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ओस पड़ी है

सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर
यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर

आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले
सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले
फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर

अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की
जिसमें बस बातें होती हैं रासों की मधुमासों की
उसमें जाकर हँस लेता हूँ, जीवन के संत्रास पर

आँख खुली तो दिन आ पहुँचा लेकर कर्ज़ हज़ारों का
मैंने उसको हाल सुनाया सपनों के गलियारों का
तब से ये दिन शर्मिन्दा हैं, रातों के उपहास पर

✍️ चिराग़ जैन

नींव की कमज़ोरी

साफ़-साफ़ दिख रही है
नींव की कमज़ोरी
दीवार की लीपापोती
छुपा नहीं पा रही है
भीतर की दरारें।
एक भय-सा झाँक रहा है
झरोखों से!
अंधेरा ही अंधेरा
छा गया है
रौशनदान के आरपार

सब समझ आ रहा है
कि क्यों
लटक गया है
कंगूरों का चेहरा!

✍️ चिराग़ जैन

पलकों के भीतर

बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।

तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।

तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।

जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे

उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।

लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।

नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा जगनी थी

अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था
ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था
रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में
तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था

✍️ चिराग़ जैन

विचार और मूर्त

दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है
हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है
कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो
जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है

सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते
युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते
अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है
वो ध्यान से खिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

अन्तस् में हो गया जब, विश्वास का उजाला
अमृत बना दिया था, मीरा ने विष का प्याला
वरदान में न रखना, संकोच और शंका
विश्वास से मिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

ये स्वर्ग-नर्क की सब, चर्चा उधार की है
जिस पर जहाँ टिका है, ताक़त विचार की है
मस्तिष्क में उपज कर, जो सोच में पला है
सच में वही घटेगा, ये सृष्टि का नियम है

✍️ चिराग़ जैन

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