Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
मैंने आरएस पुरा बॉर्डर कई बार देखा है। सतवारी एयरपोर्ट से निकलकर धान के खेतों से गुज़रते हुए कई बार पहुंचा हूँ उस गेट तक जहां माइलस्टोन लगा हुआ है “सियालकोट 11 किलोमीटर”। ज़ीरो लाइन भी देखी है। “919 इण्डिया” का मार्क-स्टोन…. तिरंगे में रंगी भारतीय पोस्ट…. हरे रंग में रंगी पाकिस्तानी पोस्ट… “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” और “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे…. सब देखे हैं। साथ ही देखी है एक लाचारी भरी दहशत, अपने गांववालों में…. एक हताशा भरा अविश्वास, अपने सैनिकों में…!
यूं ही पूछ लिया था एक सैनिक से मैंने -“सिंह साहब, बॉर्डर पर रहकर डर तो रहता होगा?”
उसने ठहर कर बताया था – “ज्जे पकिस्तानियो का कोई भ्रोसा नी ए साब।”
कई दिनों से टीवी पर न्यूज़ देखते हुए उस सैनिक के शब्द कानों में गूँजने लगते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अपने हर चरित्र में जो मनोवैज्ञानिक इंजीनियरिंग की वो कमाल थी। चाचा चौधरी का दिमाग़ बड़ा बनाया और होंठ मूछ में छुपा दिए। साबू का शरीर बड़ा बनाया। पिंकी, बिल्लू, चाची इन सबके आकार में एक प्रकार था। साबू जैसे चरित्र की कल्पना कार्टून जगत् में एलियन का प्रादुर्भाव था। संभवतः यह चरित्र भारतीय बच्चों का एलियंस से पहला परिचय है।
कैरिकेचर की दुनिया में वे एक नयी धारा के संयोजक थे। काल्पनिक चरित्रों को उन्होंने सूरत दी, पहचान दी। और खुद की पहचान को केवल एक साधारण से हस्ताक्षर तक सीमित करलिया।
बचपन के कनवास पर कौतूहल मिश्रित हास्य के बीज बोने वाले प्राण महान थे।
विनम्र श्रद्धांजलि
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
“भाई नी है… दिखा दे ना।” उसने मेरे ठीक पीछे वाले बेंच पर से फुसफुसा कर कहा। मैं थोड़ा सा सरक गया।
“साले ढंग से दिखा वरना रहने दे।”
“अबे तो मैं अपना न लिखूँ।”
“अच्छा बस एक मिनिट।”
“एक बार में देख ले, फिर नहीं दिखाऊंगा। इत्ता लम्बा पेपर है, तेरे कारण मेरा भी रह जाएगा।”
“अबे मैं फेल हो गया तो तुझे अच्छा लगेगा।”
मेरी शीट उसके पास थी और मैं एक्स्ट्रा शीट पर अगला आन्स्वर लिखने लगा।
ये मेरी स्मृतियों में मौज़ूद दोस्ती का पहला एहसास है। जिसने मुझे अपनत्व के अधिकार का सुख महसूस करना सिखाया।
दोस्ती अद्भुत रिश्ता है। अपने लिए जीने की तमाम व्यवहारिक-नैतिक शिक्षा के बीच दोस्ती का अध्याय हमें दूसरों की संवेदनाओं का सम्मान करना सिखाता है। मेरे पास इस रिश्ते का भरपूर एहसास है।
दो-दो रुपयों के लिए लड़ते हुए शुरू हुई दोस्तियाँ आज बीस-बीस हज़ार की बेहिसाबी तक पहुँच गयी है। नोटबुक मांगने का अधिकार आज गाड़ी मांगने तक पहुँच गया है। सफ़र ज़ारी है। बड़ी ज़ोरदार ग्रिप है इस रिश्ते की। तेज़ दौड़ते रास्तों पर कई झटकों ने हाथ छुड़वाने की कोशिश की; पर….. सफ़र ज़ारी है।
✍️ चिराग़ जैन