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फोकट का लाफ्टर शो

विश्व राजनीति को कॉमेडी शो बनाने की सुपारी लेने वाले पहले नेता हैं डोनाल्ड ट्रंप। उन्हें अपने आप पर विश्वास है कि एक दिन वे नासा के वैज्ञानिकों की फौज भेजकर सूरज को भी उठवा लेंगे। वाशिंग्टन के किसी डुप्लेक्स में उसे नज़रबंद करेंगे। फिर मुँहमांगी क़ीमत पर दुनिया भर में धूप का धंधा करेंगे।
शीशियों में धूप भर-भरकर एक ठेला व्हाइट हाउस से निकलेगा और फेरीवाले की तरह ट्रंप गली-गली में धूप बेचेंगे। ठेले पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होगा कि “हमारी रूस या चीन में कोई ब्रांच नहीं है।”
अगर सूरज-चांद को किडनैप करने में नासा के वैज्ञानिक सफल नहीं हुए तो ट्रंप के क्रोध की अग्नि से नासा का नाश हो जाएगा।
मुझे विश्वास है कि सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपने आईने के सामने खड़े होकर आस्था और विश्वास से मंत्रोच्चार करते हैं कि ‘ट्रंप इज़ द बेस्ट प्रेसिडेंट एवर’।
इस मंत्र के प्रभाव से अचानक उनके आसपास रौशनी फैल जाती है। उनके दिमाग़ की बत्ती जल जाती है। वे तुरंत किसी की जड़ें खोदने लगते हैं और किसी की दीवार बनाने लगते हैं। जिस देश में दीवार बनानी हो, उसके प्रधानमंत्री को फोन करके भारतीय शराबियों के स्टाइल में बोलते हैं- ‘आज दीवार तेरा भाई बनाएगा।”
वे जानते हैं कि इस सृष्टि में वही ‘उचित’ है जो माननीय ट्रंप सर करते हैं। यदि कोई तुच्छ प्राणी उनके किसी कार्य की आलोचना करता है तो उसकी आलोचना ‘फेक न्यूज़’ से अधिक कुछ नहीं है।
विश्व राजनीति ने ऐसे लोग भी देखे हैं, जिन्होंने प्रश्नों के अनुसार ख़ुद को बदल लिया। विश्व राजनीति में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिन्होंने अपने अनुसार सवाल बदल दिए। लेकिन ट्रंप पहले ऐसे लीडर हैं, जो सवाल पूछनेवाले को ही बदल देते हैं।
रोज़ सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपना ट्विटर खोलकर दुनिया को कोई नयी टेंशन देना नहीं भूलते। उनकी एक गुड मॉर्निंग पूरी दुनिया की नींद उड़ा देती है। इसी को ट्रंप विश्व जागरण कहते हैं।
ट्रंप के आत्मविश्वास के आगे फैक्ट्स शर्म से सिर झुका लेते हैं। सूरज उनके ट्वीट पढ़कर यह जानने की कोशिश करता है कि आज निकलना है या नहीं। चीन की दीवार और मिस्र के पिरामिड रोज़ उनके दरबार में हाजिरी लगाकर यह पूछते हैं कि बॉस अभी हम ‘ग्रेट’ हैं या फिर आपकी किसी हरकत ने हमें टुच्चा सिद्ध कर दिया है?
मैं गूगल पर अमरीका का नक्शा देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे कोई चपटे से मुँह का आदमी अपने होंठों को पूरा खींचकर मुस्कुरा रहा हो। इस मुस्कान से उसकी दोनों आँखें बंद हो गई हैं। जिनसे वह देख नहीं पा रहा है कि पूरी दुनिया उस पर हँस रही है।
चूँकि वे स्वयं को महान मान चुके हैं इसलिए अपनी हरकतों को ‘लीला’ कहने में उन्हें संकोच नहीं होता। ट्रंप की महानता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि जबसे ये साहब अपनी पर उतरे हैं तब से दुनिया ने हिटलर, गद्दाफी, सद्दाम और किम जोंग को लानत भेजना बंद कर दिया है।
मुझे जब कभी हँसने का मन करता है तो मैं डोनाल्ड ट्रंप के भाषण सुनने लगता हूँ, क्योंकि बाकी सब कॉमेडियन तो हँसाने के पैसे लेते हैं…!
✍️ चिराग़ जैन

शुभकामनाओं की बाढ़

‘चार पैग व्हिस्की, दो बोतल बीयर, ओ माई डियर, हैप्पी न्यू ईयर’ -बचपन में ग्रीटिंग कार्ड पर इस गोत्र की शायरी लिखी जाती थीं।
‘आपकी सारी प्रॉब्लम होंगी फिक्स, ख़ुशी-ख़ुशी बीतेगा ट्वेंटी ट्वेंटी-सिक्स’; ‘नीचे से निकला आलू, 2026 चालू’ और ‘ऊपर से गिरा बम, 2025 ख़तम’ -इन महान कविताओं से इस बार भी नये साल की शुरुआत हो ही गई।
देश के एक महान कवि ने मुझे दो साहित्यिक पंक्तियों से नववर्ष की बधाई दी। ‘गाय दूध देती है लात मारकर, हैप्पी न्यू ईयर आँख मारकर।’ इन महान पंक्तियों में जो आँख मुझे मारी गई थी, वो अभी तक मेरी आँख में खटक रही है। मैंने उनका संदेश पढ़ा और सूर-कबीर से लेकर तुलसी और ग़ालिब तक को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी।
पहले के ज़माने में शुभकामनाएं देने में पैसे और समय दोनों ख़र्च होते थे। ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने या बनाने के लिए परिश्रम करना पड़ता था। फिर उसे पोस्ट करने डाकखाने तक जाना भी पड़ता था। इसलिए उसी को शुभकामनाएं दी जाती थीं, जिससे कुछ ख़ास लगाव हो।
अब हमारे हाथ में मोबाइल है। अब हम रजाई में पड़े-पड़े ही हज़ारों लोगों को शुभकामनाएं भेज देते हैं। एआई की मदद से रेडीमेड पोस्टरों पर अपना खूबसूरत चेहरा चिपकाकर हम थोक के भाव पर्सनल शुभकामनाएं भेजते हैं।
31 दिसंबर की दोपहर से ही हम अपने-अपने मोबाइल से शुभकामनाएं दागने लगते हैं। चारों ओर शुभकामनाओं की बाढ़ आ जाती है। सबके इनबॉक्स लबालब भर जाते हैं। व्हाट्सएप बल्क मैसेजिंग को स्पैम समझकर अकाउंट रेस्ट्रिक्ट कर देता है। अब इन पश्चिमी लोगों को क्या पता कि त्योहार कैसे मनाए जाते हैं।
रेस्ट्रिक्शन के साथ ही व्हाट्सएप का बिज़नेस पैकेज परचेज़ करने का ऑफर आने लगता है। तब हम भारतीयों को समझ आता है कि त्योहार की आड़ में पैसे कैसे कमाए जाते हैं।
पूरा त्योहार शुभकामनाओं के उत्तर देते हुए ही बीत जाता है। धूमधाम से मनाए जानेवाले त्योहार अब कॉपी-पेस्ट से मनने लगे हैं।
शुभकामनाओं की आमद इतनी स्पीड से होती है कि उन्हें बिना पढ़े ही ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ लिखना पड़ता है।
पिछले वर्ष एक जनवरी को ही मेरे एक मित्र के पिताजी का देहावसान हो गया था। मैंने क्लिपबोर्ड पर ‘यह अवसर आपके लिए शुभ हो’ की मुहर बना रखी थी। शोक संदेश का डिजाइनर मैसेज भी एआई से तैयार करके भेजा गया था। मैंने भी उसे बिना डाउनलोड किए उसके नीचे अपना क्लिपबोर्ड चिपका कर भेज दिया। तब से पूरा साल बीत गया, वे मेरी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
डिजिटली भेजी गई सामग्री को यदि सच में डाउनलोड करना संभव होता तो इस एक जनवरी को मैंने लगभग तीन चार क्विंटल केक और चॉकलेट खा लिया होता।
मैंने एक बेकरी पर जाकर केक और चॉकलेट से उनके हालचाल पूछे। उन्होंने भी एआई की एक रेडीमेड शायरी पढ़कर अपना दर्द बयान किया- ‘आग लगे इस डीप फेक को, नये साल में भी कोई नहीं पूछ रहा केक को।’
मोबाइल की स्क्रीन पर घिसते-घिसते हमारे नसीब की रेखाएँ मिट गई हैं। जिन हाथों से हम हाथ मिलाते थे, वे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। जिन आँखों से हम अपनों को देखते थे, वे मोबाइल में गड़ी हुई हैं। हम अपने-अपने हिस्से का नकलीपन निभा रहे हैं। और हमें ग़लतफ़हमी है कि हम त्योहार मना रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन

सड़क सौन्दर्य

देश की यातायात व्यवस्था देखकर मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। पूरी दुनिया सड़कों के रास्ते दफ्तर पहुँचती है और दफ्तर पहुँचकर चुनौतियों से जूझने लगती है। हम भारतीय चुनौतियों से जूझते हुए दफ्तर पहुँचते हैं और दफ्तर पहुँचकर चैन की साँस लेने लगते हैं।
अन्य देशों के लोग गाड़ी की पिछली सीट पर बैठकर अख़बार पढ़ते हैं, लेकिन हम सड़कों के अप्रतिम सौंदर्य के कारण गाड़ी में अख़बार नहीं पढ़ पाते, इसलिए दफ्तर पहुँचकर अख़बार पढ़ने लगते हैं।
चूँकि हम भारतीय बड़े दिलवाले लोग हैं इसलिए तीन लेन की सड़क पर पाँच लेन बनाने में कभी नहीं कतराते। सड़क पर बनी सफेद-पीली पट्टियां हमारी शक्ल देखती रह जाती हैं और हम उनके अरमानों को कुचलकर लहराते हुए निकल जाते हैं।
हम पश्चिम की तरह यू टर्न के लिए सड़क को चौड़ा नहीं करते, बल्कि उसके लिए मेन लेन को भी संकरा कर देते हैं। प्रेम गली अति सांकरी…!
होंगे वे और देश जहाँ पैदल चलने के लिए फुटपाथ बनाए जाते हैं। हम वसुधैवकुटुम्बकम वाले तो इन फुटपाथों पर सपरिवार निवास करते हैं। दुनिया बैडरूम में हाइवे का चित्र लगाती है, हम हाईवे पर ही बैडरूम बना लेते हैं। खुले आसमान के नीचे…!
चूँकि सड़कें राष्ट्र की धरोहर हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए यातायात पुलिस की भी सुविधा है। ये कर्मठ सेवक सड़क पर कभी भी, कहीं भी बैरिकेड्स लगाकर चले जाते हैं। इनका विश्वास है कि बैरिकेड्स अपने आप गाड़ियों को नैतिकता की प्रेरणा देते रहेंगे।
बीच के डिवाइडर पर लगी रेलिंग कहीं भी अपनी महान सड़कों के चरण स्पर्श करने सड़क पर उतर आती है। रिपेयर करने के बाद बचे हुए पत्थर, बजरी आदि को वहीं सड़क पर छोड़ दिया जाता है ताकि जनता अपने नेताजी का एहसान याद रख पाए।
पेड़ की डालियाँ अगर झुककर ट्रैफिक सिग्नल का चेहरा छिपा दें तो हम अनुमान से चौराहा पार करते रहते हैं लेकिन डाली और सिग्नल के इस प्रणय में खलल नहीं पड़ने देते।
रेलिंग, बैरिकेड्स, पेड़ों की डालियों, भिखारियों, रेहड़ियों, गड्ढों और कचरे से जो जगह बच जाती है वहाँ मवेशी विचरण करते हैं। क्योंकि ‘सबै भूमि गोपाल की!’
दुनिया को होगा अपने राजमार्गों पर अभिमान। हमने तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों के सम्मान में गीत लिखे हैं- ‘गड्डी जांदी है छलांगां मार दी।’
हम भारतीयों का कलाप्रेम देखना हो तो किसी ट्रक का सौंदर्य देख लो। नजरबट्टू से लेकर चुटीले तक सब कलात्मक। यहाँ तक कि हॉर्न में भी गाना भरवा रखा होता है। रात के अंधेरे में रेस-पैडल पर ईंट रखकर पालथी मारकर पैग लगाता ट्रक-ड्राइवर, जब अस्सी-नब्बे की स्पीड में ट्रक दौड़ाते हुए हॉर्न से मधुर संगीत बजाने लगता है तो ऐसा लगता है, मानो स्वर लहरियां बिखेरती हुई किसी गंधर्व की सवारी आ रही है।
मैंने अपने ड्राईवर से पूछा कि ख़तरा किसे कहते हैं तुम्हें पता है। उसने बाईं ओर स्टीयरिंग घुमाकर एक गाड़ी को ओवरटेक किया और बोला- “साहब, ख़तरा तो बाएं हाथ का खेल है।”

✍️ चिराग़ जैन

रुपया क्यों लुढ़कता है

जो लोग रुपये के गिरने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उन्हें मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि रुपया सरकार के कारण नहीं, तुम्हारी फटी हुई जेब के कारण गिरता है।
यदि तुमने अपनी जेब सिल ली होती तो रुपया नहीं गिरता। सरकार उचित नीतियां बनाकर सारा रुपया अपने पास सुरक्षित करना चाहती है तो जनता शोर मचाने लगती है।
अब ले लो मज़े, और रखो अपने पास। अब गिर गया ना रुपया। अब पड़ गया चैन?
जेब नहीं सिल पाए तो कम से कम जुबान ही सिल लो। देश की करंसी के विषय में ऐसी गिरी हुई बातें करनेवालों को राष्ट्रद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
जिसे गिरना हो वो गिरेगा ही। शादियों में लोग आसमान की ओर रुपये उछालते हैं, लेकिन रुपया फिर ज़मीन पर आ गिरता है। अब जिसे गिरने की आदत पड़ गई हो, उसे कोई कहाँ तक उछाल सकेगा?
सोशल मीडिया पर रुपये की गिरावट को लेकर बड़ा मज़ाक बनाया जा रहा है। ये काफ़ी गिरी हुई हरकत है। गिरते को गरियानेवाला नजरों से गिर जाता है।
रुपया बेचारा कब से ललचायी नज़रों से नब्बे के अंक को देख रहा था। हमारी नीतियों ने अथक परिश्रम करके उसे नब्बे पार करवाया है। इस उपलब्धि पर सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए लेकिन जिन्हें केवल आलोचना करनी है उनका कोई इलाज नहीं है।
यह सरकार का बड़प्पन है कि दूसरों की गलतियों की सज़ा चुपचाप भुगत रही है। दरअस्ल रुपया नेहरू जी के कारण गिरता है क्योंकि नेहरू जी ने रुपया गोल बनाया। अब गोल है तो लुढ़केगा ही। यदि उन्होंने रुपया चौकोर बनाया होता तो रुपया कभी नहीं गिरता।
डॉलर ने रुपये को छेड़ते हुए कहा- “आज खुश तो बहुत होगे तुम। जो रुपया गिरे हुओं को भी चढ़ा देता था, आज वो ख़ुद गिरा पड़ा है।”
इस पर रुपये ने खनकता हुआ जवाब दिया- “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।”
डॉलर ने चिकोटी काटकर बात आगे बढ़ाई- “रुपये को उठाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।”
रुपये ने थोड़ा दार्शनिक होते हुए जवाब दिया- “कौन कमबख्त उठने के लिए गिरता है, हम तो गिरते हैं ताकि बाज़ार उठ सके।”
डॉलर फिर बोला- “बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे, तेरा डॉलर।”
रुपया गिरे हुए गुरूर से बोला- “मुझ पर एक एहसान करना, मुझ पर कोई एहसान मत करना।”
डॉलर ख़ुद पर इतराते हुए बोला- “हमारा डॉलर गिरा होता तो हमारी सरकार उसे उठाने के लिए जी-जान लगा देती।”
अब हमारे नेताजी बोले- “मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता डॉलर सेठ!”
डॉलर अपना सा मुँह लेकर रह गया। हमारे नेताजी ने जेब से रुपया निकाला और ख़ुद की नजर उतारते हुए डायलॉग बोला- “बाबूमोशाय, बात ऊँची होनी चाहिए, सच्ची नहीं।”

✍️ चिराग़ जैन

अमरीका की शोले

अमेरिकी उद्योगपतियों के लिए ऑक्सीजन के बिना जीवित रहना संभव है किन्तु राष्ट्रपति जी को प्रसन्न किये बिना अपना अस्तित्व बचा पाना असंभव हो गया है। उनकी हालत देखता हूँ तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह का अमर वाक्य याद आता है- ”गब्बर के ख़ौफ़ से तुम्हें केवल एक आदमी बचा सकता है, और वो है ख़ुद गब्बर।“
उद्योगपति सहयोग की उम्मीद से न्यायपालिका की ओर देखते हैं, लेकिन न्यायालय अपने महंगे दुशाले में अपने कटे हुए हाथ छिपाकर चुपचाप खड़ा है। वह जानता है कि अगर थोड़ा भी हिलने-डुलने की कोशिश की तो गब्बर सिंह की हवाएँ उसका दुशाला गिरा देंगी और उसे फ्लैशबैक में जाकर हाथ कटने की पूरी कहानी सबको सुनानी पड़ेगी। इस डिप्रेसिंग सीन से बचने के लिए न्यायालय मुँह फिराकर लिबर्टी की मूर्ति से नैन-मटक्का करने लगता है।
मीडिया के एकाध जय और बीरू, बंदूक लेकर पानी की टंकी पर चढ़ ज़रूर गए हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके चैनल में सांभा और कालिया का पैसा लगा हुआ है। इसलिए माइक को बंदूक की तरह पकड़कर वे दोनों, गब्बर सिंह पर फूल बरसा रहे हैं। कैमरे पर वे बंदूक चलाते हुए दिखते हैं लेकिन मालिक के मालिक पर केवल फूल बरसते हैं।
उधर उद्योगपतियों को अच्छी तरह समझ आ गया है कि गब्बर का मनोरंजन किये बिना काम नहीं चलेगा, इसलिए वे ख़ुद अपनी-अपनी धन्नो को चाबुक मारकर डायलॉग बोल रहे हैं- ”चल धन्नो, तेरी बसंती के धंधे का सवाल है।“ धन्नो पूरी जान लगाकर दौड़ती है, और बसंती को गब्बर के अड्डे पर ले आती है। गब्बर के अड्डे पर पहुँचते ही बसंती मुजरे की महफ़िल जमा लेती है।
गब्बर सिंह को संगीत और कला की भी उतनी ही समझ है, जितनी मनुष्यता की। इसलिए वे ठुमरी को डिस्को कहकर दाद दे रहे हैं। बसंती गब्बर सिंह की मूर्खता को विद्वत्ता सिद्ध करने के लिए ठुमरी की कैसेट चलाकर डिस्को करने की कोशिश करती है। बाहर खड़ी धन्नो, बसंती की इस हरकत पर हँसती है, लेकिन बसंती उसकी हँसी को इग्नोर करके गब्बर स्वामी की मुस्कान पर रीझती रहती है।
जमी हुई महफ़िल में जब थोड़ी देर तक कुछ हैप्पनिंग नहीं होता तो गब्बर सिंह अपने आसन से उठकर एकाध ठुमका लगा देते हैं। गब्बर का ठुमका लगते ही बसंती उनको नृत्यकला का गंधर्व सिद्ध कर देती है। जय और बीरू ड्रोन से पुष्पवृष्टि करने लगते हैं। न्यूयॉर्क हार्बर में लिबर्टी और न्याय की देवी का नैन-मटक्का डांस-शो में बदल जाता है।
गब्बर ठुमका लगाकर ऊंघने लगते हैं और पूरा अमरीका नृत्य करने लगता है। सभी बुद्धिजीवी, सूरमा भोपाली के अंदाज में अपने-अपने मजमे जुटाकर नृत्य की डींगें हाँकते हैं।
जय और बीरू को जिस काम के लिए स्क्रिप्ट में रखा गया था, वह काम उनसे छिन गया है। इसलिए स्क्रिप्ट में बने रहने के लिए बेचारा जय, अपने ही अन्नदाता की विधवा बहू के घर के सामने बैठा माउथ ऑर्गन बजा रहा है। उसके हुनर से इम्प्रैस होकर सूने आंगन में लालटेन जलने लगती हैं।
जो मस्क ख़ुद को घर का मालिक समझकर मसका लगाता फिर रहा है वह दरअस्ल रामलाल है। जिसे बंद कमरे में ठाकुर को चादर ओढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है।
पूरा अमरीका गब्बर की दहशत से नाच रहा है। सबको पता है कि उसके केस्टो मुखर्जी अमरीका के कोने-कोने में फैले हुए हैं। जो थोड़े बहुत पुराने लोग ज़िन्दा बचे हैं वे इस सबसे उकताकर चर्च की ओर बढ़ते हुए डायलॉग बोलते हैं- “पूछूंगा ऊपरवाले से, इस देश को नचाने के लिए एकाध ट्रम्प और क्यों नहीं दिया?”

✍️ चिराग़ जैन

मास्टर स्ट्रोक से सारे प्रदूषण पर लगाम

पुराने समय में किसी नगर में एक यशस्वी राजा राज्य करता था। एक बार सभी राजकीय कर्मचारियों ने राजा की महा आरती का आयोजन किया। राजकाज के सभी कर्मचारी अपने-अपने विभाग के बजट के अनुरूप दीप, धूप, लौबाण, गुग्गल और न जाने कितनी ही सामग्री बटोर लाए।
आयोजन बहुत भव्य था। धूप के धुएं ने आकाश तक जाकर राजा की लोकप्रियता के फरमान पर हस्ताक्षर किए। धीरे-धीरे यह धुआं राजा के विरोधियों की आँखों में चुभने लगा। विरोधियों की आँखें लाल हुई तो प्रजा की भी साँस घुटने लगी।
विरोधी, जनता की कराह को चीख बनाने पर तुल गये और मंत्रियों ने कराह की आवाज़ को आरती के मंजीरे की आवाज़ घोषित करके राजा की पूजा जारी रखी।
जब धुएं से ख़ुद राजा की ही साँस उखड़ने लगी तो राजा ने मंत्रियों से पूछा कि इस धुएं का क्या करें?
मंत्रियों ने राजा को सुझाव दिया कि और तो कुछ नहीं हो सकता लेकिन ये धुआं प्रजा की आँखों में झोंकने के काम आ सकता है।
समाधान सुनकर राजा की आँखें चमक उठीं। उसने अपने काबिल मंत्रियों की ओर प्रशंसा भरी नजरों से देखा।
एक मंत्री बोला, ‘हुज़ूर, हम इस धुएं को धोकर राजा की सौगात के रूप में जनता को बांट देंगे।’
‘लेकिन धुएं को धोया कैसे जाएगा?’ एक चिढ़ोकड़ा मंत्री बोला।
”पानी से धुलाई होगी जनाब, और कैसे धोयेंगे?’ पहला मंत्री गुफी पेंटल के अंदाज़ में खिसियानी हँसी हँसते हुए बोला।
राजा को सुझाव पसंद आया, पूरे राज्य में मुनादी हो गयी कि “सब अपने-अपने घर के ऊपर छाये धुएं को धो-पोंछकर साफ़ करेंगे। जिसके घर के ऊपर ज़हरीला धुआं मिला, उसको राजा के आदेश से देशनिकाला दे दिया जाएगा।”
मुनादी काम कर गई, देशनिकाले के डर से जनता ने अपने-अपने ऊपर के आसमान को साफ़-सुथरा कहना शुरू कर दिया। समाजसेवी संगठनों ने जगह-जगह कैंप लगाकर हवा में पानी उछाला और धुएं की धुलाई में उल्लेखनीय योगदान दिया। वैद्य-हकीमों ने धुएं में साँस लेने के चिकित्सीय लाभ बताकर प्रजा को जागरूक किया। हरकारों ने घर-घर संदेश पहुँचाया कि राजा की बेहतरीन शासकीय क्षमता से प्रजा की आँखों से ख़ुशी के जो आँसू बहे, उन्हीं आँसुओं से सारा धुआं धुल गया।
विरोधियों ने जिस आसमान को सिर पर उठा रखा था, उसी आसमान को शीशे की तरह साफ़ बताकर प्रजा ने विरोधियों के सिर पर दे मारा।
इसे कहते हैं मास्टर स्ट्रोक।राजा ने एक मुनादी से प्रदूषण की चौतरफा सफाई कर दी।
पानी बहा, इससे जल प्रदूषण समाप्त हो गया। धुआं धुल गया इससे वायु प्रदूषण ख़त्म हुआ। जिनकी आँखों में राजा की ख्याति खटक रही थी, उनकी आँखों का कचरा साफ़ हो गया।
और विरोधियों की बोलती बंद हुई इससे ध्वनि प्रदूषण पर भी लगाम लग गई।

डिस्क्लेमर: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं।यदि इसमें दिल्ली के प्रदूषण के दर्शन हों तो यह केवल एक इत्तफाक होगा।

✍️ चिराग़ जैन

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