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गोपालदास नीरज जी के निधन पर

ये निशा आज फिर नीरज-निशा कहाएगी
बस क्षोभ यही; इसमें अब वैसा नूर नहीं
ग़ज़लें बाक़ी हैं, गीत बचे हैं अनगिन पर
ये आज तुम्हारे स्वर सुख से भरपूर नहीं

तुम गीत नहीं रचते थे, जादू करते थे
दर्शन की देहरी पर श्रृंगार सजाते थे
रस की गगरी के चातक बड़े छबीले थे
शब्दों की टोली से कितना बतियाते थे

जब आज शाम मैंने सूरज को देखा था
वह लिए शरारत भरे नयन इतराता था
अब जाना उसकी इस इतराहट का मतलब
वह तुम्हें मनाकर साथ लिवाए जाता था

जग को लगता है यही कि ’नीरज’ मौन हुआ
दरअस्ल कारवाँ और बढ़ाने निकले हो
धरती की गोद हरी कर के कविताओं से
अब नभ भर को गीतिका सुनाने निकले हो

थक जाना या चुक जाना; वह भी ’नीरज’ का
मालूम नहीं जलवा नादान ज़माने को
महफ़िल-महफ़िल तुम स्वयं बताते फिरते थे
सदियाँ कम हैं ’नीरज’ की याद भुलाने को

✍️ चिराग़ जैन

राजगोपाल सिंह जी की याद

“कविता व्याकरण के दोष बर्दाश्त कर सकती है लेकिन भाव के चरित्र में मिलावट नहीं झेल पाती।” – यही गुरुमंत्र दिया था मेरे भीतर के कवि को श्री राजगोपाल सिंह जी ने। पितृत्व और गुरुत्व की गुणमुक्ताओं को मित्रता के सूत्र में पिरोने से संबंध का जो गलहार बनेगा, बस वही नाम है मेरे और उनके सम्बन्ध का। कितनी ही यात्राओं, कितने ही संस्मरणों और कितने ही संघर्षों के चित्र सजीव हो उठते हैं, उनका नाम गुनने भर से। ग़ज़ल और गीत के अतिरिक्त बाग़वानी के वे ख़ूब शौकीन थे। बोनसाई और कैक्टस की उनकी दीवानगी उनके व्यक्तित्व का दर्पण बन गई। बोनसाई की तरह उन्होंने जीवन भर अपना क़द बढ़ाने से अधिक ध्यान अपने अस्तित्व की पूर्णता पर दिया और कैक्टस की तरह कंटीला जीवन जीने के बावजूद कहीं से भी तड़कने पर गीत का दूधिया बहाव कम नहीं हुआ। कैक्टस कंटकों के लिए जाना जाता है, लेकिन राजगोपाल जी ने यह समझा कि काँटों की बदनामी झेलता कैक्टस वर्ष में एक बार पुष्पित भी होता है और जब यह पुष्प खिलता है तो इसके एक फूल के सम्मुख हज़ारों कुमुदनियों की प्रसिद्धि फीकी पड़ जाती है। आज भी नजफगढ़ में उनके घर की छत पर उनके ये बोनसाई और कैक्टस उनकी मान्यताओं का अनुवाद कर रहे हैं। उनके अशआर में यह हरियाली अपने पूरे सौष्ठव के साथ उपस्थित है। प्रकृति के प्रेम में पगी ग़ज़लों के रचयिता के जन्मदिन का आयोजन है। वे तो नहीं होंगे लेकिन उनकी स्मृतियां होंगी, उनका चित्र होगा और उनकी कविताओं में प्रदर्शित उनका पूरा चरित्र होगा। पूरा जीवन लेखनी को समर्पित करने वाले राजगोपाल सिंह जी को याद करने के लिए अपने जीवन के कुछ पल निकाल सकें तो आप भी आना! अच्छा लगेगा!
✍️ चिराग़ जैन

बैरागी जी नहीं रहे

आह! हिंदी के शौर्य जा सूरज डूब गया। कवि सम्मेलनों में दिनकर की ऊष्मा को उग्र करके जीवित रखने वाला अमर रथ ऊर्ध्वगामी हो गया। कविता की वर्तिका की जाज्वल्यमान आभा खो गई। कड़वा है, पर सत्य है बैरागी जी नहीं रहे। आज शाम गोधूलि वेला में वे दिनकर के संग अस्त हो गए। जीवंत इतने थे कि आयु की विवशताओं के सम्मुख घुटने टेक कर कभी निष्क्रिय नहीं हुए। आज दोपहर तक मनासा में एक कार्यक्रम में शिरक़त करके लौटे और ज़िन्दगी को अभिमान से कह गए कि अंतिम श्वास तक सक्रिय रहा हूँ। संघर्षों की भट्ठी में तपकर दमकी एक रौशनी बुझी है आज। इन तूफानों की रफ्तार बता रही है कि कोई बहुत विशाल वटवृक्ष धराशायी हुआ है। प्रणाम दद्दू!

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Demise of Balkavi Bairagi

काला अम्ब

हरियाणा और हिमाचल के संगम पर एक छोटा सा कस्बा है – काला अम्ब। दोपहर बाद जब यहाँ पहुँचे तो उदासी और वीराने के दर्शन हुए। सूखी हुई पहाड़ी नदी, ट्रैफिक, धूप और बेतरतीब सी शहरी ज़िन्दगी जी रहे लोग। लेकिन ज्यों-ज्यों शाम ढली, त्यों त्यों इस उदासी में उत्सव पैर पसारने लगा। हिमालयन ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज़ के परिसर में रौशनी सिंगरने लगी। पहाड़ से उतरी हुई ठंडी हवाओं ने उमस का तख्ता पलट दिया।
यूकलिप्टस के ऊँचे वृक्षों पर टंगा हुआ आधा चाँद ऐसा लगता था मानो आसमान के गाढ़े अंधेरे ने काले धागे सोने का तावीज पहन रखा हो। शिक्षण संस्थान के वार्षिकोत्सव से निकसित स्वर लहरियाँ हवा के सोर में गुंथकर मटके और बीन का संगीत निर्मित करती थीं।
परिसर के भीतर श्रोतादीर्घा भारत के लोकतंत्र का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करती थी। अध्यात्म के प्रतिनिधित्व में ब्रह्मचारी ब्रह्मस्वरूप जी, न्यायपालिका की ओर से जस्टिस मित्तल और तीन अन्य न्यायाधीश, विधायिका की ओर से कम्बोज जी और असीम गोयल जी, पत्रकारों का विशाल समूह, सशस्त्र सैन्य बल, व्यापारी समूह, अध्यापक वृन्द, विद्यार्थी, कर्मचारी और कवियों में पद्मश्री सुरेन्द्र शर्मा, कर्नल वीपी सिंह, शम्भू शिखर, गजेंद्र प्रियांशु और चिराग़ जैन।
राजनैतिक व्यंग्य, ठहाके, श्रृंगार के मधुर गीत तथा भारत के शौर्य का यशगान। शहीदों की श्रद्धांजलि हेतु दो ढाई हज़ार श्रोताओं का समूह शौर्य की हुंकार के साथ खड़ा हो गया। कवि सम्मेलन में आँसू और मुस्कान का सुयोग देखने को मिला।
✍️ चिराग़ जैन

अरुण जैमिनी

हिंदी कवि सम्मेलनों की अपनी डेढ़ दशकीय यात्रा में हर वरिष्ठ ने कुछ न कुछ सिखाया है। यात्राओं में लगभग सभी के साथ अच्छा समय बिताया है। इस डेढ़ दशक में मुझे ज्ञात हुआ कि हर शख़्स अपनी सीमित बुराइयों और असीमित अच्छाइयों के साथ जीता है। इस डेढ़ दशक में मैंने जाना कि हर बड़ा व्यक्ति भीतर से एक बेहद प्यारा और मासूम बालक ही होता है। जीवन की इस पाठशाला में जिन्होंने मुझे ज़िंदादिली और सकारात्मकता के अध्याय पढ़ाए उनका नाम है – अरुण जैमिनी। बड़ी से बड़ी घटना को हँस कर टाल देना, कठिन से कठिन परिस्थिति में संयत रहना और हर इंसान के अस्तित्व को सम्मान देना उनके व्यक्तित्व की विशेषता है। ठहाके और मस्ती उनकी उपस्थिति का अंश हैं। चिंता करना, घबराना, परेशान हो जाना और विचलित होना उन्होंने जैसे सीखा ही नहीं। स्वयं की सुविधाओं को प्राथमिकता देने के बावजूद वे कभी किसी के सुख में अवरोधक नहीं बनते। बड़े होने का अहंकार और लोकप्रिय होने का दम्भ कम से कम मैंने तो उनके व्यक्तित्व में कभी नहीं देखा। आयु में उनसे लगभग आधा और प्रसिद्धि में उनसे चौथाई होने के बाद भी मैंने उनसे हमेशा एक मित्रता का संबंध ही पाया है। उनका जीवन आज साठ साल पूर्ण कर रहा है। ये साठ वर्ष की अवधि हर उस संघर्ष से सुसज्जित है जो एक सामान्य मनुष्य को झेलना पड़ता है लेकिन इस सब संघर्षों में अपने भीतर के अरुण जैमिनी को बचाए रखना एक असामान्य घटना है।

✍️ चिराग़ जैन

थाईलैंड की खाड़ी पर बसा यह रंगीन शहर – पटाया

बैंकाक में काव्यपाठ के उपरांत पटाया भ्रमण का निर्णय हुआ। थाईलैंड की खाड़ी पर बसा यह रंगीन शहर अपनी विलासिता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मुम्बई जैसी ऊमस भरे मौसम में भी लोगों की ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। प्रदूषण और गंदगी से पूरी तरह मुक्त यह शहर सैलानियों की पसंदीदा जगह है। नारियल की मिठास यहाँ सामान्य से अधिक है। आम का मौसम है इसलिए आम और लीची बेचने वाले हर सौ कदम पर मिल जाते हैं। थाई महिलाएँ बेहद परिश्रमी होती हैं। समुद्र किनारे रेस्तरां चलाने से लेकर मसाज पार्लर्स में काम करने तक हर जगह उनकी ऊर्जा यथावत है। थाई पुरुष टैक्सी या मोटरबाइक पर सैलानियों की दूरियाँ कम करते हैं। गौतम बुद्ध के प्रति आस्था पूरे देश में अनवरत प्रसारित है। महाराज जनक के समान थाईलैंड का शरीर भी एक ही समय में आधा भोग में रत है और आधा साधना में। एक ओर स्वर्णाभ बुद्ध बिंब और थाई वास्तु से सुसज्जित पैगोडा मन को तृप्त करते हैं वहीं दूसरी ओर वाकिंग स्ट्रीट जैसे बाज़ार तन की थकान दूर करते हैं। भारत की तरह यहां भी अमलतास के कंगूरे खिल उठे हैं। दूर पश्चिम में सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो गए हैं। उनकी कांति से स्वर्णदेही तथागत और भी भव्य हो उठे हैं। बाज़ारों में रंगीनियां बढ़ने लगी हैं। दिन भर की ऊमस को पदच्युत कर समुद्री हवाओं ने सत्ता सम्भाल ली है। हमने पटाया को स्वतदिखरप कहा और बैंकाक रवाना हो गए।

✍️ चिराग़ जैन

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