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मौन

भले ही कभी बाँहों में भरकर दुलारा न हो मुझे आपके नेह ने! …लेकिन फिर भी न जाने क्यों काटने को दौड़ता है आपका मौन! ✍️ चिराग़...

उम्मीद

उम्मीद टूट जाये तो पीड़ा …संत्रास! और बंधी रहे तो टूट जाने की आशंका। ✍️ चिराग़...

मन

कितना भयंकर पल है …मन में कहने को बहुत कुछ है पर कुछ भी कहने का मन नहीं है। ✍️ चिराग़...

क़हक़हे

बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने दिल का भरा-पूरा मकान आँखों की बाल्टी में आँसुओं का पानी भरकर धो डाला है मकान का एक-एक कोना …काफ़ी दिन हुए। लेकिन अब भी गूंजते हैं यादों के क़हक़हे टकराकर ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से। और मैं फिर से धोने लगता हूँ दिल के मकान की उदास...
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