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सागर मंथन

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान से क्यों हैं ….क्योंकि आप दिल्ली में है। जिया जले, जान जले रात भर धुआँ चले …क्योंकि आप दिल्ली में हैं। सागर मंथन से हलाहल उत्सर्जन की घटना प्रोडक्शन एक्सट्रेक्ट के प्रदूषण का सृष्टि का पहला उदाहरण है। यह साफ़ है कि जब भी प्रकृति का दोहन किया जाएगा, तब-तब प्रदूषण चरम पर जाएगा। इससे जीवन जीना कठिन हो रहा है। सतयुग में शिव ने कालकूट पी लिया था। उन्होंने विष को ग्रहण तो किया लेकिन वह विष उनके गले से नीचे नहीं उतरा।
हमारी स्थिति सतयुग से थोड़ी भिन्न है। हमें कालकूट पीना भी है और राजनेताओं की ढोंगी चिंता को गले से नीचे भी उतारना है। राजनीति चिंतित है। यह प्रदूषण पराली के कारण है या दीवाली के कारण; यह भाजपा के कारण है या आम आदमी पार्टी के कारण; यह केंद्र सरकार के कारण है या दिल्ली सरकार के कारण; अगले चुनाव में इसका लाभ अरविंद केजरीवाल को मिलेगा या मनोज तिवारी को -इन महत्वपूर्ण प्रश्नों को सुलझाना सरकार का पहला दायित्व है।
जनता मुँह पर मास्क पहनकर घूम रही है। मास्क बनानेवाली कम्पनियाँ कह सकती हैं कि जिस सागर मंथन से दिल्लीवालों को कालकूट मिला है, उसी सागर मंथन से मास्क मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियों को लक्ष्मी मिली है। धन्वंतरि जी भी इन दिनों खूब चांदी काट रहे हैं। दिल्ली सरकार के ऑड-ईवन फॉर्मूले से ओला-ऊबर को कल्पवृक्ष मिल गया है। कामधेनु भाजपा ले उड़ी है। हाथी पर मायावती का पेटेंट है। घोड़े, रंभा, कौस्तुभमणि और वारुणी के लिए राजनैतिक दल चुनाव लड़ रहे हैं। शारंग आउटडेटेड हो गया है क्योंकि हमने विदेशों से शस्त्र ख़रीदने की कला सीख ली है। जो भी पाञ्चजन्य फूंकता है उसे ध्वनि प्रदूषण फैलाने के जुर्म में पुलिस पकड़ रही है। गंधर्वों के गले चोक हो गए हैं। जनता अमृत मिलने के आश्वासन पर ख़ुशी-ख़ुशी विषपान कर रही है।
दिल्लीवाले बड़े सख़्तजान हैं। जिनको राजनैतिक और सामाजिक प्रदूषण प्रभावित न कर पाया, उन्हें ये धुँए की चादर क्या हिला पाएगी। किसी दिन कोई राजनेता ढिठाई से कह देगा कि दिल्ली गैस चेम्बर बन गई है, तो इसमें बुरा क्या है? लोग चिल्लाते रहते हैं कि गैस महंगी हो रही है। हमने दिल्लीवालों को इस महंगाई से मुक्ति दिला दी है। गैस के लिए अपनी गाड़ी कमाई मत ख़र्चाे, हवा में पाइप लगाओ और मस्ती से खाना पकाओ।
मीडिया किसी इवेंट की तरह इस स्थिति की रिपोर्टिंग कर रही है। सिस्टम और राजनेता, मीडिया को उसी स्टाइल में बयान दे रहे हैं जैसे प्याज़ के दाम बढ़ने पर देते हैं। मीडिया, सिस्टम और सरकारें तत्वज्ञान प्राप्त कर चुके हैं कि जो लोग इस धुँए से बच सकते हैं, वे अगला मुद्दा आते ही इस मुद्दे को भूल जाएंगे; और जो इस धुँए से मर जाएंगे, वे सवाल पूछने नहीं आएंगे। कुछ दिनों में यह धुआँ भी धुआँ हो जाएगा। …सब धुआँ हो जाएगा, एक वाक़या रह जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

एलियन का यात्रा वृत्तांत

पृथ्वी पर बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं। जिन पर इंसानों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को वे गाँव, क़स्बा, शहर, देश और दुनिया कहते हैं, जहाँ दो पैरों से चलनेवाले विचित्र प्राणियों के झुंड रहते हैं। झुंड का प्रत्येक सदस्य एक ऐसे झुंड में रहना चाहता है, जिसमें केवल उसकी बात मानी जाए और केवल उसकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
पृथ्वीवासी युगों-युगों से इन झुंडों में एक अदद इंसान तलाश रहे हैं। लेकिन आज तक किसी को कहीं कोई इंसान मिला ही नहीं, क्योंकि जब कोई पृथ्वीवासी ‘इंसान’ तलाशने निकलता है, तब केवल उतनी ही देर के लिए वह ख़ुद भी इंसान बन जाता है, और उस वक़्त के गुज़रते ही वह वापस अपने वर्चस्व वाला झुंड बनाने के लिए किसी झुंड में खो जाता है।
पृथ्वी के दो छोर हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों पर प्रकृति ने जीवन जीने योग्य स्थितियाँ नहीं बनाईं, और बाक़ी पृथ्वी को इंसानों ने जीवन जीने लायक नहीं छोड़ा। प्रकृति ने नदियाँ बनाई थीं, लेकिन मनुष्य ने नदियों से जीवन लेते-लेते, नदियों का जीवन ले लिया। पर्यावरण की चिंता और ईश्वर का भय; ये दोनों ही प्रत्येक मनुष्य ने अपने अतिरिक्त सबके लिए आवश्यक बना रखे हैं। चूँकि मनुष्य की आँखें अपने गिरेबान में नहीं झाँक सकतीं, इसलिए एयरकंडीशन कमरे में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर बात करने में कोई नैतिक संकट उत्पन्न नहीं होता।
हर झुंड के अपने कुछ नियम हैं, इन नियमों को बनाने का काम ‘सरकार’ का होता है। सरकार उन लोगों का समूह है जो अपनी बातों से ज़मीन पर रेंगते लोगों को आसमान के ख़्वाब दिखा सकें। सपने इतने सच्चे लगने चाहियें कि रेंगनेवालों को अपने कुचले जाने का पता न चल सके। सरकार बनाने के लिए हर झुंड में एक प्रतियोगिता होती है, जिसे ‘चुनाव’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता में जो सबसे ज़्यादा झूठा, ढीठ, ढोंगी और बेशर्म साबित होता है उसे विजेता मान लिया जाता है। अपने कार्यकाल में जब ये विजेता लोग जनता को गिड़गिड़ाने और गाली देने तक विवश कर देते हैं तब अगली प्रतियोगिता में अन्य प्रतियोगियों के जीतने की संभावना बनती है। इससे प्रतियोगिता में रोचकता बनी रहती है। प्रतियोगिता के विजेता अन्य झुंडों के विजेताओं से मिलने-जुलने और लड़ने-भिड़ने में समय व्यतीत करते हैं। इन खर्चों को पूरा करने के लिए झुंड के बाक़ी लोग दिन-रात कठोर परिश्रम करके धन की व्यवस्था करते हैं। हर सरकार अपने झुंड के लोगों को बताती है कि उनके झुंड की दूसरे झुंडों के बीच इज़्ज़त बढ़ रही है। ऐसा सुनकर झुंड के लोग नाचने लगते हैं और सरकार के ख़र्चे उठाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।
पृथ्वी का मनुष्य भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है, किन्तु दूसरों के जीवन में ताका-झाँकी किये बिना नहीं जी सकता। किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसकी किससे दोस्ती है, किसकी किससे दुश्मनी है, कौन क्या खाकर सोया है, कौन भूखा सोया है… इस प्रकार के लाखों प्रश्न जीवनयापन का कच्चा माल हैं। मनुष्य बड़ी लगन से इन प्रश्नों को जन्म देता है, फिर दिन-रात श्रम करके इनके उत्तर या तो खोज लेता है, या फिर गढ़ लेता है। उत्तर मिलते ही उन्हें लेकर वह दूसरे मनुष्य को पहले मनुष्य की समस्या और अपनी ज्ञानवत्ता से अवगत कराता है। इस प्रक्रिया में जो चर्चा होती है, वही चर्चा मानव जीवन का परम सुख है। सुख के उन्माद में यह चर्चा धीरे-धीरे झूठ और चरित्र-हत्या के हथियारों का पुलिंदा बनकर उस मनुष्य तक पहुँच जाती है जिसके विषय में चर्चा की जा रही थी। अब वह मनुष्य सक्रिय होता है और चर्चा का पीछा करते हुए चर्चा के जनक को तलाशने लगता हैं। चर्चा आगे बढ़ती जाती है और उसका नायक उसके सूत्रों में उलझकर पीछे होने लगता है। अंततः एक दिन वह जनक को तलाश लेता है और फिर कहासुनी, तू-तू-मैं-मैं, गाली-गलौज, झगड़ा, हाथापाई, मारपीट, भिड़ंत, मुठभेड़ और युद्ध तक कुछ भी हो सकता है। इस घटना के अंत में भी विजेता को धर्मात्मा और पराजित को अधर्मी मान लिया जाता है। फिर इस घटना की चर्चा चलती है। फिर युद्ध, फिर चर्चा, फिर युद्ध…. बस इसी तरह यह संसार-चक्र चलता रहता है।

✍️ चिराग़ जैन

शब्द नहीं चुके, हम चूके हैं

हिंदी की वर्तनी में कई बार हम ऐसी चूक कर देते हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लापरवाही के कारण कोई-कोई भूल परंपरा भी बन जाती है और फिर शब्दकोष पलटने के आलस्य के कारण समाचार पत्रों में विद्यमान “विद्वान” उसे प्रचलित प्रयोग का नाम देकर स्वीकार्य मान लेते हैं। उसके बाद कर्मठ सरकारी कर्मचारियों की कृपा से सरकारी दस्तावेज़ और सार्वजनिक सूचना पट्ट तक इस संक्रमण के प्रभाव में आ जाते हैं। आज मैं कुछ ऐसे ही “प्रचलित प्रयोगों” की वास्तविकता का स्मरण करूँगा।

(1)
अंतरराष्ट्रीय = अंतर + राष्ट्रीय = INTERnational (involving two or more countries)
अन्तर्राष्ट्रीय = अंतः + राष्ट्रीय = INTRA-national (within one nation)

(2)
ग्रह, गृह, ग्रहण, गृहिणी
ग् + र + ह = ग्रह = बुध, शुक्र, मंगल आदि आकाशस्थ पिण्ड
ग् + ऋ + ह = गृह = घर
ठीक यही चूक हम ग्रहण और गृहिणी की वर्तनी में भी करते हैं।
ग्रहण शब्द का अर्थ “पकड़ने की क्रिया” से जुड़ा है। अंग्रेजी में इसको Assumption और Eclipse के रूप में समझा जा सकता है। गृहिणी का अर्थ है “घर की स्वामिनी”। अंग्रेजी में इसे Mistress या Housewife कहते हैं।

सूर्य पर ग्रहण लगता है तो गृहिणियाँ पूजन-पाठ करने लगती हैं। पाणिग्रहण के बाद कन्या गृहिणी बन गई। कुण्डली में द्वादश गृह (घर) और नव ग्रह होते हैं।

(3)
‘न’ और ‘ना’
ये दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं किन्तु अर्थ की दृष्टि से लगभग विलोम हैं।
“न” निषेधात्मक अर्थ देता है और सामान्यतया वाक्य के अंत में नहीं आता। जैसे – “न जाइये”, “आप न कर सकेंगे”, “अब न रहे” इत्यादि।
“ना” अनुरोधात्मक होता है और वाक्य के अंत में ही आता है।
यथा, “जाइये ना!”; “सुधारिये ना!”;
“न जाइये ना!” -इस वाक्य में यदि “ना” न लगता तो यह आदेशात्मक वाक्य होता किन्तु “ना” ने इसे अनुरोधात्मक बना दिया। है ना!

(4)
जूठा और झूठा
जूठा (जूठन) = खाने-पीने से बचा हुआ।
झूठा = असत्य बोलने वाला।
बोली में झूठ और थाली में जूठ बुरी होती है।

(5)
कई बार अच्छी हिंदी लिखने के चक्कर में हम हास्यास्पद हो जाते हैं। विवाह का निमंत्रण देते समय घर के मुखिया का नाम लिखकर साथ में ‘सपरिवार’ लिखा जाता है। यहाँ तक ठीक है।
सपरिवार = परिवार सहित
किन्तु आजकल कुछ लोगों ने कुछ अलग करने के चक्कर में “सहपरिवार” लिखना शुरू कर दिया है। इस सहपरिवार को सहन करना बहुत मुश्किल है। कुछ लोग इससे भी आगे बढ़कर ज़्यादा ज़ोर डालने के लिए “सपरिवार सहित” लिखने लगे हैं। उपसर्ग लगाने के बाद अलग से सहित लिखकर आप हिंदी का अहित कर रहे हैं।
‘स’ उपसर्ग लगाने से शब्द में सहित का अर्थ सम्मिलित हो जाता है, अलग से भाव स्पष्ट करके सामने वाले की अर्थग्राह्यता पर प्रश्नचिन्ह न लगाएँ।

(6)
“फ” और “फ़” में हम अक्सर भूल करते हैं। फ = PH फ़ = F देवनागरी की मूल वर्णमाला में “F” की ध्वनि के लिए कोई वर्ण नहीं है, किन्तु फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्दों का जब हमारी शब्दावली में सम्मिलन हुआ तो इस ध्वनि की आवश्यकता पड़ी। इसलिए “फ़” चिन्ह को इस ध्वनि के लिए सुनिश्चित किया गया। अब हम लगभग एक जैसा चिन्ह देखकर भ्रमित हो जाते हैं और फिर (PHIR) को फ़िर (FIR) बोलते फिरते हैं। यही चूक हम अन्य शब्दों में भी करते हैं। लिखते हैं फोन (PHONE) और बोलते हैं फ़ोन (FONE) थोड़ा ध्यान रखें, आगे से ये हेराफेरी करने से बचें।

(7)
नमस्कार! यह शब्द ‘नमस्कार’ मूलतः संस्कृत का शब्द है। इसमें नमः + कार होने से विसर्ग संधि के नियमानुसार नमस्कार बनता है। ठीक वैसे ही ज्यों नमः + ते = नमस्ते हो जाता है। “नमस्ते” का सौभाग्य यह है कि उसे सब लोग “नमस्ते” ही बोलते हैं, किन्तु ‘नमस्कार’ बेचारा ‘नमश्कार’ बोला जाने लगा। सज्जनो! हमने इस नमश्कार से बहुत से अभिवादन दूषित किए हैं। कृपया आज से अपने “नमस्कार” को सुधार लें।

(8)
राज़ की बात यह है कि राज किसी का भी हमेशा नहीं रहता
राज (हिंदी) = शासन = Rule
राज़ (उर्दू) = रहस्य = Secret

(9)
गढ़ना और गड़ना
स्वर्णकार ने ख़ूबसूरत आभूषण “गढ़े” और उन्हें चोरों से बचाने के लिए ज़मीन में “गाड़” दिया।
नोट : गढ़ का एक अर्थ दुर्ग भी होता है।

(10)
ड़ और ड चिह्न का आकार तथा उच्चारण ध्वनि के कारण ‘ड’ और ‘ड़’ में लोग चूक करते हैं। जबकि इनका बिल्कुल सही प्रयोग करना बेहद आसान है। इसके लिए निम्न बिंदुओं का ध्यान रखना होगा :- .
1) ‘ड़’ कभी भी शब्द के प्रारंभ में नहीं आ सकता। इसलिये यदि यह शब्द के प्रारंभ में है तो निश्चित रूप से ‘ड’ ही होगा। जैसे डगर, डायन, डेरा, डाकिया।
2) हिंदी के शब्द के बीच में या अंत में सामान्यतया ‘ड़’ ही होगा। जैसे कड़क, धड़कन, भाड़, झाड़ी, ताड़ना।

अपवाद : 1) संयुक्ताक्षर या अर्द्धाक्षर के साथ कभी भी ‘ड़’ नहीं लगेगा। चाहे वह शब्द के बीच में या अंत में ही क्यों न हो। जैसे काण्ड, आडम्बर, ठण्ड, हाण्डी, खड्डा, गड्ढा, गुड्डा।
2) अंग्रेजी की वर्णमाला में ‘ड़’ के लिए कोई चिन्ह ही नहीं है। अतः इस भाषा से हिंदी में आए शब्दों में ‘ड़’ की ध्वनि की संभावना ही नहीं है। सो, अंग्रेजी के शब्दों में हमेशा ‘ड’ ही प्रयुक्त होगा। जैसे :- गुड, लीडर, राडार।
3) ‘ड’ से प्रारम्भ होने वाले किसी शब्द से पूर्व यदि उपसर्ग, संधि अथवा समास के कारण कोई अक्षर या शब्द जुड़ता है तो उसमें मूल शब्द का सिद्धांत ही बना रहता है। जैसे ‘निडर’ शब्द में डर से पहले नि उपसर्ग जुड़ने के कारण ‘ड’ बीच में आ गया है, लेकिन इसमें ‘ड’ ही बना रहेगा। उसे बदलकर ‘निड़र’ नहीं किया जाएगा।
नोट : ये सभी नियम ‘ढ’ तथा ‘ढ़’ के प्रयोग में भी समान रूप से लागू होते हैं।

(11)
हँसी और हसीं
हँसी = खिलखिलाहट
हसीं = हसीन, ख़ूबसूरत
उर्दू में जो शब्द ‘न’ पर समाप्त होते हैं उनमें ‘न’ को अनुस्वार से रूपांतरित करने की परंपरा है। (संस्कृत में भी ‘म्’ पर समाप्त होने वाले शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है जैसे ‘देवम्’ को ‘देवं’ लिखा जा सकता है।) ‘हसीन’ का ‘हसीं’; ‘आसमान’ को ‘आसमां’; ‘जुनून’ को ‘जुनूं’ इसी नियम के तहत लिखा जाता है। इसलिए जब किसी की ख़ूबसूरती की बात करनी हो तो उसे ‘हसीं’ कहना, वरना लोग आपकी ‘हँसी’ उड़ाएंगे।

(12)
कृपा और कृपया
1) ‘कृपया’ शब्द में आधा प प्रयोग करके ‘कृप्या’ लिखने से कृपा रुक जाती है।
2) एक वाक्य में एक बार से अधिक कृपा मांगी जाए तो भद्दा लगता है। इसलिए यदि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ प्रयोग किया गया है तो उसमें दोबारा कृपा करने के लिए न कहें। नीचे कुछ उदाहरण देखें :-
“कृपया अपनी थाली स्वयं उठाएँ!” – यद्यपि इस वाक्य में आदेश दिया गया है किन्तु ‘कृपया’ लगने से यह अनुरोधात्मक बन गया है। यदि हम यह लिखें कि ‘अपनी थाली स्वयं उठाने की कृपा करें।’ तो भी इसका स्वरूप समान रहेगा। चूँकि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ लगाने से ‘कृपापूर्वक’ का आशय प्राप्त होता है, इसलिए पुनः ‘कृपा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
सामान्यतया कार्यालयी पत्र व्यवहार में अधिकारी को लिखे गए पत्रों में यह चूक अधिक दिखाई देती है। यथा, ‘कृपया दो दिन का अवकाश देने की कृपा करें।’ या ‘कृपया मुझे स्टेशन छोड़ने की अनुमति दें, आपकी अति कृपा होगी।’ – इन वाक्यों में अनुरोध गिड़गिड़ाहट से भी ज़्यादा लिजलिजा हो जाता है।

(13)
कार्यवाही (हिंदी) = Proceedings
कार्रवाई (फ़ारसी)= Action
अदालत में कार्यवाही के दौरान पूछा गया कि शिक़ायत मिलने पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की। .
किसी समाधान तक पहुँचने के लिए सभा आदि में चलने वाली प्रक्रिया को कार्यवाही कहते हैं। किसी कार्यवाही से प्राप्त आदेशों के आधार पर समस्या का समाधान करने हेतु किया जाने वाला कार्य कार्रवाई कहलाता है।

(14)
रु और रू
अन्य किसी भी वर्ण पर ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ की मात्रा लगाने में हम चूक नहीं करते किन्तु ‘र’ के साथ अक़्सर यह लापरवाही हो जाती है। थोड़ा ध्यान से देखें। इन दोनों पर लगने वाली मात्रा का आकार भिन्न है। याद करें कि आप र वर्ण पर उ/ऊ की मात्रा लगाते समय लघु अथवा दीर्घ का अंतर करते हैं या नहीं। ‘रुक’ कर सोचें, नहीं तो शब्द ‘रूठ’ जाएंगे।

(15)
जगत् और जगत
जगत् = संसार, दुनिया, शिव
जगत = कुएँ की मेढ़, कुएँ के चारों ओर का चबूतरा
‘जगत्’ संस्कृत का शब्द है और ‘जगत’ हिंदी का। हम सामान्यतया हिंदी में ‘जगत’ लिखकर समझ लेते हैं कि हमने सारा संसार लिख दिया, लेकिन वास्तव में हम तब अपनी दुनिया को कुएँ तक सीमित कर रहे होते हैं।

(16)
जब हम किसी शब्द को संबोधन के लिए प्रयोग करते हैं तो उसमें बहुवचन होने पर भी अनुस्वार नहीं लगता। जैसे :-
बच्चो! स्कूल जाओ।
मित्रो! एक-दूसरे का सहयोग करो।
भाइयो और बहनो! देश का विकास करो।
दिल्लीवालो! दिल्ली को साफ़ रखो।

ये ही शब्द जब संबोधन से इतर कहीं प्रयुक्त हों तो इनमें अनुस्वार लगेगा। जैसे :-
बच्चों ने पाठ पढ़ा।
मित्रों के साथ आनंद आया।
भाइयों की सहायता करो।
बहनों ने अपने-अपने भाइयों को राखी बांधी।
दिल्लीवालों की बात ही कुछ और है।

बच्चो! अपने मित्रों की सहायता करो।
भाइयो और बहनो! मैं सभी दिल्लीवालों को आश्वस्त करता हूँ कि उनके बच्चों के स्कूलों के हालात सुधरेंगे।

(17)
दिया और दीया
दिया : यह एक सकर्मक क्रिया है जो कुछ देने के अर्थ में प्रयोग की जाती है। किसी कार्य के सम्पन्न कर देने के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।
दीया : दीपक
गृहिणी ने आँगन में ‘दीया’ रख ‘दिया’। ईश्वर ने सबको उसकी क्षमता के अनुसार दुःख ‘दिया’ है।

(18)
दादा और दद्दा
दादा (हिंदी) : पितामह (पिता का पिता)
दद्दा (बांग्ला) : अग्रज (बड़ा भाई) .
कला के क्षेत्र में जब कोई कनिष्ठ कलाकार किसी वरिष्ठ से मिलता है तो सामान्यतया ‘दद्दा’ कहकर संबोधित करता है। यह चलन तब से चला जब कला की गलियों में बंगाली लोगों का वर्चस्व हुआ। ‘दद्दा’ संबोधन ऐसे ही है जैसे हम सामान्य व्यवहार में किसी को भाईसाहब कहते हैं। कुछ लोग अनजाने में ‘दादा’ कह बैठते हैं। जब अपनी आयु से छह-सात वर्ष अधिक के व्यक्ति को कोई ‘दादा’ कहता है तो हास्यास्पद लगता है।

(19)
अर्थी और अरथी
अर्थी : अपेक्षा रखने वाला
अरथी : बाँस और फूस से तैयार वाहन, जिस पर बांधकर शव को मरघट ले जाया जाता है।
आजकल विद्यार्थी (विद्या+अर्थी) ही विद्या की अरथी निकालने पर तुले हैं।

(20)
कढ़ाई, कड़ाही और कड़ाई
कढ़ाई : क़सीदे निकालने का काम
कड़ाही : एक चौड़ा पात्र जो आँच पर रखकर पकाने के काम आता है
कड़ाई : सख़्ती
इन तीनों शब्दों का उच्चारण बहुत निकट का है अतः इनमें हम अक्सर चूक कर देते हैं। बस, ज़रा सी सावधानी से इस चूक से बचा जा सकता है। लड़की कढ़ाई करके सपनों का नाम लिखती है, लेकिन सौतेली माँ कड़ाई करती है कि लड़कियों को चूल्हे-चौके में ही ध्यान लगाना चाहिए। बेचारी लड़की, चुपचाप अपने सपनों को कड़ाही के नीचे भभकती आग में झोंक देती है।

(21)
‘र’ अक्षर पैरों में पड़ा हो तो पूरा होता है और सिर पर चढ़ जाए तो आधा हो जाता है। ‘कर्म’ में ‘र’ आधा है, जबकि ‘क्रम’ में ‘र’ पूरा है। जिसके सिर पर चढ़ता है उससे पहले बोलता है और जिसके पैरों में पड़ता है उसके बाद बोलता है। इस सिद्धांत को आप ध्यान रखेंगे तो कभी भी ‘आशीर्वाद’ लिखने में चूक नहीं होगी।

(22)
अनुस्वार (ं)
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म

इन पाँच वर्गों में क्रमशः ङ, ञ, ण, न और म पंचम अक्षर हैं
1) पंचमाक्षर के बाद यदि उसी वर्ग का कोई व्यंजन हो तो वहाँ ‘हिंदी’ में अनुस्वार से रूपांतरित किया जा सकता है। जैसे दण्ड में ड से पूर्व ण् की ध्वनि है इसलिए इसको ‘दंड’ लिखा जा सकता है। इसी प्रकार चंचल, चंद्रमा, झंझा, पंथ, गंगा, कंपन आदि भी हिंदी में मान्य हैं। किन्तु संस्कृत लिखते समय पञ्चमाक्षर को अनुस्वार रूप में लिखना मान्य नहीं है।
2) पंचमाक्षर के उपरांत यदि किसी अन्य वर्ग का व्यंजन हो तो अनिवार्य रूप से पंचमाक्षर ही लिखना होगा। जैसे : अन्य, उन्मत्त, उन्मुख। यहाँ अनुस्वार से रूपांतरण मान्य नहीं होगा।
3) यदि कहीं पर पंचमाक्षर की पुनरावृत्ति हो तो भी अनुस्वार से रूपांतरण नहीं होगा। जैसे : विभिन्न, सम्मोहन, सम्मत, सम्मान।
4) संस्कृत के शब्दों में यदि अंत में अनुस्वार है तो वह ‘म्’ का द्योतक है। यथा : अहं (अहम्), एवं (एवम्)।

अनुनासिकता चिह्‍न / चंद्रबिंदु (ँ) चंद्रबिंदु वर्ण नहीं है। यह स्वर का नासिक्य विकार है। इसमें स्वरों के उच्चारण में नाक से भी व्युस्राव होता है। जैसे : गाँठ, पराँठा, जहाँ, हँसना, गाँव, गँवार। सामान्यतया, इस ध्वनि के लिए चंद्रबिंदु लगाने का ही प्रावधान है किंतु जहाँ पर शिरोरेखा से ऊपर मात्रा लगती हो वहाँ यदि अनुनासिक ध्वनि है तो मुद्रण की भ्रांति से बचने के लिए चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदी (अनुस्वार) लगाया जाता है, जैसे : नहीं, में, भैंस, मैं आदि।

विशेष : मात्रा गणना के समय अनुस्वार की मात्रा गिनी जाती है किंतु अनुनासिकता की मात्रा नहीं गिनी जाती। कंठ 2 l संतान 2 2 l चंचल 2 l l हंस 2 l हँस l l चँवर l l l धँसी l 2

(23)
आकलन
आकलन हिंदी भाषा का शब्द है, जिसे सामान्यतया पूर्वानुमान द्वारा गणना करने के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। कुछ जगह लोग इसको आंकलन लिखने लगे हैं। किन्तु इस शब्द में अनुस्वार या चंद्रबिंदु नहीं लगता। अंक से बनने वाला शब्द आँकड़ा उन्हें भ्रमित करता होगा किन्तु हर आकलन का संबंध आँकड़ों से नहीं होता।

(24)
सफल और विफल
सफल = स + फल (फल से युक्त) विफल = वि + फल (फल से रहित) ‘सफल’ में फल ‘धातु’ पर ‘स’ उपसर्ग लगा हुआ है। जो लोग इसका विलोम ‘असफल’ लिखते या बोलते हैं वे एक ही धातु पर दो उपसर्ग जड़ देते हैं। सफल का विलोम विफल होता है।

(25)
उद् + ज्वल् + अच् = उज्ज्वल
प्र + ज्वल् + अच् = प्रज्वल
इन शब्दों में किसी भी तरह ‘ज्वल’ को ‘जवल’ बना देने की नौबत नहीं आती। इसलिए जो संधि करनी हो, वह ‘ज्वल’ से पहले ही कर लें। भविष्य में अपने कार्यक्रमों में दीप ‘प्रज्वलन’ ही करवाएँ ताकि कार्यक्रम का भविष्य ‘उज्ज्वल’ हो सके।

(26)
दुनिया
‘दुनिया’ की हालत हमने पहले ही बहुत ख़राब कर रखी है। इसे ‘दुनियां’ लिखकर कृपया इसे और बर्बाद न करें।

(27)
बदतमीज़
बदतमीज़ शब्द हमने बचपन से सुना है। इतना सुना है कि इसे कभी लिखकर देखने की ज़रूरत नहीं समझी, और श्रुत परम्परा से इसे ‘बत्तमीज़’ बोलते रहे हैं। जब आप स्वयं को सभ्य भी बनाए रखना चाहें और गाली बकने का भी मन हो तब यह शब्द बहुत काम आता है। इसे मुस्कुराते हुए बोला जाए तो यह लाड़ की प्रतिध्वनि तक दे देता है। इतने काम के शब्द के साथ बदतमीज़ी की जाए, यह अच्छी बात नहीं है।

(28)
ख़ुदकशी = आत्महत्या
यह शब्द सामान्यतया ग़लत बोला जाता है। कुछ लोग इसे खुदखुशी बोलते हैं तो कुछ खुदकुशी। जबकि इसका अर्थ है ख़ुद को नष्ट कर लेना। ख़ुद के प्राण खींच लेना।

(29)
स्वागतम् = सु + आगतम्
स्वागतम् में अलग से सु जोड़कर सुस्वागतम् लिखना ऐसे ही है जैसे किसी ने पगड़ी के ऊपर मुकुट लगा लिया हो।

(30)
बंद : (फ़ारसी) रुका हुआ, छंद, क़ैद, अवरुद्ध
बंध : (संस्कृत) बन्धन, गाँठ, बांधने की वस्तु
इन दोनों शब्दों की प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए इनके प्रयोग में छोटी सी चूक होती है। कुछ उदाहरण देखें : मेरे गीत में तीन बंद हैं। समान तो बंध गया लेकिन रास्ता बंद है। शादी की गाँठ बंध जाए तो तो बंदे का दोस्तों से मिलना बंद हो जाता है।

(31)
कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके बहुवचन बनाने की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन हम अनजाने में बहुधा ऐसा करते हैं। जैसे, ‘अनेक’ स्वयं में बहुवचन है, इसे अनेकों करके कोई लाभ नहीं है। अंग्रेजी का ‘लेडीज़’ तो इस पीड़ा से सर्वाधिक पीड़ित है। ‘एक लेडीज़ आई’ और ‘लेडीज़ों में न बैठें’ जैसे वाक्य बहुत अखरते हैं।

(32)
शल्वार = पैरों में पहनने का ढीला परिधान
शल्वार फ़ारसी भाषा का शब्द है। अनेक लोग इसे ‘सलवार’ लिखते-बोलते हैं। यह सामान्य प्रचलन में है किंतु सही शब्द ‘शल्वार’ ही है।

(33)
सर (संस्कृत) : जलाशय, तालाब, झील
सर (फ़ारसी) : सिर, सिरा
सर (अंग्रेजी) : एक संबोधन जो सम्मानित पुरुष के लिए प्रयुक्त होता है।
सिर (हिंदी) : कपाल, खोपड़ी, सिरा, चोटी, ऊपर का छोर
संस्कृत के ‘शिर’ को हिंदी में ‘सिर’ कहा गया। इसीलिए हिंदी में भी सिर पर पहनने के आभूषण को ‘शिरफूल’ कहा जाता है। हिंदी में पहुँच कर भी इस शब्द ने अनेक शब्द गढ़े, जैसे सिराहना, सिरमौर, सिरखपी, सिरचढ़ा, सिरताज। उधर फ़ारसी में ‘सिर’ का अर्थ मर्म, गूढ़, राज़ जैसे अर्थों के लिए होता रहा और हिंदी के ‘सिर’ को ‘सर’ कहा जाने लगा। इसीलिए वहाँ जो शब्द गढ़े गए उनमें छोटी इ की मात्रा नदारद रही। जैसे सरफ़रोश, सरमाया, सरफ़राज़, सरमस्ती।
इस स्थिति में कुछ शब्दों के सही रूप की पहचान पूरी तरह मिट चुकी है। जैसे हिंदी में जिसे ‘सिरदार’ कहते हैं उसे फ़ारसी ने ‘सरदार’ कहा और चूँकि ‘दार’ फ़ारसी का प्रत्यय है इसलिए ‘सरदार’ ज़्यादा समीचीन भी है। इस शब्द ने हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की खिचड़ी से काम चला रही पीढ़ी के सिर में दर्द कर रखा है। कुछ वाक्य लिखते हुए तो मज़ा आ जाता है :- सर भी तो सरदार हैं। सर के सर में दर्द है। सरफ़राज़ सर ने उसे बहुत सर चढ़ा रखा है।
भाषा गड्ड-मड्ड हो चुकी है, इसलिए ग़लत दोनों ही नहीं हैं, लेकिन यदि हिंदी वाले ‘सिर’ का प्रयोग करना शुरू करेंगे तो अनेक जगह भ्रम की स्थिति से बच सकेंगे।

(34)
सर्वश्री
संस्कृत में ‘आदिदीपक’ का प्रचलन है। जब कोई शब्द इस तरह लगाया जाए कि उसका प्रभाव उसके बाद आने वाले उस समूह के सभी शब्दों पर पड़े, तो उसे आदिदीपक कहते हैं। जब बहुत से नाम क्रम से पढ़ने अथवा लिखने हों तो सभी के नाम से पूर्व बार-बार ‘श्री’, ‘सुश्री’ अथवा ‘श्रीमती’ लिखने के स्थान पर प्रारम्भ में ‘सर्वश्री’ लिखना पर्याप्त है।
मैंने कुछ लोगों को बार-बार ‘श्री’ के स्थान पर बार-बार ‘सर्वश्री’ प्रयोग करते देखा है। उनको लगता है कि ‘सर्वश्री’ कोई ऐसी डिग्री है जो ‘श्री’ से ज़्यादा ऊँची है। जबकि वास्तव में इसकी व्यवस्था पुनरावृत्ति विकार से बचने के लिए की गई है।

(35)
विद्या, विद्यालय, विद्यार्थी
इन शब्दों के उच्चारण में अक्सर हम चूक करते हैं। विद्या शब्द में ‘द्य’ का प्रयोग है जो कि द् + य के योग से बनता है। चूँकि इस संयुक्ताक्षर की बनावट ‘ध’ से मिलती-जुलती है इस भ्रम में इसे ध और य का योग समझ लिया जाता है। इसका रोमन रूपांतरण करें तो इसकी वर्तनी ‘VIDYA’ होगी, न कि ‘VIDHYA’ । भविष्य में अपने बच्चों को ‘विद्यालय’ भेजें विध्यालय नहीं।

(36)
वैद्य = चिकित्सक, जो वैद्यक शास्त्र के अनुसार चिकित्सा करता हो। (विशेषण) वेद से सम्बंधित।
वैध = विधि के अनुसार, विधान द्वारा स्वीकृत
वैदिक = वेद से संबंधित (मूल स्रोत वेद)
वैद्य जी वैदिक परंपरा के समर्थक हैं। आयुर्वेद की दवाइयाँ अनेक पश्चिमी देशों में भी वैध हैं। मोबाइल कंपनियों को बताइये कि जब हम रीचार्ज करवाते हैं तो उसकी ‘वैधता’ होती है। और चेरिटेबल चिकित्सालयों को बताइये कि अपने दवाख़ाने में ‘वैद्य’ जी को ही नियुक्त करें।

(37)
स्रोत : उत्पत्ति, मूल कारण, बीज
स्तोत्र : स्तुति
इन दोनों शब्दों के उच्चारण में सामंजस्य होने के कारण चूक होती है। कई बार तो ‘स्रोत्र’, ‘स्त्रोत’ और ‘स्त्रोत्र’ जैसी वर्तनी भी पढ़ने को मिलती है। हम यदि शब्दों की प्रवृत्ति और अर्थ का थोड़ा सा ध्यान रखें तो इन स्थितियों से बचा जा सकता है।

(38)
‘वीणापाणि’
यह माँ सरस्वती का एक नाम है। हाथों में वीणा धारण करने के गुण स्वरूप यह समासरूप निर्मित हुआ। इसमें वीणा और पाणि (कर, हाथ) का योग है। कुछ लोग सरस्वती वंदना और सामान्य प्रयोग में ‘वीणापाणी’ लिखते/बोलते हैं। यह ऐसा ही है जैसे किसी एप्लिकेशन में अफ़सर का नाम ग़लत लिखा जाए। रिजेक्ट होने की गारंटी।

(39)
वृत : चुना गया, घेरा गया, लपेटा गया
वृत्त : गोल घेरा, वर्णन
व्रत : नियम
वृत्त शब्द से ‘आवृत्त’ शब्द की सर्जना हुई है, जिसका अर्थ है : मुड़ा हुआ, चक्कर खाया हुआ, दोहराया हुआ, अध्ययन किया हुआ। ‘प्रवृत्त’ शब्द भी इसी से निर्मित है जो सामान्यतया संलग्न या कटिबद्ध होने का अर्थ देता है। वृत शब्द का उपयोग हिंदी में कम होता है अतः बहुत से लोग ‘वृत्त’ को मुखसुख के आधार पर ‘वृत’ लिखते/बोलते हैं। जबकि दोनों शब्दों के लिए अलग-अलग अर्थ निर्धारित हैं। ‘व्रत’ इन दोनों से बिल्कुल अलग शब्द है, किन्तु अनजाने में हम इन सबमें घालमेल कर देते हैं।

(40)
‘हस्’ से हास्य, हास, उपहास, परिहास और अट्टहास जैसे शब्द बने हैं। इन सबमें थोड़ा-थोड़ा अंतर है। यद्यपि संस्कृत शब्दकोश में उपहास और परिहास का अर्थ लगभग समान है तथापि प्रयोग के आकलन अनुसार
परिहास : मज़ाक़, हँसी-ठट्ठा
उपहास : मज़ाक़ उड़ाना, व्यंग्यपूर्ण हँसी उड़ाना
इस दृष्टि से उपहास नकारात्मक है और परिहास स्वस्थ हास्य।
‘अट्टहास’ अर्थात् ऊँचे स्वर का हास। कुछ लोग इसको ‘अट्टाहस’ लिखते-बोलते हैं। जबकि सही शब्द अट्टहास है। हास : हँसी
हास्य : हँसने योग्य (जैसे प्रणम्य, पूज्य आदि)
चौपाल पर बैठे चार छोकरे ‘परिहास’ कर रहे थे। तभी वहाँ से एक लंगड़ा साधु निकला। एक लड़के को शरारत सूझी और उसने साधु के साथ-साथ लंगड़ाते हुए चलना शुरू कर दिया। दूसरे लड़के ने ‘उपहास’ करते हुए कहा- “क्या बात है महाराज!आज तो लहरा रहे हो।” अन्य छोकरे ‘अट्टहास’ करने लगे। साधु कुपित होकर बोला – “उद्दंड बालको! हर विषय ‘हास्य’ नहीं होता। व्याधि में ‘हास’ तलाशोगे तो व्यथित हो जाओगे।”

(41)
आशंका
संभावना
दोनों ही शब्द किसी अनिश्चित के घटित होने का अर्थ देते हैं, लेकिन दोनों के अर्थ में आकाश-पाताल का अंतर है। जो हम चाहते हैं, उसके होने की ‘संभावना’ होती है। और जो हम नहीं चाहते उसके होने की ‘आशंका’ होती है। यथा
1) विदर्भ में इस वर्ष अच्छी बारिश होने की संभावना है।
2) जमुना उफान पर है और शाम तक बारिश होने की ‘आशंका’ है।

(42)
शाप, अभिशाप
यह शब्द ‘शाप’ ही है। न जाने किस विद्वान ने इस शाप में एक छड़ी जोड़ कर इसे ‘श्राप’ बनाने का कुकृत्य किया है। जिसने भी इस शब्द की सूरत बिगाड़ी है उसे पाणिनि का ‘शाप’ लगेगा।

(43)
विमोचन : छुड़ाना, मुक्त करना
लोकार्पण : लोक को अर्पित करना
सामान्य व्यवहार में हम लोकार्पण के ही अर्थ में विमोचन शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, किन्तु यदि इसके सही अर्थ पर ध्यान देंगे तो समझ आएगा कि जब मंत्री जी हमारी पुस्तक का ‘विमोचन’ करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि पुस्तक को किसी ने क़ैद कर रखा था जिसे छुड़ाने मंत्री जी आए हैं। इसलिए भविष्य में यदि कोई पुस्तक लिखें, तो उसका लोकार्पण कराएँ, विमोचन नहीं।

(44)
मुहब्बत
इस लफ़्ज़ को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से लिखते हैं। ‘मोहब्बत’ या ‘मौहब्बत’ लिखा देखता हूँ तो मुझे ‘मुहब्बत’ के अंजाम पर रोना आता है।

(45)
सम् + न्यास
व्यंजन संधि के नियमानुसार यदि ‘म्’ के बाद ‘क्’ से ‘भ्’ तक कोई भी स्पर्श व्यंजन हो तो ‘म्’ का अनुस्वार हो जाता है या उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर बन जाता है। इस हेतु उक्त संधि के बाद जो शब्द बनेगा वह ‘संन्यास’ होगा। अधिकतम स्थानों पर इस शब्द का अनुस्वार ग़ायब रहता है।

(46)
वेला (संस्कृत) : काल, समय
बेला (हिंदी) : चमेली जैसा एक फूल
वेल्ला (पंजाबी) : निठल्ला
लोक प्रयोग में हिंदी की कुछ बोलियों में ‘बेला’ को ‘वेला’ के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। एक फ़िल्म आई थी – ‘आई मिलन की बेला’। इस फ़िल्म में ‘बेला’ शब्द को मुखसुख के आधार पर निर्मित अपभ्रंश के रूप में ‘समय’ के अर्थ में ही प्रयोग किया गया है। यह ग़लत भी नहीं है। लेकिन यदि हमें कभी लिखना पड़ा कि【 ‘बेला’ के महकने की ‘वेला’ बहुत सुहानी होती है।】 तब अवश्य चुनौती खड़ी हो जाएगी।

(47)
धन्यवाद और साधुवाद
‘धन्यवाद’ आभार ज्ञापन के लिए प्रयोग होता है जबकि ‘साधुवाद’ प्रशंसा के लिए प्रयोग होता है। इसलिए जब आपको किसी को THANKS बोलना हो तो ‘धन्यवाद’ कहें, लेकिन जब किसी की सराहना करनी हो तो ‘साधुवाद’ कहें। ‘साधु’ शब्द का संस्कृत में अर्थ है, ‘अच्छा’। इसका संन्यासी से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। उत्तम मनुष्य होने के कारण संन्यासी को साधु कह दिया जाता है।

(48)
उपर्युक्त = उपरि + उक्त = ऊपर कहा गया \
यह शब्द संस्कृत के उपरि में उक्त जोड़ने से बना है। जो लोग इसे ‘उपरोक्त’ लिखते हैं वे ग़लत लिखते हैं। क्योंकि संस्कृत का मूल शब्द ‘उपरि’ है और हिंदी का शब्द ‘ऊपर’। यदि हिंदी वाले ऊपर में उक्त जोड़ेंगे तो ‘ऊपरोक्त’ बनेगा। लेकिन ‘उपरोक्त’ तो किसी तरह से नहीं बनेगा। ‘उपर्युक्त’ विवेचना को ध्यान रखें और ‘उपरोक्त’ लिखने से बचें।

(49)
व्रज : मथुरा और वृंदावन के आसपास का क्षेत्र जो श्रीकृष्ण की लीलाभूमि थी।
‘व्रज’ संस्कृत भाषा का शब्द है। जिस क्षेत्र को इस संज्ञा से जाना जाता है वहाँ के लोकप्रभाव के कारण इसे ब्रज, बृज और बिरज बोल दिया जाता है। इसी प्रभाव के कारण इस क्षेत्र की बोली को हम बृजभाषा कहने लगे। लोक लालित्य के कारण यह सुंदर भी लगता है। किंतु वास्तविक शब्द ‘व्रज’ ही है। फिर भी जब होली का त्यौहार हो तो मन यही गाता है कि – “आज बिरज में होरी रे रसिया!”

(50)
त्योहार : पर्व, उत्सव
इस शब्द को कल तक मैं स्वयं ‘त्यौहार’ लिखता था, लेकिन कल एक सज्जन श्री आशीष शर्मा जी ने मेरी इस चूक की ओर इंगित किया। मैंने शब्दकोष के पृष्ठ पलटे तो ज्ञात हुआ कि मैं ग़लत था। भविष्य में अपने त्योहार मनाते समय अतिरिक्त मात्रा नहीं लगाऊंगा ताकि त्योहारों की शुद्धता का संतुलन बना रहे।

(51)
शम्अ, मआनी, मुआमला, मुआफ़
उर्दू के कुछ लफ़्ज़ हिंदी में आकर अपना रूप इसलिए बदल लेते हैं क्योंकि हिन्दी में सामान्यतया शब्द के बीच मे स्वर हो तो वह पूर्ववर्ती व्यंजन में समाहित हो जाता है, किन्तु उर्दू में इसे अलग से ही लिखा व बोला जाता है। जैसे ‘शम्अ’ को हिंदी में ‘शमा’ लिखने का प्रचलन है। ‘मआनी’ को ‘मानी’ लिखते बोलते हुए हम कब ‘मायने’ बोलने लगे, यह पता ही न चला। चूँकि उर्दू वाले प्रथम अक्षर पर लगी लघु मात्रा को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते इसलिए उनके ‘मुआमला’ का भी ‘मामला’ बिगड़ गया और ‘मुआफ़’ तक को ‘माफ़’ करने लगे।

(52)
वापस : प्रत्यागत, लौटा हुआ
वापसी : प्रत्यागमन, लौटना, वापस आना
वापस शब्द की सही वर्तनी में कहीं भी ‘इ’ की मात्रा नहीं आती। अनजाने में जो लोग इसे ‘वापिस’ बोलते या लिखते रहे हैं वे भविष्य में शुद्ध प्रयोग की ओर वापस आएंगे।

(53)
चुकना और चूकना
शीर्षक में प्रयुक्त इन दो शब्दों के विषय में अनेक जिज्ञासाएं प्राप्त होती हैं। अनेक मित्रों का मत है कि मुझसे भूलवश ऐसा हो गया है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैंने सोच-समझ कर शीर्षक में इन दोनों शब्दों को प्रयोग किया है।
चुकना : सम्पन्न हो जाना, समाप्त हो जाना। यह शब्द भूतकाल में सम्पन्न हुए किसी कार्य अथवा घटना का द्योतक है। जैसे खा चुका, रह चुका, सो चुका।
चूकना : किसी लक्ष्य का छूट जाना। यह शब्द भूल, ग़लती आदि के लिए प्रयोग होता है। जैसे भूल चूक लेनी देनी, मैं मौक़ा चूक गया। ‘शब्द नहीं चुके’ का अर्थ यह है कि शब्द समाप्त नहीं हुए हैं। शब्द कभी नहीं चुकते। हम ही उनका उचित प्रयोग करने में चूक गए हैं। हम ही अनजाने में भूल करते जा रहे हैं।

(54)
छिपना
यह शब्द ‘छिपना’ ही है। जो लोग इसे ‘छुपना’ लिखते या बोलते हैं, वे अशुध्द प्रयोग करते हैं। इस शब्द की विकृति में बॉलीवुड का बड़ा योगदान है। फ़िल्म का नाम ही ‘छुपा रुस्तम’ रख दिया। गाना गाया तो भी ‘छुप गए सारे नज़ारे…’। इनसे प्रेरणा लेकर हम भी अपनी ‘छिपम-छिपाई’ को छुपम-छुपाई’ बोलने लगे। लेकिन शब्दों की इस ‘लुका-छिपी’ में भी शब्दकोश ने कभी कुछ ‘छिपाव’ न रहने दिया।

(55)
अवधि और अवधी
अवधि : समयसीमा, Duration, Period, Term
अवधी : अवध क्षेत्र की बोली।
बाबा तुलसी ने अवधी में ऐसा काव्य रच दिया जिसकी लोकप्रियता की अवधि निरंतर बढ़ती जाती है।

(56)
विदुर : ज्ञाता, पंडित, पाण्डु के अनुज
विधुर : दुःखी, जिसकी पत्नी मर गई हो
अपने ज्ञान और चातुर्य के बल पर विदुर ने यह सिद्ध किया कि वे अपने नाम के अनुरूप ही गुणी भी हैं। किन्तु वे विधुर नहीं थे, क्योंकि उनकी पत्नी ‘पारसंवी’ पूर्णतया स्वस्थ थी और पारसंवी के हाथ से श्रीकृष्ण ने उल्टे पीढ़े पर बैठ कर वैसे ही केले के छिलके खाए थे, जैसे शबरी की भक्ति देख राम ने जूठे बेर खाए थे।

(57)
प्रसाद : अनुग्रह, कृपा, देवता को चढ़ाई गई वस्तु
प्रासाद : राजमहल, राजभवन, देवालय
प्रसाद शब्द को लोग जब किसी के नाम के साथ प्रयोग करते हैं तो सामान्यतया चूक नहीं करते। जैसे हरि प्रसाद, राम प्रसाद आदि। किन्तु इसी शब्द को लेकर जब हम मंदिर पहुँचते हैं तो न जाने क्यों इसे ‘परसाद’ या ‘परशाद’ बोलने लगते हैं। सम्भव है, इस अशुद्ध उच्चारण के कारण देवता हमारा प्रसाद ग्रहण न करते हों।

(58)
दिलासा, सांत्वना
हताशा, निराशा, शोक, दुःख अथवा क्षोभ के समय हिम्मत बंधाना हमारा मानवीय कर्त्तव्य है। किन्तु याद रहे कि दिलासा दिया जाता है और सांत्वना दी जाती है। जो शब्द प्रचलन विकृति के शिकार हुए हैं उनमें ‘दिलासा’ भी एक है। भ्रम की स्थिति में शब्दकोश से पूछा तो पता चला कि दिलासा पुल्लिंग है।

(59)
दुलहन और दूल्हा
हिंदी भाषा का शब्द है ‘दुलहन’ जिसे कुछ लोग ‘दुलहिन’ भी लिख बोल देते हैं। दुलहन शब्द ने जब आंचलिकता का सिंगार किया तो इसे दुल्हनिया कहा जाने लगा। गांव में खेलती इस दुल्हनिया को जब हम वापस शहर लाए तो बाद का ‘इया’ तो हटा दिया किन्तु ‘ल’ की बैसाखी लगाना भूल गए। किन्तु शब्दकोश कुछ नहीं भूलता। उसके पास आज भी ‘दुलहन’ सुरक्षित है। ‘दूल्हा’ इस सबसे इसलिए बच गया क्योंकि लोकबोली के घर प्रवेश करते हुए वह सतर्क था और उसने ‘ह’ की दीर्घ मात्रा को ‘ल’ में जोड़ कर स्वयं को ‘दूलह’ बनाया। इसलिए जैसे ही वह लोक लालित्य से बाहर निकला उसने अपनी आदत के अनुसार स्वयं को ठीक करके फिर से ‘दूल्हा’ बना लिया।

(60)
पूर्वग्रह : पूर्व + ग्रह (समास)
दुराग्रह : दु: + आग्रह (संधि)
पूर्वग्रह का अर्थ है पहले से ग्रहण करना। किसी के विषय में पहले से राय क़ायम करना पूर्वग्रह है। दुराग्रह का अर्थ है मूर्खतापूर्ण हठ या बुरा आग्रह। ‘दुराग्रह’ की वर्तनी देखकर ‘पूर्वग्रह’ को ‘पूर्वाग्रह’ लिखना हमारा ‘पूर्वग्रह’ है और किसी के समझाने पर भी उसमें सुधार न करना ‘दुराग्रह’ है।

(61)
चक्रवर्ती : एक समुद्र से दूसरे समुद्र पर राज्य करने वाला।
चक्र-वृद्धि : सूद दर सूद
कल कोई बता रहा था कि बैंक का ब्याज तो चक्रवर्ती ब्याज होता है। सुनकर मुझे लगा कि इतना ब्याज मिलता होगा जिससे मूलधन का स्वामी अकूत संपत्ति अर्जित कर लेता हो। फिर जब बैंक ब्याज की दर पता की तो लगा कि 4 से 6 प्रतिशत में तो यह सम्भव नहीं है। इसलिए भविष्य में ब्याज से साथ चक्र-वृद्धि शब्द ही जोड़ें। चक्रवर्ती ब्याज देना पड़ा तो बैंक कंगाल हो जाएगा।

(62)
अलमबरदार : झंडा उठाने वाला
नम्बरदार : अंग्रेजों के ज़माने में कर वसूलने वाला ज़मींदार, गाँव का मुखिया।
इन दोनों शब्दों में भ्रम को स्थिति इसलिए उत्पन्न हो जाती है क्योंकि हमारे कुछ ग्रमीण क्षेत्रों में “नम्बरदार” को “लम्बरदार” बोला जाता है और “लम्बरदार” “अलमबरदार” से मिलती-जुलती ध्वनि देता है अंग्रेजों का शासन समाप्त होने के बाद बंगाल में नम्बरदारों के विरुद्ध सरकार ही अलमबरदार बन गई थी।

(63)
बहु : (उपसर्ग से रूप में प्रयुक्त) बहुत, अधिक, ज़्यादा। उदाहरण : बहुआयामी, बहुमान।
बहू : (वधू का अपभ्रंश) पत्नी, दुल्हन
उन्होंने गली-गली जाकर कहा कि राजीव की बहू को बहुमत मत देना।

(64)
अंत्य + अक्षरी = अंत्याक्षरी
इस शब्द को कुछ लोग अंताक्षरी लिखते बोलते हैं, जबकि यह वास्तव में अंत्याक्षरी है।
इसमें अंत्य शब्द ठीक वैसे ही प्रयोग किया गया है जैसे अंत्योदय शब्द में किया गया है।

(65)
प्लेट्स : रकबियाँ, थालियाँ, पत्तलें, पट्टियाँ, पट्ट,
प्लेटलेट्स : एक प्रकार की रक्त कोशिकाएँ
जब किसी को डेंगू होता है तब डॉक्टर प्लेटलेट्स काउंट करवाने को कहता है, लेकिन हमारे देश में अनेक लोग प्लेट्स गिनवाने निकल पड़ते हैं। “जब किसी के प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं तब उसे प्लेट में रखी चीजें नहीं, बल्कि गिलास में भरी चीज़ों का सेवन करना चाहिए।”

(66)
शलजम (हिंदी)
शलगम (फ़ारसी)
ये दोनों शब्द समानार्थी हैं। यद्यपि इनमें कोई भी अशुद्ध नहीं है, फिर भी यदि हिन्दी के पास उसी अर्थ का, उसी मात्राभार का, उसी तुकांत का बिल्कुल वैसा ही शब्द है तो उसमें विदेशी शब्द प्रयोग करना उचित नहीं। मैं पुनः कह रहा हूँ कि दोनों ही शब्द सही हैं।

(67)
उपलक्ष्य
कोई ऐसा कारण अथवा विचार जिसको ध्यान में रखकर कोई बात कही जाए या कोई काम किया जाए, उपलक्ष्य कहलाता है। सामान्यतया सांस्कृतिक कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्र पर यह शब्द दिखाई देता है। किंतु कुछ जगह इसे ‘उपलक्ष’ लिखा जाने लगा है। यह उचित प्रयोग नहीं है। लक्ष शब्द का अर्थ है ‘लाख की संख्या’। इसका उपलक्ष्य से कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्रचलन के संक्रामक रोग के कारण यह प्रयुक्त होने लगा है। जबकि सही शब्द ‘उपलक्ष्य’ ही है।

(68)
अंग्रेजी का मूड हिंदी का मुंड
इन दोनों शब्दों के अर्थभ्रम से एक अजीब सा शब्द निर्मित हुआ। मुंड का अर्थभ्रम हुआ तो लोग इसे सिर का समानार्थी मानने लगे। ‘सिर घूम जाना’ मुहावरा धीरे-धीरे ‘दिमाग़ घूम जाने’ और ‘दिमाग़ ख़राब होने’ में बदल गया। उधर अंग्रेजी का ‘MOOD OFF’ हौले से हिंदी में प्रविष्ट हुआ। धीरे धीरे यह ‘मूड ख़राब होने’ के रूप में रूपांतरित हो गया। हिंदी बोलचाल में रचा बसा ‘मूड’ हिंदी के ‘मुंड’ से रूपसाम्य रखने के कारण कुछ क्षेत्रों में ‘मूंड’ का रूप धारण करके घूमने लगा। यदि आपने कभी किसी को ‘मूंड ख़राब’ कहते सुना है तो उससे मूड ऑफ़ करने की जगह, इस शब्द की यात्रा का आनन्द लो।

(69)
तत्त्वावधान
इस शब्द की वर्तनी में दो चूक अक्सर दिखाई देती हैं। प्रथम, ‘तत्त्व’ शब्द को ‘तत्व’ लिखा जाता है। दूसरा ‘अवधान’ शब्द को ‘आधान’ लिखा जाता है। इन दोनों से बचें और भविष्य में जब कोई कार्यक्रम हो तो उसे किसी के ‘तत्त्वावधान’ में ही आयोजित करें।

(70)
दवाई / दवाइयाँ
हिंदी में यदि एकवचन से बहुवचन बनाने के लिए शब्द के अंत में ‘याँ’ या ‘यों’ जोड़ा जाता है तो मूल शब्द का अंतिम वर्ण ह्रस्व हो जाता है।
दवाई : दवाइयाँ
भाई : भाइयों
अधिकतर केमिस्ट अपनी दुकान पर “दवाईयां” लिखवाते हैं। इनकी दुकान से औषधि ख़रीदकर रोगी ठीक होगा या नहीं, यह तो ईश्वर जानता है; लेकिन भाषा के बचने की कोई संभावना नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

क्षमा : एक पर्व

क्षमावाणी मनुष्य इतिहास का सर्वाधिक वैज्ञानिक पर्व है। यह मनुष्यता के लिए सबसे आवश्यक त्योहार है। ‘क्षमा’ मानव के चरित्र निर्माण का सर्वाधिक प्रबल यंत्र है।
क्षमादान कठिन है किन्तु क्षमायाचना उससे भी अधिक कठिन है। क्षमा करनेवाले के पास कहीं न कहीं बड़प्पन का कोई अहंकार हो सकता है, किंतु क्षमा याचना करनेवाला तो हर अहम् से मुक्त होता है। क्षमा मांगने के लिए अहम् को तिरोहित कर देना अपरिहार्य है। जिसने यह कर लिया वह उत्सव का अनुभव कर सकता है।
‘क्षमा’ – लिखना कठिन है, बोलना और भी कठिन है, अनुभूत करना इससे भी अधिक कठिन है और क्षमा कर पाना सबसे कठिन है। व्यवहारिक धरातल पर जब हम जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, उस समय स्थितप्रज्ञ रहकर विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहजता को अक्षुण्ण रखना बेहद दूभर होता है। कई बार आपकी क्षमाशीलता को आपकी दुर्बलता समझ कर विपरीत पक्ष आपको प्रतिक्रिया हेतु विवश करता है। ज्ञानी कहते हैं कि सामनेवाला कुछ भी करे, आपको क्षमाशील बने रहना है। किन्तु मेरा मत है कि मनुष्य ने जितने भी संबंध निर्मित किये हैं, उनमें ‘क्षमा’ का संबंध एक ऐसा संबंध है जिसका द्विपक्षीय होना अपरिहार्य है।
यदि दूसरा पक्ष क्षमा के सूत्र में बंधने को तैयार न हो, और हम इकतरफ़ा क्षमा करते रहें तो धीरे-धीरे क्षमा करने वाले व्यक्ति में स्वयं के महान होने का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगता है। इसके जन्मते ही वह दूसरे को पहले मूर्ख और फिर तुच्छ समझने लगता है। और आगे बढ़ने पर घृणा जन्म लेती है, और अंततः स्थिति पुनः कटुता की ओर बढ़ जाती है। इसलिए क्षमा के संबंध को साधना है तो इकतरफ़ा निबाह से काम नहीं चल सकता।
साँप के काटने पर अहिंसक रहनेवाले तथागत का उदाहरण हमें याद रखना चाहिए किन्तु सौ गालियाँ देने वाले शिशुपाल का उदाहरण भी हमें नहीं बिसारना चाहिए। यह केवल अपने लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु ‘क्षमाभाव’ के वैभव हेतु भी अपरिहार्य है। यदि थोड़ा-सा ध्यान करेंगे तो हमें ऐसी परिस्थितियों के अनेक उदाहरण अपनी ही ज़िन्दगी के आसपास मिल जाएंगे।
जिस शस्त्र से शत्रु को परास्त करना हो, उसकी साधना और उसकी पड़ताल बेहद आवश्यक हैं। हमने ‘मुआफ़ी‘; ‘सॉरी’; ‘क्षमा’ जैसे शब्दों को इतना बेमआनी बनाकर रख दिया है कि न तो बोलनेवाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही सुननेवाले को।
जैनियों के पर्युषण पर्व इस शब्द को प्राणवान करने की साधना है। दस दिन के ये पर्व अवचेतन तक क्षमा के पहुँचने का मार्ग हैं। पहले दिन क्षमा का अर्थ समझना होता है, उसके बाद मार्दव, आर्जव आदि के माध्यम से चित्त को क्षमा मांगने योग्य बनाया जाता है, तब कहीं जाकर क्षमा ‘वाणी’ में साकार होती है।
एक बार मुख पर क्षमा विराजित हुई कि त्योहार हो गया, एक बार जिव्हा ने क्षमा चख ली तो फिर मन इतना हल्का हो गया कि वह नाच उठा। फिर अलग से ढोल-नगाड़े नहीं बुलाने पड़ते। फिर तो भीतर का संगीत झूम उठता है। जिन ग्रंथियों ने मन को जकड़ रखा था, वे इस एक शब्द की गूँज से विलीन हो गईं।
यह प्रयोग बेहद सार्थक है। यह आपने भी यकीनन कभी न कभी आज़माया ही होगा। यदि न आज़माया होता तो आप आज जीवित न होते। क्षमा के अभाव में जीवित रहना असंभव है। क्षमा के बिना जीवन ऐसे ही है जैसे किसी झल्लीवाले की पीठ पर लगातार बोझा बढ़ता रहे और उसे उतारने का कोई उपाय ही न किया जाए। फिर अधिक देर तक पीठ बोझा उठा न सकेगी। यह तो कमर टूट जाएगी या लकवा मार जाएगा। बोझा उतारा न गया तो झल्लीवाला यकीनन मर जाएगा।
हमारा मानस संसार में खड़ा यही झल्लीवाला है। दिन-प्रतिदिन के व्यावहार में इस पर बोझा बढ़ता जाता है। क्षमा मन का बोझा उतार देने का उपाय है। भीतर सड़ांध मारती ग्रंथियों से मुक्त होकर जीवन की सुवास भोगने का ज़रिया है। यही कारण है क्षमादान उतना आवश्यक नहीं जान पड़ता, जितना आवश्यक क्षमा याचना है।
अपने भीतर जो कचरा भर गया है, उसे कचरा मानने के लिए तैयार होना कठिन है। उसकी पहचान करके यह स्वीकार कर पाना कि हमने अपने भीतर कचरा रख लिया था- यह आसान काम नहीं है। इस मूर्खता के लिए सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी पड़ती है। इस विद्रूपता के लिए अपने आप पर हँसना पड़ता है। यह आसान नहीं होता। दूसरे पर हँसना बहुत आसान है, किंतु अपने आप पर हँसना बड़ा श्रमसाध्य काम है। लेकिन इस सोपान के बिना क्षमा का सुख भोगना नामुमकिन होगा।
‘क्षमावाणी’ पर्व के अवसर पर एकांत में बैठकर अपनी ग़लतियों को याद करना। अपने भीतर भरे द्वेष और घृणा के कचरे की पहचान करने का प्रयास करना। जिसके प्रति क्षोभ या अपराध बोध हो, उसके साथ घटित हुई सर्वाधिक कड़वी घटना को याद करना और फिर जिससे मांगनी हो, उसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पूरे चैतन्य मन से क्षमा याचना करना। अगर आज भी रेडीमेड क्षमा मांग ली तो यह पर्व निरर्थक रह जाएगा। अगर आज भी प्राणहीन क्षमा कर के रह गए तो पीठ का बोझा न उतर सकेगा। अगर आज भी खोखली औपचारिकता में फँसे रह गए तो मन को निर्ग्रंथ करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से जाता रहेगा।

✍️ चिराग़ जैन

खेल-खिलवाड़

भारत जवान दिखने और खोई जवानी वापस पाने के विज्ञापन करता रह गया और दुनिया बूढ़ा दिखाने वाली फेसबुक एप्प पर मर मिटी। अपने आपको जवानी के बाद के अधेड़ या वृद्ध गेटअप में देखकर लोग बड़े ख़ुश हुए। हमें कभी इस तरह की किसी तकनीक की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
हमारे देश में ग़रीबी और बेरोज़गारी का आलम यह है कि अपनी आयु से दस-पाँच वर्ष अधिक तो सब लगते ही हैं। जिसे और अधिक बूढ़ा दिखने का चाव हो, वह सरकारी अस्पतालों और सरकारी दफ़्तरों से रिश्ता जोड़ ले। इससे भी अधिक बूढ़ा दिखना हो, तो उसके लिए सरकार ने थाने खोल दिये हैं। और जिसे यह जानना हो कि वह मरणासन्न होगा तो कैसा लगेगा, उसके लिए न्यायालय की व्यवस्था है। यहाँ तो संकट जवान रहने का था। बूढ़े होने के लिए तो हमें कुछ करना ही नहीं है। भारतीय संस्कृति में ये व्यवस्थाएँ पहले से मौजूद हैं, जिनको नए आविष्कार कहकर पश्चिम ढोल पीट रहा है।
बच्चे मोबाइल पर एक खेल खेलते हैं, ‘सब-वे सर्फ़र्स’। यह खेल भी कोई नया आविष्कार नहीं है। हमारे देश के हर नागरिक के साथ हमारा तंत्र यह खेल लगातार खेलता रहता है। जब तक भागते रहोगे, तब तक ज़िंदा रहोगे। तंत्र रास्ते में अड़चन पैदा करता रहेगा, लेकिन हमें उन सबसे बचकर भागते रहना है। अगर किसी अड़चन से टकराने की भूल की, वहीं चारों खाने चित्त कर दिए जाओगे। भागो और कमाओ। कमा-कमा कर बैंक में जोड़ो, फिर कहीं किसी से टकराने की चूक करो और निपट जाओ। जैसे ही आप निपटेंगे, बाक़ी के सबवे-सर्फ़र्स आपकी उठावनी में यह बोलकर आगे भाग जाएंगे कि- ‘किसके पीछे भागे बंदे, सब कुछ यहीं रह जाना है।’
हमारे पास जनसंख्या की बहुतायत है, इसलिए हमारा तंत्र जनता से खेलता है। उनके पास लोग कम हैं, धन अधिक। इसलिए वे लोग लूडो भी सोने की गोटियों से खेलते हैं। हम मोबाइल में देखकर उनकी नक़ल करने निकले हैं। जबकि हम तो वास्तव में असलवाले लोग हैं। वो खेल खेलते हैं, हम खिलवाड़ करते हैं। हमारी बराबरी करने में उनके पसीने छूट जाएंगे। उनकी वीडियोगेम में रेस पूरी करने के लिए रास्ते में आने वाली गाड़ी, मनुष्य, पुलिसमैन सबको उड़ाने की छूट होती है। यह खेल हमारे देश में सड़कों पर रोज़ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो स्पष्ट नहीं होता कि हमारी सड़कों से वीडियोगेम ने क्रूरता और अभद्रता सीखी है या वीडियोगेम ने खेल-खेल में हमारी पीढ़ियों से करुणा और सभ्यता छीन ली हैं।
लट्टू खेलने वाले लड़के कील पर सलीके से नाड़ा लपेट कर गतिमान लट्टू को उंगली पर नचाने का संतुलन जानते थे तो उन्हें ‘लफंडर’ और आवारा कहा जाता था, लेकिन आज पाँच सौ रुपये का बेब्लेड चलाना बच्चे का स्टेटस सिंबल हो गया है। छुपम-छुपाई और आँख-मिचौनी खेलने वाली लड़कियाँ आवारा थीं, और फाइव स्टार में जाकर दस हज़ार रुपये की एंट्री टिकट में हाइड एंड सीक खेलने वाली मैडम मॉडर्न हैं। खो-खो गँवारों का खेल है और म्यूजिकल चेयर्स एडवांस्ड लोगों का। इमली के बीज घिसकर अष्टा-च्वंगा-पैं खेलना गुनाह था, लेकिन तंबोला और पोकर खेलना स्टाइल है। स्टापू, गिट्टे, पिट्ठू गरम, कबड्डी और गिल्ली-डंडा छीनकर हमारे मुहल्ले में जिम खोल दिया गया है। जिन हवाओं में पतंगें उड़ती थी वहाँ मोबाइल का नेटवर्क बिछ गया है। साथ ही मोबाइल डाटा भी ख़ूब सस्ता है। बिस्तर पर पड़े-पड़े मोबाइल पर गेम खेलते रहो ताकि गर्दन, आँखें सीधे और बाक़ी का शरीर परोक्ष रूपेण अस्वस्थ होता रहे। फिर उसी मोबाइल पर नियरेस्ट जिम ढूंढो ताकि फेसबुक पर लिख सको ‘बीइंग हेल्थ कॉन्शियस’!

✍️ चिराग़ जैन

हम भारत के लोग

हम भारत के लोग एक ऐसे तंत्र में जीने को विवश हैं, जहाँ जनता का शासन, जनता के प्रति कोई जवाबदेही महसूस नहीं करता। टेलिविज़न पर जो विज्ञापन आते हैं उनका एकमात्र उद्देश्य अपना माल बेचना होता है। दीवाली आती है तो वे अपने माल के विज्ञापन में दीवाली फेस्टिवल का जुमला जोड़ देते हैं, हम उतावले होकर दीवाली की ख़ुशी में उनका माल ख़रीदकर ख़ुश हो लेते हैं। फिर पंद्रह अगस्त आता है तो वे अपने पान मसाले के इश्तिहार में ‘आज़ादी’ जैसा कोई जुमला जोड़कर हमें पान मसाला चिपका देते हैं। हम देशभक्ति की भावुकता में पान मसाला चबाने के उपक्रम को राष्ट्रभक्ति समझ बैठते हैं। होली पर उसी पान मसाले को ज़िन्दगी के ‘रंग’ पर ट्रांसलेट कर दिया जाता है और हम समझने लगते हैं कि होली मनाने के लिए अमुक पान मसाला चबाने से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। इसी तरह हमारे शादी-ब्याह और आपसी संबंधों तक कि भावुकता का हवाला देकर सब अपना धंधा चलाते रहते हैं और हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं।
राजनीति भी ऐसा ही करती है। बिहार में माल बेचना हो तो बिहारियों के पर्व-त्यौहार भुनाए जाते हैं। महिलाओं को आकृष्ट करना हो तो अचानक महिलाओं का कष्ट राजनेताओं के दिल में दहाड़ें मारने लगता है। तमिलनाडु से वोट बटोरने हों तो हिंदीभाषी राजनेता भी वणक्कम बोलने लगते हैं। हम इस पर रीझने लगते हैं कि फलाने जी हमारी भाषा बोल रहे हैं। जैसे एक बार माल बिक जाने के बाद अपनत्व जता रहा व्यवसायी आपकी शिकायतों से इर्रिटेट होने लगता है उसी तरह एक बार चुनाव जीतने के बाद वणक्कम बोलने वाले नेताजी आपकी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
हमारी रोज़मर्रा की समस्याओं से न तो किसी व्यवसायी का कोई लेना-देना है न ही किसी राजनेता का। फिर भी हम बार-बार इनके इश्तिहारों में अपनी भावुकता की चुम्बक से चिपके रहते हैं।
महानगरों में कैब सर्विस चलती है। कैब कम्पनियां धड़ल्ले से लोगों की जेब पर डाका डालती हैं, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका मानना है कि जो आदमी कैब में चल सकता है उसे थोड़ा बहुत लूट भी लिया जाए तो इससे कोई आफत नहीं आ जाएगी। विकल्पहीनता की स्थिति यह है कि बसों में जगह नहीं है, अपनी गाड़ी लेकर निकलें तो पार्किंग वाला लूट लेता है। कुछ बोलो तो वही जुमला कि जो गाड़ी चला रहा है वो सौ-पचास रुपये के लिए झगड़ा क्यों कर रहा है?
हवाई जहाज में चलो तो विमान कम्पनियों ने जेबतराशी का गुर सीख रखा है। फ्लाइट कैंसिल हो जाए तो आप मुँह बाये देखते रहो। आप पाँच मिनिट लेट हो जाओ तो आपको फ्लाइट नहीं पकड़ने दी जाएगी, लेकिन फ्लाइट को दो, तीन, चार, पाँच घण्टे लेट कर दिया जाए तो आप इंतज़ार करने को मजबूर हैं। फ्लाइट बुक कराते समय आप पूरा पैसा भुगतान करते हैं। फिर फ्लाइट कम्पनी कहती है कि वेब चैक इन कर लीजिए ताकि हवाई अड्डे पर लाइन में न लगना पड़े। हम वेब चैक इन के लिए कम्प्यूटर खोलते हैं तो कम्पनी कहती है कि चैक इन करने के लिए सीट चुननी हो तो अलग से पैसे देने होंगे। हम कहते हैं कि सीट के ही तो पैसे देकर हमने टिकट बुक कराई थी। सामने से ग्राहक सेवा प्रतिनिधि कहता है कि सॉरी सर, कम्पनी पॉलिसी है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते।
दिल्ली में सड़क पर ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार ने ट्रैफिक पुलिस मुहैया करवाई है। उनको कहा गया है कि जो नियम तोड़े उसका चालान काटो। अलग-अलग ग़लती के लिए अलग-अलग जुर्माना है। किसी-किसी केस में लाइसेंस तीन महीने के लिए सस्पेंड भी किया जाता है। किसी-किसी में लाइसेंस ले लिया जाता है और वाहन चालक को कहा जाता है कि कोर्ट में जाकर चालान भुगतान करके लाइसेंस कोर्ट से लेना होगा। कोर्ट के नाम से घबराया नागरिक पुलिसवाले से अनुरोध करता है कि कोर्ट का चालान न कीजिये। पुलिसवाला कोर्ट के इस भय को समझता है, इसलिए जिसे भी पकड़ता है उसे सीधा बोलता है कि लाइसेंस जब्त होगा और तीन/चार हज़ार का चालान होगा। शिकंजे में फँसा आदमी गिड़गिड़ाने लगता है, पुलिसवाला दया से भरकर उससे पाँच-सात सौ रुपये ऐंठता है और कभी सौ रुपये का चालान बनाकर, और कभी वह भी बनाए बिना उसे चलता करता है।
इसमें यह कहा जा सकता है कि जिसने ग़लती की है उसका जुर्माना तो होना ही चाहिए। बेशक़ उसका जुर्माना होना चाहिए लेकिन इस जुर्माने की आड़ में सड़क पर हैरासमेंट कतई उचित नहीं है। ट्रैफिक पुलिस की आँखों के सामने चौराहों पर भिक्षावृत्ति होती है, एक वर्ग विशेष की भूषा बनाकर ताली बजा-बजाकर सरेआम लूट होती है।
जिन सड़कों पर चलने का दंड भुगतना पड़ता है, उनकी तीन में से दो लेन तक रेहड़ी, रिक्शा, बसें खड़ी रहती हैं। बाएँ मुड़नेवाले दाहिनी लेन में चलते हैं, दाएँ मुड़नेवाले बाएँ मुड़नेवालों का रास्ता रोक लेते हैं। सामान्य गति में चल रहे वाहन को हॉर्न बजा-बजाकर परेशान किया जाता है। सड़क टूटी हो तो महीनों तक उसकी मरम्मत नहीं होती, कोई गाड़ी ख़राब हो जाए तो उसे हटाने की कोई व्यवस्था नहीं है, सर्विस रोड पर दुकानें खुली हुई हैं, फुटपाथ पर खोखे बने हुए हैं -इन सबके लिए सरकार की ओर से कोई निदान नहीं खोजे जाते। जिन गाड़ियों का रोड टैक्स ले रहे हो, उनके लिए पार्किंग की व्यवस्था करना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है।
ऐसा नहीं है कि इन सब अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के लिए शिक़ायत का प्रावधान नहीं है। वह टुनटुना भी जनता के हाथ में थमाया गया है लेकिन वह इतना पेचीदा है कि उसमें चाबी भरते-भरते बंदे के हाथ लहूलुहान हो जाते हैं, लेकिन उस खिलौने की गरारी नहीं घूमती। सुना है कि उसकी गरारी में ज़ंग लग गया है जिसमें रुपयों की ग्रीस डाले बिना काम नहीं बनता।
औरतें रोती हैं तो उनके पक्ष में कानून बना दिया जाता है। सरकारों की जय-जयकार हो जाती है। बाद में पता चलता है कि उस कानून का दुरुपयोग करके कई निर्दाेष परिवार बर्बाद किये जा रहे हैं। सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह इस कानून को बदलकर अपना वोट बैंक गँवाने की मूर्खता नहीं करना चाहती। कोई वर्ग विशेष चिल्लाता है तो सरकार उनके हाथ में ब्रह्मास्त्र दे देती है कि तुम हमें वोट देना, इसके बदले में जिस मर्ज़ी पर आरोप लगाकर उसे गिरफ़्तार करवा सकते हो।
स्कूलों में एडमिशन कराने जाओ तो लुटो, अस्पताल में इलाज कराने जाओ तो लुटो, सरकारी बस में चलो तो कष्ट सहो, सरकारी रेल में चलो तो लेट होते रहो, सरकारी दफ़्तर में काम पड़ जाए तो टेबल-टू-टेबल चढ़ावा चढ़ाते रहो, पासपोर्ट बनवाओ तो अपनी सही जानकारियों को सही कहने के लिए भी इंवेस्टिंग अफसर को चढ़ावा चढ़ाओ, रोते हुए थाने में जाओ तो अपनी असली समस्या को भूलकर पुलिसवालों से जान छुड़ाने का उपाय खोजते फिरो, अदालत में जाओ तो शिकायत करने के लिए वक़ील पर आश्रित रहो, शिक़ायत हो जाए तो तारीखों और दफ़ाओं के फेर में ज़िन्दगी बिता दो। कुल मिलाकर भारतीय जनता के पास एक ही विकल्प है कि वह सरकारों और राजनैतिक दलों के कौतुक देखती रहे और नुक्कड़ की बहस में अपने विरोधी को यह बताने का प्रयास करे कि जिस मुर्गे की तुम तरफ़दारी कर रहे हो, वह तो गर्दन के नीचे वार करता रहा, हमारे वाले मुर्गे ने तो सीधे टेंटुए पर चोंच मारी है।
भारतीय नागरिक इस दुनिया का सर्वाधिक लाचार लेकिन अधिकार प्राप्त प्राणी है, क्योंकि हमारे देश में जनहित सर्वाेपरि है।

✍️ चिराग़ जैन

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