+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सादगी की डगर

सत्य का पथ हमें क्यों जटिल सा लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए

जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टालकर चल दिए

हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए

हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए

भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डालकर चल दिए
✍️ चिराग़ जैन

आपदा-प्रबंधन

संकट हो कोई समक्ष खड़ा
या फिर घिर आए युद्ध बड़ा
जीवन की हर कठिनाई से
मानव का पुत्र सदैव लड़ा
मानवता का इक दिव्य भाव, अंतस् में धारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

सागर ने लांघी मर्यादा
सूनामी यम का रूप बनी
भूकम्पों की मनमानी से
जब धरा मृत्यु का कूप बनी
मानवता एक हुई सारी
विपदा उसके आगे हारी
सब मतभेदों का तिरस्कार, जीवन के कारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जब जीवनदायी मेघ फटें
अम्बर से मौत बरसती हो
नदियाँ सुरसा का रूप धरें
धरती किसान को ग्रसती हो
पर्वत से गिरे शिला भारी
शहरों को डसे महामारी
मानवता की रक्षा हित हम, हर स्वार्थ समर्पण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जगती का कष्ट मिटाने को
शिव हालाहल पी जाते हैं
कान्हा गोकुल की रक्षा में
पर्वत का बोझ उठाते हैं
अस्थियाँ दान जहाँ ऋषि करें
और जनक खेत में कृषि करें
यदि समय त्याग का आया तो, हम याद कोई क्षण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

सुरों की आह

ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है
कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है
बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के
जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है

✍️ चिराग़ जैन

वर्तमान

मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं

✍️ चिराग़ जैन

मापदण्ड

टूट गया था मैं
ठीक वैसे ही
ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही
टूट जाता है कच्चा बर्तन।
क्वारी-गर्भवती कन्या के
मजबूर बाप की तरह
कसमसा उठी थी मेरी आत्मा।
जून की झुलसती गर्मी में
सड़क-किनारे खड़े
शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े
बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह
पिघल गईं थीं मेरी आँखें
और भूख से बिलबिलाते हुए
मासूम बच्चे की
ग़रीब माँ की तरह
फ़फ़क पड़ा था मेरा दिल
क्योंकि भ्रष्टाचार का शिकार हुआ था ‘मैं’।

मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य
(क्योंकि अपना कार्य सभी को महत्त्वपूर्ण लगता है)
चढ़ा दिया गया था
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर।

लेकिन आज न टूटन है मुझमें
न आत्मा में सिसक
न आँखों में पानी
और न दिल में कराह।
बस कुछ है तो लालच में लपलपाती जीभ
आँखों में अमानुषी चमक
होंठों पर जीत की कुटिल मुस्कान
आसुरी अट्टहास
और कुम्भकर्ण की तरह सोता हुआ ज़मीर।

क्योंकि भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर बलिदान हुआ कार्य
आज महत्त्वपूर्ण नहीं है
आज मैं भ्रष्टाचारी हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!