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थाने में फिर कभी न आना

चुन्नू-मुन्नू थे दो भाई
प्रॉपर्टी पर हुई लड़ाई
चुन्नू बोला मैं भी लूंगा
मुन्नू बोला कभी न दूंगा

झगड़ा सुनकर जिप्सी आई
दोनों को थाने ले आई

थोड़ा तू दे चुन्नू बेटा
थोड़ा तू दे मुन्नू बेटा
थाने में फिर कभी न आना
अपना झगड़ा खुद निपटाना

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव: एक ढोंग

लीजिये जनाब
फिर से आ गया चुनाव
चुनाव मतलब शोर-शराबा
रैली-वैली
वादे-शादे
भाषण-वाषण
गाली-वाली
इसके हिस्से उसकी थाली
उसके हिस्से इसकी थाली
कुछ की सूरत भोली-भाली
कुछ की बातें जाली-जाली
मेरी बज्जी
तेरी बज्जी
बिन मतलब की मत्था-पच्ची
मेरा पहला, तेरा पहला
इसका नहला, उसका दहला
इसकी बेग़म, उसका गुल्ला
हल्ला-गुल्ला
खुल्लम-खुल्ला
बैनर-शैनर
झंडे-वंडे
यानी सबके सब हथकंडे
हर नुक्कड़ पर कुछ मुस्टंडे
इसने मारे उसको अंडे
उसने मारे इसको डंडे
जब होगा वोटिंग का वन डे
उसके अगले दिन सब ठंडे
सबके एक सरीखे फंडे
थोड़े-थोड़े तुम मुस्टंडे
थोड़े-थोड़े हम मुस्टंडे
आओ मिलाएँ अपने झंडे
वोटर ठगा-ठगा बेचारा
देख रहा है भाईचारा
देख-देख ये ग़ज़ब नज़ारा
वोटर को चढ़ गया बुखारा
जब तक उसने किया उतारा
फिर चुनाव आ गया दोबारा।

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

सनसनीबाज़ पत्रकार

छाप-छूप कर अख़बार
एक सनसनीबाज़ पत्रकार
रात तीन बजे घर आया
तकिये में मुँह छुपाया
और चादार तान के सो गया,
इतनी देर में उसका अख़बार
जनता के हवाले हो गया।

इधर पत्रकार चैन से
खर्राटे भर रहा था,
उधर उसका अख़बार
दुनिया की नाक में दम कर रहा था।

दोपहर की पावन बेला में
जब बिस्तर ने पत्रकार से निज़ात पाई,
तब तक पत्रकार को भूख लग आई।
पत्नी थाली लेकर आई,
तो पत्रकार ने उस पर अपनी खोजी दृष्टि घुमाई।
सबसे पहले उसने माथे से लगाई दाल,
और बड़बड़ाते हुए बोला- “धन्यवाद तरुण तेजपाल”।
फिर रोटी को करते हुए प्रणाम,
नमस्कार की मुद्रा में बोला- “जय हो बाबा आसाराम”।
देख कर थाली में वेज पुलाव,
आकाश की ओर सिर उठाकर बोला-
“धन्य हैं इस देश का साम्प्रदायिक तनाव”।

किसी ने कोई विवादास्पाद बात कही,
इसलिये थाली में शामिल हुआ दही।
फिर से बढ़ने लगा है कोई चुनावी विवाद,
तभी थाली को नसीब हुई है सलाद।
अब बस पाकिस्तान जी थोड़ी सी हैल्प कर दें,
तो बरसों से प्यासा गिलास
व्हिस्की की ख़ुश्बू से भर दें।

कुल मिलाकर
थाली में देश के सारे मुद्दे शामिल थे,
कुछ त्रासदी थे
कुछ अत्याचारी थे
और कुछ क़ातिल थे।
लेकिन पत्रकार
देखते ही देखते
सब कुछ पचा गया,
और शाम होते होते
अगले दिन की थाली सजाने
अख़बार के दफ़्तर में आ गया।

✍️ चिराग़ जैन

चाचा-भतीजा और कवि-सम्मेलन

चाचाजी को भतीजों का दस्ता चहिये था नया
अपना अरुण जैमिनी भी इंटरव्यू देने गया

इंटरव्यू में पूछा गया सिर्फ एक सवाल
अरुण ने बना दिया सवाल का बबाल
सवाल था-
“अरुण, यदि तुम लालकिला कवि सम्मेलन में बुलाए जाओगे,
तो कौन सी कविता सुनाओगे?”

अरुण बोला – “चाआजी,
आजकल लालकिले पर कविता सुनाता कौन है,
और जो कविता सुनाए,
उसे लालकिले पर बुलाता कौन है?”

चाआजी को जवाब में मज़ा आया
उन्होंने सवाल आगे बढ़ाया –
“अच्छा अगर किसी गोष्ठी में बुलाए जाओगे तो?”

अरुण बोला- ”गोष्ठी की बात छोड़ दो!
गोष्ठी से आप मेरी प्रतिभा का
अंदाज़ा नहीं लगा पाओगे
क्योंकि आप ठहरे बड़े कवि
कविता के लिए गोष्ठी में थोड़े ही आओगे।
और यदि गोष्ठी में ही जाना पड़े
कविता सुनाने के लिए
तो आपको क्या चाचाजी बनाया है
ऐसी-तैसी कराने के लिए”

अच्छा व्हाट्सएप ग्रुप में जाओगे तो?
व्हाट्सएप ग्रुप का नाम सुनकर
अरुण सीरियस हो गया थोड़ा
बोला- “अजी साहब, आप लोगों ने ग्रुप को
कविता सुनाने लायक ही कहाँ छोड़ा।
ग्रुप तो कविता पर ताली बजाता है
सुनके तो कहीं बाहर से आता है।”

“अरुण तुम्हारे पिताजी भी तो कविता सुनाते हैं”
“जी वो अब केवल अध्यक्ष बनाए जाते हैं।”

तुम्हारा कोई दोस्त है कवि
जी है, महेन्द्र अजनबी
वो कविता सुनाता है
हाँ कोई सुने तो सुना आता है

चाचाजी, आपने भी इस सवाल को खूब धकेला है
लगता है इस बार आपके हाथ में नौचन्दी मेला है

पर कुछ भी हो अब अपना जवाब ले लो
महेन्द्र अजनबी मंच पर जाएगा
और कविता सुनाकर बैठ जाएगा
पर कविता कैसी
अब ये संयोजक की मर्ज़ी, वो कहे जैसी

“अरुण तुमने तो ज़रा-सी बात का बना दिया बबाल”
अरुण बोला, “मुझे तो शुरू से ही पसंद नहीं है ये सवाल
मेरे विचार में आज मंच पर जितनी भी गड़बड़ है
ये कविता ही उसकी जड़ है
अगर उस दिन वाल्मीकि वो एक कविता न सुनाते
तो न मानस लिखी जाती, न राम वन जाते
न लतीफ़े होते न मंच
न लिफाफे होते न प्रपंच

इंटरव्यू का ये हुआ परिणाम
कि आजकल अरुण जैमिनी
हर कार्यक्रम की टीम बनाते हैं
खुद सञ्चालन करते हैं
और चाचाजी से अध्यक्षता करवाते हैं

✍️ चिराग़ जैन

शादी संकट

ये जो शादी है ना सनम हाय इसमें झंझट बड़ा है
दो रोज़ का है मज़ा फिर सबको रोना पड़ा है

यूं तो मेरा पड़ा नहीं था कभी ग़मों से पाला
शादी की इस दुर्घटना को मैंने कितना टाला
अच्छी पत्नी की चाहत में विश्व भ्रमण कर डाला
आखि़र इक दिन इक कन्या ने पहना दी जयमाला
ऐसा उतरा मेरा ख़ुमार, फिर आज तक ना चढ़ा है

जो होता है चाट पकौड़ी, तले-भुने का आदी
मूंग दाल की खिचड़ी उसको कर जाती है बादी
बीवी की झिकझिक ने मेरी सुख की नींद उड़ा दी
सब हंसते हैं मुझ पर बेटा, और कराले शादी
मेरी खुल न पाती ज़ुबां, यहां उसका ताला जड़ा है

मैं कहता हूं पूरब को चल वो पश्चिम को दौड़े
मैं कमरे का फैन चलाउं तो वो कंबल ओढ़े
ना तो मेरे साथ चले और ना ही मुझको छोड़े
जिसने ये कुण्डली मिलाई उसके निकलें फोड़े
मेरी पत्नी से मेरा छत्तीस का आंकड़ा है

क्वारा हो तो कर सकता है रोज़ नवेली सैटिंग
शीला, मुन्नी सबसे करता रहता घंटों चौटिंग
ईलू-ईलू, इश्क़-मुहब्बत, मूवी-पिकनिक-डेटिंग
शादी होते ही बंदे की गिर जाती है रेटिंग

क्वारे थे तो वृंदावन में नाचे ता-था-थैया
चौन की बंसी, हंसी-ठिठोली, मीठी जमना मैया
गांव की गोरी, माखनचोरी, गोपी, ग्वाले, गैया
शादी होते ही पचड़ों में फँस गए कृष्ण कन्हैया

यहां न जाओ, वहां न जाओ- कोई न इतना टोके
क्वारों के जीवन में चलते मस्त हवा के झोंके
जैसे चाहे सो सकते हैं आड़े-तिरछे होके
एक ज़रा सा सुख मिलता है, इतना सब कुछ खो के

कितना भी समझा ले दुनिया, नहीं समझता कोई
जिसके पैरों पड़ी बिवाई, पीर जानता सोई
बिन बिस्तर की नींद भली या चादर नीर भिगोई
जिल्लत के जीवन से बेहतर सूनी पड़ी रसोई
इस देश का हर युवा, क्यों ख़ुदकुशी पर अड़ा है

✍️ चिराग़ जैन

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