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मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से

न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से

वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से

ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से

वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से

✍️ चिराग़ जैन

रिसाला

याद है मुझको अभी भी
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।

सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।

याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
“तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।”

आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।

मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।

पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने

अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते

और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
….ऊबना ही था तुम्हें!

पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।

✍️ चिराग़ जैन

मिलन का क्षण

प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया

पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया

जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया

सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया

✍️ चिराग़ जैन

ओ माधो जी!

ओ माधो जी!
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!

वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी

आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!

क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!

✍️ चिराग़ जैन

संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

✍️ चिराग़ जैन

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