Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
बेहद आलीशान मकान का
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।
इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose, Reviews
बाजीराव मस्तानी देखी। लोग इसे प्रेमकथा समझें लेकिन ये संबंधों के उस दर्शन की कथा है जिसको सहज अनुभूत करना भी मुश्किल है। ये इस बात का प्रमाण है कि हम अक्सर ऐसी स्थिति में जी रहे होते हैं, जहाँ कोई भी शख़्स ग़लत नहीं होता, लेकिन हम अक्सर ये भी मान रहे होते हैं कि सब ग़लत हैं।
फ़िल्म का सबसे बारीक़ और मार्मिक सन्देश ये था कि सारी दुनिया के शत्रुओं के वार झेलना संभव है, शत्रुदल के सम्मुख अकेले उपस्थित होना और उसे जीतना भी संभव है, उफनती नदी में मृत्यु से लोहा लेना भी सरल है लेकिन ‘अपनों’ के व्यवहार में पल भर का परायापन ऐसा अजेय शत्रु है जिसे परास्त कर सकना सर्वथा असंभव है।
कि भयानक शत्रुओं से लगातार चालीस लड़ाईया जीतने वाले योद्धा को भी अपनों की चार दिन की बेरुख़ी धराशायी कर देती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
आपकी प्रीत जबसे सुलभ हो गई
फिर किसी मीत की आरज़ू ना रही
प्यार में हार कर जो मिला है मुझे
अब किसी जीत की आरज़ू ना रही
साँवरे के लिए गीत गाती फिरी
एक मीरा दीवानी कहाती फिरी
क्षण समर्पण का जब तक न हासिल हुआ
तब तलक हर नदी गुनगुनाती रही
राधिका कुंजवन में मिली श्याम से
फिर उसे गीत की आरज़ू ना रही
शब्द आँखों में आकर ठहरने लगे
भाव चेहरे की लाली में ढलने लगे
कण्ठ में जम गए ज्ञान के व्याकरण
अर्थ अधरों पे आकर पिघलने लगे
श्वास का राग धड़कन से ऐसा मिला
मुझको संगीत की आरज़ू ना रही
अबकी सावन मिलेगा तो पूछूंगी मैं
मेघ पहले क्यों ऐसे न लाया कभी
बिजलियों ने न इतना प्रफुल्लित किया
कोयलों ने न यूँ मन लुभाया कभी
मन के चातक ने कैसा अमिय चख लिया
अब उसे छींट की आरज़ू ना रही
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कैसा था वो अनुभव तुमने
सबसे पहले जब मेरे
संदेशों की अनदेखी की थी
जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था
सहज मिला करते थे हम-तुम
पहरों जाने कितनी बातें
रोज़ किया करते थे हम-तुम
तब भी मुझको डर लगता था
तब भी मैं सोचा करता था
आपस में दूरी आई तो
तुम उत्तर ना दे पाई तो
तब कैसे रातें काटेंगे
किससे अपना मन बाँटेंगे
तब भी तुमने बेफ़िक्री से
मेरे मन के ऐसे सब
अंदेशों की अनदेखी की थी
पहले सोचा व्यस्त हुई हो
दुनियादारी की बातों में
फिर जाना अभ्यस्त हुई हो
कोमलता पर आघातों में
जब संदेशा पहुँचा होगा
तुमने ये तो सोचा होगा
उत्तर बिना उदास रहेंगे
वो मुझसे नाराज़ रहेंगे
मैं उनको समझा ही लूँगी
कारण एक बना ही लूँगी
ख़ुद को लापरवाह बनाकर
तुमने उन अपनत्व भरे
आदेशों की अनदेखी की थी
जब मेरा सन्देश तुम्हारी
दिनचर्या में खो जाता हो
कुछ पल मेरी याद जगाकर
आख़िर धूमिल हो जाता हो
तब उत्तर की प्यास जगाए
हर आहट से आस लगाए
मन व्याकुल होता जाता था
सब धीरज खोता जाता था
खीझ, तड़प, चिंता, आकुलता
क्रोध, प्रलय, संशय, आतुरता
मत पूछो क्या क्या होता था
जब तुमने अधिकार भरे
परिवेशों की अनदेखी की थी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
✍️ चिराग़ जैन