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जो है वही कहना

किसी भी चोट को सहना बड़ा दुश्वार होता है
जु़बां हो और चुप रहना बड़ा दुश्वार होता है
ये माना दर्द को अभिव्यक्त करना भी ज़रूरी है
मगर जो है वही कहना बड़ा दुश्वार होता है

✍️ चिराग़ जैन

कैसे लिखूँ

मस्त था मैं, भ्रमर-सा दीवाना था मैं, लेखनी प्रेयसी बन गई थी मेरी
ऑंसुओं की अमानत संजोई बहुत, जुल्म से जंग-सी ठन गई थी मेरी
एक दिन प्रेयसी मुझसे कहने लगी- “मेरे प्रीतम ये क्या कर दिया आपने
मेरे बचपन को क्यों रक्त-रंजित किया, मांग में रक्त क्यों भर दिया आपने
क्यों शवों के नगर में मुझे लाए हो, मेरी मासूमियत तुमने देखी नहीं
घात-आघात की बात करते सदा, तुमने यौवन की लाली समेटी नहीं
शोक विधवा का, पीड़ा जगत् की दिखी; मेरे दिल के ज़ख़म ना दिखे आपको
सारी दुनिया के ऑंसू समन्दर लगे, मेरे ऑंसू सनम ना दिखे आपको
मेरे भीतर ज़रा झाँक कर देख लो, प्यार के गीत बनते चले जाएंगे
मेरे ऑंचल से ऑंसू अगर पोंछ लो, सब समन्दर सिमटते चले जाएंगे”

मैं रहा मौन, मन ने मगर ये कहा- “तेरे बचपन को मैंने क़तल कर दिया
तुझको खूँ से रंगा हर पहर, हर घड़ी, तुझको यौवन से भी बेदख़ल कर दिया
जब कभी तेरे यौवन पे लाली चढ़ी, मुझको बेवाओं की मांग दिखने लगीं
जब कभी तेरे ऑंचल में मोती जड़े, दिल में भूखी निगाहें सिसकने लगीं
तेरी मासूमियत कैसे देख्रू भला, भूखे बच्चे बिलखते नज़र आ रहे
ऐसे मौसम में क्या प्यार को शब्द दूं, जब ग़रीबों के बच्चे ज़हर खा रहे
क़ातिलों के शहर में खड़ा है कवि, हर तरफ़ मौत का घर नज़र आएगा
प्यार का गीत कैसे लिखेगा कोई, प्यार भी मौत की भेंट चढ़ जाएगा!”

✍️ चिराग़ जैन

चाहत

मैं मुहब्बत का सुगम-संगीत लिखना चाहता हूँ
कंदरा संग पर्वतों की प्रीत लिखना चाहता हूँ
उत्तरा का मूक-वैधव्य जकड़ लेता है मुझको
जब कभी मैं पांडवों की जीत लिखना चाहता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

सरस्वती वन्दना

वरदान दे दे मुझे छंद-गीत-कविता का,
वाग्देवी तेरा उपकार मांगता हूँ मैं
रंग-ओ-तरंग तेरे संग से मिलेगा मुझे,
जीवन में तेरे सुविचार मांगता हूँ मैं
मृदु-सौम्य-भावपूर्ण वाणी बोलने के लिए
वाणी तेरे सभ्य-संस्कार मांगता हूँ मैं
वाणी का वरद् सुत बन के जिऊँ मैं यहाँ,
हंसवाहिनी ये अधिकार मांगता हूँ मैं

शारदे, दे ऐसा वरदान कि मुखर करे
पीड़ितों के दिल की पुकार मेरी कविता
जहाँ सच मौन की घुटन में सिसकता हो,
वहाँ बन जाए ललकार मेरी कविता
यौवनों में डोले बन प्यार मेरी कविता; औ
पीढ़ियों में घोले संस्कार मेरी कविता
निराशा औ तेजहीनता की सूखी धरती पे
बने आशाओं की जलधार मेरी कविता

✍️ चिराग़ जैन

कविता

ज्वार भावनाओं का जो मन में उमड़ता है,
तब आखरों का रूप धरती है कविता
आस-पास घट रहे हादसों की कीचड़ में
कुमुदिनी बन के उभरती है कविता
प्रेयसी के रूप में सँवरती है कविता; औ
शहीदों की अरथी पे झरती है कविता
लोग मानते हैं काग़जों पे लिखी जा रही है,
कवि जानते हैं कि उतरती है कविता

‘रश्मिरथी’ में ‘रेणुका’ में ‘सामधेनियों’ में
दिनकर बन के दमकती है कविता
सूर, रसख़ान जैसे साधुओं में बसती है,
निराला की ‘बेला’ में झलकती है कविता
कभी घुंघरुओं में ख़नकती है कविता; औ
कभी ‘मधुशाला’ में छलकती है कविता
कभी महादेवी-सा बिरह झेलती है; कभी
आँसुओं की धार में ढलकती है कविता

✍️ चिराग़ जैन

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