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विश्व भर में भावुकता और संवेदना की मिसाल कहा जानेवाला देश आज राजनैतिक वर्चस्व की अंधी होड़ में संवेदना जैसे शब्दों को कितना बेमआनी कर चुका है, इसका आभास होने तक संभवतः हमारे पास पश्चाताप के लिए आंसू तक नहीं बचेंगे।
हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर नौनिहालों को बलिदान करनेवाले चरित्र कंस और हिरण्यकश्यप जैसी कुख्याति को प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस दौर में निगेटिव पब्लिसिटी को भी सुर्ख़ियों में बने रहने का हथकण्डा समझा जाने लगा हो, वहां बेचारी संस्कृति की पुस्तक पलटने की फ़ुरसत किसके पास बची है!
यह सत्य है कि लखनऊ की आग न तो सत्ता ने लगाई है, न ही विपक्ष ने। लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीति ने हमारी संवेदना को इतना भौंथरा तो कर ही दिया है कि हम चौदह-पन्द्रह परिवारों की चौखट पर पसरे अंधेरे पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह सोच रहे हैं कि इससे सत्ता को क्या नुकसान होगा और विपक्ष को क्या लाभ होगा। हम मानवता की मर्यादा रेखा से इतनी दूर तो आ ही गए हैं कि बड़े से बड़े दुर्भाग्य की ख़बर सुनकर हमारे समाचार चैनल यह विचार करने लगते हैं कि जिस इमारत में आग लगी है उसे कोचिंग सेंटर की बजाय गेमज़ोन कहने से ख़बर की लपटों को किस दिशा में मोड़ना संभव हो सकेगा।
यह एक सत्य है कि ‘हादसे बोलकर नहीं आते’ लेकिन यह भी सत्य है कि यदि प्रशासन हादसे से उपजे क्रोध को डाइल्यूट करने की बजाय वास्तव में समाधानोन्मुखी कदम उठाती तो आज़ादी के आठवें दशक में भी हम अनाधिकृत निर्माण और विभागीय भ्रष्टाचार के कारण निर्दोष युवक-युवतियों के झुलसे हुए जिस्म देखने पर विवश न हुए होते।
परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और विभागीय लापरवाही से हताश जिन बालकों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं, वे दरअस्ल हमारी व्यवस्था के मुंह पर यह प्रश्नचिन्ह तो छोड़ ही गए हैं कि इस हताशा का असली दोषी कौन है कि एक बालक अपने सिस्टम से सवाल पूछने की बजाय, अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेना ज़्यादा आसान समझ रहा है। हो सकता है कि अत्याचार के आगे अपना मुंह बंद करने से अधिक आसान जान पड़ा हो अपनी आंखें बंद कर लेना।
कल उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री को लखनऊ के घटनास्थल के बाहर मीडिया को बाइट देते देखा। महसूस हुआ कि उनका गला भर्रा गया था। महसूस हुआ कि उनकी आंखों की कोरें भीग गई थीं। बस उसी एक बाइट को देखकर मेरे भीतर के नैराश्य में आशा की किरण जगती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ज्यों ही मीडिया कवरेज देखी तो ऐसा लगा जैसे हमने संवेदना की तमाम उम्मीदों को नेस्तोनाबूद करने का प्रण ले लिया है।
प्रश्न यह नहीं है कि सत्तर साल किसका शासन था और बारह साल से कौन गद्दी पर बैठा है। प्रश्न यह है कि दिल्ली में तोड़े जा रहे अनधिकृत निर्माण पर व्यवस्था को कोसनेवाले अराजक नागरिकों को लखनऊ की दुर्घटना पर अनधिकृत निर्माण के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
प्रश्न यह है कि यदि अलीगंज की उस इमारत के लिए अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग की जा सकती है तो चांदनी चौक और करोलबाग़ की इमारतों का हिसाब-किताब करने पर हंगामा क्यों मचाया जाता है।
दरअस्ल समस्या के समाधान पर किसी का ध्यान है ही नहीं। सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी घटना या दुर्घटना पर उनके मन में केवल एक प्रश्न कौंधता है कि इस घटना को भुनाकर पब्लिक सेंटीमेंट्स अपने पक्ष में कैसे किये जाएं। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में सिर पर लटकते बिजली के तार हटाने तक का साहस जिस व्यवस्था में नहीं है, वह बुलडोजर और त्वरित न्याय की बात करती अच्छी नहीं लगती।
जब कभी यह प्रश्न उठता है, तब बेशक सरकारी विभाग कुछ छज्जे तोड़कर, कुछ इमारतें गिराकर अपनी गंभीरता का विज्ञापन करने लगते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में वह इमारत बनकर तैयार हुई, जिस-जिस अधिकारी के हस्ताक्षर से उसका बिजली-पानी का कनेक्शन पास हुआ। जिस-जिस अधिकारी ने उसकी हाउस-टैक्स की रसीदों पर हस्ताक्षर किए, उन सब पर हत्या के मुकदमे चलाने का प्रवधान नहीं होगा तो यह व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी।
मैं किसी भाजपा या किसी कांग्रेस का समर्थन या विरोध करके अपने आंसुओं का अपमान नहीं करना चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि अमानवीय भ्रष्ट आचरण को किसी भी तरह की अराजकता के हाथों सौंप दिया जाए। मैं केवल इतना चाहता हूं कि जिन संभावनाओं को कल अलीगंज की इन लपटों ने लील लिया है, उन्हें हम श्रद्धांजलि न दें, बल्कि यह आश्वस्ति दें कि ‘प्यारे बच्चो! जब भी इस देश में व्यवस्था-सुधार के तात्कालिक कारणों पर चर्चा होगी, तब तुम सबके झुलसे हुए चेहरे सूरज की तरह चमक उठेंगे।’

✍️ चिराग़ जैन

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