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भाषा : सिनेमा से समाज तक

हिन्दी सिनेमा की भाषा भारतीय समाज में हिंदी की यात्रा का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने के लिये पर्याप्त है। ज्यों-ज्यों समाज की भाषा बदली त्यों-त्यों सिनेमा की भाषा भी बदलती गयी।
प्रारंभिक हिंदी फिल्मों में एक ओर उर्दू शब्दावली की भरमार थी तो दूसरी ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी भी सहज स्वीकार्य होती थी। ‘ग़म दिये मुस्तक़िल’ जैसे गीत उन दिनों लोकप्रियता के प्रतिमान बन जाते थे। मजरूह का ही ‘हम हैं मताए-कूचा-ए-बाज़ार की तरह’ जैसी ख़ालिस उर्दू की ग़ज़ल भी न केवल स्वीकार्य थी बल्कि जनता के मुँह पर चढ़कर बोलती थी। उर्दूनिष्ठ हिंदी के ये उदाहरण बाद में शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ी आज़मी, जांनिसार अख़्तर और शहरयार से होते हुए गुलज़ार और जावेद अख़्तर के ज़माने तक ख़ूब दिखाई देते हैं। हाल ही में ‘मेरे रश्के-क़मर तूने पहली नज़र इस तरह से मिलाई मज़ा आ गया’ गीत की लोकप्रियता ने उर्दू की स्वीकार्यता पर पुनः मुहर लगाई। यह भी सत्य है कि उर्दू की गाढ़ी शब्दावली के प्रयोग में अब, पहले की अपेक्षा, क़ाफ़ी कमी आ गई है। हाँ, आम बोलचाल की उर्दू पहले भी ख़ूब प्रचलित थी और आज भी उसकी स्थिति में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिलता।
उधर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के उदाहरण स्वरूप भरत व्यास के गीतों ने बड़ी लक़ीर खींची। ‘हरी-भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन’; ‘प्रणय, विरह और मिलन की कथा सुनो साथी’; ‘कल्पना के घन बरसते’ और ‘ओ पवनवेग से उड़ने वाले घोड़े’ सरीखे गीत हिंदी सिनेमा के उस दौर की पहचान बने। इंदीवर ने ‘चन्दन सा बदन, चंचल चितवन’ जैसी शब्दावली से पण्डित जी की इस परंपरा को पुष्ट किया। गोपालदास नीरज जी ने ‘मदिर’; ‘पाती’ और ‘जल’ जैसे शब्दों को गीत में पिरोकर प्रचलित कर दिया। क्लिष्ट शब्दावली के प्रयोग के और भी तमाम उदाहरण हिंदी फिल्मी गीतों में आसानी से ढूंढे जा सकते हैं। बालकवि बैरागी जी द्वारा लिखे गये गीत ‘तू चंदा मैं चांदनी’ में ‘तरुवर’ और ‘पाख’ जैसे शब्द बड़ी आसानी से प्रयुक्त हुए हैं। इससे इंगित मिलता है कि उस समय तक हमारे जन की भाषा में प्रचलन से बाहर हुए शब्दों को पुनर्जीवित करने की क्षमता थी।
इससे अलग एक धारा आमफ़हम शब्दों के दायरे से बाहर जाने से परहेज करती रही। शैलेन्द्र के गीतों में हिंदी का सर्वाधिक जनसुलभ स्वरूप प्रदर्शित होता है। वे दर्शन के गीत भी सबसे सादा शब्दावली के परकोटे से बाहर नहीं जाने देते थे। ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’; ‘वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ’; ‘सजन रे झूठ मत बोलो, ख़ुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है वहाँ पैदल ही जाना है’ और ‘याद न जाए बीते दिनों की’ जैसे गीत उसी भाषा के उदाहरण हैं जो हम आज भी आम बातचीत में प्रयोग करते हैं। क़ैफ़ भोपाली, राजा मेहदी अली ख़ान, इंद्रजीत सिंह तुलसी, पण्डित नरेंद्र शर्मा, विट्ठलभाई पटेल और राजेंद्र कृष्ण जैसे रचनाकार भी लगभग इसी आम शब्दावली की परंपरा के गीतकार रहे। और यह शब्दावली ही फिल्मों में सर्वाधिक अपेक्षित भी रही, क्योंकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी और उर्दूनिष्ठ हिंदी लिखनेवाले रचनाकारों के यहाँ भी इस शब्दावली के उदाहरण ख़ूब दिखाई देते हैं।
समय के साथ हमारी भाषा में पंजाबी के शब्दों की उपस्थिति बढ़ने लगी। ऐसे में आनन्द बख़्शी और संतोष आनन्द ने पंजाबी के शब्दों का सहजता से प्रयोग किया। ‘कुड़ी’; ‘मुंडा’ जैसे एकाध शब्द का प्रयोग बाद में इतना बढ़ा कि आनंद बख्शी ने ‘बिंदिया चमकेगी’ गीत की प्रत्येक तुकांत पंक्ति में बाक़ायदा पंजाबी का व्याकरण प्रयोग किया – ‘छत टुटदीये ते टुट जाये’।
लोकशैली के गीतों और कहीं-कहीं शुद्ध लोकगीतों को फिल्मों में प्रयोग किया गया तो अवधी, बृजभाषा, मराठी और भोजपुरी के हस्ताक्षर फिल्मी गीतों में चलने लगे। ‘चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे’, ‘ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे’ और ‘कौन दिसा में ले के चला रे बटोहिया’ जैसे गीत इस धारा की गीतशैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
‘गॉड प्रॉमिस हम सच बोला है’ जैसे मुम्बइया हिंदी के भी कुछ गीत फिल्मों का हिस्सा बने। लेकिन यह प्रयोग बहुत अधिक प्रचलित न हो सका। इसी तरह दक्खिनी हिंदी का तड़का लगाकर ‘हमें काले हईं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ जैसे भी एकाध गीत लिखे गए; लेकिन वे भी चरित्र की मांग से अधिक अपनी स्वीकार्यता न बना सके। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों का लक्ष्य दर्शक इस भाषा से बहुत परिचित नहीं रहा।
विशेष प्रयोग के रूप में दूसरी पीढ़ी की फिल्मों में भाषाओं के सम्मिश्रण के कुछ उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उनको भी परंपरा न बनाया जा सका। साहिर ने ‘न तो करवां की तलाश है’ में पंजाबी, ब्रजभाषा और उर्दू का अद्भुत समागम प्रस्तुत किया। नीरज जी ने भी ‘छुपे रुस्तम हैं ज़माने की ख़बर रखते हैं’ में अवधी का तड़का लगाकर क़व्वाली की खूबसूरती बढ़ाई। लेकिन इनकी सनद लेकर आगे के गीतकार ऐसे बहुत अधिक प्रयोग न कर सके।
फिल्मों की छठी-सातवीं पीढ़ी में अचानक अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। यहाँ से शब्दों की तोड़-फोड़ प्रारम्भ हुई। भाषा खिचड़ी होने लगी। यह स्पष्ट रूप से कहना कठिन होगा कि यहाँ से जनता की भाषा फिल्मों ने बदली या फिल्मों की भाषा जनता ने! अंग्रेजी के मुहावरे और विशेष रूप से ‘आई लव यू’ वाक्यांश का प्रयोग गीतों में बहुतायत में होने लगा। वीनू महेंद्र ने ‘लवेरिया’ जैसा शब्द गढ़कर भी गीत लिखा, जो अपने समय मे मिसाल बन गया। आनन्द बख्शी ने भी अंग्रेजी के सहज शब्दों का प्रयोग करने के साथ-साथ कहानी की मांग पर अंग्रेजी के व्याकरण को निभाते हुए भी ‘माई नेम इज़ एंथोनी गोंसाल्विस’ जैसा गीत भी लिखा।
इसके बाद गीतों की भाषा कब हिंग्लिश हो गई, पता ही न चला। वे वर्जित शब्द जिन्हें असंसदीय या अश्लील समझा जाता था, वे भी गीतों में सम्मिलित होने लगे। हम गीत-ग़ज़ल से शुरू होकर गाली-गलौज तक को स्वीकारने लगे। यही स्थिति हमारी आम बोलचाल की भी रही। अंग्रेजी शब्दावली के बढ़ते चलन ने इस स्थिति को पुष्ट करने में महती भूमिका अदा की। एक ज़माने में ‘सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें’ गीत आया था तो सभ्य परिवारों में इस गीत को गुनगुनाने पर बच्चे पीट दिए जाते थे। बाद में यह सब आम हो गया। बॉलीवुड में ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसे चित्रपट कलात्मक दृश्यों के कारण विवादित हो गए, लेकिन उनसे जन साधारण की सोच दूषित न हो सकी। लेकिन गीत और संवाद में अश्लीलता की घुसपैंठ ने आज यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि हमारे समाज की भाषा सभ्यता की मर्यादा लांघ चुकी है।
दृश्य सिनेमाघर के पर्दे पर छूट जाता है और भाषा लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर समाज में छूत की तरह फैल जाती है। भाषा में वर्जित शब्दावली का सामान्य प्रयोग बढ़ने की प्रवृत्ति भाषा के लिए तो घातक है ही, समाज और संस्कृति के लिए भी विषबेल सरीखी है।
हिंदी फिल्मों की भाषा से यदि समाज की भाषा बनती है तो फिल्मों को अपनी भाषा के प्रति उत्तरदायित्व-बोध महसूस करना होगा और समाज की भाषा के आधार पर फिल्मों की भाषा तय होती है, तो हमें अपने परिवारों के भाषा-स्तर के प्रति बेहद गम्भीर होने की आवश्यकता है।
✍️ चिराग़ जैन

हथियार बनाम औजार

भारत जैसे लोकतंत्र में राष्ट्र को सर्वाेपरि मानना बेहद आवश्यक है। इस विचार के अभाव में पूरा तंत्र इतनी विविध वरीयताओं की गुत्थी सुलझाता रह जाएगा कि राष्ट्र के सम्मुख अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो जाएगा।
यही कारण है कि दल, व्यक्ति, परिवार, संगठन, धर्म, जाति और सम्प्रदाय; जो भी स्वयं को बड़ा सिद्ध करने चला, उसके लिए स्वयं को राष्ट्रभक्त सिद्ध करना अपरिहार्य हो गया। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जिसने भी ‘सप्रयास’ स्वयं को बड़ा सिद्ध करने का प्रयास किया उसकी राष्ट्रभक्ति संदेहास्पद ही रही है।
जो राष्ट्रहित अर्पित रहा, उसे कभी कुछ सिद्ध नहीं करना पड़ा। जिसने जनहितकारी कार्य किये उसे अपने आपके प्रति आभार के पोस्टर्स नहीं चिपकवाने पड़े। जिसने पोस्टर लगवाए, वह अंततः राष्ट्रभक्ति की आड़ में सत्ता के लिए संघर्ष करता ही पाया गया।
स्वाधीनता के बाद से सत्ता की यह प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई है। हम पचास प्रतिशत काम और पचास प्रतिशत प्रचार के अनुपात से शुरू हुए थे और शून्य अनुपात शत के पायदान से होते हुए ऋणात्मक स्थिति तक पहुँचने जा रहे हैं। यह राजनीति की आमूल-चूल स्थिति है। इसमें कोई भी दल, कोई भी व्यक्ति, कोई भी विचारधारा और कोई भी दौर अछूता नहीं है।
धर्मनिरपेक्षता की डोरी से लोकतंत्र की कठपुतली नचानेवालों ने स्वयं को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने के चक्कर में देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को तहस-नहस कर डाला। निरपेक्ष होने का अभिनय करके वोट बटोरने की लोलुपता ने कब उन्हें पक्षपाती बना दिया, उन्हें अनुमान ही न हो सका। यदि उनकी धर्मनिरपेक्षता राष्ट्र के हित को सर्वाेपरि रखकर आगे बढ़ी होती, तो आज हम वास्तव में विश्व के सम्मुख एक उदाहरण बनकर खड़े होते। किन्तु उनकी दृष्टि राष्ट्रहित के बिंदु पर स्थिर न रहकर सत्ता के वर्चस्व का त्राटक करती रही।
जब कोई इमारत बन रही होती है तब उसका ढाँचा खड़ा होता हुआ सबको दिखता है। उसकी दीवारें सबको दिखती हैं। इसीलिए स्वाधीनता के उपरांत देश की बुनियाद भरकर इस पर एक-एक ईंट रखनेवाले लोगों के प्रति हमें कृतज्ञ अवश्य होना चाहिए किन्तु यह भी सत्य है कि उन परिस्थितियों में जो भी देश का निर्माण करता वह ठीक इसी दिशा में कार्य करता, जिसमें तत्कालीन राजनीतिज्ञों ने किया। बाढ़ आने पर दो ही काम किये जा सकते हैं, या तो पानी को रोकने का उपाय किया जाए अन्यथा डूबतों को बचाने की मुहिम चलाई जाए। स्वाधीनता के समय की परिस्थितियों में जो भी सत्तारूढ़ होता वह यही करता, यह और बात है कि कुछ लोग पूरे गाँव को बचा ले जाते हैं और कुछ स्वयं भी गाँव के साथ डूब जाते हैं।
हिन्दू हित, मुस्लिम हित, दलित हित आदि डोरियों से सत्ता के मंच पर अपनी डुगडुगी बजानेवालों ने भी यदि वास्तव में हिंदुओं का, मुस्लिमों का या दलितों का हित सोचा होता तो भी हम आज विश्व में उदाहरण बन चुके होते। किन्तु दुर्भाग्य कि इन लोगों ने भी वोटों के ध्रुवीकरण से अधिक अपने-अपने हिंदुओं, अपने-अपने मुस्लिमों और अपने-अपने दलितों की कोई अहमियत न समझी।
यदि इन्होंने अपने समूह के भविष्य की चिंता की होती तो किसी दलित को छुड़ाने के लिए दलित नेताओं के फोन थानों में न जाते। ग़लती करने पर पुचकारने वाले अभिभावक अपनी पीढ़ियों का भविष्य नष्ट कर देते हैं। यदि किसी मुस्लिम नेता को यह पता चले कि उसके समाज के किसी लड़के ने संविधान के अनुसार कोई अपराध किया है, तो उस लड़के के खि़लाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराने उस नेता को स्वयं जाना चाहिए। न कि उस पर हुई प्राथमिकी को रफ़ा-दफ़ा करवाने का उपक्रम किया जाए। यदि ऐसा हुआ होता तो हर समाज में यह संदेश प्रसारित होता कि तुम्हारा धार्मिक कुनबा या तुम्हारा जातीय कुनबा भी देश के क़ानून का अपमान करने में तुम्हारा साथ नहीं देगा।
इतना भर पर्याप्त था, एक सुसभ्य समाज की प्रतिष्ठापना के लिए। किंतु हुआ इसके ठीक विपरीत। हर जाति के छुटभैये गुंडों ने अपनी अपनी जाति के छुटभैये नेताओं से अभय प्राप्त कर लिया। ये छुटभैये नेता उस जाति के वोट की दलाली करते रहे और इसके लिए अपनी ही जाति में सड़कछाप गुंडे पैदा करते रहे।
प्रारम्भ में उस जाति के सामान्य जन पर इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता था, किंतु ज्यों-ज्यों छुटभैये नेताओं की रंगदारी देखी तो दूसरी जाति के गुंडों से संरक्षण पाने के लोभ ने सामान्य जन में भी अपनी जाति कर प्रति कर्तव्यबोध जगा दिया।
काश यह कर्तव्यबोध राष्ट्र के प्रति जागा होता। धर्म की राजनीति भी ठीक जाति की राजनीति की तरह ही काम करती है। अपने आराध्य को राजनीति में घसीट कर छुटभैये नेता अपने पाले हुए छुटभैये गुंडों से फूस बिछवाते हैं और फिर उन गुंडों को भी बताए बिना चुपचाप उस फूस में चिंगारी लगा देते हैं। और हमारे देश से ज़्यादा कौन जानता है कि इस चिंगारी को लपट बनने में कितनी देर लगती है।
एक बार नफ़रत की चिंगारी चमक भर जाए, फिर उन्माद की हवाएँ उससे ऐसी बड़वानल उत्पन्न करती हैं कि सौहार्द, समन्वय, मनुष्यता, करुणा, सद्भावना और क्षमा जैसे शब्द उसकी पहली लपट में ही भस्म हो जाते हैं। विवेक के मजबूत वृक्ष भी उन लपटों से कोयला बन जाते हैं। कुछ दिन तक नफ़रत की आग समाज में ताण्डव करती है। उसके बाद इस आग के बचे हुए ताप पर वोटों की रोटियाँ सेकी जाती हैं।
इस प्रक्रिया में भी लगभग सभी राजनैतिक दल विविधता में एकता का परिचय देते हैं। हम इतने भोले हैं कि हर तीसरी हिंदी फिल्म में इस सबका असली चेहरा देखने के बाद भी यह नहीं समझ पाते कि दंगों का सबसे ज़्यादा नुक़सान उन्हें होता है, जिन्हें दंगों से कोई मतलब ही नहीं है। और दंगों से सबसे ज़्यादा लाभ वो उठाते हैं, जिन्हें कोई नुक़सान नहीं होता।
आजकल सोशल मीडिया ने दंगों को डिजिटल करके राजनीति के इस प्रकल्प को सुदृढ़ कर दिया है। पहले के समय में दंगे करवाने के लिए राजनीति को कई-कई दिन नफ़रत की फसल बोनी पड़ती थी, फिर अफ़वाह फैलवाकर उसको अंकुरित किया जाता था तब कहीं जाकर लोकतंत्र के औजारों को हथियार बनाकर वोटों की फ़सल काटी जाती थी। अब यह काम झटपट हो जाता है। सोशल मीडिया पर सभी दलों की साइबर सैल्स हमेशा केरोसिन में भीगी लकड़ियाँ तैयार रखती हैं। बस किसी भी छोटी-मोटी घटना को ढंग से न्यूज़ बुलेटिन या पैनल डिस्कशन में हवा देकर दंगे की लपट भड़काई जा सकती है।
दल, धर्म, व्यक्ति, परिवार, जाति और भाषा की तरह सोशल मीडिया भी एक औजार है। इससे इस राष्ट्र की मशीनरी को दुरुस्त करने और दुरुस्त बनाए रखने का काम किया जा सकता है। इसीलिए कोई भी मेसेज पढ़ो तो उसका अर्थ ग्रहण करने से पूर्व यह अवश्य विचारिये कि इस मैसेज में हम सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं या फिर सोशल मीडिया के माध्यम से एक बार फिर कोई राजनैतिक दल हमारा उपयोग कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

घूरे में पड़ा अतीत: आशापुरी

भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’
आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।
क गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

मन की सुनने से बचो

हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।

✍️ चिराग़ जैन

फिल्मों से झाँकता लोकतंत्र

हिंदी फिल्मों में भारतीय समाज की पूरी तस्वीर साफ़ दिखाई देती है। एक प्रभावी संचार माध्यम होने के नाते फिल्मों ने जनमत का ही नहीं ‘जन-प्रवृत्ति’ का भी निर्माण किया।
हर फिल्म में एक नायक होता है। यह नायक जो भी करे, उसे सही मानना जनता का धर्म है। इस धर्म के निर्वाह में क़ानून की धज्जियाँ उड़ती हैं तो उड़ जाएँ। इस धर्म के निर्वाह में अदालत का अपमान होता हो, तो हो जाए। इस धर्म के निर्वाह में अराजकता पुष्ट होती हो, तो हो जाए।
जिस फ़िल्म में नायक गैंगस्टर, डॉन या स्मगलर हो, उसमें वह पुलिस को चकमा दे तो हॉल में तालियाँ बजने लगती हैं। वह पुलिस पर गोलियाँ चलाकर फरार हो जाए, तो हॉल में तालियाँ बजती हैं। वह कॉलेज में लड़की छेड़े तो तालियाँ बजती हैं। वह बैंक लूटने की फुलप्रूफ प्लानिंग करे तो तालियाँ बजती हैं। वह गाली दे तो भी तालियाँ बजती हैं। कुल मिलाकर हमें यह समझा दिया गया कि नायक जो भी करे वह प्रशंसनीय है। और हम यह समझ भी गए।
जिस फ़िल्म में नायक पुलिसवाला हो, वहाँ गुंडों की कुटाई पर, राजनेताओं की ठुकाई पर, नियम-क़ानून को ताक पर रखकर अपराधी को सबक़ सिखाने पर हम तालियाँ पीटते रहते हैं। इन फिल्मों में साफ़ दिखाया जाता है कि क़ानून का पालन करके क़ानून का पालन नहीं करवाया जा सकता।
जिन फिल्मों में नायक वक़ील हो, उसमें न्यायालय की अवमानना, पुलिस की मिलीभगत, अदालत के बाहर होने वाले प्रपंच और क़ानून की लाचारी साफ़-साफ़ दिखाई जाती है। हम अदालत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते एक्शन हीरो, और जज के सामने धमकी देते वकीलों को देखकर ताली बजाते हैं।
फिल्मों ने हमें यह भी बताया कि हर नायक के कुछ सहयोगी होते हैं। जिस फ़िल्म का नायक गैंगस्टर हो, उसके सहयोगी छोटे-मोटे गुंडे होते हैं। ये सहयोगी अपने नायक की दादागिरी जमाने के लिए ‘जुगाड़’ करते रहते हैं। भाई को कोई दिक्कत न हो इसके लिए पुलिस से सेटिंग और जनता को साधने के लिए ‘कभी गर्म, कभी नर्म’ की नीति, प्रतिद्वंद्वी गैंग से होने वाले पंगों का निपटारा वगैरा सब इनका काम होता है। पुलिस के आला अधिकारियों और ऊँचे-ऊँचे पॉलिटिशियन्स के साथ नायक का उठना-बैठना होता है, और छोटे-मोटे इंस्पेक्टर वगैरा को सहयोगी सम्भाल लेते हैं।
जिन फिल्मों में नायक पुलिसवाला हो, उनमें ये सहयोगी या तो जूनियर पुलिस अफसर होते हैं या फिर भूतपूर्व गुंडे। इनको साथ लेकर नायक सड़े हुए सिस्टम में पल रहे अपराध के कीड़ों को साफ़ करता है।
इन फिल्मों में भीड़ के शॉट्स भी दिखाए जाते हैं, लेकिन इन शॉट्स की तीन ही सिचुएशन्स होती हैं। या तो यह भीड़, खलनायक और उसके गुर्गों के शोषण से पीड़ित होकर रोती-पीटती दिखाई देती है, या फिर इस भीड़ को खलनायक की दहशत से घरों में दुबकते दिखाया जाता है, या फिर कभी-कभी फ़िल्म के अंत में अधमरे खलनायक को ‘मॉब लिंचिंग’ से मारकर नायक को कोर्ट-कचहरी से बचाने के लिए इस भीड़ का सीन लिखा जाता है। शेष फिल्मों में अगर भीड़ है तो तालियाँ बजाने के लिए या जयकारे लगाने के लिए।
फिल्मों ने हमें बताया कि राजनेता हमेशा भ्रष्टाचारी ही होते हैं। हम भी राजनीति के दाँव-पेंच पर्दे पर देखते रहे और मान बैठे कि राजनीति की कीचड़ में कोई बेदाग़ हो ही नहीं सकता।
मीडिया इन फिल्मों में हमेशा सच को उजागर करता ही दिखाई दिया। इसलिए भ्रष्ट पुलिस, अपराधी और राजनीति को इन फिल्मों में हमेशा मीडिया से डरता हुआ ही दिखाया जाता है। ख़बरें बेचने, ख़बरें दबाने, ख़बरें बनाने और ख़बरें घुमानेवाले सीन कभी किसी स्क्रिप्ट में लिखे ही नहीं गए। अब से कुछ दशक पहले तक न्यायाधीशों के लिए संवाद लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनकी सिचुएशन फिक्स थी। अदालती बहस के दौरान उन्हें केवल लकड़ी का हथौड़ा टेबल पर पीटते हुए ‘ऑर्डर… ऑर्डर…’ बोलना होता था।
इस पूरे तमाशे ने हमारे मस्तिष्क में कुछ बातें गहरे तक बैठा दीं।

जनता, भीड़ है। जो उसे हाँक ले जाए वही उसका नायक है। फिर वह चाहे पुलिस हो चाहे अपराधी।
सही वही है जो नायक करे और ग़लत वही है जो खलनायक करे।
सिस्टम को सुधारा नहीं जा सकता, उससे या तो खेला जा सकता है या फिर उसको यूज़ करके रॉबिन हुड का जीवन बिताया जा सकता है।
अराजक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते अराजक होनेवाला नायक हो।
जनता का काम केवल ताली पीटना है। उसे अपने उत्थान के लिए स्वयं कुछ नहीं करना होता। उसे केवल एक नायक की प्रतीक्षा करनी होती है, जो पूरे सिस्टम से लड़कर जनता को ख़ुशी-ख़ुशी ताली बजाने का मौक़ा देगा।

इन सब धारणाओं को मस्तिष्क में बैठाए हमारी कई पीढ़ियाँ गुज़र गईं। नायकवाद की इस धारणा ने हमें ‘जनता’ से ‘प्रजा’ बना डाला। और इससे जो ख़ामोशी पसरी उसका लाभ उठाकर हमारे तंत्र ने लोकतंत्र का मखौल बनाकर रख दिया।

✍️ चिराग़ जैन

तीन उंगलियाँ अपनी ओर

‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ -ये भारतीय पत्रकारिता के प्रारंभिक तेवर थे। संपादन और क्रांति एक-दूसरे के पूरक थे। संपादकों को भाषा का ज्ञान इतना था कि अख़बार में छपे शब्द वर्तनी का प्रमाण होते थे। अख़बार का काग़ज़ खोटा होता था, पर ख़बरें खरी होती थीं। काली स्याही से जो अख़बार में छप गया, वह इतिहास में दर्ज हो गया।
संपादकीय टिप्पणी के एक-एक वाक्य में सत्ता की चूल हिलाने का सामर्थ्य होता था। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की जो फ़सल हमने काटी उसके खेत की सिंचाई में पत्रकारों का क़ाफ़ी ख़ून-पसीना शामिल था।
आज़ादी के पाँच दशक बाद पत्रकारिता में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए। एक तो अब तक टेलिविज़न भारत में दुर्लभ नहीं रह गया था, दूसरे उद्योग जगत् को अख़बार की आड़ में अपने राजनैतिक हित साधने और औद्योगिक घपले छिपाने का फार्मूला मिल गया। अब तक अख़बार के मुताबिक़ जनता चलती थी अब जनता के मुताबिक़ अख़बार चलने लगे। उधर टेलिविज़न पर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने न्यूज़ रीडिंग को न्यूज़ एंकरिंग में तब्दील करने का पहला प्रयोग ‘आज तक’ नामक समाचार बुलेटिन में किया। लगभग इसी दौरान सुश्री नलिनी सिंह ने ‘आँखों देखी’ के माध्यम से प्रोग्रामिंग और न्यूज़ बुलेटिन के सम्मिश्रण का सफल प्रयोग किया।
इधर ये दोनों कार्यक्रम सफलता के चरम पर थे, उधर चौबीस घण्टे के समाचार चैनल्स की अवधारणा भारत में शुरू हो गई। श्री एस पी सिंह ने जो न्यूज़ एंकरिंग शुरू की थी वह सबसे पहले, सबसे तेज़, सबसे आगे, नम्बर वन और सनसनीखेज़ समाचारों के जंगल में ऐसी फँसी कि उसमें से न्यूज़ ग़ायब हो गई और केवल एंकरिंग शेष रह गई।
ठीक इसी समय प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रतिद्वंद्विता और औद्योगिक घरानों की लाभप्रधान नीतियों के रोग से ग्रस्त होकर ऐसा रंगीन हुआ कि उसमें कुछ भी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं बचा। संपादकीय पृष्ठों पर लगने वाली ऊर्जा ‘पेज थ्री’ को ग्लैमरस बनाने में नष्ट होने लगी। सेलिब्रिटी मैनेजर्स को संपादकों से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा। फिल्मी कलियाँ, स्टारडस्ट और मनोहर कहानियाँ जैसी मसालेदार सामग्री से अख़बार की बिक्री बढ़ाने की होड़ शुरू हो गई।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया; भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, खाना-पकाना और सास-बहू के सीरियल्स को ख़बर बनाकर; चौबीस घण्टे न्यूज़ चैनल चलाने का ढोंग करता रहा और प्रिंट मीडिया क्लासीफाइड, मेट्रीमोनियल, बॉलीवुड, क्रिकेट, ग्लैमर वगैरा से अपने-अपने पन्नों के ढेर को नम्बर वन अख़बार बताने पर तुले रहे।
बाज़ार में खड़ी पत्रकारिता के बीच ‘जनसत्ता’ बेचारा काफ़ी दिन तक उसी चौड़े आकार और काली स्याही पर अड़ा रहा; लेकिन चटपटे काग़ज़ को अख़बार समझकर ख़रीदनेवाले ग्राहकों ने जनसत्ता की दशा इतनी दयनीय कर दी कि वह बन्द होने के कगार पर आ गया। हारकर इस एकमात्र मंदिर को भी अपने चौक में दुकानें और सर्कस लगवाने पड़े ताकि पर्यटकों की चप्पलें गिनवाकर श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफ़ा किया जा सके।
जिस पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म और गटर जर्नलिज्म को हेय समझा जाता था, वहाँ ‘बटर जर्नलिज्म’ तक के दर्शन होने लगे। जिस देश में, राजनीति अख़बार देखकर जनता का मूड भाँपती थी; वहाँ राजनीति का मूड देखकर, अख़बार जनमत बनाने लगे।
जनता की अनदेखी ने दूरदर्शन के सीधे-सादे समाचार बुलेटिनों और जनसत्ता जैसे साफ़-सुथरे समाचार-पत्रों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बाज़ारू होने पर विवश कर दिया।
जिन न्यूज़ चैनल्स को टीआरपी दे-देकर हमने सींचा है, आज वे ही किसी राजनैतिक पार्टी, किसी धन्ना सेठ और किसी मल्टीनेशनल कम्पनी के मन मुताबिक़ हमारी आँखों में धूल झोंक रहे हैं। मीडिया के इस वीभत्स रूप को धिक्कारने वाले एक बार अपने गिरेबान में झाँक कर देखें कि इस मीडिया को इतना उच्छृंखल बनाया किसने है।
जब किसी चैनल की डिबेट में पैनलिस्टों को मुर्गे की तरह लड़ाया जाता है; जब किसी स्टूडियो में बैठे एंकर शालीनता, सभ्यता और शिष्टता की समस्त मर्यादाएँ लांघते हैं; जब पीत पत्रकारिता के दम पर चार-चार दिन लोगों को मूर्ख बनाया जाता है तब भी हम पलटकर दूरदर्शन के समाचार बुलेटिन पर नहीं लौटते। जब हम अख़बार के चालीस पन्नों में से तीस में विज्ञापन और बाकी दस में ग्लैमर और हिंसा देखते हैं, तब हम उस पत्र के दफ्तर में एक चिट्ठी नहीं लिखते कि जिन पन्नों पर ख़बर, समसामयिक लेख, साहित्य, विचार प्रधान संपादकीय छपते थे; जिनमें छपा ‘बच्चों का कोना’ पढ़कर हमारा बचपन अख़बार पढ़ना सीखा है; उन पर ये क्या छाप कर हमारी बालकनी को गंदा कर रहे हो?
विश्वास कीजिये, बीहड़ बन चुके इस मीडिया में अभी भी उस पत्रकारिता के कुछ बीज ‘दबे हुए हैं’ जिन्हें हमारी दृष्टि का थोड़ा-सा पानी और समर्थन की थोड़ी-सी धूप मिल गई, तो ये वीराना फिर से लहलहा उठेगा।

✍️ चिराग़ जैन

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