प्रेम-कथा के अंत में
प्रेम-कथा के अंत में दो में से एक ही चीज़ प्रेमी के पास जीवन भर को रह जाती है- प्रेमिका या प्रेम।
✍️ चिराग़ जैन
प्रेम-कथा के अंत में दो में से एक ही चीज़ प्रेमी के पास जीवन भर को रह जाती है- प्रेमिका या प्रेम।
✍️ चिराग़ जैन
आज मेरा बटुआ खो गया। बटुआ खोने के बाद मुझे पता चला कि इस देश में जितने भी लोग हैं वे सब जीवन में कभी न कभी बटुआ गँवा चुके हैं और उस अनुभव की कहानी सुनाने के लिए अवसर की तलाश में जीवन जी रहे हैं। कुछ दरिद्र लोग जिनके पास निजी अनुभव का अभाव है वे समय पड़ने पर अपने दोस्त, चाचा, ताऊ, मौसा या पड़ोसी के अनुभवों से काम चलाते हैं।
बटुआ खोने के बाद मुझे इस बात का भी एहसास हुआ कि मनुष्य नामक सामाजिक प्राणी जानता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है इसलिए उस पत्थर के नीचे से भी बटुए की तलाश करते हैं जिसे युगों पूर्व भगवान् राम ने भी छूकर अहिल्या नहीं बनाया था।
बटुआ खोने के बाद ही मुझे यह भी पता चला कि देश के लोग वाक्य के शुरू में “काश” और वाक्य के अंत में “ता” लगा कर घटी हुई घटना को भी घटने से रोकने की सम्भावना बनाए रखने में दक्ष हैं।
जो भी व्यक्ति घटनास्थल की लोकप्रियता से आकृष्ट होकर मुझ तक पहुँचता वो आते समय मुख पर कौतूहल, सुनते समय माथे में त्यौरियां और कथा समाप्ति के समय नीचे वाले होंठ को ठुड्डी तक ले जाने का असफल प्रयास करके गर्दन हिलाता हुआ भीड़ का हिस्सा बन जाता था। कहानी चूंकि मैं खुद “आह से उपजे गान” की तरह सुना रहा था इसलिए वह कुछ ही मिनिटों के “करत करत अभ्यास” से इतनी प्रभावी हो चली थी कि सुनने वाला लौटते हुए गर्दन झुकाकर यह सोच कर शर्मिंदा दिखाई देता था कि यदि वह मौक़ा ए वारदात पर मौजूद रहा होता तो बटुए के गिरते ही उसे दबोच लेता और मुझे देकर मेरा सारा कष्ट हर लेता।
बटुआ खोने के बाद मुझे यह भी अच्छी तरह पता चल गया कि बटुए जैसी कीमती चीज़ संभाल के रखनी चाहिए। एक सज्जन ने यह भी जानकारी दी कि बटुए के खोने से बहुत परेशानी हो जाती है।
कुछ लोगों ने मुझसे यह भी पूछा कि बटुए में पैसे थे क्या। मैंने उनको बताया कि नहीं पैसे तो मेरी कार के फ्यूल टैंक में थे, बटुए में तो मैंने पेट्रोल भरवा रखा था।
ये सुनकर उन्होंने अपने स्वेटर के गले में हाथ घुसाकर कमीज की जेब में से एक सौ बीस रूपये निकाले और बताया कि वे भी पैसे कभी बटुए में नहीं रखते, बटुआ हमेशा खाली रहता है ताकि कभी गुम हो तो पैसों का नुकसान न हो। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक सौ बीस रूपये से अपनी कमीज की खाली जेब पुनः भर ली।
बटुआ खो जाने के बाद मुझे यह भी पता चल गया कि अगले चार-पाँच दिन मुझे इस उम्मीद में जीना चाहिए कि कोई भला आदमी मुझे फोन करके बताएगा कि आपका बटुआ हमें कहीं पड़ा मिला है, इसे हमसे वापस ले जाओ।
✍️ चिराग़ जैन
आज एक साहित्यिक कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला तो पता चला कि आजकल मार्केट में अनेक प्रकार के वक्ता चल रहे हैं। कुछ परंपरागत वक्ता जो पुराने ढर्रे पर विषय का बाक़ायदा अध्ययन करके मंच पर आते हैं, वे आजकल मंच पर आ नहीं पाते हैं। इसके विपरीत वे लोग मंच की अट्टालिकाओं पर सुशोभित हो जाते हैं जो अध्ययन में व्यर्थ होने वाला अमूल्य समय मंच जुटाने में लगाते हैं। ये लोग जानते हैं कि एक बार मंच मिल जाए तो कुछ भी बोल देंगे, श्रोताओं को सुनना पड़ेगा। क्योंकि साहित्यिक गोष्ठियों का श्रोता वह विवश जीव है जो दरी पर बैठी अनपढ़ महिलाओं की तरह इस भंगिमा से मंच को निहार रहा होता है कि पूज्य बाबाजी जो कह रहे हैं वह ठीक ही होगा।
कुछ वक्ता प्रोफ़ेशनल वक्ता होते हैं। ये स्वागत-वुआगत हो जाने के उपरांत बराबर वाले की ओर झुकते हैं और घबराहट प्रदर्शित करने का अभिनय करते हुए प्रश्न करते हैं कि आज क्या बोलूंगा। उनका प्रश्न सुनकर बराबर वाला अतिरिक्त शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए रिरियाता हुआ कहता है, अरे साहब, आप तो कुछ भी बोल दीजिये। इसके बाद दोनों हें हें हें की ध्वनियाँ निकालते हुए सीधे हो जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ अनुभवी लोग पेट के भीतर हो रही गुड़गुड़ाहट को ठोस से गैस में परिवर्तित कर देने का रासायनिक उपक्रम भी पूर्ण कर लेते हैं।
फिर संचालक एक-एक वक्ता को जिन शब्दों में आमंत्रित करता है उनसे स्पष्ट होता है कि अमुक की उत्पत्ति न हुई होती तो इस धरा को स्वयं पर इतराने का अवसर न मिला होता।
एक ख़ास प्रकार के वक्ता अपने रटे-रटाए वक्तव्य को प्रस्तुत विषय से जोड़ने के लिये एकाध मिनिट की त्वरित भूमिका बनाते हैं और जैसे ही उनके तैयार भाषण का शीर्षक उनके आशुभाषण में घुसड़ जाता है, वे तुरंत धाराप्रवाह अपना भाषण पेल कर मुस्कुराते हुए बैठ जाते हैं।
इसके बाद क्रम शुरू होता है उन वक्ताओं का जो किसी भी विषय पर केवल यह बताते पाए जाते हैं कि उनका कई बड़े-बड़े लोगों से बेहद निकट का संबंध रहा है। ऐसे लोगों की सूची सामान्यतया उन लोगों तक सीमित रहती है जो कदाचित् इनसे निकटता के सदमे से दुखी होकर दुनिया छोड़ चुके हैं। इनको सुनकर पता चलता है कि कई भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राज्यपालों ने तो इनकी सलाह सुनने के लिये ही पदग्रहण किया होता है। ऐसों का वक्तव्य सुनकर मेरा मन एक ठंडी आह भरते हुए कहता है कि अच्छा ही है अमुक जी दुनिया से चले गए वरना ऐसी बेसिर-पैर की बातें सुनने में समय नष्ट करने के अपराध में भारतीय दण्ड संहिता की सभी धाराएँ एक साथ उन पर लग जातीं।
कुछ वक्ता एकदम इन्स्टेंट वक्ता होते हैं। वे “हिंदी साहित्य में रामचन्द्र शुक्ल जी का योगदान” जैसे विषय पर भी बोलेंगे तो बात यहाँ से शुरू करेंगे-
“मेरे पास आयोजकों का फोन आया। मुझसे कहा डॉक्टर साहब आपको आचार्य शुक्ल के योगदान पर बोलना है। मैंने कहा अरे भई, कब बोलना है, कहाँ बोलना है, कुछ तो बताओ। तब आयोजक बोले अरे सर, सॉरी सॉरी मैं बताना भूल गया था, फ़लाँ तारीख़ को फ़लाँ जगह फ़लाँ अवसर पर आपको बोलना है। मैंने कहा ये हुई ना बात। अब बताइये आपको मेरा नम्बर कहाँ से मिला। तो उन्होंने बताया जी आपका नम्बर चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी ने दिया है। मैंने कहा अरे राम रे, ये तो मुसीबत हो गई। चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी की बात कैसे टाल सकता हूँ। उनसे इतना पुराना सम्बन्ध है कि क्या बताएँ। मुझे एक आवश्यक कार्य से लखनऊ जाना था लेकिन अब आपने ऐसे धर्म्संकट में डाल दिया है कि क्या कहें। चलिये… अब जो भी हो, आ जाएंगे। इसलिये मुझे आना पड़ा। बहुत बढ़िया कार्यक्रम है आपका। सभी बढ़िया लोग बुलाए हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में आजकल इतने स्तरीय विद्वान कहाँ देखने को मिलते हैं। आज के अध्यक्ष जी को ही ले लीजिये। महोबा में ये और हम घंटों चाय की दुकान पर साहित्य चर्चा किया करते थे। अनेक बार इनके घर भी जाना हुआ है मेरा। और भाभीजी तो क्या शानदार भजिया बनाती हैं। और उसके साथ वो लहसुन की चटनी। आज तक स्वाद नहीं गया उसका। इतने विद्वान आदमी को अध्यक्ष बनाकर आपने साहित्य के प्रति अपने अनुराग और ईमानदारी का परिचय दिया है। समय की सीमाएँ हैं इसलिये अपनी बात को संक्षिप्त कर रहा हूँ, वरना जी तो करता है कि बोलता ही जाऊँ। आचार्य शुक्ल पर जितना कहा जाए उतना कम है। हिंदी साहित्य उनके योगदान के लिये हमेशा ॠणी रहेगा। आपने मुझ अकिंचन को इतने संभ्रांत लोगों के बीच बोलने का अवसर दिया, बहुत बहुत धन्यवाद।”
इस प्रकार के सात-आठ वक्तव्यों के बाद आयोजक सबका धन्यवाद ज्ञापन करता है। वक्ता सम्मान में मिले दुशालों को कंधों पर डाले, अपना अपना गुलदस्ता उठाकर इतराते हूए एक दूसरे की पीठ ठोंकते हैं। सबके मन में एक दूसरे के प्रति समान आदर भाव होता है कि आप भी उतने ही विद्वान हैं जितना मैं स्वयम को समझता था। श्रोता प्रवचन समाप्ति की घोषणा के साथ ही प्रसाद के लिये जलपान की लाइन में लग जाते हैं। और साहित्य मंच के पीछे टँगे बैनर के साथ ही अपने कर्णधारों की योग्यता देख कर ज़मीन पर आ गिरता है।
✍️ चिराग़ जैन
यही हाल रहा तो कुछ दिन बाद अरविन्द भैया अपने मफलर को साड़ी के पल्लू की तरह पतलून में खोंस कर हाथ हिला हिला कर बोलेंगे- “हाय या के कीड़े पड़ें…..याको नास जाय… मेरौ जीनौ हराम कार्राखो है। जाय आफत पररई है। जे ना मानैगा …छोरा दामोदर का। हाय लगेगी मेरी हाय… मेरी आत्मान तैं हाय निकलेगी रे….!”
✍️ चिराग़ जैन
राहुल भैया बिना बात ही नाराज़ हो गए। स्वयंसेवकों ने औरतें आगे कर केवल यह याद दिलाने की क़ोशिश की थी कि ये उम्र मंदिर जाने की नहीं, घर बसाने की है। लेकिन स्वयंसेवकों को भी समझना चाहिये था कि जो आदमी बैंकॉक से भी केवल योग कर के लौटा हो उसका संयोग भगवान भी नहीं करा सकता।
✍️ चिराग़ जैन