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नए नग़मे सजा लेना

मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी
बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना
जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें
नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना

✍️ चिराग़ जैन

दिल में आह बाक़ी है

जब तलक़ दिल में आह बाक़ी है
तब तलक़ वाह-वाह बाक़ी है

अब कहाँ कोई ज़ुल्म ढाता है
ये पुरानी कराह बाक़ी है

ख्वाब सारे फ़ना हुए लेकिन
देखिए ख्वाबगाह बाक़ी है

मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन
अब भी इक ख़ैरख्वाह बाक़ी है

जिस्म को रूह छोड़ती ही नहीं
हो न हो कोई चाह बाक़ी है

ज़िन्दगानी भटक गई तो क्या
हर जगह एक राह बाक़ी है

कट चुका है शजर कभी का मगर
अब भी धरती पे छाह बाक़ी है

मिरे दिल को कचोटता है बहुत
मुझमें मेरा ग़ुनाह बाक़ी है

मिरी यादों के शामियाने में
एक भीगी निगाह बाक़ी है

✍️ चिराग़ जैन

बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं,
आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं
सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ,
अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं
झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में,
सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं
बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल,
तब लगता है एक कवि हो गया हूँ मैं

✍️ चिराग़ जैन

मैं जी उठा

सूर्य जब-जब ले के अंगड़ाई उठा
पूजने सब चल पड़े थाली उठा

मुस्कुराकर आपने देखा मुझे
और कुछ ऐसा हुआ मैं जी उठा

क्या पता किस चांद के दीदार को
कब लहर की शक्ल में पानी उठा

सांझ ढलते ही हुआ सूरज निढाल
चांद पीकर रोशनी उसकी उठा

सोच अपनी सोच को कुछ इस तरह
लफ़्ज़ से हटकर नए मानी उठा

या तो तू सबकी तरह से बात कर
या फिर अपनी बात से आंधी उठा

✍️ चिराग़ जैन

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