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कवि सम्मेलनों का सफ़र

कवि सम्मेलनों का सफ़र सौ साल पूर्ण करने के पड़ाव पर है। अक्टूबर 1920 में श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की अध्यक्षता और श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी के संयोजन में हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान श्री जॉर्ज ग्रियर्सन जी के निवास पर कुल 27 कवियों का कवि सम्मेलन हुआ जिसे कवि सम्मेलन का पहला क़दम माना जा सकता है। तब से अब तक यह परंपरा अनवरत चल रही है। स्वाधीनता संग्राम, चीन युद्ध, पाक युद्ध, आपातकाल, कारगिल युद्ध और तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में कवि सम्मेलनों ने जन भावना को बौद्धिक ख़ुराक़ उपलब्ध कराई है। कवि सम्मेलनों की इस क्षमता के कारण ही पत्रकारिता के विद्वानों ने इस माध्यम को “लोक परंपरागत जनसंचार माध्यम” के रूप में स्वीकार किया है। देश भर में मनोरंजन तथा बैद्धिक विमर्श को समानांतर रूप से साधने वाली यह कला परिवर्तित होती सामाजिक परिस्थितियों तथा जनता की मानसिक परिस्थितियों के अनुरूप सम्प्रेषण की भाषा व विधा का निर्धारण करती रही है। यही लचीलापन इस कला की सम्प्रेषणीयता को अक्षुण्ण बनाए हुए है। इस प्रभावी सम्प्रेषण माध्यम के अनेक महत्वपूर्ण स्तम्भ 9-10 जुलाई को हरिद्वार में एकत्रित हुए तथा उन्होंने कला के इस भवन के वैभव व गरिमा की वृद्धि की दिशा में विचार विनिमय किया। कवि सम्मेलन समिति के इस अधिवेशन में अपनी क्षमताओं की सीमा के साथ मैंने भी गिलहरी जैसा योगदान दिया, इस हेतु मन संतुष्टि के भाव से आनंदित है।

✍️ चिराग़ जैन

संजू

आरोप को अपराध मानकर किसी के प्रति राय क़ायम कर लेने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति किसी के जीवन को किस हद्द तक चुनौतियों से बेन्ध सकती है -इसी तथ्य की प्रामाणिक कथा है संजू। मीडिया इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर जनमानस की मानसिक लतों का पोषण करता हुआ अपना गुजर-बसर कर रहा है।
हम कुछ परंपरागत अफवाहों को सच मानते हुए अपनी कई पीढ़ियाँ बर्बाद कर चुके हैं। अफवाहों के इसी हवनकुण्ड में कई महत्वपूर्ण जिंदगियां स्वाहा करने में हम कभी हिचकते भी नहीं हैं। संजय दत्त ऐसे ही हवन कुंड में भस्म हुई एक ऐसी प्रतिभा का नाम है जिसने उतार-चढ़ाव के अनेक आश्चर्यजनक दौर जिये।
संजू फ़िल्म हर उस ख़बर पर एक प्रश्नचिन्ह है जिसने डेढ़ मिनिट की सनसनी के चक्कर में एक मुकम्मल ज़िन्दगी तबाह कर डाली। सामाजिक जीवन जीने वालों के व्यक्तिगत चरित्र की पड़ताल करना और उसके विषय में कहानियों की फसलें बोने में हमे बड़ा मजा आता है। आश्चर्य यह है कि किसी पर आरोप लगाकर उसकी चरित्र-हत्या करने वाला मीडिया आज तक कभी किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद क्षमायाचना करने भी प्रकट न हो सका।
अदालतों में चल रही सुनवाई को दरकिनार कर फैसले सुनाने वाले मीडिया की घिनौनी तस्वीर का पर्दाफाश किया गया है इस फ़िल्म ने। फ़िल्म को देखकर संजय दत्त के प्रति संवेदना जन्मती है और सुनील दत्त के प्रति सम्मान। चुनौतियों से जूझने की प्रवृत्ति और कभी न थकने का जज़्बा उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसे अब से पहले न तो किसी न्यूज़ चैनल ने स्पेशल स्टोरी बनाकर दिखाया था न ही किसी गॉसिप मैगज़ीन ने। कमलेश उर्फ परेश जैसे किसी दोस्त का रिश्ता संजय दत्त की किस्मत से ईर्ष्या उत्पन्न करता है।
मज़े की बात यह है कि संजय दत्त के रोम-रोम पर नज़र रखने वाली मीडिया को उनके इस साए का कभी आभास न हुआ। ड्रग पेडलर्स कैसे काम करते हैं और बचपन पर अधिक अनुशासन कैसा असर डालता है -इन दोनों सवालों को बहुत करीने से फ़िल्म में पेश किया गया है। सिल्क स्मिता के बाद सम्भवतः पहली बार किसी भारतीय सिने स्टार की बायोपिक बनी है। बदनाम ज़िन्दगियों के अनकहे पहलुओं को उजागर करती ये दोनों ही फिल्में यह तो सिद्ध करती हैं कि अखबारों के समझाने पर जिसे हम बुरा आदमी कहकर छोड़ देते हैं उसके भीतर भी काफ़ी कुछ अच्छा छुपा होता है जिसे देखने के लिए उसके साथ कुछ वक़्त बिताने की दरकार होती है।

✍️ चिराग़ जैन

महलों में वनवास

अकथ वेदना करती होगी रह-रहकर परिहास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

धीर धरो मैया वैदेही
अनगिन झेले कष्ट भले ही
मृग आकर्षण में अंकुर थे
स्वर्ण नगर की पीड़ा के ही
पल भर का सम्मोहन लाया जीवन भर का त्रास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हर इक सुविधा द्वार पड़ी थी
प्राण बिना इक देह खड़ी थी
माँ सीता की आँखें नम थीं
पर उर्मिल की पीर बड़ी थी
भीतर-भीतर घुलकर सींचा प्रियतम का विश्वास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

अश्रु बहाने पर अंकुश था
पीर जताने पर अंकुश था
अगन सेज पर इक लक्कड़ को
धधक बताने पर अंकुश था
वरना सबको हो जाएगा, पीड़ा का आभास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हमें बताया रामायण ने
भीषण पाप किया रावण ने
किन्तु देह की पर्णकुटी से
जिसका हरण किया लक्ष्मण ने
उस बेचारी ने कब की थी कंचन मृग की आस
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

✍️ चिराग़ जैन

राजगोपाल सिंह जी की याद

“कविता व्याकरण के दोष बर्दाश्त कर सकती है लेकिन भाव के चरित्र में मिलावट नहीं झेल पाती।” – यही गुरुमंत्र दिया था मेरे भीतर के कवि को श्री राजगोपाल सिंह जी ने। पितृत्व और गुरुत्व की गुणमुक्ताओं को मित्रता के सूत्र में पिरोने से संबंध का जो गलहार बनेगा, बस वही नाम है मेरे और उनके सम्बन्ध का। कितनी ही यात्राओं, कितने ही संस्मरणों और कितने ही संघर्षों के चित्र सजीव हो उठते हैं, उनका नाम गुनने भर से। ग़ज़ल और गीत के अतिरिक्त बाग़वानी के वे ख़ूब शौकीन थे। बोनसाई और कैक्टस की उनकी दीवानगी उनके व्यक्तित्व का दर्पण बन गई। बोनसाई की तरह उन्होंने जीवन भर अपना क़द बढ़ाने से अधिक ध्यान अपने अस्तित्व की पूर्णता पर दिया और कैक्टस की तरह कंटीला जीवन जीने के बावजूद कहीं से भी तड़कने पर गीत का दूधिया बहाव कम नहीं हुआ। कैक्टस कंटकों के लिए जाना जाता है, लेकिन राजगोपाल जी ने यह समझा कि काँटों की बदनामी झेलता कैक्टस वर्ष में एक बार पुष्पित भी होता है और जब यह पुष्प खिलता है तो इसके एक फूल के सम्मुख हज़ारों कुमुदनियों की प्रसिद्धि फीकी पड़ जाती है। आज भी नजफगढ़ में उनके घर की छत पर उनके ये बोनसाई और कैक्टस उनकी मान्यताओं का अनुवाद कर रहे हैं। उनके अशआर में यह हरियाली अपने पूरे सौष्ठव के साथ उपस्थित है। प्रकृति के प्रेम में पगी ग़ज़लों के रचयिता के जन्मदिन का आयोजन है। वे तो नहीं होंगे लेकिन उनकी स्मृतियां होंगी, उनका चित्र होगा और उनकी कविताओं में प्रदर्शित उनका पूरा चरित्र होगा। पूरा जीवन लेखनी को समर्पित करने वाले राजगोपाल सिंह जी को याद करने के लिए अपने जीवन के कुछ पल निकाल सकें तो आप भी आना! अच्छा लगेगा!
✍️ चिराग़ जैन

रुक जाने का मन होता है

आपाधापी की राहों पर सुस्ताने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

शिक़वे और शिक़ायत कर ली
हिम्मत और हिमाक़त कर ली
यश-अपयश का दौर हुआ है
ज़हर सरीखा कौर हुआ है
नफ़रत का हर पाठ पढ़ा है
बदले का हर ज्वार चढ़ा है
मस्तक पर अवसाद रखा है
अपशब्दों का स्वाद चखा है
छल-बल की हर रीत दिखी है
देहरी चढ़ती जीत दिखी है
अब दुश्मन के आगे जाकर, झुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

उत्सव देखे, वैभव देखा
यौवन देखा, शैशव देखा
जयकारों का रोर सुना है
तारीफ़ों का शोर सुना है
स्वागत देखे, वंदन देखे
कितने ही अभिनन्दन देखे
फूलों संवरीं राहें देखीं
स्वागत करतीं बांहें देखीं
यश की हर इक सहेली देखी
पसरी रिक्त हथेली देखीं
हर आपाधापी को तजकर, चुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

इच्छाओं को शिष्ट कर लिया
पूरा जीवन क्लिष्ट कर लिया
तन जागा तो स्वप्न नरारद
हल निकले तो प्रश्न नदारद
झुकना चाहा अहम अड़ गए
रुकना चाहा क़दम बढ़ गए
ढेरों नियम, अगिन सीमाएँ
खंडहर थोथी परिभाषाएँ
कारण मिला अधर फैलाये
कारण मिला नयन भर आए
कभी-कभी बिन कारण भी तो मुस्काने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

✍️ चिराग़ जैन

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