+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सरस्वती वंदना

हम सरिता सम बन जाएँ
कविता-सरगम-ताल-राग के सागर में खो जाएँ

सात सुरों के रंगमहल में साधक बनकर घूमंे
नयनों से मलहार बहे माँ, दादर पर मन झूमे
भोर भैरवी संग बिताएँ, सांझहु दीपक गाएँ
हम सरिता सम बन जाएँ

हे वीणा की धरिणी, हमको वीणामयी बना दो
ज्ञानरूपिणी मेरे मन में ज्ञान की ज्योत जगा दो
कण्ठासन पर आन विराजो इतना ही वर चाहें
हम सरिता सम बन जाएँ

✍️ चिराग़ जैन

सुभाषचंद बोस

जिनकी धमनियों में डोलता था ज्वालामुखी,
मात-भारती के क्रांति-कोष कहाँ खो गए
राष्ट्र-स्वाभिमान वाली मदिरा का पान कर
होते थे जो लोग मदहोश; कहाँ खो गए
जिस सिंह-गर्जना से बाजुएँ फड़कतीं थीं,
इन्क़लाब वाले जय-घोष कहाँ खो गए
देश को आज़ादी की अमोल सम्पदा थमा के,
नेताजी सुभाषचन्द बोस कहाँ खो गए

✍️ चिराग़ जैन

मज़ा उनको भी आता है

अजब सी बात होती है मुहब्बत के तराने में
क़तल दर क़त्ल होते हैं सनम के मुस्कुराने में
मज़ा हमको भी आता है मज़ा उनको भी आता है
उन्हें नज़रें चुराने में हमें नज़रें मिलाने में

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!