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पागलपन का सुख

अब नहीं आना हमको सारी दुनिया के समझाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

दुनिया की सारी दौलत ठुकरा बैठी दीवानी थी
उसको अपने नटवर नागर के सँग प्रीत निभानी थी
मिश्री सा मीठापन पाया उसने विष पी जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

थाम लुकाठी हाथ कबीरा साखी गाया करता था
ढोंगी को झीनी चादर से ख़ूब छकाया करता था
अपना ही घर फूंक लिया दुनिया के दीप जलाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

बिगड़े मस्त दिमाग़ों में ही ख़ुशियों वाले लच्छे हैं
हमको पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं
रंग बसंती गहराएगा फाँसी पर चढ़ जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जब आँखों की एक झलक से सारी दुनिया हल्की हो
जब कोई हिचकी पलकों से आंसू बनकर ढलकी हो
उसके बिन जीने से अच्छा है उस पर मर जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जिन आँखों में रंग ख़ुशी का भरना अच्छा लगता है
उसकी हर इक चाहत पूरा करना अच्छा लगता है
अपने सारे काम भुला कर उसका हाथ बँटाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

मन करता है हाथ उठाकर मुक्त गगन में बह जाएँ
समझ मना करती है जिनको, वो सब बातें कह जाएँ
कितनी इच्छाएँ कैदी हैं मन के पागलखाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जब कोई बेचारा केवल आँख सेकता रह जाए
बंदर बोटी ले भागे और शेर देखता रह जाए
किसी और की पटी प्रेमिका को लेकर भग जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

✍️ चिराग़ जैन

कल्पना का रंग

जानती है हर नदी
जिस राह पर मैं बढ़ रही हूँ
उस सफर का अंत खारा है
किन्तु कैसे रोक लूँ मैं पाँव अपने
इस सफर का रास्ता आकृष्ट करता है
घाट है रंगीन इसके और
हर इक गाम प्यारा है

छू गया सूरज मुझे जब
तो पिघल कर बह चली मैं
फिर कभी पर्वत नहीं मिल पाएगा अब
सत्य यह भी सह चली मैं।
मैं इसी अनुभूति के रोमांच से अभिभूत हूँ
जिस ठौर पर संतृप्त होती है किसी की प्यास
वो मेरा किनारा है।

पत्थरों की देह का घर्षण मिलेगा
दृढ़ नुकीली पीर से यह तन छिलेगा
किन्तु उन सब अड़चनों को लांघ कर
जिस क्षण किसी निश्छल कन्हैया की सताई
गोपिका मुझमें दुबक लरजाएगी
उस कल्पना का रंग न्यारा है।

✍️ चिराग़ जैन

परोक्ष

यूँ समझ लो हम किसी पर्वत शिखर पर आ गए हैं
जब कई झोंके हवा के आएंगे तो भय लगेगा
उस घड़ी तुम हारना मत
सिर्फ ये आभास करना
इस महापर्वत के अपराजित शिखर पर
श्वास लेते आदमी को देखने का
इन हवाओं को अभी अभ्यास कम है
ये समीरों का समर सामान्य ही है
ध्यान से देखो इन्हें तुम
है स्वयं की हार पर अचरज इन्हें ज़्यादा
तुम्हारी जीत पर विश्वास कम है

यूँ समझ लो
हम किसी बादल के ऊपर उड़ रहे हैं
जब कभी नीचे धरातल दिख पड़ेगा
भय लगेगा
उस घड़ी तुम काँपना मत
सिर्फ ये उल्लास करना
बादलों की पालकी पर तैरने के
स्वप्न को साकार होते देखने पर
विश्व को विश्वास कम है
ये धरा का मोहबल सामान्य ही है
ध्यान से देखो इसे तुम
क्षोभ है इसको स्वयं के स्वप्न पर ज़्यादा
पर तुम्हारी कामना की पूर्ति का संत्रास कम है

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

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