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हर सम्भव के साधन हैं

सपनों की आँखें पथराईं
हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं
संघर्षों की तेज पवन ने
प्राणों की शाखें दहलाईं
इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला
स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला
लक्ष्मण, वैदेही, रघुराई
और न कोई संग सहाई
इतनी पीर सही तीनों ने
विधिना की आँखें भर आईं
फिर भी कब आँसू छलकाए, पुरुषोत्तम रघुबीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

किष्किंधा के द्वार खुले थे, किन्तु न नगर प्रवेश किया
निज अनुशासन की सीमा में, जीवन सकल निवेश किया
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाएँ पर वचन न जाई
दशकंधर से लंका जीती
और विभीषण को लौटाई
तीरों से कब मोह किया है, वीरों के तूणीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

हर चर्चा का सार बने हैं, जन-जन के अभिवादन हैं
आशा का आधार बने हैं, हर सम्भव के साधन हैं
केवट ने ली जो उतराई
शबरी जो झोली भर लाई
जो पूंजी जोड़ी रघुपति ने
उसकी चमक युगों पर छाई
सबकी दौलत ओछी कर दी, राघव की जागीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

✍️ चिराग़ जैन

घर उससे नाराज़ रहा है

जिसकी छाया में आँगन ने अपना हर त्यौहार मनाया
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
जिसके फूलों की ख़ुश्बू ने घर का हर कोना महकाया
उसके सूखे पत्तों पर झल्लाना एक रिवाज़ रहा है

जिस नदिया ने जीवन सींचा, वो बरसातों में अखरेगी
बारिश का मौसम बीता तो, छतरी हमको बोझ लगेगी
जिन अपनों के बिन जी पाना इक पल भी दूभर लगता है
जब वे अपने मर जाते हैं, तब उनसे ही डर लगता है
ऋतुओं के संग आँख बदलना, सबका सहज मिजाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है

प्यास न हो तो पानी भूले, भूख न हो तो रोटी भूले
मन से बचपन बीत गया तो, व्यर्थ लगे सावन के झूले
बचपन में कुछ खेल-खिलौने, यौवन में दिल का नज़राना
फिर घर भर की ज़िम्मेदारी, फिर बिन कष्ट सहे मर जाना
जितनी देर ज़रूरत जिसकी, उतनी देर लिहाज रहा है
जब उस पर पतझर आया तो, घर उससे नाराज़ रहा है

मन के छोटे से झोले में सब कुछ ढोना नामुम्किन है
यादों की डोरी में सबके नाम पिरोना नामुम्किन है
जिससे जितनी साँसें महकी, उससे उतनी प्रीत रही है
रात अंधेरा, भोर उजाला, ये ही जग की रीत रही है
जैसा है अंजाम किसी का कब वैसा आगाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है

✍️ चिराग़ जैन

तुलसी बाबा के वंशज

कविता को आसान बनाकर जन-जन तक पहुँचाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

मेले, गाँव, गली, चौबारे, संसद, देश, विदेश विचरते
चिंता की त्यौरी पिघलाकर, ओंठों पर मुस्कानें धरते
एक ठहाके के जादू से पीड़ा को ग़ायब कर देते
हर अंधियारे की झोली में आशा का सूरज धर देते
नयन भिगोकर लिखने वाले, हँसते-हँसते गाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

जब पापी ने दुःसाहस कर भारत माँ पर आँख उठाई
हमने शोणित में साहस का ज्वार उठाती कविता गाई
हमने आगे बढ़कर टोका शासन की हर मनमानी को
हमने सच का दर्पण सौंपा सत्ता की खींचातानी को
यौवन को सरसाने वाले, उत्सव रोज़ मनाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

जैसे श्रोता हों, कविता का वैसा रूप बना लेते हैं
नवरस की मथनी से मथकर, मन तक रस छलका देते हैं
कविता, गीत, लतीफ़े, जुमले, हम हर शस्त्र चला लेते हैं
जिस शैली में सुनना चाहो, उस शैली में गा लेते हैं
कानों के दरवाज़े घुसकर, सीधे मन पर छाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

✍️ चिराग़ जैन

रामजी के काम का लिहाज

बिन बात आप जाने कैसे हो गए नाराज़
रामजी के काम का लिहाज भी नहीं रहा
वक़्त का स्वभाव बड़ा बेवफ़ा-सा है हुजूर
हमेशा किसी का परवाज़ भी नहीं रहा
रावण का दंभ धूल में मिला है बार बार
घर भी न रहा, राजकाज भी नहीं रहा
सच से नहीं है कोई नाता राजनीति का जी
कल भी नहीं था और आज भी नहीं रहा

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Manoj Tiwari created a scene when someone ask him to sing a Ramayana Chaupai on stage.

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