+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

दीपावली

जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग।
हर आंगन संदीप्त हो, जाय अंधेरा भाग ॥

दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग।
दिव्य अल्पनाएँ बनें, हों सब दिव्य प्रसंग ॥

पावन पुष्पों से गुँथें, ऐसे बन्धनवार।
जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥

भोर समीरों में घुलें, गेंदे के मकरंद।
सांझ ढले कर्पूर की, हर दिसि भरे सुगन्ध ॥

लक्ष्मी का अवतार हो, हाथ लिए संतोष।
जिससे खाली हो सकें, सभी लालसा कोष॥

पथ पर हो दीपावली, मन में हो मकरंद।
वाणी में मिष्ठान्न हो, जीवन में आनंद॥

मन दशरथ, केकैयी कुमति, देह अयोध्या धाम।
तृष्णा इक वनवास है, सुख के क्षण श्रीराम॥

✍️ चिराग़ जैन

व्यस्तता

जब तक तुम संग थीं
मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी
नहीं खोजी कोई मुस्कान
नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी
…ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

अब तलाशता फिरता हूँ
एक-मासूम सी ख़ुशी
अपने दिल के लिये।
एक कोमल-सी मुस्कान
अपने होंठों के लिये।
एक गीली-सी हँसी
अपने चेहरे के लिये।
और एक पावन-सी चमक
अपनी आँखों के लिये।

लेकिन रीती ही रह जाती है
तलाशों का जल भरने के लिए बढ़ती
छोटी-सी अंजुरी।

दूर तक यात्रा करने के बाद
पलकों के भीतर
लौट आती हैं गीली निगाहें
और देर तक इंतज़ार करने के बाद
थककर बैठ जाता हूँ मैं।

हाय राम!
खुशियों को भी
अभी व्यस्त होना था!

✍️ चिराग़ जैन

शॉर्ट-सर्किट

सर्किट के सीने में हुई
गड़बड़ का असर
उपकरण पर भी
समान रूप से पड़ा
लेकिन इन दोनों के बीच
बेचारा वायर
अकारण ही सड़ा।

तार बेचारा
सदैव अपना कार्य
सुचारू रूप से करता है
लेकिन जब भी कुछ प्रॉब्लम होती है
तो उसको जलना ही पड़ता है।

रिश्तों के कनेक्शन में हुए
झगड़ों के शॉर्ट-सर्किट से
विश्वास का वायर जल जाता है
और वक़्त का मैकेनिक
उपकरण और सर्किट को बचाने के लिये
बीच के वायर को बदल जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं,
आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं
सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ,
अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं
झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में,
सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं
बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल,
तब लगता है एक कवि हो गया हूँ मैं

✍️ चिराग़ जैन

लोग आते-जाते हैं

दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह
लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह

जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां
तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह

चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो
वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह

दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ
जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं पारे की तरह

ज़िन्दगी तुम बिन भी यूँ तो ख़ूबसूरत झील थी
तुम मगर इस झील में उतरे शिकारे की तरह

आपका चेहरा भी मीठी ईद-सा ख़ुशरंग है
खिलखिलाहट चांद-तारे के नज़ारे की तरह

एक अरसा साथ रहकर भी पराए ही रहे
तुम समन्दर की तरह थे, हम किनारे की तरह

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!