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दल बदलू का कार्यकर्ता

कल तक जो थे दोस्त, कहा अब उनको दुश्मन मान
हम पुतले हैं या इंसान

कल तक जिनको गाली दी थी
जुमला छाप जुगाली की थी
अब कहते हो गाली छोड़ करें उनका गुणगान
हम पुतले हैं या इंसान

कल तक जिनके कपड़े फाड़े
हमने जिनके टैंट उखाड़े
अब तुम ख़ुद ही बैठ गये हो उनका तम्बू तान
हम पुतले हैं या इंसान

जब तुम चाहो पत्थर मारें
जब तुम बोलो चरण पखारें
स्वार्थ तुम्हारे पूरे होते, हम होते बलिदान
हम पुतले हैं या इंसान
✍️ चिराग़ जैन

उदित राज के विवादित बयान

कैसे देते हो विवादित बयान
बताओ ये कहाँ से सीखे
ऐसी बातें ही क्यों करते श्रीमान
बताओ ये कहाँ से सीखे

बीच बहस में क्यों चैनल को छोड़ चले आते हो
अपनी-अपनी कहते, औरों की नहीं सुन पाते हो
झट से हो जाते हो कैसे अंतर्धान
बताओ ये कहाँ से सीखे

कभी कुम्भ के मेले पर ही प्रश्न उठा देते हो
मीटू को भी ब्लैकमेलिंग का ज़रिया बतलाते हो
सोशल मीडिया से तनती है कमान
बताओ ये कहाँ से सीखे

थेथर, कुत्ता, गूंगा, बहरा, कंगना नाचने वाली
ढक्कन, कीड़ा, मिर्ची, हैकिंग, धूर्त, पनौती, गाली
लाते कहाँ से हुज़ूर ये सामान
बताओ ये कहाँ से सीखे
✍️ चिराग़ जैन

उदित राज को समर्पित

जब तक टिकट नहीं कट जाती
तब तक सब कुछ चलता है
सब कुछ है चलता है
टिकट का कटना खलता है

जिस पुलवामा की घटना को साज़िश आप बताए
उस घटना के घटने पर क्यों दल को छोड़ न पाए
जिसकी खाट खड़ी हो जाए
वो ही आँखें मलता है
आंखें मलता है, टिकट का कटना खलता है

राष्ट्रपति को गूंगा-बहरा कहते नहीं हिचकते
बीजेपी में रहकर क्यों ये बात नहीं रख सकते
जबसे पार्टी बदली कर ली
तबसे जियरा जलता है
जियरा जलता है
टिकट का कटना खलता है
✍️ चिराग़ जैन

राजनीति में कार्यकर्ता की सीमाएँ

भारतीय राजनीति, जनता को, मिलकर रहने की प्रेरणा देती है। धर्म, विचार, आदर्श, सिद्धांत और विचारधारा जैसे खिलौनों में उलझकर आपस में द्वेष उत्पन्न करनेवाले लोगों को राजनीति से सीखना चाहिए कि इन सब रास्तों का अस्तित्व वहीं तक है, जहाँ तक गंतव्य दिखाई न देता हो। एक बार गंतव्य दिखाई दे जाये; फिर इन शब्दों को विस्मृत कर देना ही सफल मनुष्य का कर्त्तव्य है। जो मार्ग ईश्वर तक न पहुँचाता हो वह अधर्म है; इसी प्रकार जो सिद्धांत सत्ता तक पहुँचाने में बाधा दे, उसका वध कर देना ही उचित है।
अध्यात्म में जिन्हें स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वे वास्तव में राजनीति के गलियारों में ही वास करते हैं। जनता चाहे आपके लिये लड़-लड़कर मर रही हो, कार्यकर्ता चाहे आपके प्रति श्रद्धावान रहकर अपना तन-मन झोंक चुका हो; किन्तु सत्ता पर अधिकार करने के लिये जनता की भावनाओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण की बेड़ियों को तोड़ देनेवाला ही वास्तव में शासन के योग्य माना जाता है।
बरसों-बरस मनुवाद को पानी पी-पीकर कोसनेवाले यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर उस समय उत्तर प्रदेश की कुर्सी न हथियाते तो कार्यकर्ताओं की भावना को क्या धरकर चाटते? साँप और नेवले की तरह लड़नेवाले सपाई, अगर बसपाइयों के चरण न पखारते तो लोहिया जी के सिद्धांतों का क्या अचार डालना था?
राजनीति निरंतर हमें अपने आचरण से यह समझाती रहती है कि सफल होनेवाले व्यक्ति सिद्धांतों की पूँछ पकड़कर नहीं चलते, वे तो ‘महाजनो येन गतः स पन्थः’ की नीति पर चलकर सदैव सत्तारूढ़ रहते हैं। नीतीश कुमार जी लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि राजद के प्रति कहे गए अपने ही वचनों का स्मरण करने के चक्कर में पड़े होते तो कुर्सी पर ध्यान केंद्रित कैसे करते? ये महान योगी तो वर्तमान में जीते हैं। अर्जुन की तरह उन्हें केवल मंत्रालय की कुर्सी दिखाई देती है; अन्य वस्तुएँ उनकी एकाग्रता से अछूती ही रहती हैं। कल किसको क्या कहा था और कल किसको क्या कहा जायेगा – इन ओछे प्रश्नों में उलझना तो कार्यकर्ता का काम है। इन सबसे ऊपर उठे बिना आप कार्यकर्ता तो हो सकते हो, नेता नहीं।
नेता बनने के लिये तो स्वयं अपनी ही कही हुई बातों से विमोह करना पड़ता है। जिसको गाली दी जा रही है और जो गाली दे रहा है ये दो महाशक्तियाँ जब एकाकार होकर मंच पर गले मिलती हैं तब कहीं जाकर एक सरकार बनती है।
शिवसेना की कट्टरपंथी छवि के समस्त अवगुणों को ‘थोथा देय उड़ाय’ की तरह मन से भुला कर विधायकों की संख्या का सद्गुण ग्रहण करते हुए जब कांग्रेस महाराष्ट्र राज्य की सरकार का निर्माण करने के लिये राज़ी हो जाती है तब कहीं जाकर यह ज्ञात होता है कि राजनीति के हठयोगियों को कितनी कठिन साधना करनी पड़ती है।
राजनेता को जनक की तरह विदेह भी होना पड़ता है। एक ही समय में एक ही पार्टी का केंद्र में समर्थन तथा राज्य में विरोध करने का कार्य बड़े-बड़े योगियों के वश में भी नहीं है। किंतु हमारे राजनेताओं ने यह दूभर कार्य अनेक अवसरों पर कर दिखाया है।
पीडीपी और भाजपा का गठबंधन; राजद और कांग्रेस का गठबंधन; वामपंथ और दक्षिणपंथ का गठबंधन… और न जाने कितने असम्भवप्रायः संयोग बनाकर भारतीय राजनीति ने हमें बार-बार समझाया है कि शत्रु और मित्र केवल चुनावी रैलियों में होते हैं; सदन में यह सब नहीं चलता। जो इन सबमें फँसते हैं वे कभी सदन के दर्शन नहीं कर पाते।
इसलिए हे कार्यकर्ताओ! राजनीति में रोचकता बनाए रखने के लिए ख़ूब लड़ो। जो अभी हमारे साथ नहीं है उसको ख़ूब गालियाँ दो। उसके कच्चे चिट्ठे खोलकर उसे भरे बाज़ार में नंगा करो। जो उसका समर्थक हो उसे अपना शत्रु मानो। उससे मित्रता, रिश्तेदारी और मनुष्यता तक समाप्त कर दो। किन्तु जैसे ही वह हमारे साथ मिल जाए, तुरंत उसका गुणगान करना प्रारंभ करो। उसके ऊपर लगनेवाले भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से ख़ारिज करो। उसके समर्थक को रिश्तेदार बना लो।
यदि यह सब करते समय तुम्हें हैरानी अथवा परेशानी हो; तुम्हारा ज़मीर तुम्हें धिक्कारने लगे; तुम्हारी आत्मा तुम्हारे हाथ पकड़ ले तो समझ लेना कि तुम्हारा जन्म केवल झण्डे और बिल्ले बाँटने के लिए ही हुआ है; तुम्हारा कार्य केवल पार्टी कार्यालय के बाहर इलेक्शन के बाद भीड़ बनकर नाचने तक सीमित है; तुम्हें मृतज़मीर सिद्धों के ट्वीट को वायरल करने में ही अपनी ऊर्जा लगानी चाहिये क्योंकि राजनेता बनना तुम्हारे वश का रोग नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

बात-बात पर बदलें मापदण्ड

हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।

काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?

मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

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