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अटल बिहारी वाजपेयी जी के महाप्रयाण पर

भारत का योग्य सपूत गया
मानवता का अवधूत गया
नैतिकता का क़िरदार गया
हिम्मत का लम्बरदार गया
संसद का उन्नत भाल गया
भारत माता का लाल गया
इक अद्भुत इच्छाशक्ति गई
सद्भावों की अनुरक्ति गई
जनहित का अथक प्रयत्न गया
भारत का अनुपम रत्न गया
दुनिया से बाज़ी मार गया
युग “अटल सत्य” से हार गया
धरती रोई, अम्बर रोया
हर इक आँगन, हर घर रोया
भीगी हैं करगिल की पलकें
संस्कृति के भी आँसू छलके
है मौन पोखरण की धरती
कविताओं की आँखें झरती
वक्तव्य कला का ताज गया
चुटकी का एक रिवाज़ गया
रसपूरित वाणी मौन हुई
तर्कों की भाषा गौण हुई
दिल्ली सूनी, संसद सूनी
जन-जन की पीर हुई दूनी
वह अनुशासन का पालक था
भीतर से निश्छल बालक था
जय-विजय खूंटियों पर टांगी
गरिमा की लीक नहीं लांघी
अन्तस् में नहीं दुभात चला
वह सबको लेकर साथ चला
कुछ पक्ष-विपक्ष नहीं जाना
मानव को बस मानव माना
वह राजधर्म का साधक था
भारत भू का आराधक था
जीवन जीकर भरपूर गया
वह शून्य क्षितिज पर पूर गया
लग गया श्वास लय पर विराम
हे दिव्य तुम्हें शत-शत प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन

ये संसार रहेगा

प्रीति रहेगी, प्यार रहेगा, जीवन का विस्तार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा

सन्नाटे से शोर उगेगा, शोर पुनः सन्नाटा होगा
मंदी होगी, तेज़ी होगी, लाभ रहेगा, घाटा होगा
सारे सौदागर मर जाएँ, फिर भी ये बाज़ार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा

स्वप्न यही होंगे नयनों में, लेकिन नयन बदल जाएंगे
अर्थ यही होंगे बातों के, लेकिन कथन बदल जाएंगे
आज हमारे मन में है जो, यह ही शेष विचार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा

हम जलकण हैं लहरों में मिल, थोड़ा-बहुत बहल जाएंगे
सागर ऐसे ही गरजेगा, हम बादल में ढल जाएंगे
हर पल कुछ लहरें टूटेंगीं, पर सागर में ज्वार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा

हर त्रेता में कलयुग होगा, हर कलयुग में त्रेता होगा
हर युग में इक श्रवण रहेगा, हर युग में नचिकेता होगा
उत्तर भी बहुतायत होंगे, प्रश्नों का अंबार रहेगा
हम सब कुछ दिन बाद न होंगे, लेकिन ये संसार रहेगा

✍️ चिराग़ जैन

कौन क़तरा है

ख़र्च ही भेजना रिश्ता नहीं साबित करता
प्यार कितना है, ये पैसा नहीं साबित करता

बस यही बात उसे सबसे बड़ा करती है
वो किसी शख़्स को छोटा नहीं साबित करता

ख़ुद ही दिख जाती है परबत की बुलन्दी सबको
ख़ुद को आकाश भी ऊँचा नहीं साबित करता

सच तो अपनी ही हक़ीक़त बयान करता है
वो किसी और को झूठा नहीं साबित करता

सबको आगोश में भर लेता है आगे बढ़कर
कौन क़तरा है, ये दरिया नहीं साबित करता

रौशनी कितनी है ये बात बताता है ’चिराग़’
कितना गहरा था अंधेरा, नहीं साबित करता।

✍️ चिराग़ जैन

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