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मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से ये दहशतग़र्द अब...

रिसाला

याद है मुझको अभी भी मैंने तुमको एक जीती-जागती कविता कहा था। सुन के तुम शरमा गई थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए मेरी आँखों में उतर आई थी तुम। याद है मुझको कि उस लम्हा बिना सोचे ही तुमने टप्प से उत्तर दिया...

मिलन का क्षण

प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए और सूखा हुआ मन हरा हो गया सीप को बून्द का बून्द को सीप का प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी अनबने रास्तों पर चली इक नदी जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर वो...

ओ माधो जी!

ओ माधो जी! कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी काफ़ी सजी-धजी लगती थी यूँ लगता है तुमने उसको नहलाने में अपनी आँखों का सब पानी ख़र्च कर दिया! वो जो गै़रत वाला जोड़ा तुम हरदम पहने रहते थे कल मैंने उस ही जोड़े में रूह तुम्हारी लिपटी देखी आँखें झुकी हुई थी उसकी गर्दन नीचे गड़ी...

संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है...
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