Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
रात के सन्नाटे में
‘प्लानर’ लेकर बैठा।
सोचा, कुछ सुनियोजित कर लूँ
अपने काम-धाम!
घण्टे-सवा घण्टे तक
पृष्ठ दर पृष्ठ
लिखता रहा
प्रोजेक्ट्स और पेंडिंग्स!
…तभी
सन्नाटे को चीरती हुई
मेरे कानों में गूंजी
किसी कुत्ते के रोने की आवाज़…
…और मैंने
एक मद्धम-सी कँपकँपी के साथ
बन्द कर दिया प्लानर!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी
और सिर्फ़ तुम जानती थीं
कि आख़िरी भी…!
स्टेशन पर खड़े
चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग
कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है
और हर आहट के साथ
सहम जाता था मैं
-’हाय राम!
कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
शब्द
शिव हैं।
जब कभी
बहती है भावना
उद्विग्न हो
मन के भीतर से
तो उलझा लेते हैं उसे
व्याकरण की जटाओं में।
रोक देते हैं
उसका सहज प्रवाह।
सीमित कर देते हैं
उसकी क्षमताएँ।
कविता वेग है
आवेग है
उद्वेग है।
वो तो
शब्दों ने उलझा लिया
वरना,
बहा ले जाती
सृष्टि के
सारे कचरे को।
शब्द ब्रह्म नहीं हैं,
शब्द शिव हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैं खुली आँखों से
एक सपना देखता था
अक्सर।
बनाता था इक तस्वीर
अपनी ख़्वाहिशों की।
न जाने कब उभर आया
एक मुकम्मल इंसान
मेरे मन के कॅनवास पर।
न जाने क्यों
मैंने रख दिया
अपना दिल
बिना सोचे-समझे
इस इंसान के सीने में
…तुम
केवल एक रिश्ता नहीं हो
मेरे लिए
तुम मेरे सपनों का
कॅनवास हो।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
….सिर्फ़ कोशिश।
कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
…और कभी-कभी
अपना भी मन।
इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!
✍️ चिराग़ जैन
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देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।
उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!
✍️ चिराग़ जैन