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एक क़लम ऐसी

इस महफ़िल में चुपचुप बैठी एक क़लम ऐसी है जिसने
ग़ालिब से ग़ज़लें सीखी हैं, तुलसी से चैपाई ली है
अम्बर के उद्दीप्त सितारो, उसको किरणों से दुलराना
जिसने कविता के उपवन में अभी-अभी अंगड़ाई ली है
✍️ चिराग़ जैन

मन की निर्मलता छलकती है

सुबकियाँ गहरे उतर जाती हैं दिल के छोर तक
हिचकियाँ यादों में अटकाती हैं हमको भोर तक
फिक्र और चिंता को लेकर बाहर आता अट्टहास
मन की निर्मलता छलकती है नयन की कोर तक

✍️ चिराग़ जैन

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