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मीडिया में कवि सम्मेलन

हिंदी कवि-सम्मेलन भारतीय समाज में एक परंपरागत संचार माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित है। आधुनिक और अत्याधुनिक माध्यमों के प्रचलन से पूर्व ही कवि-सम्मेलनों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैंठ बना ली थी। समय के साथ काव्यमंचों पर रासानुपत में परिवर्तन अवश्य हुए किन्तु ये सब परिवर्तन कवि-सम्मेलन के मूल स्वरूप के इर्द-गिर्द ही बने रहे।
प्रारम्भ में साहित्य और पत्रकारिता के हस्ताक्षर अलग-अलग नहीं थे किंतु समय के साथ ये दोनों ही क्षेत्र अलग चिह्नित किये जाने लगे। हिंदी की पत्रकारिता का तो उद्भव ही साहित्य के साधकों ने किया। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, धर्मवीर भारती और अन्य तमाम ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने भारत में पत्रकारिता की आधारशिला रखी। यह वह समय था जब साहित्य और पत्रकारिता को अलग करना असंभव जान पड़ता था।
बाद में “साहित्यिक पत्रकारिता” पत्रकारिता के बड़े क्षितिज का छोटा-सा अंश बनकर रह गई। इस कालखंड में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को समाचार-पत्र के संपादन-मंडल में इसलिए स्थान मिलता था क्योंकि पत्र में नियमित प्रकाशित होने वाली कहानियां, कविताएं, संपादकीय, व्यंग्य और भाषा का स्तर पत्र की गरिमा तय करता था। धीरे-धीरे समाचार-पत्रों में साहित्य एक कोना मात्र बनकर रह गया। अधिकतर समाचार-पत्रों में यदा-कदा कोई कविता छापकर साहित्य की हाज़िरी लगा दी जाती थी और कुछ समूहों ने तो यह हाज़िरी भी बंद कर दी।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब साहित्य, कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास की कड़ियाँ समाचार-पत्रों में बाक़ायदा “बैन” हो गईं। कुछ संपादकीय मंडलों ने तो साहित्यिक गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों आदि की ख़बर तक प्रकाशित करने से परहेज किया। अंततः इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक की शुरुआत होते-होते देश के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्रों से साहित्य-बीट ही समाप्त हो गई।
मीडिया की अनदेखी के इस दौर में दूरदर्शन एकमात्र ऐसा माध्यम बचा था जिससे प्रसारित होनेवाली काव्य-गोष्ठियों में साहित्य जीवित था। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर प्रसारित होनेवाले रंगारंग कार्यक्रमों में हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा और शैल चतुर्वेदी जैसे चेहरे अक्सर दिखाई देते थे। अशोक चक्रधर और गोविंद व्यास ने दूरदर्शन की इन काव्य-गोष्ठियों में विविध प्रयोग किये। हर दूसरे मंगलवार को प्रसारित होने वाले ‘कहकहे’ कार्यक्रम में अशोक चक्रधर, सुरेश नीरव और सरोजिनी प्रीतम ने हास्य-कविता का नया अध्याय प्रारम्भ किया। अनेक कवियों की वर्तमान लोकप्रियता की नाल दूरदर्शन की इन्हीं गोष्ठियों में गड़ी हुई है। युवा काव्य-गोष्ठी, फुलझड़ी एक्सप्रेस और अन्य काव्य आधारित कार्यक्रम टेलीविज़न पर कवियों की हाज़िरी लगवाते रहे। दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम पर यह उपस्थिति साहित्यिक अनुष्ठानों के मनोबल की दृष्टि से “डूबते को तिनके का सहारा” सिद्ध हुई।
बाद में सेटेलाइट टेलीविज़न की अतिवृष्टि में जैसे-जैसे दूरदर्शन के रंग फीके पड़े, वैसे-वैसे ही काव्य गोष्ठियों और अन्य साहित्यिक अनुष्ठानों के प्रचार-प्रसार का कारवां भी थम गया। शुद्ध व्यावसायिकता और ग्लैमर की तेज़ रौशनी में मसनद पर विराजित बिना संगीत-साज के कवि-सम्मेलन को मिसफिट करार दे दिया गया। देश भर में कवि-सम्मेलन होते रहे किन्तु मीडिया की फोकस लाईट का छोटा-सा घेरा कवि-सम्मेलन तक पहुँचने से कतराता रहा। NDTV ने कुमार संजोय सिंह के संचालन में “अर्ज़ किया है” शीर्षक से एक कवि-सम्मेलन की सर्जना की भी थी किन्तु इस प्रयास की यात्रा बहुत लम्बी न हो सकी। इसके तुरंत बाद डॉ अशोक चक्रधर ने SAB TV पर “वाह-वाह” प्रारम्भ किया। कवि सम्मेलन की परंपरागत छवि की तर्ज़ पर तैयार यह कवि-सम्मेलन एक नए भवन की नींव मजबूत कर गया।
इसी समय में STAR ONE पर द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज नामक एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसने TRP के सभी रेकॉर्ड तोड़ डाले। इस कार्यक्रम में लतीफों और भाव-भंगिमा से लोगों को हँसाने की एक अपेक्षाकृत नवीन विधा की प्रतियोगिता का संयोजन था। इस कार्यक्रम को जब मीडिया के पुराने लोगों ने देखा तो वह साथी याद आया जिसे वे मसनद पर बैठा छोड़ आए थे।
“आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड” में यक़ीन करनेवाले मीडिया ने कवि-सम्मेलन को लुप्त मान लिया था। इसलिए जब पीछे जाकर उसने कवि-सम्मेलन के सिर पर लगी फोकस-लाइट का स्विच ऑन किया तो वहाँ सब कुछ बदल चुका था। मसनद के गोल तकियों ने सोफे का रूप ले लिया था। कवियों का कुर्ता-पायजामा सूट-बूट में तब्दील हो चुका था। टैंट हाउस के माइक सिस्टम अब ग्लैमरस माइक्रोफोन और लेपल के आकार में ढल गए थे, दरी पर बैठे श्रोताओं की दरियां] कुर्सियां बन चुकी थीं और लोकल टैंटहाउस की व्यवस्थाएं भव्य ऑडिटोरियम में सुव्यवस्थित हो चली थीं।
इस दौर तक SAB TV पर अशोक चक्रधर द्वारा संचालित “वाह-वाह” का दर्शक वर्ग TRP के आंकड़ों में अपनी सम्मानजनक पहचान बना चुका था। उधर “जनमत” टीवी के माध्यम से दीपक गुप्ता और नीरज पुरी; टीवी इंडिया और दबंग टीवी से शैलेश लोढ़ा; तथा अन्यान्य चैनल्स से अरुण जैमिनी भी सेतुनिर्माण में गिलहरी के योगदान की कथा लिख रहे थे। विवेक गौतम के संचालन में “जैन टीवी” पर चल रहा “इंडिया कॉलिंग” लम्बा चला किंतु अपनी पहचान क़ायम करने में विफल रहा। साधना टीवी पर प्रवीण आर्य के संयोजन में चल रहे “कवियों की चौपाल” कार्यक्रम का उपक्रम भी बहुत फलदायी सिद्ध न हो सका।
इसी उठापटक के बीच सब टीवी को सोनी एंटरटेनमेंट जैसे बड़े समूह ने ख़रीद लिया और अशोक चक्रधर का “वाह-वाह” सुभाष काबरा के हाथों से होता हुआ शैलेष लोढ़ा के हाथों में आ गया। अनेक प्रयोग करने के बाद शैलेष जी ने इसे “वाह-वाह क्या बात है” शीर्षक से बिल्कुल नए प्रारूप में प्रारम्भ किया। ठीक इसी कालखण्ड में लाफ्टर चैम्पियन की अचानक से उभरी मांग का जादू धीमा पड़ने लगा था। और इसी दौर में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन में डॉ कुमार विश्वास की अग्रणी भूमिका ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर ला खड़ा किया था।
वाह-वाह क्या बात है ने TRP के मोर्चे पर कवि सम्मेलन की महती उपस्थिति दर्ज की और कुमार विश्वास ने कवि सम्मेलनों को उस तबके तक पहुंचा दिया जिसको कविता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था।” वाह-वाह क्या बात है” के संचालक शैलेश लोढ़ा भी लोकप्रिय धारावाहिक “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” के मुख्य पात्र के रूप में लोकप्रियता के प्रतिमान स्थापित कर चुके थे।
ऐसे संयोगों के बल पर SAB TV का “वाह-वाह क्या बात है” कवि सम्मेलनों के खोए हुए ग्लैमर का लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। नए रूप-रंग और ग्लैमर के साथ प्रसारित होता परंपरागत कवि-सम्मेलन कॉर्पोरेट और मल्टी नेशनल्स को भी आकृष्ट करने लगा। उधर कुमार विश्वास की ख्याति भी कवि-सम्मेलनों की सिल्वर स्क्रीन प्रेजेंस के लिए प्रायोजक जुटाने में सहायक सिद्ध हुई।
इधर “वाह-वाह क्या बात है” के सौ से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके थे, उधर धूमिल होते लाफ्टर शो के एक सादा से नुमाइंदे कपिल शर्मा ने एक कॉमेडी शो लांच करके भारतीय टेलीविज़न जगत के TRP अन्वेषकों को चौंका दिया। चूँकि कवि-सम्मेलन और लाफ्टर शो के स्वरूप में बहुत सी समानताएं हैं इसलिए इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के श्रोतावर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा समान ही है।
कपिल शर्मा के शो की टीआरपी के चलते कोई नया कार्यक्रम तो टेलीविज़न पर नहीं शुरू हुआ किन्तु कवि-सम्मेलन के प्रति उदासीन मीडिया का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। टीवी न्यूज़-चैनल्स ने कवि-सम्मेलनों को अनियमित प्रसारण के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। एकाध वर्ष में ही प्रत्येक न्यूज़ चैनल में होली के अवसर पर कवि-सम्मेलन अनिवार्य-सा हो गया। इसी बीच न्यूज़-नेशन ने “चुनावी-चकल्लस” शीर्षक से कवियों का एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक चुनावी घटनाक्रम पर कवियों की चुटकियां कार्यक्रम की सफलता का माध्यम बनी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में यह कार्यक्रम ख़ासा लोकप्रिय हुआ। चुनाव सम्पन्न होने के बाद इसे “चकल्लस” शीर्षक से संजय झाला ने संचालित किया।
उधर कुमार विश्वास ने दो कदम और आगे बढ़कर “महाकवि” शीर्षक से दिवंगत कवियों के जीवनवृत्त की एक श्रृंखला ABP NEWS पर प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार ने कवियों के ग्लैमर को और ऊपर उठाने में सहायता की।
कुछ समय बाद NEWS 18 INDIA ने “लपेटे में नेताजी” शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्टूडियो में कवियों के सामने बैठाया जाता था और कवि अपने चुटीले अंदाज़ में उनसे प्रश्न पूछते थे। इस कार्यक्रम में पहली बार कविता और राजनीति का ON AIR आमना सामना हुआ।
न्यूज़ मीडिया में कवि-सम्मेलन अब पूरी तरह चस्पा हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर कवियों को बुलाकर एक एपिसोड शूट कर लेना प्रोग्रामिंग हेड के लिए आसान भी होता है और इस कार्यक्रम की सफलता की गारंटी भी पूरी होती है। कई लाख रुपये ख़र्च करके प्रोग्रामिंग कोटे का एक बुलेटिन तैयार करने की बजाय मौलिक कंटेंट, सरल समन्वय और अपेक्षाकृत कम व्यय में शानदार कवि-सम्मेलन शूट करने में प्रोडक्शन की अधिक रुचि दिखने लगी है। आज तक, एबीपी, न्यूज़ नेशन, ज़ीन्यूज़, ज़ी बिज़नेस, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ 24 और अन्य सभी न्यूज़ चैनल्स पर समय-समय पर कवि-सम्मेलनों की उपस्थिति यह घोषणा करती है कि साहित्य और मीडिया का जो बिछोह प्रिंट मीडिया के मेले में प्रारम्भ हुआ था वह अब इलैक्ट्रोनिक मीडिया की गलियों में समाप्त हो गया है। मीडिया के पास नए कंटेंट का टोटा था और कवि-सम्मेलनों के पास उचित प्रचार तकनीकों का। दोनों ने आपस में हाथ मिलाकर एक नए युग की शुरुआत की है।

✍️ चिराग़ जैन

इनबाॅक्स के शुभचिंतक

मेरे हितचिंतको!
रोज़ सुबह जब मैं मोबाइल उठाता हूँ तो मेरा व्हाट्सएप्प आपके संदेशों से लदा हुआ होता है। मेरे निरुत्तर रहने के बावजूद आप ‘मा फलेषु कदाचन’ का अनुगमन करते हुए बिना मतलब की ‘गुड मॉर्निंग’ भेजना नहीं भूलते। मेरे शुभाकांक्षियो, आपके द्वारा भेजे जा रहे लाल-पीले फूलों को गूगल पर देख-देखकर मैं ऊब चुका हूँ। और उसके नीचे जो टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में ‘गुड मॉर्निंग’ या ‘गुड नाईट’ लिखकर आप इतराते हैं वह सब इतना बासी हो गया है कि अब उन फूलों से सड़ांध उठने लगी है।
आपकी निष्ठा देखकर मन गंधाने लगता है कि आपके पास जैसे ही कोई कूड़ा-करकट टाइप का फॉरवर्डेड मैसेज आता है आप तुरंत ‘सर्वकार्य त्यक्तेन’ उसे मेरे व्हाट्सएप्प पर दे मारते हैं। तिल के तेल से लेकर अदरक, मेथी, गाजर, लहसुन और लौंग तक के इतने लाभ आप मुझे बता चुके हैं कि अब इन सबको एक साथ खाकर मर जाने का जी करने लगा है।
आपका सूचना तंत्र इतना प्रबल है कि दिल्ली पुलिस से लेकर रॉ तक को जैसे ही किसी संदिग्ध फोन नंबर की ख़बर मिलती है तो वो तुरंत आपको बताते हैं और आप मेरे प्रति अपने अनुराग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मुझे फॉरवर्ड कर देते हैं। पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद हो अथवा मिलावटखोरों की नई साज़िशें; आपके इनबॉक्स में हाज़िरी लगाए बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता। और आप इन पत्तों से उत्पन्न आंधियों को मेरे व्हाट्सएप्प पर भेजकर मोक्ष पा लेते हैं।
वैष्णोदेवी के भवन से चला हुआ संदेश हो या अजमेर शरीफ के जिन्नात का हुक्म; हिन्दू धर्म पर मंडरा रहा ख़तरा हो या इस्लाम के खि़लाफ़ चल रही साज़िशें, अमरीका की गुप्तनीति हो या नासा की फ्यूचर प्लैनिंग …सब कुछ सलीके से आपके व्हाट्सएप्प पर मत्था टेकने आता है और आप उसे मेरे मोबाइल पर फेंक देते हैं।
इतिहास के ऐसे-ऐसे तथ्य आप निकालकर लाते हैं कि अकबर से लेकर चंद्रगुप्त तक सबकी आँखे फट जाती हैं। खुशियाँ मनाने का कोई अवसर चूक न जाए इस उद्देश्य से आप दीपावली, होली, गणतंत्र दिवस, ईद, रमज़ान, गुरूपरब, स्वतंत्रता दिवस, वेलेंटाइन डे, नववर्ष, क्रिसमस, गुडी पड़वा, ओणम, पोंगल, आखा तीज, नरक चतुर्थी, सोमवती मावस, अहोई अष्टमी, करवा चौथ और यहाँ तक कि जलिकुट्टी की भी शुभकामनाएँ भेजने से पीछे नहीं रहते।
आप मुझे इतना प्यार करते हैं कि अपनी हर उपलब्धि मुझसे शेयर करना चाहते हैं। चूँकि मेरे बिना आपका हर त्योहार अधूरा है इसलिए आप न्यूनतम व्यवहार को भी अनदेखा करके अपने, अपनी पत्नी के, अपने बच्चों के, अपने रिश्तेदारों के और अपने दोस्तों के भी चित्र मेरे इनबॉक्स में चिपकाकर मुझसे जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनाओं की अपेक्षा करते हैं। आपके पड़ोस में भी कोई मर जाए तो उसकी उठावनी की सूचना मुझ तक अवश्य आती है कि न जाने कब मेरा उस अज्ञात दिवंगत के प्रति मोह जाग जाए।
आपके घर में नई गाड़ी आती है और मेरे इनबॉक्स में उसका चित्र टांग दिया जाता है। आप फ़िल्म देखकर आते हैं और सज़ा मेरे इनबॉक्स को मिलती है। आपका कहीं सम्मान होता है और आप मेरे इनबॉक्स में पहुँचकर प्रशंसा की अपेक्षा करने लगते हैं। आप किसी सेलिब्रिटी के साथ फोटो खिंचवाते हैं और मेरे इनबॉक्स में पिंग हो जाता है। आप खिचड़ी खाने का निर्णय लेते हैं और खिचड़ी के लाभ का रायता मेरे इनबॉक्स में बिखर जाता है। आप सब्ज़ी खरीदते हुए सेल्फी खींचते हैं और मेरे इनबॉक्स में सब्जी मंडी लगा दी जाती है।
आपके इतने अधिक अपनत्व के कारण मुझे व्हाट्सएप्प से डर लगने लगा है। आपकी निरंतरता और अनर्गल सक्रियता के कारण मैं व्हाट्सएप्प पर आनेवाले आवश्यक संदेशों की भी अनदेखी करने लगा हूँ।
मैं अपने प्रति आपकी इस चिंता से अनुग्रहित हूँ और आपको दोनों हाथ जोड़कर यह बता देना चाहता हूँ कि आप जिन बासी चुटकुलों को ‘मार्केट में नया है’ के टैग के साथ पेलते हैं उन्हें सुनकर मुझें पाँचवी कक्षा में भी हँसी नहीं आती थी। मैं आपको यह भी सूचित करना चाहता हूँ कि मेरा हास्यबोध और संवेदना बोध श्रेष्ठ साहित्य से सिक्त होकर काफी आगे बढ़ चुका है और आपके बेमतलब फॉरवर्डेड संदेश उस स्तर तक नहीं पहुँच पाते। आपके गुड मॉर्निंग मेसेज को डिलीट करने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग करूँ तो मैं कुछ सृजन कर लूंगा।
आपकी प्रशंसा लोलुपता मुझे व्हाट्सएप्प से आपको ब्लॉक करने के लिए प्रेरित करती है किन्तु संचार माध्यमों के महत्व को समझते हुए मैं ऐसा नहीं कर पाता। संचार के माध्यम सूचनाओं के सम्प्रेषण हेतु आविष्कृत हुए थे किंतु आपकी कचरा उंडेल प्रतियोगिता ने इन्हें सिर का दर्द बना दिया है। यदि आप इस माध्यम का उपयोग सूचनाओं एवं सृजन के प्रसारार्थ करें तो आपका सम्मान भी बना रहेगा और इन माध्यमों की उपयोगिता भी। फॉरवर्ड करने की हड़बड़ी में आप न जाने कितने ही अपवाद, विवाद और अफ़वाह प्रचारित करने लगते हैं।
इनबॉक्स प्रत्येक व्यक्ति का निजी अधिकार क्षेत्र है। उसमें घुसकर ज़बरदस्ती अपनी मूर्खताएँ पढ़ने-देखने-सुनने को विवश करना आपका अपमान बढ़ाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे कई कूड़ेघर हैं जहाँ आप कुछ भी डालकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
चाकू का आविष्कार तरकारी बिनारने के लिए ही किया जाए तो बेहतर है। यदि आप उससे हत्या करने लगें तो इससे चाकू की साख भी ख़तरे में पड़ेगी और आपका चरित्र भी। आशा है आज के बाद आप या तो मुझे अपनी बेमतलब ब्रॉडकास्टिंग सूचियों से हटा देंगे अथवा मेरा नम्बर ब्लॉक कर देंगे …दोनों ही स्थितियों में आपका आभारी रहूंगा।
✍️ चिराग़ जैन

लोक और तंत्र की रस्साकशी

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं – विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता।
विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को अंगूठा दिखा रही है। घोटालों और दलाली तक के नवरत्नों ने प्रधानमंत्री पद से वार्ड सदस्य तक की कांति दूनी कर रखी है। स्थितियाँ इतनी सुखद हैं कि पूरे विश्व में भारतीय राजनीति के भ्रष्टाचार की मिसालें दी जाती हैं। किसी भी फ़िल्म में इस स्तम्भ के भीतर की गंदगी दिखाने में कोई राष्ट्रद्रोह नहीं महसूस किया जाता।
न्यायपालिका की कुत्ता-फ़जीहत पिछले दिनों सुखिऱ्यों में प्रकाशित हुई। कभी कोई जज अपने दुर्व्यवहार के लिए सड़क पर जनता के कोप का भाजन बनता है तो कभी सरेआम रिश्वत लेते हुए बरामद होकर न्याय की आँखों पर बंधी काली पट्टी पर धूल झोंकता दिखाई देता है। फैसलों की ख़रीद-फरोख़्त बोलने की हिम्मत इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें न्यायालय को बेइज़्ज़ती महसूस होती है। फिल्मों में न्याय प्रक्रिया की जितनी चाहे धज्जियाँ उड़ा लो, कभी कोई अवमानना का नोटिस जारी नहीं होता क्योंकि आँखों पर पट्टी बांधे बैठी न्याय की मूर्ति टीवी नहीं देखती। शिवसैनिक, बजरंग दल, आशाराम के भक्त, राम रहीम के भक्त, विश्व हिंदू परिषद, करणी सेना और अन्य संगठन, न्यायालय के आदेश के साथ बलात्कार करते रहते हैं और सभी महकमे चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं।
कार्यपालिका ने अपनी एक साख बनाई है। जनता को विश्वास है कि जब कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिलेगी तो पुलिस ले-दे के काम करवा देगी। थाना एकमात्र ऐसा जगह है जहाँ आम आदमी बाली की तरह जाने से डरता है। पुलिसवालों से बात करने में लोगों की रूह काँपती है। फिल्में पुलिसवालों को दिन रात गालियाँ देती हैं लेकिन पुलिसवाले ऊपर की कमाई में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फ़िल्म देखने की फुरसत ही नहीं है।
पत्रकारिता लोकतंत्र की आवाज़ है। सरकारी माध्यमों को सरकार का भौंपू कहने की परंपरा इंदिरा जी के ज़माने में ही डाल दी गई थी। अब विज्ञापनदाता की अभिरुचियों, सरकारी स्वार्थों की साधना और टीआरपी की अंधी होड़ में ‘कुछ भी’ दिखानेवाला मीडिया जनता से ‘बिकाऊ’ जैसा अलंकरण प्राप्त कर चुका है। मुद्दे, किरदार, खबर और यहाँ तक कि मौत को भी मंडी में बेचकर पैसा कमानेवाला मीडिया भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी के गीत का आधार तत्व है।
इन चारों स्तंभों पर खड़ा लोकतंत्र निस्पृह भाव से लोक और तंत्र के मध्य की अनवरत रस्साकशी को तब-तक देखता रहेगा, जब तक हमारा तंत्र, लोक का आख़िरी कश नहीं मार लेगा।

✍️ चिराग़ जैन

इतिहास : एक कठपुतली

भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल, इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं।
जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई बातों को कुतर्क की भूल-भुलैया में उलझाकर उसका मेकअप करने में सक्षम हैं उनके आगे सुनी-सुनाई बातों की तो कोई औक़ात ही नहीं है। इन दिनों, कुछ ऐसे विद्वानों की भी तादात बढ़ गई है, जो स्वरचित इतिहास के दम पर, पढ़ने से परहेज करनेवालों से मैगस्थनीज़ की उपाधि प्राप्त कर लेते हैं।
जातीय विश्लेषण और ऐतिहासिक चरित्रों के नितांत व्यक्तिगत मनोभावों का बखान इन विद्वानों का प्रिय कर्म होता है। इनके आत्मविश्वास की दूरबीन इतनी शानदार होती है कि ये इक्कीसवीं सदी में बैठकर चंद्रगुप्त के मोबाइल पर पड़े एसएमएस पढ़ लेते हैं। दुर्याेधन, शकुनि, अम्बिका, भीष्म, द्रौपदी, मंथरा, विभीषण, मंदोदरी और अंगद आदि तो कलयुग तक चलकर आते थे इन्हें अपनी मनोदशा बताने। कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पैगम्बर, ईसामसीह और राम तो इन महान विद्वानों के निर्णय की प्रतीक्षा में हाथ बांधे खड़े हैं कि ये लोग सुनिश्चित कर लें तो हम भी ख़ुद को महान मान लें।
पुराने धुरंधरों को धूसर करने के बाद इनकी चर्चाएँ मुग़ल काल और हिन्दू शासकों पर गोलाबारी करने लगती है। बाबर, अकबर, औरंगजेब, महाराणा प्रताप, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान और शाहजहाँ इनके प्रिय पात्र हैं। मुग़ल काल की घटनाओं का बखान करते हुए ये विद्वान अक्सर मुग़ल-ए-आज़म की अनारकली, बाबरनामा, आईने-अकबरी और अकबर-बीरबल के किस्सों की खिचड़ी पका देते हैं और फिर उसी पतीले में डूबकर महफ़िल समाप्त कर देते हैं। यही स्थिति राजपूतों के इतिहास, पद्मावत महाकाव्य और जौहर की कथाओं के साथ भी घटित हो रही है।
इससे आगे बढ़कर जब स्वाधीनता संग्राम के नायकों की चर्चा निकलती है तो सारे स्वघोषित इतिहासकार अपनी-अपनी विचारधारा के चश्मे लगाकर ज्ञानी बन जाते हैं। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे, नाना फड़नवीस, मंगल पांडे, बहादुरशाह ज़फ़र और टीपू सुल्तान की मट्टी पलीद करने के बाद ये महान इतिहासकार चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, रासबिहारी बोस और अशफ़ाकुल्लाह ख़ान के पीछे पड़ते हैं। बीच-बीच में विवेकानन्द और दयानन्द सरस्वती को भी कुछ खरोंचे आती हैं। उसके बाद जब बात गांधी, मुखर्जी, सावरकर, लोहिया, जिन्ना और नेहरू तक आती है तो ये विद्वान अपना आकार घटोत्कच्छ की तरह विराट कर लेते हैं। इस समय गांधी, नेहरू इनकी गोदी में खेलते बौने बालकों जैसे दिखने लगते हैं जिनको ये कभी भी थप्पड़ मारकर चुप करा सकते हैं। पटेल और शास्त्री इन्हीं की सलाह पर गांधी जी और नेहरू जी को लताड़ने लगते हैं। और इसके बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी, नरसिम्हा राव और अटल जी तो इनके इशारों पर भरतनाट्यम की मुद्रा में कठघरे में खड़े ही हुए हैं।
आजकल व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर इन महान इतिहासवेत्ताओं का अभियान ज़ोर-शोर से जारी है। राजनीति इन अनर्गल चर्चाओं पर वोट की रोटियाँ सेंकने में व्यस्त है और महापुरुषों के योगदान की चिताएँ मीडिया बुलेटिनों में धू-धूकर जल रही हैं। इन भभकती चिताओं से उठता धुआँ जनता की आँखों में घुसकर वास्तविक मुद्दों के दर्शन में अवरोध पैदा करता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम एक खुला पत्र

श्री मान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री
दिल्ली सरकार

सरजी!
हमें इस बात का भान है कि आप जब से सरकार में आए हैं, तब से पूरी क़ायनात आपके खि़लाफ़ हो गई है। पूरे देश की राजनीति, नौकरशाही और व्यवस्था सिर्फ इसी प्रयास में है कि आपको कुर्सी से कैसे हटाया जाए।
स्वयं प्रधानमंत्री आपके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। उधर राज्यपाल ने आपके सुख-चैन की सुपारी दे रखी है। यहाँ तक कि ईश्वर भी आप ही से चिढ़कर स्मॉग भेजने लगा है। और तो और आपकी ईमानदारी और लोकप्रियता से जलकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, शाज़िया इल्मी, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा और ख़ुद अन्ना हज़ारे तक अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा न होने पर आपको अकेला छोड़ गए हैं।
दिल्ली पुलिस, डीडीए जैसे महत्वपूर्ण विभाग साज़िशन आपके नियंत्रण से बाहर रखे गए हैं। महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में आपको निमंत्रित न करके अपमानित किया जाता है। आपकी सरकार के आयोजनों को सुरक्षा का अड़ंगा लगाकर अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया के सारे बेईमान मिलकर आपके खि़लाफ़ हो गए हैं। और रही-सही कसर आपका स्वास्थ्य पूरी कर देता है। कभी मानसिक तो कभी शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी आपका खासा समय व्यतीत हो जाता है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए हिम्मत तो नहीं हो रही किन्तु एक मतदाता होने के नाते मैं आपको सूचित करना अपना अधिकार समझता हूँ कि जिस केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री होने का आप लुत्फ़ उठा रहे हैं, वह दिल्ली इन दिनों बहुत समस्याओं से घिरी हुई है।
आपकी गाड़ियों का क़ाफ़िला जिन चौराहों से दनादन दौड़ता हुआ निकलता है, उन चौराहों पर किन्नरों की उपस्थिति आपकी सरकार की नपुंसकता का मज़ाक उड़ाते हुए आपके मतदाताओं को सरेआम लूटती है। पुलिसवाले यह नंगा नाच देखते हैं और ख़ामोशी से स्टॉप लाइन क्रॉस करनेवालों से पैसे वसूलते रहते हैं।
डीटीसी के ड्राइवर ढिठाई से यातायात नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी लम्बी-चौड़ी बस से आम आदमी को खदेड़कर यह संदेश देते हैं कि सरकार ने आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझ लिया है, जिसकी जान की किसी को कोई परवाह नहीं है।
पार्किंग वाले 20 रुपये घंटे को पचास रुपये करने पर आमादा हैं और अनधिकृत पार्किंग में धड़ल्ले से गाड़ियों की वसूली की जा रही है। कानूनी निष्क्रियता का इतना अंधेरा छा गया है कि सिग्नल पर लालबत्ती का रंग लोगों को दिखना बंद हो गया है।
रेहड़ी-पटरीवाले आपके संरक्षण में घटोत्कच्छ की भाँति पूरी सड़क घेरने लगे हैं और रोड टैक्स चुकानेवाले वाहन चालक रोड ढूंढ रहे हैं। टूटी हुई सड़कें और टूटती जा रही हैं।
आपको झुग्गी-झोंपड़ियों में अपने राजनैतिक भविष्य का सूर्य दिखाई देता है और मध्यमवर्गीय दिल्ली अपनी ख़ामोशी का परिणाम झेलती जा रही है। सरकारी विज्ञापन आपकी सरकार को रामराज्य घोषित करना चाहते हैं किंतु उन विज्ञापनों को पढ़नेवाला दिल्लीवासी उनमें सिस्टम की बेशर्मी और ढिठाई पढ़ता है।
अगले वर्ष चुनाव है सरजी! दिल्ली की क़ानून व्यवस्था और यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। यदि इन खंडहरों पर ढंग से लीपापोती नहीं की गई तो पोलिंग बूथ जाने के लिए घर से निकला आपका वोटर ट्रैफिक जाम में फँसकर रह जाएगा।

-आपका दिल्लीवासी
✍️ चिराग़ जैन

प्रश्न पूछना पाप है

साहब ने शतरंज की चाल चली। चार-पाँच चाल चलने के बाद, साहब हारने लगे। आँख बचाकर शतरंज की टेबल से उठकर, वे लूडो खेलने लगे। देश शतरंज को भूल गया और लूडो देखने लगा। थोड़ी देर बाद लूडो में भी साहब की सारी गोटियाँ पिट गईं। देश साहब की बुद्धिमत्ता पर लगाने के लिए प्रश्नचिन्ह लेने दौड़ा और जब तक वापस लौटकर आया तो साहब कैरम खेलते पाए गए। किसी जिज्ञासु ने पूछा कि लूडो और शतरंज का क्या हुआ तो साहब उसे बताने लगे कि शतरंज में मेरी गोटी लाल होने लगी तो लूडो के वज़ीर को कैरम की रानी ने शह दे दी। अभी-अभी बेसबॉल के रैकेट से दो सफेद गोटियाँ बाहर पहुँचाई हैं।
‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि सफेद गोटियाँ विपक्षियों ने बाहर भेजी हैं!’ -जिज्ञासु आश्चर्यचकित होकर बोला।
प्रश्न सुनकर साहब के चेहरे पर महानता के चिन्ह उभर आए, लेकिन वे विनम्र होते हुए बोले- ‘यही तो हमारा बड़ा दिल है रे। हम काम करके क्रेडिट नहीं बटोरते।’
‘लेकिन आधार, मनरेगा, मंगल यान, एफडीआई के क्रेडिट लेने के लिए तो आपने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं।’ -जिज्ञासु, साहब की विनम्रता को सत्य समझकर पूछने की हिम्मत कर बैठा।
सहब ने विनम्रता का कुर्ता उतार फेंका और राष्ट्रभक्ति की कमीज़ चढ़ाते हुए चिल्लाए- ‘अब ऊँची कूद में भी सीमा नहीं पार करूंगा तो विरोधी खिलाड़ी मुझे हरा देंगे। और मैं नहीं चाहता कि मैं हार जाऊँ और भारत की जनता को नज़रें झुकानी पड़ें।’
जिज्ञासु ने नहले पर दहला फेंकते हुए पूछा- ‘पर अपने कट्टर विरोधियों को अपनी पार्टी जॉइन करवाने के कार्य से आपने समर्थकों को नज़रें झुकाने पर विवश किया है।’
अब साहब का धैर्य डोल गया। वे अपनी फुलप्रूफ प्लानिंग का वर्णन करते हुए बोले- ‘मिस्टर जिज्ञासु! समर्थक हमारी पेड ऑडियन्स हैं। उनको स्पॉन्सर्स की उंगलियों पर तालियाँ बजानी होंगी। अभी किसी नेता के पाला बदलने पर थोड़ी ज़िल्लत उठानी होगी लेकिन कुछ दिन बाद इनके ज़ख़्मों पर नारंगी ब्रांड का मरहम लगाकर इन्हें मैनेज कर लेंगे। फिर भी स्थिति न संभली, तो आस्था की एस्टरॉयड डोज़ से फ़ास्ट रिलीफ़ की व्यवस्था कराई जाएगी।’
जिज्ञासु दुःखी होकर बोला कि यह तो चीटिंग है। पेड ऑडियन्स और डोपिंग दोनों ही खेल के नियम के खि़लाफ़ है।
अब साहब ने जिज्ञासु को कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अपने राइट हैंड को एसएमएस किया- ‘नेक्स्ट टारगेट जिज्ञासु भाई।’
दस मिनिट में राइट हैंड का रिप्लाई आया- ‘टारगेट अचीव्ड।’

✍️ चिराग़ जैन

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