Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
जिनके इशारों पर नाचता था भ्रष्टतंत्र
कैश के बिना सभी रिमोट बंद हो गये
वोट फोर नोट की जो करते थे राजनीति
उन मायाधारियों के वोट बंद हो गये
डाकुओं का कैश से हुआ है ऐसा मोहभंग
सरे-आम लूट व खसोट बंद हो गये
पर्दे के पीछे काफ़ी कुछ अभी भी है बंद
जनता को लगता है नोट बंद हो गये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
इक कमीशनखोर से उसकी कमीशन छीन ली
उसने मासूमों से सारी ऑक्सीजन छीन ली
हाकिमों ने वहशियों के साथ बस इतना किया
दे के उनको ट्रांसफर उनकी डिवीजन छीन ली
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ओ मगरमच्छ के भ्रष्ट रूप, ओ दानव के कल्पित स्वरूप
इतिहास हमें बतलाता है, बड़बोला हानि उठाता है
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
दहशत का आलम हो रा है, अब तो नैन लड़ाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
कपड़ों पे ख़ुश्बू लगा के निकले हुजूर
बाल-वाल काढ़-कूढ़ के चहकने लगे
छोरियों के काॅलेज के बाहर लगा के घात
खड़े-खड़े बड़ी-बड़ी बात करने लगे
काॅलेज की कोई लड़की वहाँ से गुज़री तो
घूर-घूर कर टोंट पास करने लगे
तभी एक पुलिसिया जीप आती दीख पड़ी
गधो के सिरों से सींग से सरकने लगे
बापू घबराता है इनको चश्मा नया दिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
लैला ने बुलाया मजनू को डेट पे चलेंगे
मजनू ने कहा मुझे माफ़ कर दो बहन
हीर ने कहा कि रांझे लांग ड्राइव पे चलूंगी
रांझा बोला मेरा इन्साफ कर दो बहन
रोमियो को जूलियट ने कहा कि प्यार करो
बोला पहले मेरा इंतज़ाम कर दो बहन
माहीवाल सोहनी के घर जा के फैल गया
ऐसा करो ज़िन्दगी हराम कर दो बहन
छोरों की आवाज़ खो गई, दिल का हाल बताने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
जिन ज़ुल्फों को लहरा के सुख मिलता था
उनमें भी तेल वाला हाथ फिरने लगा
जिस लड़के को थी लफंडरी की आदत वो
हर घड़ी दादाजी के साथ फिरने लगा
जिसे चाऊमीन और पिज़्ज़ा अच्छा लगता था
घर पे ही खा के दाल-भात फिरने लगा
आशिक़ी की चैसर पे नीतियों ने दांव चला
आशिकों का राजा खा के मात फिरने लगा
डर सा बैठ गया छोरों में दाढ़ी-मूछ बढ़ाने मे
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
धूप से बचाव को जो चश्मा लगाया काला
देखा थानेदार जी ने और काण्ड हो गया
ट्रैफिक के जाम से निकलने को ज़रा तेज
कट मारा कार जी ने और काण्ड हो गया
नर्स सामने थी पर दर्द से कराह के ली
सिसकी बीमार जी ने और काण्ड हो गया
जींस ट्रैक्टर में अटक के फटी थी पर
पूछा सरकार जी ने और काण्ड हो गया
दर्जी के घर लाइन लगी है, चिथड़ी जींस सिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
8 NOV
एक सप्ताह से काला धुआँ आँखों में जल रहा था, अब नारंगी और हरे नोट आँखों में चुभ रहे हैं।
जितने का पेट्रोल भरवा सकते हो भरवा लो, बाकी में पैट्रोल डाल कर आग लगा दो।
आदेशानुसार : मोदी उर्फ़ धो दी।
प्रधानमंत्री जी करुणानिधान हैं, वे जानते थे कि दिल के दौरे वाले मरीज़ 100 रूपये के नोट नहीं जुटा पाएंगे इसलिए अस्पतालों में काले नोट स्वीकार्य हैं।
मोदी जी की इमेज उस बच्चे की तरह हो गई है जो अपनी हर अगली शरारत से पिछले काण्ड को छोटा सिद्ध कर देता है।
इस बीच विजय माल्या ने स्टेट बैंक के जीएम से बोला है कि अपना 1700 करोड़ रुपैया लेना हो तो कल कूड़ेदानों में से बीन लेना। फिर मुझे मत बोलना कि पैसा नहीं दिया।
उधर पाकिस्तान में इस बात की खलबली है कि जो आदमी एक झटके में अपने 1000-500 के नोट की वैल्यू दो कौड़ी की कर सकता है वो हमारे दो कौड़ी के देश का क्या करेगा!
9 NOV
बॉर्डर फ़िल्म का डायलॉग याद आ गया-
सुबह नाश्ता करते हुए पोलीपैक दूध बैन कर दूंगा।
दोपहर के लंच में इंजन वाले वाहनों पर रोक लगा दूंगा। और रात के खाने मेंमिल में बना कपड़ा बंद कर पूरे देश को पेड़ के पत्ते लिपटवा दूँगा।
जसोदाबेन ने मोदी जी को फोन करके पूछा है – 1000 और 500 के नोटों ने भी तुमसे शादी कर ली थी क्या?
कुछ ख़ास बात नहीं है। करेंसी नोट का रंग रूप अमरीका जैसा बनाने के चक्कर में मोदी जी ने कच्चे के व्यापारियों की शक्ल सोमालिया जैसी बना दी।
अब तो लोग दो दिन की सब्ज़ी भी इकट्ठी नहीं ख़रीद रहे, पता नहीं मोदी जी कब लौकी को ग़ैर कानूनी घोषित कर दें।
मन की बात कोई सुन नहीं रिया था तो मेरे भाई ने मनी की बात कर दी।
लब्बो-लुआब : हज़ार और पाँच सौ के नोट एक साथ बंद कर दिए जाएं तो दो हज़ार का नोट पैदा हो जाता है।
स्मॉग हटते ही मोदी जी ने दिन में तारे दिखा दिए।
हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने काफी माखनलाल चतुर्वेदी जी लगाए लेकिन बनारसी दासने अमीर ख़ुसरो जी को भिखारी ठाकुर बनाने का फैसला वापस नहीं लिया। अब पूराभारतेंदु हरिश्चंद्र इस फ़िराक़ गोरखपुरी में है कि अपने मैथिली शरण गुप्त धनको उजागर करके मन को निर्मल वर्मा कर लें।
बिगड़ी हुई औलाद को सुधारने के लिए जेबख़र्च बंद करने का उपाय हमेशा कारगर होता है।
10 NOV
8 नवंबर को मोदी जी ने जनता बोला – 1000-500 के नोट काग़ज़ के टुकड़े रह जाएंगे।
9 नवम्बर को न्यायालय ने सरकार से पूछा – pollution कण्ट्रोल का मास्टर प्लान बताओ?
मतलब, सब जानते हैं कि नोट जलेंगे से धुआँ होगा ही होगा।
वो कौन सा दार्शनिक था जो कह कर गया था कि पैसा तो सड़कों पर बिखरा पड़ा है, समेटने के लिए हिम्मत चाहिए। निंद्य है।
✍️ चिराग़ जैन