Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
देश की आवाम को अमन की ज़रूरत है
इसे कोई फालतू बबाल नहीं चाहिए
शासक को चाहिए सुशासन बनाए रखे
व्यर्थ बकवाद, झोलझाल नहीं चाहिए
जनता को भरपेट रोटी चाहिए सुकूं की
धरना या भूख हड़ताल नहीं चाहिए
यदि संविधान का हो पूरी तरह पालन तो
फिर हमें कोई लोकपाल नहीं चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं
जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं
ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ
कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए
क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose, Story
मोदी जी नेपाल गए। लोगों ने नारे लगाए -“मोदी …मोदी।” मोदी जी प्रसन्न हुए। मोदी जी अमरीका गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी …मोदी।” मोदी जी आत्मविश्वासी हो गए। मोदी जी जापान गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी ..मोदी।” मोदी जी बेबाक़ हो गए। मोदी जी चीन गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी ….मोदी।” मोदी जी ने विपक्षियों की बातें सुननी बंद कर दीं। मोदी जी जर्मनी गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी …मोदी। मोदी जी ने सबकी बात सुननी बंद कर दी।
मोदी जी कश्मीर में परास्त हुए। लेकिन कानों में गूँजता रहा- “मोदी …मोदी।” मोदी जी दिल्ली हार गए। लेकिन कानों में गूँजता रहा- “मोदी …मोदी। मोदी जी बिहार में हारे तो भ्रम टूटा। चेहरा उतर गया। कान सुन्न हो गए। उनको आडवाणी जी की आवाज़ सुनाई दी। जोशी जी की बात पर उनका ध्यान गया। लेकिन आज मोदी जी ब्रिटेन पहुँच गए। लोगों ने फिर नारे लगाए- “मोदी… मोदी।” तभी मोबाईल पर किसी हितचिंतक ने फोन करके कहा- “भारत में आपकी लोकप्रियता कम हुई है।” मोदी जी ने ज़ोरदार अट्टहास किया। मोबाइल को हिक़ारत से स्विच ऑफ़ किया। और हाथ हिलाते हुए उनका अभिवादन करने लगे जो नारे लगा रहे थे- “मोदी …मोदी।”
✍️ चिराग़ जैन
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दुर्घटना घटे सड़क पर तो हम रुकने को तैयार नहीं
आँखों के आगे जुल्म बढ़े तो हम करते प्रतिकार नहीं
अब हमको फर्क नहीं पड़ता चालीस मरे या चार मरे
पानी बन गया लहू वह जो बढ़कर भीषण हुंकार भरे
जब भूखी उम्मीदें टूटीं खलिहान जले हम मौन रहे
जब धनिया की अस्मत लूटी पत्थर पिघले हम मौन रहे
लालच ने जब नैतिकता का दर्पण तोड़ा हम मौन रहे
लाचारी को ताक़त ने जब बेघर छोड़ा हम मौन रहे
निर्बल की आह-कराह सुनी, दिल दहल गया, हम मौन रहे
टीवी पर चर्चाएँ सुन ली, मन बहल गया, हम मौन रहे
अपराध घटित होता है तो देखा करते हैं मौन खड़े
फिर ये कहकर बढ़ जाते हैं, छोड़ो पचड़े में कौन पड़े
शोषित पर अत्याचार हुआ, शोषक ने अट्टाहास किया
नुक्कड़ पर खड़े बतोलों ने, उपहास किया, परिहास किया
अख़बारों को हेडलाइन मिली, टीवी ने ख़ूब विलास किया
हम भी संवेदनहीन हुए, हमने भी टाइमपास किया
उम्मीद कभी चलकर अपने द्वारे तक आई तो होगी
रातों में किसी बिचारी ने साँकल खटकाई तो होगी
हमने ख़ुद बंद किया बढ़कर सब खिड़की रौशनदानों को
गुलदस्ते लेकर पहुँच गए जब बेल मिली सलमानों को
छोड़ो ये चर्चा कब कितना नुकसान हुआ घोटालों से
पहले ये सोचो औलादें क्यों सस्ती हुई निवालों से
छोड़ो इन बातों की चर्चा सरकार हमें क्या दे पाई
पहले ख़ुद से ये तो पूछो क्यों भूखा मरा सगा भाई
कुछ रंग-बिरंगे चोलों ने भड़काया तो हम भड़क गए
पत्थर की गिरी इमारत तो हम सबके बाजू फड़क गए
लेकिन तब ख़ून नहीं उबला, ना गुस्से को सुर-साज मिला
जब पन्द्रह दिन की बच्ची को दिल्ली में नहीं इलाज मिला
हमने कब किसकी रक्षा की, अपराधों से, आघातों से
निष्क्रियता पर पर्दे डाले कुछ रटी रटाई बातों से
शासन पर प्रश्न उठाएंगे, सत्ता को जी भर कोसेंगे
सिस्टम से आस लगाएंगे, अपने आलस को पोसेंगे
क्या ये सचमुच आवश्यक है हम सच से पीठ किए बैठें
क्या से सचमुच आवश्यक है अवसर पर होंठ सिए बैठें
ये क्या हो गया हमें आख़िर, धमनी में ख़ून नहीं है क्या
निष्क्रियता को बंदी कर ले, ऐसा क़ानून नहीं है क्या
खादी, खाकी, व्हाइट कालर, ये सब हममें से ही तो हैं
इक्के, बेग़म, राजा, जोकर, ये सब हममें से ही तो हैं
केवल इतना भर अंतर है, केवल इसके ही हैं झगड़े
कुछ खिड़की के इस पार खड़े, कुछ खिड़की के उस पार खड़े
यूँ तो हममें से हर कोई बढ़-चढ़कर बात बनाता है
जिसका जिस पर वश चलता है, वो उससे स्वार्थ सधाता है
हम किस दिन ये सच समझेंगे सारा नुक्सान हमारा है
जिसको दिन-रात कोसते हैं, वो हिन्दुस्तान हमारा है
✍️ चिराग़ जैन