Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब समय फंदा कसेगा
भूमि में पहिया धँसेगा
शाप सब पिछले डसेंगे
पार्थ नैतिकता तजेंगे
उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है
सब समय का बारदाना है
नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी
न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी
जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे
तब सिया के गीत गातीं प्रार्थनाएँ मौन होंगी
जो सदा रक्षक रहा हो
पुत्रवत सेवक रहा हो
उस लखन ने ही वनों में छोड़ आना है
सब समय का बारदाना है
द्यूत के उपरांत लज्जित शौर्य का वैभव रहेगा
श्वास ज्वाला में दहकता वीरता का शव रहेगा
व्यूह की रचना करेंगे द्रोण जब भीषण समर में
व्यूह भेदन का पुरोधा पार्थ तब ग़ायब रहेगा
आँख से आँसू झरेंगे
घात सब अपने करेंगे
अर्जुनों को बाद में बदला चुकाना है
सब समय का बारदाना है
ज़िन्दगी के हर मिलन का, हर विरह का क्रम नियत है
बाण की शैया मिलेगी या मधुर रेशम, नियत है
सब नियत है कब कहाँ किसको दबोचेगी पराजय
कब कहाँ उत्सव मनेगा, कब कहाँ मातम नियत है
न्याय का उपहास तय है
राम का वनवास तय है
कैकयी का कोप तो कोरा बहाना है
सब समय का बारदाना है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हम सब इस कारण ज़िन्दा हैं, शायद मर जाना दूभर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
जब तक सम्भव हो तब तक ये श्वास चलाने को ज़िन्दा हैं
तन को इंधन दे पाएँ, बस भूख मिटाने को ज़िन्दा है
शायद कुछ ऐसा कर जाएँ, दुनिया जिसको याद रखेगी
जीवन भर का जीवन जीकर, फिर मर जाने को ज़िन्दा हैं
कुछ लोगों का तन जर्जर है, कुछ लोगों का मन जर्जर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबको ऐसा भ्रम होता है, हम जग में अपवाद बनेंगे
अब तक मौन रही है दुनिया, फिर भी हम संवाद बनेंगे
लेकिन माली जान रहा है, बगिया के हर इक बिरवे को
सब कोंपल बनकर जन्मेंगे, मर जाने पर खाद बनेंगे
कब खिलना है, कब मुरझाना यह भी ऋतुओं पर निर्भर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबकी इतनी सी चाहत है, सुख का कुछ सामान जुटा लें
आँख मिली है सपने पालें, कण्ठ मिला है शोर मचा लें
एक ज़रा सी भूल हमारे है को है से थे कर देगी
ऐसे-वैसे जैसे भी हो, हम अपना अस्तित्व बचा लें
उस जीवन पर मुग्ध सभी हैं, जो पहले दिन से नश्वर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Reviews, Unpublished
स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”।
हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा रहा है, और फ़िल्म में ये दोनों रंग बख़ूबी भरे भी गए हैं, लेकिन फिल्मकार ने चुपके से स्त्री की वर्तमान परिस्थितियों का संदेश भी इन रंगों में मिला दिया है।
फ़िल्म में नायक राजकुमार राव ने एक संवाद बोला है- “हमारा सामना एक ऐसी चुड़ैल से है जो पढ़ी-लिखी है, और आज्ञाकारी भी है। हम अपनी पर आ जाएं तो इससे जो चाहे करा सकते हैं।” बस यही संवाद स्त्री की सामाजिक स्थिति का संपूर्ण ग्रंथ है। स्त्री की स्थिति आज भी ठीक पहले जैसी ही है। बस अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि पहले जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तो पुरुष उसे मार-पीट कर अपनी मनमानी करता था और आज जब वह पढ़-लिख गई है तो हम सभ्यता से दीवार पर लिख देते हैं- “ओ स्त्री कल आना”; बस इसे पढ़कर सदियों से आज्ञाकारी रही स्त्री कल का इंतज़ार करने लगती है, और पुरुष उसे टरका कर अपने जश्न में मशगूल हो जाता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में चौकीदार रात में पहरा देते हुए पुरुष प्रधान समाज पर एक और तीखा प्रहार करते हुए आवाज़ लगाता है -“ओ स्त्री, मत आना! इस शहर में कोई मर्द नहीं है।” यह एक वाक्य समाज की अंतरात्मा को झखझोरने वाला वाक्य है। पुरुष को मर्दानगी के वास्तविक मआनी बताने वाला महामंत्र है यह वाक्य। स्त्री की अपेक्षाओं के समक्ष पुरुष की दुर्बलता का तमाचा है यह एक वाक्य।
फ़िल्म में श्रद्धा कपूर स्त्री सशक्तिकरण के अभियानों पर व्यंग्य करते हुए कहती है कि- “स्त्री अपने घर में बहुत शक्तिशाली होती है, उसे घर से बाहर लाओ, फिर मारो।” अद्भुत कटाक्ष है यह। समाज में नारी को उसकी भूमिका निर्वाह करने से रोककर उसे अर्थोपार्जन की मशीन बना देने के कुत्सित षड्यंत्रों पर कुठाराघात किया है इस संवाद ने।
स्त्री के स्त्रीत्व को भी फिल्मकार ने बख़ूबी समाहित किया है। “स्त्री की शक्ति उसकी चोटी में है, चोटी काट दो तो वह मरेगी नहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाएगी।” यह वाक्य स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लेने की कहानी कहता है।
स्त्री के मन को स्वर देते हुए फ़िल्म कहती है कि “आज तक इस शहर ने उसे दो चीज़ें नहीं दी, एक प्यार और दूसरी इज़्ज़त। वह इन्हीं दो चीज़ों की भूखी है।” यह बात समझ कर फिल्मकार ने पुनः एक करारा कटाक्ष करते हुए दिखाया कि पुरुषों ने एक इबारत लिखकर आज की पढ़ी-लिखी स्त्री से अपनी मनमानी करवा ली और लिखवा दिया “ओ स्त्री रक्षा करो”। यहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है क्योंकि समाज आश्वस्त है कि इस वाक्य को पढ़कर स्त्री समाज की रक्षा करने लगेगी।
फ़िल्म के निर्माता की सोच को प्रणाम करने का दिल करता है। साथ ही दर्शकों की समझ पर मन भर आता है कि जिन संवादों का ज़िक्र मैंने ऊपर किया था उन सब पर हॉल में ठहाके गूंज रहे थे।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
रोज़गार की प्रवृत्ति से व्यक्ति की प्रवृत्ति का आकलन करना हमारी पुरानी आदत है। पूरी वर्ण-व्यवस्था इसी आदत की देन थी। इसी आदत के चलते हम कथावाचकों को संत मानने लगे। हम यह सोच ही न पाए कि किसी कहानी को रोचक ढंग से कहने के लिए क़िस्सागोई का अभ्यास किया जाता है, भक्ति का नहीं। इसी भ्रांति ने धर्म का सत्यानाश किया है। धर्मस्थलों की देखरेख के लिए नियुक्त केयरटेकर को हमने धर्म का ठेकेदार समझ लिया। धीरे-धीरे हम सन्त-फ़क़ीरों और धर्म में रोज़गार तलाशने वालों के मध्य भेद करने की क्षमता खो बैठे।
ठीक ऐसा ही हम अनूप जलोटा प्रकरण में कर रहे हैं। अनूप जलोटा एक श्रेष्ठ गायक हैं। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में हाथ आजमाए लेकिन उनकी आवाज़ भजन के लिए अधिक उपयुक्त थी, इसलिए उन्होंने भजन गाना शुरू कर दिया। लेकिन हम उन्हें आध्यात्मिक पुरुष मान बैठे। जैसे हम जागरण में भजन गानेवाले आर्केस्ट्रा आर्टिस्ट को माता का भक्त मान बैठते हैं और भेंट चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।
इस अंतर को समझना होगा। बिग बॉस में इस बार जोड़ी की एंट्री होनी थी। अनूप जी से भी जोड़ी से ही एंट्री मंगवाई गई होगी। एक भजन गायक की कम उम्र की प्रेमिका वह भी तीन असफल विवाह सम्बन्धों के बाद… इस परिस्थिति में बिगबॉस के निर्माताओं को रोचक तत्व दिखाई दिया। यही रोचकता तलाशकर टीआरपी का धंधा करना रिएलिटी शो बनानेवालों का रोज़गार है।
कोई व्यक्ति अपना रोज़गार कैसे करता है, कितनी ईमानदारी से करता है; इन्हीं प्रश्नों की चर्चा महत्वपूर्ण है। कोई अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे उसके रोज़गार पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व भर को चमत्कृत करनेवाले आइंस्टाइन को उनके परिवार ने एक बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति घोषित किया था। किसी के व्यक्तिगत जीवन से उसकी प्रतिभा, उसके सामाजिक जीवन, उसके रोज़गार का आकलन करेंगे तो हम युगों के बहुत क़ीमती रत्न खो देंगे क्योंकि हर हीरा अपने निजी जीवन में केवल एक पत्थर होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
✍️ चिराग़ जैन