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मध्यम वर्ग का शिकार

मध्यम वर्ग इस देश का सर्वाधिक दीन-हीन प्राणी है। उसका जन्म इसीलिए हुआ है कि वह शासन-प्रशासन से लेकर निजी कंपनियों तक के अर्थ-आखेट के काम आ सके।
जंगल में हिरन शिकार के ही काम आते हैं। शेर से बच गये तो लकड़बग्घों, तेंदुओं और सियारों तक की निगाह हिरनों पर रहती है। इन सबसे बच जाएँ तो किसी मनुष्य को अपने बंगले की दीवार पर हिरन का सिर लटकाने का शौक चर्रा जाता है।
हिरन अपने शिकार की कहीं शिकायत नहीं कर सकते। क्योंकि शिकायतनफ़ीस को भी हिरनों का शिकार करना अच्छा लगता है।
वर्तमान में दिल्ली के मध्यम वर्ग का आखेट करने का शौक लगा है निजी कैब कम्पनियों को। उच्च वर्ग को इन कम्पनियों की सेवा की ज़रूरत नहीं पड़ती और निम्न वर्ग इन सेवाओं को प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं समझता। बच गया मध्यम वर्ग, वह इन कम्पनियों का टारगेट क्लाइंट है। प्रारम्भ में चूँकि इन कम्पनियों का युद्ध ऑटोचालकों और अन्य ट्रांसपोर्ट सेवाओं से था इसलिए इनकी विनम्रता तथा दरें आश्चर्यजनक रूप से आकर्षक थी। मध्यम वर्ग, जो मीटर से न चलने वाले ऑटोरिक्शा चालकों से प्रताड़ित था, वह इन सेवाओं का उपभोक्ता बन गया। लेकिन सियारों से बचाने जो लकड़बग्घे आए थे, उन्होंने सियारों को भगाकर ख़ुद ही हिरनों का शिकार करना शुरू कर दिया।
मध्यम वर्ग के शिकार के लिए कैब सर्विस के हथकण्डे:
1) सर्ज के नाम पर आधिकारिक रूप से तीन-चार गुना तक किराया वसूला जाता है। सरकारें इन कम्पनियों से यह पूछने की ज़ुर्रत नहीं कर पातीं कि समान दूरी के लिए वही गाड़ी इतनी महंगी क्यों पड़ रही है, जबकि जाम में फँसने की स्थिति में प्रति मिनिट किरायेवाला मीटर चालू रहता है।
2) इतना किराया देने के बावजूद कैब बुक होने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। कहाँ जाएंगे, पेटीएम की पेमेंट है तो नहीं जाऊंगा, गुड़गांव नहीं जाऊंगा, नोएडा नहीं जाऊंगा, शाहदरा नहीं जाऊंगा…; एक्स्ट्रा पैसे देने होंगे… इत्यादि। इस साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण होने के बाद आप ड्राइवर से कहते हैं कि वह राइड कैंसिल कर दे। यह अनुरोध करने के बाद आप मोबाइल देखते रहते हैं लेकिन वह राइड कैंसिल नहीं करता। आप उसे दोबारा फोन करते हैं तो वह फोन भी नहीं उठाता। थक-हारकर आप मजबूरी में अपनी ओर से राइड कैंसिल करते हैं और कम्पनी आपके नाम चालीस रुपये का बिल फाड़ देती है।
3) चूँकि मध्यम वर्ग के पास ऐसे सीन में कम्प्लेंट करने का पर्याप्त समय होता है, इसलिए कम्पनियों ने अपनी एप्लिकेशन में कोई फोन नम्बर ही उपलब्ध नहीं कराया है। आप अधिक से अधिक लिखित में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जिसमें शिकायत के विकल्प कम्पनी ने स्वयं निर्धारित कर रखे हैं।
4) आजकल इन ड्राइवर्स का नाम हाथापाई और ईव-टीज़िंग तक के मुआमलात में थानों के स्वर्णिम रजिस्टरों में दर्ज होने लगा है, लेकिन थानों की कछुआ शैली का लाभ उठाकर खरगोशों का अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।

हिरन सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इन लकड़बग्घों के गले में कानून की ज़ंजीर डाले। अनुरोध पढ़कर सरकार ज़ंजीर बनवाने का टेंडर पास करती है। ज़ंजीर की खनक सुनकर हिरन उत्साहित होने लगते हैं। सरकार सोशल डिस्टेंसिंग के पालन हेतु बसों और मेट्रो में सख्ती लागू कर देती है। डीजल की गाड़ियों पर बैन लगा देती है। पॉल्यूशन का चालान दस हज़ार का कर देती है। और लकड़बग्घों के लिए तैयार की गयी ज़ंजीर में हिरनों को बांधकर लकड़बग्घों के आगे पटक देती है।
हिरन सरकार की ओर कातर दृष्टि से देखते हैं और लकड़बग्घों की सहृदयता के लिए उन्हें नमन करते हैं कि अब से पहले कम से कम हमें बसों, मेट्रो और निजी वाहनों की स्वतंत्रता तो प्राप्त थी।
दिल्ली के सारे हिरन देखते रहते हैं कि सरकार हाथियों के लिए गन्ने की व्यवस्था कर रही है। हिरनों के नाम से जुटाई गयी घास खरगोशों में बाँटी जा रही है। लकड़बग्घों को हिरन परोस दिए गए हैं। और पूरी दिल्ली को व्यवस्थित करने के बाद अब सरकार पंजाब के हिरनों से वादा कर रही है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुलायम सरकारी घास खिलाई जाएगी।
मैं ज़ंजीर में बंधा हुआ 2.3 गुना सर्ज की निजी कैब में बैठा हूँ और बस स्टैंड पर लगा होर्डिंग पढ़ रहा हूँ जिसमें अन्योक्ति अलंकार में यह लिखा है कि- ‘दिल्ली सँवारी, अब पंजाब की बारी।’

✍️ चिराग़ जैन

जनरल विपिन रावत की शहादत

भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन

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