Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
वैसे दिल्ली दिलवाले मरीजों की राजधानी मानी जाती थी, लेकिन आजकल प्रदूषण ने इसे फेफड़ेवाले मरीजों की फैक्ट्री बना दिया है।
स्मार्टफोन के कैमरे और यूट्यूब से कमाई की ख़बरों ने जिस कौम का सबसे ज़्यादा नुक़सान किया है वह है आशिक़। सफदरजंग मक़बरा, पुराना किला, लोदी गार्डन, कुदसिया पार्क, कालिंदी कुंज, गार्डन ऑफ फाइव सेंसेज़, इंडिया गेट और इंद्रप्रस्थ पार्क जैसे सैंकडों तीर्थस्थल अपने चेहरे पर वीराना लपेटे माहौल सुधरने का इंतज़ार कर रहे हैं। मुहब्बत के रूहानी किस्सों को शरारत की चटपटी कहानियों में तब्दील करने के लिए जिन बगीचों का निर्माण दूरदर्शी राजाओं ने करवाया था वे सवेरे मॉर्निंग वॉक वालों, दोपहर में किन्नरों और शाम को स्मैकियों से भरे रहते हैं। झाड़ियाँ आशिक़ों के इंतज़ार में हरी होती जा रही हैं और आशिक़ मौके की तलाश में मुरझाते जा रहे हैं।
बाज़ार फुटपाथ पर आ गए हैं और लोग बाज़ार में। सरकारी ठेकेदार सड़क बनाते समय दोनों किनारों की चार-छह फुट जगह अनदेखी कर देता है ताकि बरसात का पानी जब भूमिगत होने की चेष्टा करे तो उसे डूब मरने की जगह मिल जाए। बरसात न होने की स्थिति में यही छूटी हुई जगह स्वच्छता के सरकारी दावों पर धूल उड़ाने का काम करती है।
गाड़ियों ने सड़कों पर हमला बोल रखा है और सड़कों ने स्पीड पर। चालीस फुट की सड़क को हमने बहुत बेहतरीन तरीके से विभाजित कर रखा है। दोनों तरफ़ चार-चार फीट उस फुटपाथ के लिए जो किसी को दिखता नहीं, फुटपाथ पर नो पार्किंग के बोर्ड से टो-अवे ज़ोन तक के बोर्ड की दस-दस फीट जगह गाड़ी पार्किंग के लिए, सड़क के बीचोंबीच चार फीट का डिवाइडर, शेष चार-चार फीट जगह वाहनों के लिए बचती है। ऐसी सड़क व्यवस्था देखकर सरकार गर्व कर सकती है कि वाहन चल पाएँ या न चल पाएँ पर हमारी सड़कों पर एलिमेंट सारे मौजूद हैं।
मुहल्लों में लोगों ने पार्किंग की जगह घेरने के लिए पर्यावरण से प्यार करना सीखा। कच्ची कॉलोनियों में घर के बाहर ईंटें भिड़ा-भिड़ाकर किचन गार्डन का शगल किया जाता है जहाँ दिन भर घर की नालियों का पानी सड़ांध मारता है ताकि कोई असामाजिक तत्व उस सुंदर उद्यान को हानि पहुँचाने के लिए खड़ा न हो सके, और रात को वहाँ घर के मालिक का दुपहिया या चौपहिया वाहन स्थापित हो जाता है। फ्लैट्स में रहने वाले लोग पुराने स्कूटर सहेजकर रखते हैं ताकि उन्हें आड़ा खड़ा करके गाड़ी की जगह घेरी जा सके।
सरकार के काग़ज़ों में जो पन्द्रह साल पुराने दुपहिये कंडम हो गए हैं, हमारे शहर में बिना कोई सरकारी नियम तोड़े ही उनका प्रयोग किया जा रहा है। उसे कहते हैं कचरे से बिजली बनाने का हुनर। यह और बात है कि इतनी बढ़िया पार्किंग व्यवस्था के बावजूद हमारे शहर के थानों में गाड़ी पार्किंग से जुड़े मुहल्ले के झगड़ों की कोई कमी नहीं हो सकी है। रात के समय किसी पॉश कॉलोनी में जाकर देखो तो ऐसा लगेगा कि आप किसी बहुत बड़ी पार्किंग ग्राउंड में आ गए हैं, जहाँ बीच-बीच में दस-पाँच घर भी पार्क कर दिए गए हैं।
सरकार ने विदेशों की नक़ल करके एक बीआरटी गलियारा बनवाया। जब यह गलियारा बन रहा था तो मूलचन्द चौक से लेकर चिराग़ दिल्ली वाली पूरी सड़क पर ज़ोरदार जाम लगता था। उस समय हम दिल्लीवाले एक-दूसरे को यह कहकर दिलासा देते थे कि बीआरटी की कंस्ट्रक्शन के कारण जाम लग रहा है। फिर कुछ वर्ष बाद गलियारा बन गया। सड़क के बीच में उगे हुए बँटवारों ने हमें सुख कम, दुःख ज़्यादा दिया। अलग-अलग लेन में चलने की व्यवस्था देखकर हम समझ गए कि सरकार हमें बाँटना चाहती है। सो हमने सरकारी मनसूबों पर ऐसा पानी फेरा कि नयी सरकार को आकर वह कॉरिडोर तुड़वाने का टेंडर निकालना पड़ा। यह है हमारी मिलकर चलने की प्रवृत्ति।
बरसों से काली-पीली टैक्सियों से ऊब कर हमने ऊबर-ओला का हाथ थाम लिया। एयर कंडीशन्ड टैक्सियों में बाइज़्ज़त सवारी करके हम इतने प्रसन्न हो गए कि काली-पीली टैक्सी चालकों के दुर्व्यवहार को सुधारने के सभी प्रयास ध्वस्त कर दिए। जब सबने ऊबर-ओला की एप्लिकेशन डाउनलोड कर ली तो अचानक उतनी ही दूरी के लिए उसी टैक्सी का किराया कम-ज़्यादा होने लगा। ईमानदार कंपनियों ने कहकर हमसे डेढ़ गुना से लेकर तीन गुना तक किराया वसूलना शुरू कर दिया। कैब बुक करने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। आपको कहाँ जाना है? पेमेंट कैश है कि नहीं? आपसे पूरी जानकारी लेने के बाद वह बिना कोई जवाब दिए फोन काट देता है। आप इंटरव्यू का रिज़ल्ट आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। सामान्यतया दस-पंद्रह मिनिट में आपका आवेदन निरस्त कर दिया जाता है। और कई बार बीस-बाइस मिनिट प्रतीक्षा करने के बाद आप अपने हाथों से कैंसिलेशन कर देते हैं। कैब कंपनी आपकी इस धृष्टता के लिए आप पर जुर्माना लगा देती है। इन सब स्थितियों की शिकायत करने में आप समय नष्ट न करें इसलिये इन कंपनियों ने अपना कोई फोन नंबर सार्वजनिक नहीं किया है।
परिवहन की एक अन्य शानदार सवारी के रूप में हमारे पास ई-रिक्शा का विकल्प है। जब ई-रिक्शा की शुरुआत हुई थी तब इनका किराया सामान्य रिक्शा से कम था, क्योंकि यह बिजली से चलती है। अब जब सभी सामान्य रिक्शा वाले ई-रिक्शा धारक हो गए तो इनके किराए सामान्य रिक्शा से लगभग ढाई गुना हैं क्योंकि अब जनता के पास कोई विकल्प नहीं है।
हम ओला, ऊबर, ई-रिक्शा की समस्याओं को लेकर सरकार के पास जाते हैं तो सरकार बताती है कि वह अभी प्रदूषण से निबटने में व्यस्त है। कोरोना के कारण मेट्रो और डीटीसी में कम लोगों को भेजा जाएगा ताकि सोशल डिस्टेन्स मेंटेन किया जा सके। पैट्रोल-डीजल की गाड़ियों पर ईवन-ऑड लागू होगा ताकि प्रदूषण कम हो। ओला-ऊबर में दो से अधिक सवारी नहीं बैठेगी ताकि कोरोना न फैले।
हम सरकार से पूछते हैं कि पूरी परिवहन व्यवस्था चरमरा रही है। सरकार बताती है कि यह सरासर आरोप है। परिवहन व्यवस्था चरमरा रही होती तो सरकार कैसे चलती?
हम अपनी शिकायतें और अपना-सा मुँह लिए खड़े रह जाते हैं और मन ही मन धन्यवाद देते हैं उन कंपनियों को जिन्होंने शिक़ायत करने के लिए कोई नम्बर ही जारी नहीं किया है।
✍️ चिराग़ जैन
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हम भारतीय लोग प्रवृत्ति से विश्वासजीवी हैं। विश्वास दो प्रकार का होता है, एक अटल विश्वास और दूसरा अटूट विश्वास। भाषा के बहुत गहरे विश्लेषण के हाथों मजबूर न हों तो इन दोनों का अर्थ एक ही है किन्तु फिर भी विश्वास दो प्रकार का होता है ऐसा हमारा विश्वास है।
जब हम किसी पर अटूट विश्वास करते हैं तो उसे तब तक अटूट बनाए रखते हैं जब तक वह टूट न जाए। एक बार टूट जाने के बाद हम फिर दोगुनी शक्ति लगाकर अटूट विश्वास करने लगते हैं।
नेता चुनाव में जो वायदे करते हैं, वे झूठे होते हैं -ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए प्रत्येक दल के वायदे सुनने के बाद सबसे बढ़िया झूठ बोलनेवाले नेता को अपना विश्वास मत देकर हम उसे सदन में भेज देते हैं। वह जीतते ही हमारे दुःख-दर्द को भूल चुका होगा- ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए हम उसके विपक्षी पर विश्वास करके उसके खि़लाफ़ नारे लगाने लगते हैं।
जो लोग सरकार के विरोधी हैं वे विपक्ष पर विश्वास करते हैं। जो लोग विपक्ष के विरोधी हैं वे सरकार पर विश्वास करते हैं। जो किसी के विरोधी नहीं हैं वे सब पर विश्वास करते हैं। और जो सबके विरोधी हैं वे ख़ुद पर विश्वास करते हैं।
मुहल्ले के कोई गुंडा भारतीय लोकतंत्र पर टिके हमारे विश्वास की हत्या करे तो हम पुलिस पर विश्वास कर बैठते हैं। जैसे ही हमें हमारी भूल का आभास होता है हम तुरंत अपने विश्वास की आरती का थाल लेकर न्यायालय में घुस जाते हैं। न्यायालय में जब विश्वास की लौ झपकने लगती है तो हम उसे संसद की ओट से बचाने की कोशिश करते हैं। जब संसद में भी विश्वासमत गिरने लगता है तो हम मीडिया के कैमरे के सामने विश्वास की गठरी खोल बैठते हैं। कैमरे के हाथ जब उल्टे हमारी ही गर्दन की ओर बढ़ने लगते हैं तो हम मुहल्ले के किसी गुंडे को लाख-दो लाख रुपये चढ़ाकर अपने विश्वास की रक्षा कर लेते हैं।
कल कुछ विश्वासी नागरिक बोल रहे थे कि सरकार ने सुशासन और सुविधाओं का पार्सल दिल्ली से रवाना किया है। अब समस्या यह है कि जिस ट्रेन से रवाना किया है वह लेट चल रही है।
हमने तार्किक उत्तर का विश्वास रखकर प्रश्न पूछ लिया- ‘पर भैया, जिस सरकार ने पार्सल भेजा है; ट्रेन भी तो उसी सरकार के आदेश पर चलती है।’
प्रश्न सुनते ही वे भड़क गए। बोले, ”तुम जैसे लोगों के कारण ही इस देश का सत्यानाश हुआ है। जब देखो सरकार को उंगली खोंचते रहते हो। और कुछ काम ही नहीं है। तुम साले पाकिस्तान के एजेंट हो। राष्ट्रद्रोही हो तुम। तुम ही सरकार को बदनाम करने के लिए ट्रेनवा लेट कराए हो। तुम्हें खटक रहा है कि कोई आदमी काम कैसे कर ले। तुम्हारी छाती पर तो साँप लोट रहे हैं।”
उनका यह रौद्र रूप देखकर हमें विश्वास हो गया कि सरकार ने सचमुच दिल्ली से पार्सल भेजा है जो एक न एक दिन गाँव तक ज़रूर पहुँचेगा, लेकिन मिलेगा उसी को जिसे सरकार पर अटूट और अटल दोनों तरह का विश्वास होगा।
© चिराग़ जैन
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नीरज जी ने जब भी नज़र उठा कर देखा तो उनकी अदा दिल पर छप गई। उन्होंने अपनी भारी आवाज़ में कुछ आदेश कर दिया तो लगा कि हम धन्य हो गए। नीली लुंगी और जेब वाली बनियान पहने जब वे लोगों को सम्मोहित करते दिखते थे तब महसूस होता था कि कोई फकीर अपनी अल्हड़ मस्ती में हम नए साधकों को चपत लगाते हुए कहा रहा है कि – ‘अरमानी के सूट पहनने से कुछ नहीं होगा बे, अरमानों को स्वर देना सीख!’
उनका पूरा जीवन एक ख़ालिस कवि का जीवन था। कोई बड़ा आदमी भी उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके प्रभाव में कपड़े बदलना ज़रूरी न समझा। अपने अंतर्नाद में वे इतने सहज हो गए थे कि मुख्यमंत्री से बात करते समय भी उनके स्वर का आरोह-अवरोह ठीक वैसा होता था जैसा शशांक से या चिराग़ से बात करते हुए होता था।
उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अपने भीतर के किशोर को कभी धीमा न पड़ने दिया। प्रशंसा और प्रसिद्धि की इतनी ऊँचाइयाँ देख चुके थे कि भय या लोभ उन्हें कुछ ओढ़कर जीने के लिए प्रेरित न कर सके।
उनके व्यवहार में साफ दिखता था कि वे हर मिलनेवाले पर अपनत्व का अधिकार अनुभूत करते थे। कार्यक्रम में पहुँचकर अपने स्वास्थ्य के अनुरूप अपने काव्यपाठ का क्रम तय करने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनका आदेश इतना अधिकारपूर्ण होता था कि उससे उत्पन्न होनेवाली तमाम व्यवहारिक चुनौतियाँ नगण्य लगती थीं।
उनके आदेश को टालना या उन्हें उसकी कठिनाई बताने का प्रयास असंभव था। मुझ जैसे नए कवियों के नाम याद न रहने पर जब वे शशांक भाई से ‘दिल्लीवाला लड़का’ कहकर मेरा ज़िक्र करते थे तो लगता था कि किस वटवृक्ष ने झुककर एक तिनके का माथा चूम लिया हो।
वे बहुत प्यारे थे। वे बहुत सच्चे थे। वे बहुत अच्छे थे। और सबसे अच्छा यह था कि वे अब तक हमारे साथ थे। उनकी उपस्थिति में काव्यपाठ करते समय ऐसा लगता था कि कविता उनके कानों में धुलकर निखार पा रही हैं और किसी पंक्ति पर वे वाह कर देते थे तो लगता था कि बस, क़िला फतह हो गया।
वे हमें बहुत उपलब्ध थे। इतने कि उन्हें सहेजने की बात याद ही न रही। पर अब वे पूरी तरह अनुपलब्ध हैं, अब हम उन्हें चाह कर भी सहेज नहीं सकते।
अलीगढ़ में अग्नि ने गीतों के विदेह देवता को आलिंगनबद्ध कर लिया है। आसमान बरसकर उनके इस अंतिम गीत को संगीत दे रहा है। तिरंगे ने अपनी संस्कृति के इस लाडले रचनाकार को भरे मन से विदा किया। और हम उनकी स्मृतियों में डूबते-उतराते उनके सैंकड़ों गीत गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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चारों वेद काव्यरूप हैं और इनमें श्रुतियों का संकलन है अतः यह माना जा सकता है कि वेद का प्रत्येक ऋषि वाचिक परम्परा का कवि रहा होगा। तथापि इन श्रुतियों के पाठ का कोई प्रामाणिक संदर्भ ज्ञात नहीं है।
महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंचवध की घटना से आहत होकर श्लोक उच्चारा था –
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।
यह श्लोक स्वरचित कविता के पाठ का प्रथम प्रामाणिक उदाहरण है। उत्तर रामायण में अयोध्या की राजसभा में लव-कुश द्वारा रामकथा का पाठ किया गया। इस घटना को भी काव्यपाठ का उदाहरण माना जा सकता है। यहाँ यह तथ्य विशेष ध्यातव्य है कि जब लव-कुश रामकथा सुनाते थे, तब वहाँ जन-सामान्य उपस्थित होता था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा गीता के अठारह अध्यायों का पाठ किया गया। यह भी काव्यपाठ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है।
इस्लाम पूर्व मक्का में उकाज नामक स्थान पर अरब के कवि एकत्रित होते थे। इस सम्मेलन में भाग लेनेवाले कवियों के बीच काव्य-प्रतियोगिता होती थी और विजेता की कविता को स्वर्णपत्र पर अंकित कर जिस दीवार पर लगाया जाता था उसे ही आज हम काबा कहते हैं। इस्लाम पूर्व काव्य ग्रन्थ सेररूल-ओकुल के नाम से आज भी प्रतिष्ठित है।
भक्तिकाल में संत कवियों का परस्पर सम्मिलन अंततः काव्य-गोष्ठी की शक्ल ले लेता था। सूरदास प्रतिदिन एक भजन रचकर आरती के समय उसका पाठ करते थे। कुम्भलदास, रैदास, मीराबाई जैसे कवियों की भेंट के वृत्तांत भक्तिकालीन साहित्य में भरे पड़े हैं। रीतिकाल भी राजाओं के मनोरंजनार्थ कवियों के काव्यपाठ की घटनाओं के प्रमाण प्रस्तुत करता है।
राजपूत राजाओं के महल में विधिवत कवि नियुक्त किये जाते थे, जो राजा के कार्यों का गुणगान तथा युद्धकाल में मनोबल वृद्धि हेतु कविताएँ लिखते थे और सभा में उनका पाठ करते थे। मुग़ल काल में उर्दू के शायरों की महफ़िल बादशाहों के दरबार में जमती थी। मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र ख़ुद एक बेहतरीन शायर थे, जो इस महफिलों में एक शायर की हैसियत से शिरक़त भी करते थे। मीर, ज़ौक़, ग़ालिब जैसे कितने ही नामचीन शायर इन मुशायरों की शान होते थे। उर्दू-मुशायरों का वर्तमान स्वरूप इन्हीं दरबारों से तैयार हो गया था, लेकिन हिंदी कवि सम्मेलनों ने जो शक़्ल आज अखि़्तयार की है उसकी मिट्टी बहुत बाद में गुंथनी शुरू हुई।
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के संयोजन में जो पहला कवि सम्मेलन हुआ, उसमें कुल 27 कवियों ने काव्यपाठ किया और उसके आयोजक थे- ‘सर जॉर्ज ग्रियर्सन’। उसके बाद साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलनों के आयोजन की परंपरा चल निकली। यहाँ तक कवि सम्मेलनों में अर्थ का संयोग नहीं हुआ था।
कविगण ससम्मान आमंत्रित किये जाते थे और बन्द मुट्ठी में जो पत्र-पुष्प आयोजक दे देता था, वह स्वीकार कर लेते थे। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, गिरिजाकुमार माथुर, वियोगी हरि, सोहनलाल द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रमई काका और हरिवंशराय बच्चन जैसी विभूतियाँ, इसी प्रकार कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ करती रहीं।
ऐसा मेरा अनुमान है कि किसी कार्यक्रम में आयोजक के द्वारा प्रदत्त इस मानदेय पर या तो कोई विवाद हुआ होगा अथवा आलोचना हुई होगी, जिसके बाद कवियों को बंद मुट्ठी में मानदेय दिए जाने की परंपरा निमंत्रण के समय सुनिश्चित किये जाने वाले मानदेय में परिवर्तित हो गई होगी। यद्यपि यह राशि भी नाममात्र की ही होती थी। इसी दौरान बच्चन जी ने मधुशाला लिखी। मधुशाला इतनी लोकप्रिय हो गई कि बच्चन जी प्रत्येक कवि सम्मेलन की आवश्यकता बन गए। एक बार बच्चन जी अस्वस्थ हुए तो उन्होंने आयोजक को सूचित किया कि स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वे कवि-सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो सकेंगे। आयोजक ने अपनी प्रतिष्ठा का वास्ता देते हुए बच्चन जी पर कार्यक्रम में उपस्थित होने का दबाव बनाया तो बच्चन जी ने अपनी मनमर्ज़ी के मानदेय पर उपस्थित होना स्वीकार कर लिया।
यहाँ से कवि सम्मेलनों में मानदेय की राशि आयोजकों की मर्ज़ी से कवियों के अधिकार क्षेत्र में आ गई। इसी दौर में दिल्ली में पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास जी ने लालकिला कवि सम्मेलन की स्थापना की। यह आयोजन देश भर में कवि-सम्मेलनों की प्रतिष्ठा वृद्धि का कारण बना। वर्ष भर लोग इसकी प्रतीक्षा करने लगे। व्यास जी चुन-चुन कर श्रेष्ठतम कवियों को इस मंच पर बुलाने लगे। इसकी ख्याति में चार चांद तब लगे जब देश के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन में मुख्य अतिथि बनकर आए। बड़े-बड़े राजनेता, बड़े-बड़े सितारे, उद्योग, समाजसेवा और शिक्षा जगत् की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इस आयोजन की दर्शक दीर्घा में दिखाई देने लगी।
लालकिला कवि सम्मेलन किसी भी कवि की प्रतिष्ठा का नियामक बन गया। शिवमंगल सिंह सुमन, देवराज दिनेश, भवानीप्रसाद मिश्र, रामवतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, माया गोविंद, रामदरश मिश्र, बालस्वरूप राही, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह निर्धन, कन्हैयालाल नन्दन, इंदिरा गौड़, बाबा नागार्जुन, मुकुट बिहारी सरोज जैसे रचनाकार लालकिले की शोभा के दैदीप्यमान नक्षत्र बन गए। किन्तु इस आयोजन का उत्तरदायित्व भी था, एक साहित्यिक संस्था के ही कंधों पर था। इसी दौरान श्री रामरिख मनहर ने कवि सम्मेलनों को मारवाड़ी सेठों के द्वार तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया।
अब कवि सम्मेलन में अर्थ का मार्ग खुल गया। इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली और वाराणसी की सीमाओं को तोड़कर कवि सम्मेलन राजस्थान, मुम्बई, कोलकाता और मद्रास (अब चेन्नई) तक भौगौलिक विस्तार पा गया। ज्यों ही साहित्यिक संस्थाओं से निकलकर कवि सम्मेलनों ने उन्मुक्त गगन में पंख पसारे ठीक उसी समय गोपालदास नीरज, बालकवि बैरागी और काका हाथरसी सरीखे लोकप्रिय कवि अस्तित्व में आए।
नीरज जी हिंदी कवि सम्मेलनों की जनप्रियता की आधारशिला बन गए। खरद की गुनगुनाहट में जब गीत लोकार्पित होता तो श्रोतादीर्घा सम्मोहित हो उठती। नीरज जी ने गीत को प्रेम के गुलाबी बगीचे से दर्शन के भव्य देवालय तक की यात्रा करवाई। नयन कोर पर अपनी पीड़ा का नीरानुवाद संजोकर लोग स्मित अधरों से नीरज को सुनते थे। उनकी सजीव आँखें और शरारती हँसी उनकी प्रस्तुति में मणिकांचन योग निर्मित करती थी।
नीरज के इस सम्मोहन में कवि सम्मेलनों का कारवां बहुत तेज़ी से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करता हुआ बढ़ने लगा। संभवतः नीरज जी पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के साथ-साथ अपनी अदाओं से भी लोगों के दिल पर राज किया। यह उनकी अदाओं का ही करिश्मा था कि यद्यपि उनके अधिकतर लोकप्रिय गीत दर्शन की धुरि पर केंद्रित थे, फिर भी उन्हें प्रेम और सौंदर्य के कवि के रूप में जाना गया।
‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है’; ‘अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए’; ‘आदमी को आदमी बनाने के लिए’ और ‘कारवां गुज़र गया’ जैसे गीतों की सरल शब्दावली और गूढ़ अर्थवत्ता ने गीत की धारा मोड़ दी। इस दौर में कविता साहित्यिक अभिरुचि से विहीन जन तक पहुँचने में क़ामयाब हुई।
यद्यपि वीर रस की भाषा अभी भी अपेक्षाकृत क्लिष्ट थी, लेकिन बालकवि बैरागी की कविता राष्ट्र पर मर मिटने के शौर्य के साथ-साथ जीवन की कठिन परिस्थितियों में स्वाभिमान के जीवट की वक़ालत करने लगी तो उसकी भावभूमि और भाषा स्वतः ही अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति से जुड़ती चली गई। शहीदों के प्रति करुणा और श्रद्धा उत्पन्न करती ओज कविता करुण रस, भक्ति रस, रौद्र रस और वीर रस का संगम स्थल बन गई।
लोगों का मन सीमा पर खड़े बेटों के प्रति वात्सल्य से भरने लगा। वीर रस की कविता शिराओं के रक्तप्रवाह को तीव्र करने के साथ-साथ आँखों को भी नम करने लगी। बैरागी जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि देश के बड़े कवि सम्मेलनों में बैरागी जी की उपस्थिति न हो तो श्रोता कार्यक्रम शुरू नहीं होने देते थे। इस दौर तक कवि सम्मेलन मंच पर गीत का बोलबाला था। जीवन दर्शन के गीत, प्रेम के गीत और सामरिक माहौल में ओज के गीत।
हास्यरस को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मंच पर जब हास्य का कवि काव्यपाठ करता था तो शेष कवि उसे अनदेखा करते थे। यद्यपि रमई काका जैसे कवियों ने जनता के तनाव को ठहाकों में बदलने की परंपरा को बख़ूबी निभाया, लेकिन हास्यरस को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसका वह हक़दार था। जनता हास्य पसंद तो करती थी, किन्तु मंच पर बैठे अन्य कवियों की भंगिमा को देखकर यह हास्यप्रेम जता नहीं पाती थी।
ऐसे समय में मंच पर काका हाथरसी का प्रवेश हुआ। उनकी प्रस्तुति से मंचासीन कवियों की त्यौरियाँ पिघलने लगीं और दर्शक दीर्घा की स्मित ने ठहाके का रूप ले लिया। यहाँ से कवि सम्मेलनों का रंग-रूप बदल गया। काका की लोकप्रियता का सूरज गाँव-खेड़ों से लेकर सात समुंदर पार तक दमकने लगा। व्यंग्य के कवियों ने अपनी रचनाओं में हास्य का अनुपात बढ़ा दिया। अब व्यंग्य, व्यंग्य न रहकर ‘हास्य-व्यंग्य’ बन गया। कवि-सम्मेलन भी कवि-सम्मेलन से ‘हास्य कवि-सम्मेलन’ बन गए।
कवि सम्मेलनों के बैनर पर ‘हास्य’ शब्द लगाना आवश्यक हो गया। मंच पर हास्य कवियों का अनुपात बढ़ने लगा। काका की कुंडलियों ने समाचार पत्रों में स्थान बना लिया। पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास और रामरिख मनहर जैसे मंच-संचालकों के संचालन में चुटीली टिप्पणियों, सहज जुमलों, व्यंग्योक्तियों और चुटकुलों ने जगह बनानी शुरू की।
नीरज, बैरागी और काका ने हिंदी कवि सम्मेलनों का चेहरा आमूल-चूल बदल दिया। बदलती तकनीक के साथ बनती बिगड़ती परंपराओं की कहानी अगली कड़ी में…
✍️ चिराग़ जैन
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कवि सम्मेलनों का सफ़र सौ साल पूर्ण करने के पड़ाव पर है। अक्टूबर 1920 में श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की अध्यक्षता और श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी के संयोजन में हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान श्री जॉर्ज ग्रियर्सन जी के निवास पर कुल 27 कवियों का कवि सम्मेलन हुआ जिसे कवि सम्मेलन का पहला क़दम माना जा सकता है। तब से अब तक यह परंपरा अनवरत चल रही है। स्वाधीनता संग्राम, चीन युद्ध, पाक युद्ध, आपातकाल, कारगिल युद्ध और तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में कवि सम्मेलनों ने जन भावना को बौद्धिक ख़ुराक़ उपलब्ध कराई है। कवि सम्मेलनों की इस क्षमता के कारण ही पत्रकारिता के विद्वानों ने इस माध्यम को “लोक परंपरागत जनसंचार माध्यम” के रूप में स्वीकार किया है। देश भर में मनोरंजन तथा बैद्धिक विमर्श को समानांतर रूप से साधने वाली यह कला परिवर्तित होती सामाजिक परिस्थितियों तथा जनता की मानसिक परिस्थितियों के अनुरूप सम्प्रेषण की भाषा व विधा का निर्धारण करती रही है। यही लचीलापन इस कला की सम्प्रेषणीयता को अक्षुण्ण बनाए हुए है। इस प्रभावी सम्प्रेषण माध्यम के अनेक महत्वपूर्ण स्तम्भ 9-10 जुलाई को हरिद्वार में एकत्रित हुए तथा उन्होंने कला के इस भवन के वैभव व गरिमा की वृद्धि की दिशा में विचार विनिमय किया। कवि सम्मेलन समिति के इस अधिवेशन में अपनी क्षमताओं की सीमा के साथ मैंने भी गिलहरी जैसा योगदान दिया, इस हेतु मन संतुष्टि के भाव से आनंदित है।
✍️ चिराग़ जैन
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“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं। पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती। .
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है। चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है! ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है।
अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया। “मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है। इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन