विरक्त हो गया था। कहते हैं कि मरणासन्न सुयोधन ने श्वास डूबने से पूर्व युधिष्ठिर का पश्चाताप देखा था।
कुछ घंटों, कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों का एक युद्ध दो देशों को विकास की दौड़ में दशकों पीछे धकेल देगा। कुछ क्षणों का उन्माद सैंकड़ों चौखटों को हमेशा हमेशा के लिए अंधियारे से भर देगा। कुछ पलों का प्रतिशोध एक पूरी पीढ़ी को अनाथ कर देगा। हमारे पास केवल आँकड़े आएंगे कि भारत के इतने सैनिक ‘शहीद हुए’ और पाकिस्तान के इतने सैनिक ‘मारे गए’। हम मारे गए सैनिकों की संख्या के सम्मुख शहीद हुए सैनिकों की संख्या रखकर कम-ज़्यादा का आकलन करेंगे और क्रिकेट मैच के स्कोरबोर्ड की तरह यह ज्ञात कर पाएंगे कि किसका पलड़ा भारी है। इस प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद हम उन आँकड़ों को भुला देंगे और बेचैनी से न्यूज़ बुलेटिन देखने लगेंगे।
एक पल के लिए भी हम उस मारे गए अथवा शहीद हुए किसी सैनिक के परिवार की मनोदशा का अनुमान लगाने की ज़हमत नहीं उठाएंगे। ख़ूब खून-ख़राबा होने के बाद हमारे यहाँ के डिप्लोमेट्स, उस दुश्मन के डिप्लोमेट्स के साथ बातचीत का लिए स्वीकृति दे देंगे और फिर कुछ घंटों की मशक्कत के बाद किसी समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। इस बीच जिन परिवारों के चिराग़ बूझेंगे उनकी सुधि किसी को नहीं आएगी। मीडिया सीमा रेखा को भूलकर शिखर वार्ता की तैयारियों, अतिथि देश के प्रधानमंत्री की पोशाक, खानपान, रुकने के स्थान और पर्यटन की कवरेज में व्यस्त हो जाएगा।
हम अपने सैनिकों के शौर्य को बिसारकर अपने देश की मेहमान नवाज़ी पर रीझने लगेंगे। एक काग़ज़ के टुकड़े पर हस्ताक्षर होंगे। दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते हुए फ़ोटो खिंचवाएंगे। फिर एक साझा बयान जारी होगा और दस-बारह साल के लिये छुटपुट घटनाओं के भरोसे अपने सैनिकों को छोड़कर अपने-अपने काम में व्यस्त हो जाएंगे।
काश, हम अपने उन्माद के अंधियारे में बेटे खोने का दुःख टटोलने की कोशिश कर पाते। काश हम समझ पाते कि दो मुल्कों के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के जीवन और भविष्य की कीमत पर युद्ध की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं होगा। काश हम स्वीकार कर पाते कि बातचीत की टेबल तक कि यात्रा यदि युद्ध के मैदान से होकर न जाए तो कई आंगनों को बिलखने से बचाया जा सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

समस्या और समाधान

वर्ष 2004 की घटना है। अटल जी की सरकार चली गई थी। उन दिनों अटल जी कुछ अस्वस्थ रहने लगे थे। उन्हीं दिनों नानाजी देशमुख भी अस्वस्थ थे और दिल्ली स्थित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान में प्रवास कर रहे थे। एक शाम अटल जी नानाजी से मिलने पहुँच गए।
नानाजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा – “अटलजी! आप स्वयं अस्वस्थ हो, ऐसे में मेरा हाल जानने के लिए स्वयं आने की क्या आवश्यकता थी?”
अटल जी ने तपाक से उत्तर दिया – “मैं आपसे मिलने नहीं आया हूँ नानाजी! एक कनिष्ठ रोग एक वरिष्ठ रोग से मिलने आया है।”
उत्तर सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरे खिलखिला उठे। नानाजी भी मुस्कुराए और सहज होते हुए पूछा – “आप अस्वस्थ हैं अटलजी! मेरा स्वास्थ्य ख़राब है। आपकी सरकार चली गई है। देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। इन तनावपूर्ण परिस्थितियों में तुम मुस्कुरा कैसे लेते हो?”
अटल जी ने उसी सहजता से उत्तर दिया – “नानाजी! तनाव से केवल समस्याएं जन्म ले सकती हैं, समाधान खोजने हैं तो मुस्कुराना ही पड़ेगा।”

✍️ चिराग़ जैन

हंस की चाल

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण, अर्जुन को लेकर बर्बरीक के पास गए और उनसे पूछा कि युद्ध का परिणाम क्या रहा? बर्बरीक ने उत्तर दिया कि पाण्डव परास्त हो गए। उत्तर सुनकर अर्जुन चकित हो गए और बोले- ‘सारा संसार जानता है कि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका है। सुयोधन वीरगति को प्राप्त हो चुका है। फिर आपको क्यों लगता है कि पाण्डव परास्त हो गए?’
बर्बरीक बोले- ‘कौरव तो प्रारम्भ से कौरव ही थे और अंत तक कौरव ही रहे। किन्तु पाण्डवों को युद्ध जीतने के लिए कई बार कौरव बनना पड़ा। और जो व्यक्ति अपना मूल स्वभाव छोड़ दे उसको परास्त ही माना जाता है।’
यह कथा भारतीय समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर भी अक्षरशः सही सिद्ध होती है। पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमणों से घबराकर पिछड़ जाने के भय से हमने अपने परिवारों का मूल स्वभाव बिसरा दिया है। कट्टरता से भयभीय होकर हमने अपने धार्मिक परिवेश की सहजता को समाप्त कर डाला है। जिस मानसिक ग़ुलामी का रोना रोकर हम पश्चिमी परंपराओं को कोसते हैं उसके प्रथम अपराधी हम स्वयं हैं।
टेलिविज़न, मोबाइल, इंटरनेट या दूसरा कोई भी तकनीकी माध्यम हमारे सांस्कृतिक परिवेश को क्षति नहीं पहुँचा सकता था यदि हम भीतर से भयभीत न हुए होते। प्राप्त को सस्ता और अनुपलब्ध को महंगा समझने की हमारी प्रवृत्ति ने हमें अपने तूणीर में रखे अस्त्र चलाने की सामर्थ्य से वंचित कर दिया और हम प्रतिद्वंदी के चमकीले कमज़ोर तीरों से बिंधते चले गए।
भाषा से लेकर चाल-चलन तक हम अनवरत दूसरों की थाली के घी पर निगाहें गड़ाकर बैठे रहे और अपने पत्तल में रखे चूरमे की अनदेखी करते रहे। यदि हम इस स्थिति को सांस्कृतिक युद्ध मान लें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि योद्धा का पहला अस्त्र उसका हौसला होता है। हम टूटी हुई हिम्मत लेकर रण में उतर तो गए किन्तु अपने देसी भाले को उनकी देखादेखी बंदूक की तरह चलाने के प्रयास में परास्त होते चले गए।
हम अपने विद्यालयों में भारतीय नागरिक तैयार करने चले किन्तु शिक्षा का माध्यम उनका अपना बैठे। हम यह भी न समझ सके कि थाली में परोसी गई खीर न तो रसना को तृप्त कर सकती है न क्षुधा ही शांत कर सकती है। खीर खानी है तो कटोरी ही उपयुक्त पात्र है।
यही व्यवहार हमने अपनी कलाओं के साथ भी किया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित मण्डप पर भरोसा न कर सके और विदेश से आयातित ऑडिटोरियम बनाकर इतराते फिरे। स्वांग और नौटंकी की प्रस्तुति इन विदेशी सभागारों में समा न सकी और धीरे-धीरे इन सभागारों की कृत्रिमता हमारी कलाओं की सहजता को लील गई।
हम आधुनिक दिखने की होड़ में कविताओं के बिम्ब बदलने लगे। माखन-मिश्री और कुंजवन की किलोल के बिम्ब भारतीयता में रचे-पगे बिम्ब थे, जिन्हें हठपूर्वक चॉकलेट और साइबेरिया के जंगलों में बदलने की कोशिश में हम कविता की लोक-ग्राह्यता नष्ट कर बैठे।
कृष्ण और राम की कथाएँ पढ़नेवाले बच्चे कब शिनचैन और नोबिता के चरित्र बाँचने लगे, हमें पता ही न लगा। आर्दश चरित्रों की कथाओं में व्याप्त परिहास के रस को अपमान समझकर हमने अनजाने में उन चरित्रों से पीढ़ियों को विमुख कर दिया। हम भूल गए कि चौपालों के ठहाके और मेलों की ठिठोली में बसी भारतीय संस्कृति परिहास और चर्चा से आहत नहीं होती, अपितु बल पाती है।
जब यह सब कुछ घटित हो रहा था ठीक उसी समय हमारी संस्कृति पर एक और आक्रमण हुआ। इस बार हमारा सामना विज्ञापनों से था। व्यावसायिक हितों की अंधी होड़ में हमारे औद्यौगिक घरानों ने हमारी प्रचलित जीवनशैली को ‘पुराना’; ‘बासी’; ‘पिछड़ा’ और ‘घिसा-पिटा’ बोल-बोलकर अपने उत्पाद बेचे। दंतमंजन से लेकर डिटर्जेंट तक के विज्ञापनों ने भारतीय संस्कृति को अपमानित किया और हम चुपचाप देखते रहे। ‘अब आ गया नए ज़माने का….’ -इस एक जुमले ने भारतीय संस्कृति की जो छवि हमारे मानस पटल पर अंकित की, उसने हमारी सोच को प्रभावित किया। अब हम अपने बच्चों को अंग्रेजी न बोलने पर डाँटने लगे।
टेलिविज़न के इसी व्यामोह में हमने मुहल्ला संस्कृति का पूरी तरह पटाक्षेप कर डाला और अपने-अपने घरों की दीवारों में क़ैद हो गए। सिमटने का क्रम इस हद तक बढ़ा कि घर सिकुड़ कर कमरे बन गए और उत्सवधर्मी भारतीय मनुष्य एकाकी जीवन की चौखट पर नाक रगड़ने लगा।
इन छोटे-छोटे फ्लैट्स में न तो रंगोली के लिए देहरी की जगह बन सकी न ही तुलसी चौरा पूजने के लिए आंगन की। सुक़ून और संतुष्टि के महामंत्र भूलकर हम आपाधापी में इतने व्यस्त हुए कि संध्या वंदन के लिए गौधूलि वेला कब आकर गुज़र गई हमें संज्ञान ही न रहा।
गुडलने चलते बचपन को संस्कारों का ककहरा पढ़ानेवाला मातृत्व अर्थतंत्र की उहापोह में विलीन हो गया और हमने अपने नौनिहालों को क्रेच और प्ले स्कूल के भरोसे छोड़ दिया। शहरी जीवन की विवशताओं और स्त्री-सशक्तिकरण की मुहिम ने भारतीय परिवारों की वैज्ञानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और केवल आर्थिक स्वावलम्बन को नारी-मुक्ति का नाम दे दिया गया। समाज में स्त्री की भूमिका के महती योगदान को उजागर करने के स्थान पर हमने पाश्चात्य प्रचलन का अंधानुकरण किया और स्त्री के द्वारा पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर निर्वाह किये जा रहे दायित्वों की उपेक्षा कर दी। भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका के आधार पर संस्कारों की पाठशाला बन्द हो गईं और हमारी पीढ़ियाँ ट्यूशन या कॉन्वेंट में डिग्रियाँ बटोरने को शिक्षा समझने लगीं।
इसके अतिरिक्त सिनेमा, जो कि राजा हरिश्चन्द्र की कहानी लेकर भारत में प्रविष्ट हुआ था, उसने बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को सर्वाेपरि मानकर अनैतिक यौन संबंधों और हिंसक अपराधी प्रवृत्तियों की वक़ालत शुरू कर दी। जुआरी, ठग, अपराधी, व्यसनी और स्मगलर्स फिल्मों के नायक बनने लगे। मुजरा और कैबरे फ़िल्म की सफलता की गारंटी बन गए और हमारे फ़िल्म निर्माताओं ने आइटम डांस के भड़कीले संगीत में भारतीय सुगम संगीत की सरगम ख़ामोश कर दी।
हमने संस्कृति को बचाने के लिए सरकार की ओर देखा तो सरकार ने योजनाओं का झुनझुना थमा दिया। संस्कृति के ठेकेदार उस झुनझुने के सहारे समय व्यतीत करते रहे और संस्कृति अपनी जर्जर होती देह को लुकाते-छिपाते समय काटती रही।
धागे से नाड़ी की गति मापनेवाला देश आँख फड़कने पर पेन किलर खाने लगा और जड़ी-बूटियों के रसायन विज्ञान से हमारा भरोसा उठ गया। लट्टू से खेलते बच्चे हमें आवारा लगने लगे और बेब्लेड चलाते बच्चे सभ्य।
भारतीय संस्कृति के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम युद्ध जीतने के लिए कौरव बनते रहे और अपने मूल स्वभाव की उपेक्षा करते रहे। हमें यह समझना होगा कि ऊँट रेगिस्तान का जहाज है। उसे प्रकृति ने रेत पर दौड़ने की शक्ति दी है। यदि कोई कार उसे स्पर्धा के लिए ललकार बैठे तो उस कार को रेत में दौड़ने के लिए आमंत्रित करो, न कि स्वयं हाइवे पर जाकर कार की तरह दौड़ने की होड़ करो।

© चिराग़ जैन

ज्ञान की सजावट

भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

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