Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘रमेश मुस्कान’ -यह किसी व्यक्ति का नहीं, एक प्रवृत्ति का नाम है। ज़िन्दगी उन्हें कितनी ही सैड सिचुएशन दे, वे उसको ठहाके की ओर मोड़कर उसका ‘दी एन्ड’ करने में माहिर हैं।
कई बार कुछ लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके जीवन में कोई चुनौती, कोई परेशानी है ही नहीं। लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इन लोगों की आँखों का निचला हिस्सा ढेर सारा पानी रोके हुए है। निरंतर ठहाके लगाकर ये लोग अपनी अलकों के बांध से उस पानी को रोके रखने में सफल हो जाते हैं।
इनके ठहाके इतने प्रभावी इसलिए होते हैं कि इनमें बनावट की कोई गुंजाइश नहीं होती। हँसने के लिए मनुष्य का अतिरिक्त बुद्धिमान होना आवश्यक है। यदि आपमें लतीफ़ा समझने जितनी बुद्धि न हो तो लतीफ़ा आपके होंठों पर हँसी रखने की बजाय पेशानी पर परेशानी रख देगा।
ज़िन्दगी भी हमें हर घड़ी लतीफ़ा सुना रही होती है। मुझ जैसे मूर्ख लोगों को वह लतीफ़ा समझ नहीं आता और मैं उसे समझने की जुगत में परेशान दिखने लगता हूँ। बाद में जब परिस्थिति बीत जाती है तब मैं उसी बात पर ख़ूब हँसता हूँ, जिसने मुझे कभी परेशान किया था। रमेश मुस्कान सरीखे लोगों का आई-क्यू लेवल इतना हाई है कि ये ज़िन्दगी के लतीफ़े को झटपट समझ लेते हैं और हमेशा ज़िन्दगी के साथ खिलखिलाते हुए पाए जाते हैं।
कुछ वर्ष पहले रमेश मुस्कान का भयंकर एक्सीडेंट हुआ। टक्कर इतनी भयावह थी कि एक टांग की हड्डी दल बदलकर कूल्हे की हड्डी में घुस गयी। डॉक्टर साहब ने भूलवश एनेस्थीसिया की दवा का असर पूरी तरह होने से पहले ही सर्जरी शुरू कर दी। दर्द की इस चरम सिचुएशन में डॉक्टर को अपने होशो-हवास की इत्तला देने की बजाय ये ऋषिकेश मुखर्जी इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि डॉक्टर को हँसाने का अवसर कब मिलेगा। कुछ समय बाद डॉक्टर साहब किसी बात से परेशान होकर अपने सहायक पर झल्लाने लगे। रमेश जी झट से बोल उठे- ‘डॉक्टर साहब, मैं कुछ हेल्प कर दूँ?’
एक क्षण के लिए डॉक्टर सन्न रह गया और फिर दोबारा एनेस्थीसिया लगवाकर सर्जरी को आगे बढ़ाया। लेकिन इस एक पंक्ति ने ऑपरेशन थियेटर के सारे तनाव को छू-मंतर कर दिया।
आर्थिक चुनौती हो या व्यावसायिक चुनौती; रमेश मुस्कान हर स्थिति में मस्त रहने की कला जानते हैं। उनके साथ वक़्त गुज़ारना किसी पैट्रोल पम्प पर अपनी ऊर्जा का टैंक फुल कराने जैसा अनुभव है। उनकी सलाह हमेशा लाजवाब होती है क्योंकि वे चश्मा आँखों पर नहीं, माथे पर लगाए फिरते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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22 जनवरी 2005 को शाम के बुलेटिन में ख़बर आई की दक्षिणी मुम्बई के एक फ्लैट से परवीन बॉबी का शव बरामद हुआ है। समाचार वाचक ने बताया कि परवीन बॉबी की मौत के दो दिन बाद पुलिस ने उनका शव बरामद किया।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि उस दिन वह समाचार बुलेटिन मेरे भीतर एक सिहरन पैदा कर गया था। मैं देर तक यह सोचता रहा कि जिन सितारों को दूर से देखकर हम रोमांचित होते हैं उनके भीतर का भयावह अकेलापन उनके जीवन को किस हद्द तक असह्य बना देता है।
एक अदद ज़िन्दगी अनबूझ पहेली की तरह दुनिया से विदा हो गयी, और इस भयावह सन्नाटे में अचानक खुसर-फुसर की आवाज़ें सरसराने लगीं। किसी ने कहा कि वह शराब बहुत पीती थी इसलिए किडनी फेल हो गयी। किसी ने कहा कि डैनी के प्यार में पागल होकर मर गयी। किसी ने अमिताभ बच्चन से नाम जोड़ा तो किसी ने महेश भट्ट से। किसी ने कबीर बेदी की दीवानी बताया तो किसी ने कहा कि काम मिलना बंद हो गया था इसलिए भूखी मर गयी।
कनबतियाँ चटखारे लगाती रहीं और फिल्मी ग्लैमर के चरम को छूकर लौटी एक नायिका अपने भोगे हुए सच को अपनी पलकों में मूंदे हुए दुनिया से रुख़सत हो गयी। उस दिन मैं बहुत देर तक उदास रहा था। आज तक पर देखी वो खिलखिलाती सूरत देर तक मेरे ज़ेहन में ठहाका मारकर हँसती रही और मैं उसके ठहाकों की व्यंजना में संवेदना की कराह को देर तक सुनता रहा।
उस दिन से मैंने किसी भी सामाजिक व्यक्ति की निजता में झाँकना बन्द कर दिया। उस दिन के बाद मैंने जाना कि फलों से लदा हुआ हर वृक्ष अपनी जड़ों में दमघोंटू उमस से घिरा होता है।
आज बस यूँ ही तारीख़ पर निगाह पड़ी तो याद आ गया वह एहसास जो मैंने एक क्षण में उस अभिनेत्री के साथ जी लिया था। एक ऐसी अभिनेत्री के साथ जिससे मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, जिससे मैं कभी मिला नहीं था…
लेकिन यह एहसास मुझे आज भी हिला देता है कि जिस दुनिया के मनोरंजन के लिए उसने अपने आँसुओं पर खिलखिलाहट का मेकअप पोत लिया था, उस दुनिया ने उसकी मौत को भी गॉसिप की थाली में रखकर मिर्च-मसाला लगाकर यूज़ कर लिया।
✍️ चिराग़ जैन
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बाँसुरी मेरा प्रिय वाद्य है। अपनी ख़ामियों को ख़ूबी बना लेने का श्रेष्ठतम उदाहरण है बाँसुरी। बाँस के खोखलेपन से सुर निकाल लेने का चमत्कार है बाँसुरी।
श्वास की लिपि से मन की भाषा बोलने का यंत्र है बाँसुरी। अंगुलियों पर थिरकते सुरों को उच्छ्वास की ऊष्मा से मीठा करने का जादू है बाँसुरीवादन।
जब कोई बंसी बजाता है तो उसके नयन स्वतः मुंद जाते हैं। पलक गिरते ही भीतर आनन्द का महारास प्रारम्भ होता है। स्थूल दृष्टि से देखने पर केवल अधरों को बाँसुरी बजाते देखा जा सकता है, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो हम पाएंगे कि अधर ही नहीं; अंगुलियाँ, कान, मस्तिष्क, मन और आत्मा तक सब मिलकर बाँस की इस पोरी को रसाल-सा मीठा करने में जुट जाते हैं।
श्वास चौकन्नी रहती है कि कहीं उसके आधिक्य से सुर न बिगड़ जाए। अंगुलियाँ सावधान रहती हैं कि ज़रा-सी इधर-उधर हुई तो तान में व्यवधान हो जाएगा। पलकें बन्द होकर ध्यान से सबकी चौकसी करने में तल्लीन ही जाती हैं। मन तान की सर्जना करता है और कान उसके साकार होने पर हर्ष की रोमावली को जागृत कर देते हैं।
गहरे ध्यान में उतरने की संगीतमयी वीथि है बाँसुरी। भीतर घटित हुए अनहद नाद का सुरावतार है बाँसुरी वादन। संगीत की सर्वाधिक मुँहलगी विधा है बाँसुरी वादन।
जब बाँसुरी बजती है तो पूरा परिवेश कलात्मक हो उठता है। दसों अंगुलियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो दस गन्धर्व किसी बाँस के पुल पर लास्य कर रहे हों। ओंठ की मुद्रा देखकर ऐसा लगता है ज्यों अनंग ने अपने पुष्पधनु पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे तान दिया हो। ग्रीवा हौले से एक दिशा में घूमकर कोई नाट्यमुद्रा की छवि प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर सब कुछ मधुर हो जाता है। शायद इसीलिए वंशवाले कन्हैया के लिए कहा जा सका- ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं!’
✍️ चिराग़ जैन
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आगरा शहर पीछे छूट रहा था और राजमार्ग सकुचाते हुए एक समान्य सी सड़क में समा गया था। निमंत्रण देते समय ही होलीपुरा के वयोवृद्ध गीतकार शिवसागर शर्मा जी ने बता दिया था कि सड़क पर गाय-मवेशी बहुत मिलेंगे इसलिए गाड़ी आराम से ही दौड़ाना।
ज्यों-ज्यों हम आगरे की शहरी आबोहवा से बाहर निकल रहे थे, त्यों-त्यों सड़क किनारे हरियाली और सड़क पर गैया की मात्रा बढ़ती जा रही थी।
आसमान के बादल रह-रहकर हमारी गाड़ी पर रिमझिम से हस्ताक्षर कर रहे थे। सड़क के बीच मवेशियों की महा-पंचायतें लगी थीं। ऐसा लगता था जैसे गौवंश के महाकुंभ में अलग-अलग अखाड़े अपनी बिछावत सजाए बैठे हों। इनकी संख्या इतनी अधिक थी कि महानगरों में सरपट दौड़ती गाड़ियां यहाँ दबे पांव किनारे होकर निकल रही थीं।
इस वृंदावननुमा वातावरण से गुज़रते हुए जब काफ़ी समय बीत गया तो जीपीएस ने हमें मुख्य सड़क से लगभग एक पगडंडी पर उतार दिया। दोनों ओर खेत कतार बाँध कर खड़े थे और उनके बीच से हमारी गाड़ी लहराती हुई पगडंडी पर दौड़ रही थी। खेतों का साम्राज्य संपन्न हुआ तो हम होलीपुरा के रिहायशी इलाके में पहुँच गए।
रास्ता, मौसम और गांव… तीनों ने मन को रमणीक बना दिया था। हवा की नमी से मन भीगने लगा था कि अचानक गाड़ी एक बड़े से गेट में प्रविष्ट हुई और एक मैदान में जाकर रुक गई। सामने बड़ा सा फ्लैक्स लगा था जिसमें आमंत्रित कविगण की सूची में मेरा भी शानदार चित्र छपा था।
बैनर से लेकर आयोजक तक सादगी का समारोह था। गाँव के इंटर कॉलेज के टीनवाले सभागार में आयोजन था। दीवारें ख़ूबसूरत और महंगे पेण्ट से सजी नहीं थीं, लेकिन उन पर जीवन की वे इबारतें लिखी थीं, जिनको आत्मसात करके मनुष्य बना जा सकता है। स्टेज पर गद्दा बिछा था और उस पर मसनद लगाई गयीं थीं। आयोजकों की भागदौड़ (जो कार्यक्रम सम्पन्न होने तक यथावत बनी हुई थी) से गद्दे में सिलवटें पड़ गयी थीं लेकिन स्वागतकर्ताओं की मुस्कान में ज़रा भी सिलवट नहीं मिली।
एनसीसी कैडेट्स और अन्य कुछ बच्चे स्टेज के ठीक सामने बिछी दरी पर विराजित थे। शेष श्रोतादीर्घा कुर्सियों से सज्ज थी। हॉल में थोड़ी आवाज़ गूंज रही थी लेकिन साउंड सिस्टम इतना बढ़िया था कि हॉल की इको का दुष्प्रभाव कवियों की प्रस्तुति पर नहीं पड़ा।
कार्यक्रम का आयोजन सीधे-सादे गीतकार श्री शिवसागर शर्मा की दो पुस्तकों के लोकार्पण के उपलक्ष्य में किया गया था। पीले कुर्ते के नीचे सफेद रंग की धोती पहने शिवसागर जी बड़े ख़ुश थे। सारी व्यवस्था प्रयत्क्ष रूप से वे स्वयं ही कर रहे थे इसलिए कवियों के स्वागत, श्रोताओं की व्यवस्था, माइक, हॉल, पुस्तक लोकार्पण, माला, भोजन, मानदेय, दीप प्रज्ज्वलन की मोमबत्ती और सभी व्यवस्थाओं ने उनको अतिरिक्त व्यस्त कर रखा था।
प्रोफेसर हरि निर्माेही ने प्रारंभिक संचालन किया और पुस्तक लोकार्पण का कार्य सम्पन्न करवाया उसके बाद शिवसागर जी ने काव्यपाठ भी किया और अपने बेहतरीन गीत से कार्यक्रम का स्तर सुनिश्चित कर दिया।
इसके बाद मेरे संचालन में सभी कवियों ने सधा हुआ, संक्षिप्त किन्तु सार्थक काव्यपाठ किया। स्थानीय कवियों को सुनकर भी यह समझ आ गया था कि परिवेश गीत का है। फिर तो सभी कवियों ने अपने मन का काव्यपाठ किया। भोजन का समय होने पर कार्यक्रम में ब्रेक दिया गया। सबने मान-मनुहार से भोजन किया।
एक बार मुझे ऐसा लगा कि इस ब्रेक के कारण श्रोताओं की संख्या कम हो जाएगी लेकिन जब हम भोजन करके लौटे तो हॉल उतना ही भरा हुआ था।
कवि-सम्मेलन क्या था, कविताओं का महोत्सव था। गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया देखकर मैं भी गीत सुनाने की हिम्मत कर सका; जिसे सफल कहा जा सकता है।
एक गर्म दुःशाला, एक डिब्बा गुंजिया, दो सद्य प्रकाशित पुस्तकें और ढेर सारा ‘मन’ लेकर गाँव से घर लौट आया हूँ लेकिन यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तानसेन बनकर घूमते-घूमते आज हरिदास की कुटिया में पहुँचा तो अपनी अट्टालिकाओं का बौनापन समझ आ गया।
भव्य मंच, ग्लैमरस साज-सज्जा, चकाचौंध और बेतहाशा शानो-शौक़त से दूर आज गाँव का कवि-सम्मेलन करके लौटा हूँ। ऐसा लग रहा है ज्यों बहुत दिन तक पिज़्ज़ा और डबलरोटी खाने के बाद यकायक किसी ने चूल्हे के पास बैठाकर पानीवाले हाथ की रोटी, ताज़ी पिसी चटनी के साथ परोस दी हो।
✍️ चिराग़ जैन
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कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा सम्मानजनक प्रतीत होता। अक्सर बड़े-बड़े सम्मानितों को मंदिर-मस्जिद में मांगते देखा गया है। इसलिए कबीर को भी कुछ मांगना था, तो मंदिर-मस्जिद अधिक उपयुक्त स्थान रहता।
मंदिर-मस्जिद में मांगने का एक लाभ यह भी है कि वहाँ जिससे मांगने जाते हैं; वह किसी को यह नहीं बताने जाता कि अमुक मुझसे फलां चीज़ मांगने आया था। बाक़ी कहीं भी कुछ मांग के देख लेना। तुम्हें वह चीज़ मिले या न मिले, लेकिन तुम्हारी मंगताई का प्रचार ज़रूर हो जाएगा। ईश्वर-अल्लाह के पास इतनी फ़ुरसत ही नहीं है कि वे प्रचार में संलग्न हो सकें। वे तो भाँति-भाँति के मंगतों की दरख़्वास्त और शिक़ायतें निपटाने में ऐसे घिरे हैं कि शायद युगों-युगों से नज़रें उठाकर देख भी न सके हों, कि हमने उनकी दुनिया की सूरत क्या बना दी है।
लेकिन कबीर ने कुछ मांगने के लिए बाज़ार चुना। बाज़ार में मांगने का प्रावधान ही नहीं है। वहाँ तो छीना जा सकता है, ठगा जा सकता है, हड़पा जा सकता है… मांगने की परम्परा बाज़ार की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। लेकिन कबीर ने उसी बाज़ार को मांगने के लिए चुना। और मांगा भी तो क्या… ‘सबकी ख़ैर!’ यह भी कोई मांगने की चीज़ है भला? लेकिन कबीर मांगते हैं। सर-ए-आम मांगते हैं।
यही कबीर होने का पहला सोपान है। यही कबीर होने की पहली शर्त है। कुछ ऐसा कर गुज़रना, जो परिपाटी ही नहीं है; कुछ ऐसा कर गुज़रना जिसका चलन ही नहीं है। परंपराओं को धता बताकर चलने का जीवट ही कबीर को कबीर बनाता है।
इसीलिए कबीर पहले ही कह देते हैं कि कबिरा खड़ा बजार में…! अब ‘कबीर’ महत्त्वपूर्ण हैं। कबीर बाज़ार को चेतावनी दे रहे हैं कि जो बाज़ार में खड़ा है वह ‘कबीर’ है। यदि इस पंक्ति में ‘बाज़ार’ को प्रमुख समझ लिया जावे तो कबीर को गौण होना पड़ेगा। इसलिए कबीर स्पष्ट कहते हैं कि अब बाज़ार में ‘कबीर’ खड़ा है। इसलिए बाज़ार को गौण होना होगा। अब बाज़ार में ‘सबकी’ ख़ैर मांगी जाएगी।
‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ -इस व्यक्तित्व के साथ ही कोई कबीर हो सकता है। और अपने भीतर के इसी कबीर को जीवित रखने में सफल होना किसी मनुष्य के मनुष्यत्व का द्विगुणित हो जाना सुनिश्चित कर देता है।
बाज़ार में प्रविष्ट होते ही ‘अर्थ’ मुखर हो जाता है। वहाँ पहुँचकर बड़े से बड़े फ़क़ीर भी व्यापारी होते देखे गए हैं। इसीलिए कबीर के पहले और कबीर के बाद किसी साधु-महात्मा-फ़क़ीर ने यह घोषणा नहीं की कि वह बाज़ार में खड़ा है। यह जोख़िम कबीर ही उठा सके। और कबीर भी यह जोख़िम इसीलिए उठा सके कि उन्होंने कभी स्वयं के फ़क़ीर होने की भी कोई घोषणा नहीं की।
यदि कबीर ने अपने आईकार्ड में ओक्यूपेशन ‘फ़क़ीर’ या ‘संत’ लिखवा लिया होता… तो वे भी अपने बाज़ार में खड़े होने का ऐसा ढिंढोरा न पीट पाते।
लेकिन कबीर तो कबीर थे। वे वैरागी होकर बाज़ार में खड़े नहीं हुए, बल्कि बाज़ार में खड़े होकर वैरागी हो गये। …ना काहू से दोस्ती। कितने अनुभवी थे कबीर। बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में बताया कि उनकी किसी से दोस्ती भी नहीं है और वैर भी नहीं है। यदि वे आधी पंक्ति लिखकर छोड़ देते तो उसका इंटरप्रिटेशन ‘यूँ’ किया जा सकता था कि किसी से दोस्ती न होने का अर्थ है कि सबसे दुश्मनी है। जैसे हमसे कोई कहे कि वह झूठ नहीं बोलता… तो हम यह स्वयं अर्थ निकाल लेंगे कि वह सच बोलता है। लेकिन कबीर स्पष्ट करते हैं कि झूठ न बोलने का अर्थ सच बोलना नहीं है। किसी से दोस्ती न होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी से वैर है या सबसे वैर है। दो विलोमार्थी शब्दों के मध्य भी एक भाव होता है। श्वास और उच्छ्वास के मध्य भी एक निर्वात होता है।
इस निर्वात पर खड़े होकर आप चाहे बाज़ार में जाएँ, मंदिर में जाएँ, मस्जिद में जाएँ, मसान में जाएँ, चाहे वेश्यालय में ही क्यों न जाएँ… यहाँ खड़े व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व कोई नहीं छीन सकता। यहाँ खड़ा व्यक्ति अपने वातावरण को प्रभावित कर तो सकता है, किन्तु अपने वातावरण से प्रभावित हो नहीं सकता। यहीं खड़ा व्यक्ति सबकी ख़ैर मांग सकता है, बिना यह ध्यान किये कि उसके इस साहस से बाज़ार की परंपरा ध्वस्त हो रही है और बाज़ार पर शासन करने वाला ‘अर्थ’ कबिरा के शब्दों का ‘अर्थ’ बूझते हुए मुँह बाये खड़ा रह जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हिन्दी कवि सम्मेलन जगत् ने यश तथा संतुष्टि के साथ मुझे कुछ अनमोल रिश्ते भी दिए हैं। आज से लगभग आठ-नौ साल पहले रीवा कवि सम्मेलन में जाते हुए अनामिका अम्बर के साथ एक बालक से भेंट हुई थी। उस समय तुकबंदियों को कविता माननेवाला वह युवा, आज मेरे सर्वाधिक प्रिय गीतकारों में से एक है। कई बार तो वह इतना श्रेष्ठ लिखता है कि मेरे लिए अनुकरणीय हो जाता है।
मुझे नहीं पता कि शोर-शराबे के इस दौर में इस युवक को कितनी पहचान मिल सकेगी। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि यदि नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सुननेवाले कुछ एक कान भी शेष रहेंगे तो निकुंज शर्मा के गीतों की गूंज अनहद नाद से एकाकार होने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकेगी।
यदि आप अपने व्हाट्सएप और फेसबुक पर चलताऊ शब्दाडंबरों के बीच शुद्ध गीत तलाशते हैं तो एक बार निकुंज के कुंजवन का विचरण अवश्य करना; मेरा वायदा है कि आपकी संवेदनाओं की साँस-साँस महक उठेगी।
वह अधरों से बाँसुरी में भी संगीत भरना जानता है और उंगलियों से गिटार को भी झंकृत कर देता है। अपने भीतर के कबीर को पोषित करने के लिए वह अपने जीवन की समस्याओं को खाद बना लेता है। मैं निकुंज से मिलता हूँ तो लगता है कि एक सम्पूर्ण कलाकार से मिल रहा हूँ।
आज अचानक यह सब इसलिए लिख रहा हूँ कि आज मेरे इस प्रिय गीतकार का जन्मदिन है।
ईश्वर तुम्हारी प्रतिभा को प्रतियोगिता के अभिशाप से बचाए रखे! ईश्वर तुम्हारी सृजनात्मकता को साधना के आभूषण पहनाए!
✍️ चिराग़ जैन