Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
एक महोदय ने अनजान नम्बर से अभी मुझे व्हाट्सएप पर मैसेज किया कि मैं फलानी जगह पर हूँ और यहाँ अस्पताल में एक परिवार मुझे महान सहायक मानकर मुझसे 10000 रुपये की अपेक्षा कर रहा है। मेरे खाते में केवल 3500 रुपये ही हैं। आप कृपया मुझे 10000 रुपये जमा करवा दो ताकि मैं उसकी दृष्टि में ‘महान’ बना रह सकूँ।
जब तक मैं इस संदेश को पढ़कर समझ पाता, तब तक किसी अन्य का फोन आ गया और मैं किसी कार्य में व्यस्त हो गया। काम निबटाकर जैसे ही व्हाट्सएप देखा तो श्रीमान जी अपने पुराने मेसेज डिलीट फ़ॉर आल करके नीचे सभ्य शब्दों में गाली देकर विदा हो गये।
यह घटना केवल इसलिए बता रहा हूँ कि आपकी भावुकता का लाभ उठाकर कहीं कोई आपके साथ छल करे तो सावधान हो जाएँ। धन की सहायता तब तक किसी की न करें, जब तक उससे आपका या आपके किसी अपने का सीधा परिचय न हो।
आशा है आप मेरा आशय समझ सकेंगे।
चिराग़ जैन
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कोविड के कारण स्थितियाँ निश्चित रूप से विकट हैं, किंतु इस समय में आपको और हमको अधिक उत्तरदायित्व तथा विवेक के साथ आचरण करने की आवश्यकता है। कुछ बातों का सब लोग ध्यान रखें तो स्थिति सामान्य होने में मदद मिलेगी –
1) यदि घर में कोई रुग्ण हो तो उसका ऑक्सीजन लेवल और तापमान मापते रहें, जब तक ऑक्सीजन लेवल 94 से नीचे न होवे तब तक घबराकर अस्पताल भागने से बचें।
2) किसी अप्रिय स्थिति के अंदेशे में दवाइयाँ और ऑक्सीजन सिलेंडर स्टॉक करके न रखें, यह आचरण शेष लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है।
3) किसी भी स्थिति में कोविड सम्बन्धी कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से पूर्व उसकी पुष्टि अवश्य करें। एक ग़लत सूचना दर्जनों लोगों का समय नष्ट करके उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा सकती है।
4) कोई भी उपयोगी फोन नम्बर सार्वजनिक करने की बजाय वह नम्बर ज़रूरतमंद को इनबॉक्स में दें, अन्यथा अनावश्यक कॉल अटैंड करके लोग परेशान हुए जा रहे हैं।
5) पैनिक न क्रिएट करें, किसी भी चुनौती में धैर्य तथा विवेक से ही समाधान निकल सकेगा। हड़बड़ाहट में काम बनने की बजाय बिगड़ते ही हैं।
6) डॉक्टर्स और अस्पतालों पर भरोसा करें। सामान्यतया कोई डॉक्टर जान-बूझकर अपने किसी मरीज़ को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। किन्तु यह भी ध्यान रखें कि डॉक्टर भी अंततः इंसान ही है। इसलिए ग़लती और अपराध के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करें।
आपका विवेक ही इस दौर का पहला उपचार है।
चिराग़ जैन
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जहाँ-जहाँ जो जो संपर्क सूत्र थे उन सबको प्रयोग कर चुका हूँ। अब नाशिक से लेकर इंदौर तक और देहरादून से लेकर जोधपुर तक अपने फोन में उपलब्ध प्रभावी तथा सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों के नम्बर न जाने कितने लोगों के साथ साझा कर चुका हूँ।
मेरी इस धृष्टता से कई ज़रूरतमंदों को समय पर मदद मिल गयी है। हालाँकि कुछ लोग नाराज़ भी हुए हैं लेकिन मेरे लिए ये नाराज़गी झेलना महंगा सौदा नहीं है। यदि आप भी मेरी फोनबुक में मौजूद हैं तो तैयार रहिएगा, किसी अनजान नम्बर से आपके पास भी मदद का फोन आ सकता है; यदि इर्रिटेट हो जाएँ तो बाद में मुझे फोन करके गालियाँ दे लेना, पर इस वक़्त मुसीबत में फँसे उस व्यक्ति की सहायता कर देना।
✍️ चिराग़ जैन
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कोरोना से जूझते लोगों और उनके परिवारों की मदद में जुटे सभी वालंटियर्स का आभार व्यक्त करते हुए एक विनम्र अनुरोध यह है कि हम सब अपनी-अपनी सीमित क्षमताओं में प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में किसी ज़रूरतमंद का संदेश अनदेखा रह जाए तो कृपया उस पर कटाक्ष करने की बजाय, अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास करें।
ये सब लोग जो अपनी सोशल प्रोफ़ाइल, अपना समय और अपने समस्त सम्पर्कों को झोंककर लोगों के लिए सहायता जुटा रहे हैं इन्हें कोई लोभ-लालच नहीं है। ये सब मनुष्यता के नाते मनुष्य के प्रति करुणाभाव लिये दिन-रात जाग रहे हैं। सम्भव है कि इनको हर जगह सफलता न मिले, लेकिन इनकी कोशिश सदैव स्तुत्य रहेगी।
कहीं संपर्क नहीं हो पा रहा तो कहीं कुछ अमानवीय लोगों द्वारा फैलाए हुए श्फेकश् सम्पर्कों के कारण भ्रामक स्थिति बन रही है। इन सब चुनौतियों से जूझते हुए ये सब पावनमना मनुष्य अपने घर-परिवार को ताक पर रखकर जी-जान से इस अभियान में जुटे हुए हैं।
आप इनके सम्बल बनिये। यदि इनकी किसी पोस्ट पर किसी ज़रूरतमंद की कोई गुहार दिखाई दे तो वहीं रिप्लाई में उसे यथासम्भव सहायता पहुँचाने की कोशिश करें। जो जहाँ परेशान है उसे उस जगह का कोई स्थानीय संपर्क सूत्र ही उपलब्ध करा दें। सम्भव है आपका यह कृत्य किसी के लिए जीवनदायी सिद्ध हो।
ये देश आपका भी उतना ही है, जितना इस अभियान में जुटे लोगों का। इसके चरमराते ढांचे को बचाने में हाथ न लगा सकें तो कृपया लात भी न मारें।
अपनी तमाम नकारात्मकता के साथ एक बार सोचें जिनको रात के दो बजे भी सहायता के लिए कोई नम्बर मिल पा रहा हो उसे कैसा लग रहा होगा। एक बार सोचें कि जिसकी टूटती उम्मीद के आखिरी छोर पर सहायता खड़ी मिल रही हो उसे कैसा लग रहा होगा।
हाँ, ये सब आप जितने अनुभवी नहीं हैं कि ग़लती होने के भय से कुछ करें ही नहीं। ये तो बेचारे सारी ग़लतियों का रिस्क लेकर भी आगे बढ़कर सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। सैंकड़ों लोगों तक इन तीन-चार दिनों में सहायता पहुँचाने में सफल भी हुए हैं।
ये नन्हें-नन्हें हाथ तूफान से जूझकर कश्ती खेने चले हैं। इनको आशीष दो!
चिराग़ जैन
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जिनकी कविताएँ पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है, उन सब युवाओं की पिछले दो-तीन दिन की क़वायद ने बुझती हुई आँखों में नयी रौशनी भर दी है। दिन-रात लगकर ये सब अनजान लोगों की मदद के लिये सबके आगे हाथ फैला रहे हैं।
न खाने का होश है न पीने की चिंता। बस यहाँ ऑक्सीजन, वहाँ इंजेक्शन, वहाँ डोनर, वहाँ प्लाज़्मा और यहाँ तक कि किसी के घर खाना कैसे पहुँचे इसकी भी ज़िम्मेदारी उठा ली है इन मासूम कंधों ने।
इनसे कोई पूछ ही नहीं रहा कि तुम्हारी अपनी तबीयत तो ठीक है ना! जब किसी तक मदद पहुँचाने में सफल हो जाते हैं तो इनके स्टेटस में लिखे शब्द बल्लियों उछलने लगते हैं और जब कहीं निराशा हाथ लग जाती है तो निढाल हो जाते हैं।
कोई छल-कपट नहीं है इनमें। इनके ये प्रयास किसी मन्दिर की आरती और मस्जिद की अज़ान से ज़्यादा पवित्र जान पड़ते हैं। जिसकी मदद की गुहार सुनते हैं, उसका धर्म-जाति, भाषा वगैरा कुछ भी सोचे बिना बस उसके शहर का नाम पढ़ते हैं और धड़ाधड़ सम्पर्क साधने में जुट जाते हैं। ये इस देश का असली जज़्बा है। इन्हें जिसकी सहायता करनी है, मतलब करनी है। उसके लिए डीएम से लेकर सीएम तक जिसका नम्बर मिल जाए, ये धड़ल्ले से उसे फोन खटका देते हैं। ऐसा ही देश सोचा होगा हमारे पुरखों ने।
क़ीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी है लेकिन इस बीमारी के कारण मेरे देश की फुलवारी ने वटवृक्षों को सहारा देना सीख लिया है। इनके हौसले को बनाए रखने में जो मदद हो सके, ज़रूर कीजिये।
इन्हें ध्यान से देखो, हर बालक में एक कन्हैया दिखाई देगा जिसने अपने गोकुल की रक्षा के लिये अपनी नन्हीं उंगली पर गौवर्द्धन उठा लिया है।
इति शिवहरे, ललित तिवारी, रुचि चतुर्वेदी, प्रिंस जैन, दीपाली जैन, पार्थ नवीन, सृष्टि सिंह, प्रियांशु गजेंद्र, भूमिका जैन, सुनील साहिल, अजय अंजाम, अवनीश त्रिपाठी, स्वयं श्रीवास्तव, सुदीप भोला, रामायण धर द्विवेदी, रश्मि शाक्या, कमलेश शर्मा, अनुज त्यागी, नंदिनी श्रीवास्तव, दीपक पारीक, नीर गोरखपुरी, विनोद पाल, दुर्गेश तिवारी, कुमार सागर, पूजा यक्ष, सरगम अग्रवाल, शालिनी सरगम, गौरव चौहान, संदीप शजर, रूपा राजपूत, भावना राठौर, पल्लवी त्रिपाठी, एकता भारती, गोपाल पाण्डे, हिमांशु भावसार और न जाने कितने सारे ऊर्जावान युवा लगातार लोगों के आँसू पोंछने के लिए अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए उपलब्ध हैं।
इन्हें नाम की कोई चाह नहीं है। जिस तक मदद पहुँच जाए, उसके लिए की गयी मदद की गुहार वाली पोस्ट भी ये अपनी वॉल से डिलीट कर देते हैं। कई ऐसे भी हैं जो व्हाट्सएप समूहों में लगातार जुटकर लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन उनका नम्बर मेरे पास दर्ज नहीं है इसलिए उनका नाम तक मैं नहीं जानता।
सचमुच, ये ऐसे मदद कर रहे हैं जैसे मदद की जानी चाहिये। ईश्वर मेरे जीवन के सारे पुण्य इन सब पर बरसा दे!
चिराग़ जैन