Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
जानते हैं
मोदी जी के स्वच्छता अभियान की गाड़ी
पिक-अप क्यों नहीं ले रही
क्योंकि जिस देश में कभी
दूध की नदियाँ बहती थीं
वहाँ दूध की थैलियाँ
नदियों को बहने नहीं दे रही।
शहरों से गाँवों तक
मस्तक से पाँवों तक
मेलों से ठेलों तक
रेलों से जेलों तक
खेलों से झूलों तक
कॉलेज से स्कूलों तक
फ़िल्मों से चैनल तक
एंकर से पैनल तक
नारों-विचारों तक
ख़त से अख़बारों तक
सब्ज़ी से राशन तक
रैली से भाषण तक
पर्ची से चंदे तक
सेवा से धंधे तक
कूड़ा ही कूड़ा है
जर्जर इक मूढ़ा है
जिस पर हम बैठे हैं
बिन कारण ऐंठे हैं
दर्द की दवाई हो
बात ना हवाई हो
अल्लाह दुहाई हो
अब कुछ सफ़ाई हो
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
बरवाला में आज हमला दिवस था। आश्रम पर हमला हुआ। बचाने आए भक्तों पर हमला हुआ। पकड़ने आए पुलिसवाले पिटे। देखने गए गांववाले पिटे। दिखाने गए मीडियावाले पिटे। घुटने टूटे, कैमरे टूटे और टीआरपी के रिकॉर्ड भी। अदालत नाराज़ है कि अदालत की तौहीन हुई। पुलिस नाराज़ है कि पुलिस की तौहीन हुई। मीडिया नाराज़है कि मीडिया की तौहीन हुई। भक्त नाराज़ हैं कि संत की तौहीन हुई।
पुलिस आई, पैरामिलिट्री आई, प्राइवेट मिलिट्री आई। सारा दिन बरवाला में बम, लाठी, गोली चली, चैनल्स पर लाइव टेलीकास्ट चला, शाम को सभी चैनल्स पर शब्दों का युद्ध हुआ।
किसी ने बताया कि बाबा कबीरपंथी है। ऐसा लगा कि दिन भर लोकतंत्र घायल होता रहा। दिन भर धर्म घायल होता रहा। लेकिन शाम को मीडिया की बहस में जब बाबा को कबीरपंथी बताया गया तो ऐसा लगा कि एक ही पल में कबीर लहूलुहान हो गए।आश्रम के भीतर से जितने पत्थर फेंके गए उनसे कबीर का अंग-अंग ज़ख़्मी हो गया।बरवाला की दिशा में कान लगाकर सुना तो लगा कोई कराह रहा है। उस कराह में एक टीस है, कोई बुदबुदाता जाता है-
कबिरा पिटा हिसार में, पूछ रहा है रोय
दो पार्टिन के बीच में, खींच लिया क्यों मोय
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Hasya Kavita, Poetry
छाप-छूप कर अख़बार
एक सनसनीबाज़ पत्रकार
रात तीन बजे घर आया
तकिये में मुँह छुपाया
और चादार तान के सो गया,
इतनी देर में उसका अख़बार
जनता के हवाले हो गया।
इधर पत्रकार चैन से
खर्राटे भर रहा था,
उधर उसका अख़बार
दुनिया की नाक में दम कर रहा था।
दोपहर की पावन बेला में
जब बिस्तर ने पत्रकार से निज़ात पाई,
तब तक पत्रकार को भूख लग आई।
पत्नी थाली लेकर आई,
तो पत्रकार ने उस पर अपनी खोजी दृष्टि घुमाई।
सबसे पहले उसने माथे से लगाई दाल,
और बड़बड़ाते हुए बोला- “धन्यवाद तरुण तेजपाल”।
फिर रोटी को करते हुए प्रणाम,
नमस्कार की मुद्रा में बोला- “जय हो बाबा आसाराम”।
देख कर थाली में वेज पुलाव,
आकाश की ओर सिर उठाकर बोला-
“धन्य हैं इस देश का साम्प्रदायिक तनाव”।
किसी ने कोई विवादास्पाद बात कही,
इसलिये थाली में शामिल हुआ दही।
फिर से बढ़ने लगा है कोई चुनावी विवाद,
तभी थाली को नसीब हुई है सलाद।
अब बस पाकिस्तान जी थोड़ी सी हैल्प कर दें,
तो बरसों से प्यासा गिलास
व्हिस्की की ख़ुश्बू से भर दें।
कुल मिलाकर
थाली में देश के सारे मुद्दे शामिल थे,
कुछ त्रासदी थे
कुछ अत्याचारी थे
और कुछ क़ातिल थे।
लेकिन पत्रकार
देखते ही देखते
सब कुछ पचा गया,
और शाम होते होते
अगले दिन की थाली सजाने
अख़बार के दफ़्तर में आ गया।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कौन कहता है नदी सागर को प्यारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
टूटकर बिखरी कहीं जब भी, तभी झरना बना
पत्थरों ने गोद में लेकर कहा- ‘मरना मना’
सिर झुकाकर बढ़ चली पर चाल भारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
घाट तक पहुँची, उलझकर रह गयी संसार में
गाँव-गलियों, मरघटों, नहरों, नलों, घर-बार में
उफ़, बिना मतलब ही खेतों की उधारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
बांध ने बंदी बनाया, शहर ने शोषण किया
कर्मकाण्डों ने लहू लेकर भरण-पोषण किया
कारख़ानों ने छुआ, घातक बिमारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कुछ पुरानी बहसें देख रहा था यूट्यूब पर। चुनावी माहौल में मुँह में तिनके दबाये कई भेड़िये रंगे सियारों के समर्थन से स्वयं को महान सिद्ध करते नज़र आये। “जनता”, “लोकतंत्र”, “ईमानदारी”, “राष्ट्रहित”, “जनसेवा” और “भारत माता” जैसे शब्दों को बोलकर अपना वाक्युद्ध जीतने पर जब वे कुटिल मुस्कान मुस्काते थे तो ऐसा जान पड़ता था कि जिस्म का धंधा करने वाली कोई त्रिया, सावित्री और अनुसूया से अपनी तुलना कर पावनता के मुख पर तमाचे मार रही हो।
मैं लोगों के मुख पर मुस्कान पिरोने वाला एक अदना सा कलाकार हूँ। सामान्य स्थितियों से हास्य जुटाना मेरा काम है। शब्दजाल बुनना और वाक्पटुता से सम्मोहन करने की कला मुझे और मेरे सहकर्मियों को माँ सरस्वती ने जन्म के समय सौगात में दे दी थी। ऐसे में किसी प्रकार की लच्छेदारी में से झाँक रही रंगदारी को पहचानना मेरे लिये कठिन कार्य न था।
हर चैनल की हर बहस में अनवरत एक-दूसरे की कुत्ता-फजीहत और खिखियाती हँसी का जब बहावानुवाद किया तो ये स्वर सुनाई पड़े- “तुम सब मूर्ख हो सालो! हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। हम ऐसे ही चैनलों पर टाइम पास करके चले जायेंगे और तुम अपने-अपने टीवी के सामने बैठे ये देखकर ख़ुश होते रहना कि फ़लां ने फ़लां को बढ़िया जवाब दे दिया। ये न्यूज़ चैनल भी हमारे ही चमचे हैं।”
वे जानते हैं कि हम इस बात से कोई सरोकार नहीं रखते कि जिन सवालों के जवाब इन बहसों में तलाशने का ढोंग किया जा रहा है, वे दरअसल हमारे हैं ही नहीं। वे ये भी जानते हैं कि इन बहसों को जनता ऐसे ही सुनती है जैसे बालिका वधु देख रही हो। सास-बहू पर विज्ञापन आ गये तो एनडीटीवी लगा लिया, थोड़ा मज़ा रवीश का ले लिया, फिर वहाँ विज्ञापन आये तो डिस्कवरी लगा लिया, तेंदुए और तेंदुई का संभोग देख लिया, वहाँ से कहीं और, और वहाँ से कहीं और।
हम रिमोट पर उंगलियाँ टिकाये लगातार अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी के अपने स्पोक्सपर्सन हैं, ये वो लोग हैं जो बहस बहुत अच्छी कर लेते हैं। ये वो टेस्ट खिलाड़ी हैं जो हारे हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जाने का हुनर जानते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत कम, य बहुत ज़्यादा बोल कर बहस का टाइम पास करना जानते हैं। ये वो लोग हैं जिनके किसी भी बयान को “उनकी निजी सोच” बताकर पार्टी अपना पल्ला झाड़ सकती है। यदि देश सेवा का हित है तो प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत? (मेरी इस बात पर कुछ लोग मेरा राजनैतिक बचकानापन कहकर खिल्ली उड़ासकते हैं) लेकिन उनको मैं पहले ही बता दूँ कि संगीन राजनैतिक अपराधों के इस दौर में राजनीति इसी बात का लाभ उठा रही है कि उन्होंने जनता को आपस में लड़ना सिखा दिया है।
किसी ने कोई बयान दे दिया, किसी ने उसका खंडन कर दिया, किसी ने स्याही फेंक दी, किसी ने चप्पल फेंक दी… हम देश की राजधानी में जीवन यापन कर रहे हैं। राजनीति जहाँ श्वास लेती है उस वातावरण से हम भी सिंचित हो रहे हैं। देश भर को प्रभावित करने वाली बौद्धिक तरंगें जब उद्घटित होती हैं तो सर्वप्रथम हमसे टकराती हैं। जब इस दौर से इतिहास प्रश्न करने खड़ा होगा तो उस समय दिल्ली की आम जनता से भी यह पूछा जायेगा कि तुमने क्यों इन सपोलियों को अपने आस-पास पनपने दिया। मैं जानता हूँ कि आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? प्रश्न ये नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं; प्रश्न ये है कि हमारी कुछ करने की इच्छाशक्ति कहाँ चली गयी।
चुनाव हो चुका है, 4 दिसम्बर से पहले मैं ये बातें करता तो लोग इसमें किसी पार्टी की महक ढूंढने लगते। इंदिराजी ने सबसे पहले मीडीया की ताक़त को समझा और आपातकाल के दौरान सर्वप्रथम मीडिया को पंगु बना दिया गया। सरकारी मीडिया आज तक उन सरकारी इंगितों का उल्लंघन करने का साहस नहीं जुटा पाया। तब से आज तक टीवी हमें बेवक़ूफ़ बनाता जा रहा है। अब तो राजनैतिक पार्टियों ने बाक़ायदा मीडिया प्रबंधन के लिये प्रकोष्ठ बना दिये हैं। साइबर मैनेजमेंट के लिये कार्यालय खोल दिये हैं। ठीक चुनाव के दिन जबकि चुनाव प्रचार बंद हो चुका है, सुबह-सुबह आपके घर पर एक अख़बार आता है और उसका मुखप्पृष्ठ एक पार्टी विशेष का विज्ञापन कर रहा होता है।
मैं ये नहीं कहता कि इन सब बातों को पढ़कर क्रांति की मशाल उठा लो। इस दौर में क्रांति के लिये घर-बार फूँकना कदाचित् कठिन न हो, लेकिन एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि जब इस प्रकार के ढोंगी चैनलों पर राजनेताओं को बिठाकर एक-एक घंटे के बुलेटिन बनाये जा रहे हों तो उस वक़्त अपना चैनल बदल दो। जिस टीआरपी के दम पर ये लोग हमको बेचे जा रहे हैं, उसी टीआरपी को अपनी ताक़त बनाओ। जब इस तरह की बहसों की टीआरपी घटेगी तो कम से कम इन चैनल्स से मिलने वाली फ़ुटेज के दम पर राजनीति करने वाले लोग तो कम होंगे।
किसने क्या बयान दिया, या दिल्ली में किसकी सरकार आयेगी इस पर किस नेता की क्या राय है… इस प्रकार की बहसों से अगर हमने चैनल बदलना सीख लिया तो कम से कम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दरारों को भरने में हम कुछ कर सकेंगे।
✍️ चिराग़ जैन