Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
पलकों में पलते सपनों की नाकामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था
मैं उसकी आँखों में गुम था, वो सबकी नज़रें पढ़ती थी
मैंने प्यार किया बिन मतलब, वो बिन कारण के लड़ती थी
दुनिया भर की बातें सुनकर आँखों में पानी भरती थी
मैं उसको समझाता था तब जाने क्या सोचा करती थी
जीना-मरना साथ करूँगा, इस हामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था
दुनियावाले क्या सोचेंगे -इसका सोच-विचार बहुत था
हिम्मत करने से बचती थी, वैसे उसको प्यार बहुत था
किस रंग के दरवाज़े होंगे, क्या दीवारों का रंग होगा
कितनी फुलवारी फूलेगी, कैसा फूलों का ढंग होगा
सपनों के इस सुंदर घर की नीलामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था
जब भी प्यार किया जाता है, सोच-विचार नहीं करते हैं
सोच-समझने वाले अक्सर, पूरा प्यार नहीं करते हैं
मर-मिटने का ख़ौफ़ नहीं हो, तब जीना अच्छा लगता है
सपनों में जीकर तो देखो, हर सपना सच्चा लगता है
हर ख़ूबी की चाह थी उसको, हर ख़ामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
हमें ऐसे बहुत सारे चैनल नहीं चाहियें जो समाज में परस्पर द्वेष की भावना भरकर आग भड़काएँ, हमारे लिए वह एक चैनल पर्याप्त है जो प्यार और भाईचारे का संदेश देकर देश को मिल-जुलकर रहना सिखाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
पीर से कह दो
मुझे आँसू पचाना आ गया है
अब किसी आघात से घायल नहीं हो पाऊंगा मैं
प्यास को अपने पसीने से बुझाना आ गया है
दोपहर की धूप से बिल्कुल नहीं घबराऊंगा मैं
भाग्य के दरबार से संत्रास लेकर लौट आया
आस के आवास से उपहास लेकर लौट आया
मैं स्वयं में इक नया विश्वास लेकर लौट आया
अब किसी के सामने झोली नहीं फैलाऊंगा मैं
अब समस्या भी मुझे भयभीत कर सकती नहीं है
नियति अब कुछ भी मेरे विपरीत कर सकती नहीं है
हार ने जो कर दिया, वह जीत कर सकती नहीं है
युध्द के परिणाम पर हर हाल में मुस्काऊंगा मैं
आपदा में धीर का व्यवहार करना आ गया है
मुस्कुरा कर दर्द का उपचार करना आ गया है
अब मुझे हर वार को स्वीकार करना आ गया है
डूब कर भी धार के उस पार तो लग जाऊंगा मैं
✍️ चिराग़ जैन