Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो दीवारों पर लिखी हिदायतें हमारी बुरी आदतों का आईना हैं।
कल्पना करें तो शायद हम समझ पाएंगे कि अपने सपनों के घर की खूबसूरत दीवार पर तारकोल से ‘गधे के पूत, यहाँ मत मूत’ लिखनेवाला आदमी किस हद तक परेशान हुआ होगा। यत्र-तत्र-सर्वत्र मूत्रत्याग करने वाले निष्ठावान नागरिकों को रोकने की दिशा में पट्ट-लेखकों ने काफी विकास किया है। ‘देखो गधा पेशाब कर रहा है’; ‘यहाँ मूतने वाले तेरी माँ की…..’ और ‘यह मंदिर की दीवार है कृपया यहाँ मूत्रत्याग न करें’ जैसे बहुभाषी ग्रंथों से मूत्रसाधकों को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका तब ‘एक चित्र सौ शब्दों के समान होता है’ का अनुसरण करते हुए हमने मूत्रनीय दीवारों पर ईश्वर के विराट रूप की छोटी-छोटी टाइल्स लगवा दीं। किन्तु इतने पर भी मूत्रत्यागकर्ताओं ने हार न मानी और वे अपने पूज्य देव को बचाकर अन्य दीवारों पर कार्य निष्पादन करते रहे। साईं बाबा के भक्त को हिंदू देवताओं की तस्वीर न रोक सकी और घोर रामभक्त ने साईं बाबा की परवाह नहीं की। वैष्णव, शाक्त, शैव और न जाने क्या-क्या बहाने बनाकर साधकों ने भक्तिप्रवाह का उपाय खोज ही लिया। अंततः सभी देवताओं ने मीटिंग करके एक साथ एक ही दीवार पर चिपकना स्वीकार किया तब कहीं कुछेक दीवारों के भूमिगत जल में मूत्र संवर्द्धन बन्द हुआ।
विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का दावा करनेवाले हम लोग कितने सभ्य रहे होंगे इसके प्रमाण-पत्र पूरे देश में हिदायती सूचना-पट्टों पर शान से चिपके हुए हैं। कितने फख्र की बात है कि हमें डायरेक्टली ‘बेहया’ कहनेवाले वाक्य भी अपनी विनम्रता नहीं छोड़ते और सम्मानपूर्वक हमें लताड़ते हुए लिखते हैं- ‘कृपया पान की पीक यहाँ न थूकें।’ हम इस सम्मान से गद्गद हो उठते हैं और आभार ज्ञापन करते हुए उस इबारत पर अपने मुखारविंद से पीक अर्पण कर आगे बढ़ जाते हैं।
रेल के टॉयलेट में मग्गे से बंधी ज़ंजीर हमारी आदतों के गले में पहनाई गई स्वर्णकड़ी जैसी भूमिका निभाती है।
आज्ञाकारी हम इतने हैं कि हर बात बोर्ड पर लिखकर समझाई जाती है। ‘कृपया यहाँ न थूकें’ और ‘गंदगी न फैलाएँ’ जैसे सूचना पट्ट हमारी आदतों के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाते हैं। ‘कूड़ा कूड़ेदान में ही डालें’, ‘फाटक बंद हो तो लाइन पार न करें’, ‘ट्रांसफार्मर के आसपास पेशाब करना जानलेवा हो सकता है’ और ‘कृपया लाइन न तोड़ें’ जैसे प्रशासनिक वाक्यों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र में भी सूचनाओं का विपुल भंडार है। ‘जगह मिलने पर साइड दी जाएगी’, ‘जिनको जल्दी थी वो चले गए’, ‘उड़ के जावेगा के’, ‘कुत्ता भी बिना वजह नहीं भौंकता’ और ‘सड़क तेरे बाप की है क्या बे’ -जैसे वाक्य हमारे ट्रैफिक सेंस की गौरवगाथा के स्वर्णिम अध्याय हैं।
‘मतदान अवश्य करें’, ‘राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाएँ’, ‘बस की सीट न फाड़ें’, ‘सीढ़ियों पर न बैठें’, ‘रिश्वत न लें, न दें’, ‘दलालों से सावधान’, ‘जेबकतरों से सावधान’ या ‘लेडीज सीट पर न बैठें’ और ‘बंदरों को न छेड़ें’ जैसे वाक्यों में सजा भारतीय लोकतंत्र पूरी दुनिया की चित्र प्रदर्शनियों में दमकता है, तो हमारा गौरवशाली इतिहास और भी प्रखर हो उठता है।
‘कृपया अस्पताल में शोर न करें’ और ‘एम्बुलेंस को रास्ता दें’ जैसे लौकिक मानवीय आदेशों से लेकर ‘जलती चिता में कचरा न डालें’ जैसे पारलौकिक सूचना पट्टों ने हमारी संवेदनाओं की हकीकत चेहरे पर जो श्रृंगार किया है उसे धोने के लिए पानी नहीं आँसुओं की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन
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आप रेडलाइट पर खड़े हैं अचानक आपके पीछे कोई हॉर्न बजाने लगता है। उसको इस बात पर आश्चर्य है कि जब कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा तो आप रेडलाइट का सम्मान क्यों कर रहे हो? आप बाजार से गुज़रते हैं। बीच सड़क पर कोई स्कूटर पार्क कर गया है। सारा ट्रैफिक रुक गया है। सबको परेशानी हो रही है। दस-पंद्रह मिनिट बाद स्कूटर का मालिक बेशर्मी से फोन कान पर लगाए आता है और स्कूटर स्टार्ट करके निकल जाता है।
सब लोग “उसके जाने के बाद” कुछ अपशब्द टाइप बड़बड़ाते हुए अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। नो पार्किंग के बोर्ड के ठीक नीचे पार्किंग करने वाले लोग; नो राइट टर्न से दाएं मुड़ने वाले लोग; यू-टर्न को ब्लॉक करने वाले लोग; पार्क के बेंच पर च्विंगम चिपकाने वाले लोग; बस की सीट फाड़ने वाले लोग; पैट्रोल पम्प पर पेट्रोल चुराने वाले लोग; अपने दूर के रिश्तेदार की पहुँच पर इतराने वाले लोग; चौराहों पर भीख देने वाले लोग; आसाराम की रिहाई के लिए जंतर-मंतर पर धरना देने वाले लोग; रेल लाइनों पर गंदगी फेंकते लोग; बिजली-पानी की चोरी करते लोग; रामपाल के लिए सेना को पथराने वाले लोग; रामवृक्ष के लिए पुलिस को दबोचने वाले लोग; रामरहीम के लिए देश जलाने वाले लोग और माँ की कसम देकर मेसेज फारवर्ड करने वाले लोग ….इन्हीं सब लोगों से मिलकर हमारे देश की जो तस्वीर बनती है उसमें सरकारी योगदान अथवा निकम्मेपन की कोई भूमिका नज़र तो नहीं आती लेकिन फिर भी हम अपने हर सामाजिक व नैतिक अपराध को सरकार तथा सिस्टम की ओट लेकर छुपा देने के अभ्यस्त हो गए हैं।
मैं सरकार और सिस्टम की तरफदारी या विरोध न करके केवल इतना भर सोचना चाहता हूँ कि जो सुई पिछले सात दशक से सिस्टम की ख़राबी पर अटकी है उसे एक बार जनता की अथक ईमानदारी से आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता! क्या आवश्यक है कि बर्बरीक बनकर इस देश की महाभारत को एकटक निहारते रहा जाए और हर मृत जयद्रथ तथा अभिमन्यु को वीरता के ख़िताब की डुगडुगी थमाकर उससे निंदा का रस प्राप्त किया जाए?
क्या एक सप्ताह मात्र के लिए हम यह प्रयोग नहीं कर सकते कि सरकारी नीतियों के उलाहनों को छोड़कर हम आत्म अनुशासन से इस देश की छोटी छोटी समस्याओं को बढ़ने से रोक पाएं। क्या अपने बच्चों को कल सड़क पर बेहिचक चलने देने के लिए आज हम अपनी गाड़ी थोड़ी दबा कर पार्क नहीं कर सकते? क्या कल अपनी बिटिया के निडर जीने की सुविधा देने के लिए आज अपने बेटों को संस्कार का छोटा-सा पाठ नहीं पढ़ा सकते। क्या कल अपने देश पर फख्र करने के लिए आज अपने आलस्य व प्रमाद का त्याग नहीं कर सकते? क्या हम देश को बदलने की ख़्वाहिश के लिए अपनी आदतों को सुधारने की कोशिश नही कर सकते!!!
✍️ चिराग़ जैन
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कबिरा लुकाठी लेकर बाज़ार की ओर गया। उसे देखकर अपना घर फूँकने को प्रेरित हुए कुछ नवयुवक उसके साथ हो लिए। बीच बाज़ार खड़े होकर कबिरा ने लड़कों से पूछा- ‘बॉयज़, आर यू रेडी टू सेट फायर ऑन योर ओन हाउस?’
लड़के जोश में आकर बोले- ‘यस सर!’
कबिरा बोला- ‘ओके, गेट रेडी विद योर लुकाठी।’
लड़के निराश होकर बोले- ‘बट वी डोंट हेव लुकाठी विद अस!’
कबिरा मुस्कुराहट छुपाते हुए बोला- ‘डोंट वरी जेंटलमेन, आई विल अरेंज अ हॉट लुकाठी फ़ॉर यू।’
लड़के कृतार्थ भाव से बोले- ‘सो नाइस ऑफ यू सर!’
‘बट इट विल कॉस्ट फाइव हंड्रेड रूपीज़ ईच।’ -कबिरा ने मौके पर चौका मारा।
कबिरा ने पाँच-पाँच सौ रुपये सबसे ऐंठे। फिर सबके हाथ में लुकाठियाँ थमाकर अपने घर चला गया और अपने एसी बेडरूम में लेटकर ‘हाउस बर्निंग शो’ का लाइव टेलीकास्ट देखता-देखता सो गया।
✍️ चिराग़ जैन
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हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय बनता है कि कवि-सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है। मंच पर फूहड़ता बढ़ रही है। चुटकुलेबाज़ ख़ुद को कवि कहने लगे हैं। लफ़्फ़ाज़ी और बकवास करके श्रोताओं का समय नष्ट किया जाता है। वही पुरानी कविताएँ सुनाकर मोटे लिफाफे लेने का चलन बढ़ गया है। कविता के धंधेबाज़ों ने मंच को बर्बाद कर दिया है, इत्यादि।
वैष्णोदेवी में कभी एक पहाड़ी जंगल को लांघ कर तीन पिंडियों के दर्शन किये जाते थे। उस समय निष्ठावान पुजारी तमाम कष्ट सहकर पिंडियों की सेवा करने जाता था। फिर वहाँ दुर्गम मार्ग की जगह एक सड़क बन गई। उस सड़क पर चलकर खोमचे तीर्थ तक पहुंच गए। फिर लोग घूमने-फिरने के लिए वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग पिकनिक मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग हनीमून मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। लेकिन इस स्थिति में भी आस्थावान पुजारी ने कभी पिंडियों को गाली नहीं दी।
उस पुजारी की पीढियां चुक गई किन्तु पिंडियों की आराधना एक दिन भी नहीं रुकी। हिंदी काव्य मंचों पर बढ़ रही विकृतियों के नाम पर कुल कवि सम्मेलनों को फूहड़ कह देना ऐसा ही है ज्यों तीर्थक्षेत्र पर खोमचे की गंदगी देखकर ईश्वर की मूर्ति के प्रति निष्ठा समाप्त हो जाए।
हिंदी की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करने वाले कवि सम्मेलनों को उन आस्थावान पुजारियों की ज़रूरत है जो किसी भी स्थिति में अपने ईश्वर के प्रति अपना समर्पण कम न होने दें। तीर्थयात्रियों की हरक़तों से रुष्ट होकर मंदिर की इमारत पर कालिख़ पोतना कहाँ तक नैतिक है? जब मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर पहला खोमचा जमा था उस समय पुजारी किस उपक्रम में व्यस्त थे? जब पवित्र तीर्थ की जड़ में हनीमून पैकेज वाला होटल खुला था तब पुजारी किस खोह में घुसकर तपस्या कर रहे थे?
खुसर-पुसर को “परिचर्चा” कहने वाले बुद्धिजीवियों को मंच की उठा-पटक से ऐतराज़ है लेकिन सम्मानों और पुरस्कारों पर होने वाले जुगाड़ उनकी दृष्टि में अपराध नहीं है। यदि किसी योग्य मेधावी ने परिवेश से परेशान होकर स्थान छोड़ा है तो ऐसा करके उसने किसी अयोग्य के लिए अवसर निर्माण करने का अपराध किया है।
✍️ चिराग़ जैन
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बधाई हो!
एक बार फिर हमें धर्म के कपड़े उतारने का मौक़ा मिला है। इस बार हमाम में हिन्दू धर्म खड़ा है। कीचड़ का एक थेपा कोई हिंदू संतों पर फेंकेगा तो बदले में हिन्दू लोग भर-भर बाल्टी कीचड़ पादरियों और मौलवियों के थोबड़े पर दे मारेंगे। बाबागिरी की आड़ में अय्याशी कर रहा कोई कुकर्मी नंगा हुआ तो हमने सभी संतों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सामान्यीकरण की यही आदत हमें सामाजिक कुरीतियों से दूर नहीं होने देती। आसाराम गिरफ्तार हुए और हम हिंदुओं को चिढा-चिढ़ाकर नाचने लगे। इमाम बुख़ारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई और हम मुसलमानों को गालियाँ बकने लगे। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप तय हुए और हम सभी हिंदुओं को आतंकवादी सिद्ध करने पर तुल गए। अफजल को फाँसी हुई और हमने हर मुसलमान को आतंकी मान लिया। एक भिंडरवाला अपराध कर के भागा और हमने हर सरदार को ज़िंदा जला देने की कसम उठा ली।
इस जल्दबाज़ी में हम यह समझ ही नहीं पाते कि किसी एक डेरे के सेम्पल से पूरी सिख परंपरा का चरित्र नहीं समझा जा सकता। दो जैनियों के हवाला में लिप्त होने से पूरा जैन समाज चोर सिद्ध नहीं होता। ठीक वैसे ही ज्यों एक अम्बेडकर के संविधान लिख देने से हर बौद्धिस्ट कानून का ज्ञाता नहीं हो जाएगा। एक उंगली पर गर्म तेल गिर जाए तो पूरे शरीर पर बरनॉल नहीं डाली जाती। रामरहीम एक व्यक्ति है जिसे श्रद्धा की वेदी में बैठाया गया था। अब उसके अपराधों ने उसे आदर की वेदी से उतार कर अपराध के परिणाम तक पहुंचा दिया।
इससे वेदी बदनाम नहीं होती। कोई विवेकानन्द उस वेदी को छुए बिना ही हज़ारों रामरहीमों की करतूत से अपनी परंपराओं को अनछुआ रखने के लिए पर्याप्त है। घटना विशेष से व्यक्ति के चरित्र का आकलन और व्यक्ति विशेष से पूरी संस्कृति का आकलन एक ऐसा अपराध है जिसे हम युगों-युगों से करते आ रहे हैं। विकास के जो स्वप्न हम देख रहे हैं उसको साकार करने के लिए इस चूक से अपनी पीढ़ियों को मुक्त कराना हमारा दायित्व है।
✍️ चिराग़ जैन