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कला की क़ीमत

कलाएँ, समाज की वन्दनवार हैं। ये इस्तेमाल की जाती हैं, समाज के उत्सवों को श्वास देने के लिए। ये काम आती हैं, समाज की उदासी में मुस्कान भरने के लिए। इन्हें निमंत्रित किया जाता है, समाज का सिंगार करने के लिए। लेकिन जब कोई आपदा आती है तब इन वन्दनवारों को कोई नहीं बचाता। किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि जिन तोरणद्वारों से आते-जाते शुभाशीष लिया है, उनका जीवन भी संकट में है।
वन्दनवार भागते-दौड़ते लोगों के माथे चूम-चूमकर अपने अस्तित्व की याद दिलाती हैं, आपदा से लड़ने के लिए भागते हुए समाज को आशीष देने का कर्तव्य निभाती रहती हैं। समाज को, यह मस्तक चूमकर आशीष देना, अखरने लगता है। वन्दनवार माथे चूम-चूमकर टूट जाती हैं और समाज इस जर्जर शुभकामना को छोड़कर स्वयं को सुरक्षित करने में व्यस्त हो जाता है।
आपातकाल व्यतीत करने के बाद, जब तक समाज लौटता है, तब तक उसके मंगल की कामना करते-करते वन्दनवार प्राण त्याग चुकी होती है।
समाज सामान्य होने लगता है और वन्दनवारों की नई पीढियाँ उनके द्वार-देहरियों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। इसी प्रक्रिया में कुछ वन्दनवारों के वंश समाप्त हो गए। कठपुतली, नौटंकी, तमाशा, क़व्वाली, नट और न जाने कितने वंश लुप्तप्रायः हैं।
सुना है, ‘सब कुछ सामान्य होने के बाद’ समाज इन वंशों के अवशेषों को महंगे दाम पर बेचता है। सुना है, कला की क़ीमत तब बढ़ती है, जब वह मर जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

पुराण साक्षी है

लंका, इसलिए नष्ट हुई क्योंकि वहाँ लंकेश की आलोचना को अपराध माना गया और रामराज्य इसलिए ख्यात हुआ क्योंकि वहाँ आम धोबी को भी राजा के आचरण पर प्रश्न पूछने का अभय था।
पुराण साक्षी है, कि जब भी कोई विभीषण शत्रु का सहयोगी बना है तो इसके मूल में किसी रावण द्वारा किया गया तिरस्कार ही उत्तरदायी रहा है। पुराण साक्षी है, कि जब भी किसी बाली ने सुग्रीव को ऋष्यमूक पर्वत पर छिपने के लिए विवश किया है, तब बाली के भय से थरथराने वाला सुग्रीव ही बाली के विनाश का कारण बना है।
राजनीति को द्रोह और आलोचना के मध्य अंतर करने का विवेक होना चाहिए। आलोचना को सुनना और द्रोह को युक्तिपूर्वक अशक्त कर देना राजा का कर्तव्य है। साकेत में भी मंथरा थी, जिसका द्रोह सिद्ध भी था, तथापि रघुकुलवंशियों ने अपनी मर्यादा में रहते हुए उसको कथा से लुप्त कर दिया।
जब आपका आचरण मर्यादित होता है तो शत्रु का आत्मबल ध्वस्त हो जाता है। नैतिक बल से बड़ा कोई अस्त्र नहीं होता। पाण्डव युद्ध जीतकर भी श्रद्धेय न हो पाए, किन्तु राम को, उनके आचरण ने पूज्य बना दिया।
राम और रावण में मूल अंतर यही था कि रावण के शिविर में चाटुकारिता को साधुवाद मिलता था जबकि राम के शिविर में मन्त्रणा को सम्मान मिलता था। राम ने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शत्रु जैसा आचरण करना स्वीकार नहीं किया।
महाभारत में भी राजनीति की पाठशाला के ऐसे ही सहज अध्याय पढ़ने को मिलते हैं। पाण्डवों के दल में सबसे कटुवक्ता श्रीकृष्ण थे। वे पाण्डवों की नीतियों और योजनाओं की उन्मुक्त आलोचना करते थे, तथापि पाण्डवों के लिए वे सर्वदा स्तुत्य रहे। उधर कुरुसभा में कटुभाषण करनेवाले महात्मा विदुर सदैव हेय दृष्टि से देखे गए।
पुराण साक्षी है, जिस सभा में भीष्म और द्रोण, विदुर का हश्र देखकर मौन रह गए उस सभा का कोई महारथी जीता न रहा, जिस सभा में माल्यवान रावण के स्वर से ऊँची आवाज़ उठाने में चूक गए, उस सभा का कुलनाश हुआ है।
विभीषण के लिए यह कदापि शोभनीय नहीं है कि वह अपने राजा और कुनबे को विपत्ति में छोड़कर शत्रु से जा मिले, किन्तु रावण को भी यह समझना होगा कि विपत्ति के समय विभीषण सरीखे सत्यवक्ताओं के कटुभाषण की सर्वाधिक आवश्यता होती है।
सबसे सफल राजा वही है, जो राज्य को किसी और कि धरोहर मानकर राजकाज करे। यदि धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों ही राम और भरत से प्रेरणा लेकर हस्तिनापुर को किसी की धरोहर मान लेते तो कुरुवंश का नाश न हुआ होता।
पुराण साक्षी है कि जब धृतराष्ट्र नेत्रहीन हो तो उसे विदुर से विमुख नहीं होना चाहिए क्योंकि राजसभा में अपमानित होने की क़ीमत पर भी सत्य बोलनेवाले हितैषी बहुत भाग्य से मिलते हैं। यदि सत्य की परतें खोलकर प्रत्यक्ष की वास्तविकता दिखानेवाले विदुर का सम्मान करने से चूक जाएँ तो भी घटनाओं का यथावत वर्णन करनेवाले संजय का सम्मान करना तो सीख ही लें क्योंकि यदि संजय ने धृतराष्ट्र के मन-मुताबिक़ घटनाओं का वर्णन किया, तो हस्तिनापुर कभी न जान पाएगा कि कब उसकी महारानी नपूती हो गई है, और कैसे उसकी मेधा उसकी राजहठ के कारण शरशैया पर जा लेटी है।
✍️ चिराग़ जैन

पीछे-पीछे आता है सुख

सुख, कुछ ढूंढने में नहीं है। कुछ ढूंढने के लिये तो एषणा का आधार चाहिए, कुछ ढूंढने का अर्थ है कि इच्छाओं की विषबेल पोषित हो रही है। सुख और इच्छा बिल्कुल विपरीत तत्व हैं। इच्छाओं की पगडंडी सुख के आगार तक पहुँच ही नहीं सकती।
सुख तो स्वीकार्यता से जन्मता है। अपने वर्तमान को स्वीकार कर लेना, सुख के शिखर का पहला सोपान है। अपनी परिस्थितियों से एकाकार हो जाना न्यूनतम अर्हता है सुखी होने की।
तथागत के नयन निमीलित इसीलिए हैं कि वे बहुत दूर दिखनेवाली मरीचिका को देखने से निषिद्ध हैं। वे ऊतनी भर पलकें खोले हैं, जिनसे वर्तमान पल को देखा जा सके। वर्तमान के सौंदर्य को निहारा जा सके। भविष्य की तलाश वर्तमान के सौंदर्य को अनदेखा कर देती है।
हम न जाने क्या ढूंढते-ढूंढते कहीं खो गए हैं। हम किसी कल्पना की आस में वास्तविकता का अपमान किये चले जा रहे हैं। इसलिए तलाशो मत, जो हाथ में है उसे जी लो। अगर हाथ ख़ाली हों, तो इस ख़ालीपन को ही जी लो। यह रिक्तता किसी पूर्ति की आशा से कहीं अधिक आनंददायी है।
उपलब्ध को अनदेखा करके अभीष्ट के लिए कसमसाना, अतिक्रमणवादी का चलन है। कोई महावीर इसकी अनुशंसा नहीं करता, कोई बुद्ध इसका समर्थन नहीं करता, किसी जीसस के आचरण से ऐसी प्रेरणा नहीं मिलती। गीता में जिसे स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वह इस प्रवृत्ति की विलोम मनोदशा है।
कृष्ण अपने वर्तमान को जीते रहे। उन्होंने जिस पल को जिया उसी में रम गए। वृंदावन में गैया चराते कान्हा को देखकर यह अनुमान कर पाना कठिन था कि यही व्यक्ति एक दिन राजनैतिक महाभारत का केंद्र बिंदु होगा। वृंदावन में रास रचाते कन्हैया को देखकर यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि यही किशोर इंद्रप्रस्थ और द्वारका जैसे नगर बसाएगा। इसलिए वर्तमान को देखकर भविष्य का अनुमान लगाने में ऊर्जा नष्ट न करो। कृष्ण ने वृंदावन में महाभारत नहीं किया। वह पल रास का पल था। वह क्षण बाँसुरी का क्षण था। तब भरपूर रास रचाया गया। तब भरपूर बंसी बजाई गई। और इतना रास रचा लिया कि जब मथुरा-गमन हुआ तो रास की कोई आकांक्षा उनके पैर न पकड़ पाई। जब कुरुक्षेत्र के मौदान में रथ हाँका तब बंसी के स्वरों ने उनकी स्मृतियों में व्यवधान उत्पन्न नहीं किया।
वर्तमान को जीनेवाला भविष्य की चिंताओं से तो मुक्त होता ही है, अतीत की स्मृतियों से भी अछूता रहता है।
जिसने बचपन पूरा जी लिया, उसका यौवन तृप्त होता है, और जिसने यौवन भरपूर जी लिया उसका बुढ़ापा भव्य होता है। भरपूर बचपन जीकर युवा होनेवाला व्यक्ति बचपन के अभावों से दुःखी नहीं रहता।
जब आप भरपेट भोजन करते हो, एक-एक कौर का स्वाद लेकर भोजन करते हो, तो फिर भोजन का वह क्षण आपकी स्मृतियों का स्थान नहीं घेरता। लेकिन जब आपको भरपेट भोजन न मिल सका हो, जब आपकी थाली आपकी क्षुधा को पूर्ण न कर पाई हो, या जब आपने दूसरे की पत्तल में झाँकते हुए भोजन किया हो; तब वह कष्ट आपको ज़रूर याद रह जाता है। इसलिए वर्तमान को भरपूर जीना ही एकमात्र उपाय है। इसमें कुछ सकारात्मक और नकारात्मक है ही नहीं। जो है वह सच है। सत्य केवल सत्य है। उसमें कुछ अच्छा या बुरा नहीं है। उसमें कोई सौभाग्य या दुर्भाग्य नहीं हो सकता।
हर वर्तमान को एक दिन कथा हो जाना है। इस कथा में हम अपने क़िरदार में पूरी तरह पगे हुए दिखने चाहियें। जो अभिनेता अभी के दृश्य में आगेवाले दृश्य के संवाद बोलेगा, उसे मंच से उतार दिया जाएगा।
कोई नायक या खलनायक है ही नहीं। सब केवल अभिनेता हैं। नायक और खलनायक तो किरदार के नाम हैं। जो अपना क़िरदार ईमानदारी से निभाएगा, वह सुखी रहेगा। नायक से खलनायक के चरित्र की तुलना करनेवाले नादान लोग हैं। तुलना अभिनय की हो सकती है, किरदार की नहीं। किरदार तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
अपने किरदार के प्रति ईमानदार रहना ज़रूरी है, अन्यथा अपनी भूमिका सही से न निभा पाने की बेचैनी से नींद की खड़ी फ़सल को करवटों का पाला मार जाता है। सुख हमको ढूंढना तब शुरू करता है, जब हम सुख को ढूंढना बन्द कर देते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

दान का उपदेश

हम अजीब किस्म के नकारात्मक लोग हैं। हमें दूसरों पर उंगली उठाने की लत पड़ी हुई है। इस भयावह संकट के समय में भी आज सुबह से लोग अलग-अलग सेलिब्रिटीज़, अलग-अलग उद्योगपतियों और अलग-अलग राजनेताओं के नाम लिखकर लानत भेज रहे हैं कि संकट के समय वे अपनी पूंजी में से दान करके समाजसेवा क्यों नहीं करते?
हद्द है यार! ऐसी पोस्ट करनेवाले लोग एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं, जिसमें ख़ुद के शरीर का कोढ़ इग्नोर करके दूसरे पर कीचड़ उछालने में मज़ा आने लगता है। हमने सुना है कि तवायफ़ भी किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है, लेकिन ये इतने घृणित और नकारात्मक लोग हैं, जो अरथी उठाते हुए भी सबसे अलग स्टाइल में ‘राम नाम सत्य है’ का घोष करते हैं ताकि इनकी ओर ध्यान आकृष्ट हो सके।
किसी को दान करना होगा तो वह ढिंढोरा पीटेगा क्या? क्या इन फेसबुकियों के प्रमाण पत्र से ही किसी की मानवता सिद्ध हो सकती है। किसी भी सफल आदमी को गाली देने में इनको मज़ा केवल इसलिए आता है कि ऐसी हरक़त से इन्हें अपने जैसे विफल और घटिया लोगों के लाइक्स मिल जाते हैं।
मुझे बहुत खेद है कि आज पहली बार मैं इस प्रकार की भाषा प्रयोग कर रहा हूँ, लेकिन इस संवेदनशील समय में भी चरित्र हत्या और निजी प्रहार करके हीरो बनने की मानसिकता वाले लोग यदि कुछ अच्छा न भी बोल सकते थे, तो कम से कम मौन ही रह लेते।
इन बकवादियों से मेरा सीधा प्रश्न है कि आपने इस संकट की घड़ी में कौन-सी समाजसेवा की है? यदि आप देश की इस विकट पीड़ा से दुःखी हैं तो आपको अन्य लोगों के दान का हिसाब रखने की फुरसत कैसे मिल गई? और अगर आप स्वयं इस पीड़ा से विगलित नहीं हैं तो आपको अन्य लोगों पर उंगली उठाने का अधिकार कहाँ से मिल गया?
शर्म आनी चाहिए। देश का एक-एक नागरिक घुटन और त्रास में जी रहा है। सामान्य बुजुर्ग अपने नियमित उपचार के लिए अस्पताल नहीं जा पा रहे। एक-एक दाने को तरसते दिहाड़ी मजदूर एक अंतहीन यात्रा पर चले जाने को विवश हैं।
महंगे स्टूडियो में बेस्ट क्वालिटी के वीडियो बनानेवाले कलाकार अपने घर पर रॉ वीडियो बनाकर जनता का मनोरंजन करके उनका टाइम पास करने का प्रयास कर रहे हैं। चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राजनेता रात-दिन जागकर स्थितियों को नियंत्रित कर रहे हैं। आम आदमी बिना कोई शोर मचाए प्रधानमंत्री राहत कोष और अन्य सामाजिक संगठनों को अर्थ दान कर रहा है। डॉक्टर और नर्स अपनी फीस का लालच छोड़कर, दिन-रात फोन पर लोगों की समस्याओं का निदान बता रहे हैं। पत्रकार स्काइप और अन्य तकनीकों के माध्यम से पत्रकारिता करके जनता तक सूचनाएँ पहुँचा रहे हैं। पुलिसवाले लोगों को सख्ती से घर रहने के लिए भी कह रहे हैं और नम आँखों से भूखे-बेघरों को खाना भी बाँट रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों ने अपनी एक-एक दिन की तन्ख्वाह दान कर दी है। गुरुद्वारे के कारसेवक पीठ पर टंकी बांधकर सड़कों को सेनिटाइज़ कर रहे हैं। साधु-संत टेलिविज़न के माध्यम से अपने अनुयायियों से संयत रहने की अपील कर रहे हैं। यहाँ तक कि जेल में बंद कैदी भी दिन-रात एक करके मास्क बना रहे हैं ताकि देश में मास्क की कमी न होने पाए।
लेकिन इन नकारात्मक मस्तिष्कों के मोबाइल में ऐसी एक भी पोस्ट नहीं आएगी, जिससे इन्हें लगे कि इस देश की जनता इस दुःख की घड़ी में बिना किसी निजी स्वार्थ के परस्पर सहयोग की भावना से पगी हुई है। इन्हें केवल दूसरों के चरित्र पर उंगली उठाकर लाइक और कमेंट बटोरने से मतलब है।
सही कहा था बाबा तुलसी ने- ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!’

✍️ चिराग़ जैन

‘वर्चस्व’ के लिए ‘अस्तित्व’ से खिलवाड़

विपत्ति मनुष्य को उसकी लापरवाही पर ध्यान देने का अवसर देती है। संभवतः किसी भी समय में किसी भी पीढ़ी के पास यह अवसर नहीं रहा होगा कि कई-कई सप्ताह तक बिना कुछ काम किये रहा जाए और उससे कोई प्रत्यक्ष हानि न हो। हमेशा समय की कमी का रोना रोनेवाला मानव आज पूरी तरह फ़ुरसत में है। उसकी दुकान बंद है, लेकिन उसे कोई बेचैनी इसलिए नहीं है कि उसके ग्राहक का कहीं और जाने का भय नहीं है। उसकी फैक्ट्री बंद है, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके प्रतिद्वंद्वी की भी फैक्ट्री बंद है। फैक्ट्री ही क्या पूरा बाज़ार बंद है। बाज़ार ही क्या पूरा शहर बन्द है। शहर ही क्या पूरा देश बंद है। देश ही क्या पूरी दुनिया बन्द है। इतनी फ़ुरसत कभी किसी पीढ़ी के मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुई है।
जब इस फ़ुरसत में बोरियत से बचने के समस्त उपायों से बोर हो जाएंगे तब दुनिया पलटकर देखेगी कि जिन कार्यों में हम अब तक इतने व्यस्त थे, वे सब तो हमारे इस संकट में हमारी सहायता कर ही नहीं पा रहे हैं। हम युद्ध की तैयारियों के लिए भयावह अस्त्र-शस्त्र बना रहे थे, लेकिन फिलहाल उनकी कोई सुधि ही नहीं ले रहा है। हम अपने थोथे अहंकार की पुष्टि के लिए समाज को ऊँची-नीची जातियों की अनुसूची में बाँट रहे थे, लेकिन महामारी का यह रक्तबीज न तो अनुसूचित जातियों को बख़्श रहा है न ही अनुसूचित जनजातियों को। हम उनके धर्मस्थल से ज़्यादा भव्य अपना धर्मस्थल बना रहे थे लेकिन यह महामारी मंदिर के फ़र्श से लेकर, मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद है। हम घोटाले और घपले कर-कर के पूंजी बना रहे थे लेकिन आज हमारे पास उस पूंजी को ख़र्च करने का उपाय नहीं है। जो एक बड़ा भूखंड विजय कर चक्रवर्ती बने फिरते थे, वे आज दो कमरों के फ्लैट में बंद हैं। जिनके पास हर काम के लिए नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में ख़ुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं। कितना आश्चर्य है कि सुख के समय में हम अमीर, ग़रीब, हिन्दू, मुस्लिम, सवर्ण, अछूत, शहरी, ग्रामीण, गोरे, काले, साक्षर, निरक्षर, स्त्री, पुरुष और न जाने क्या-क्या संज्ञाएँ तथा विशेषण ओढ़े फिरते हैं; लेकिन दुःख आते ही हम सब ख़ालिस मनुष्य हो जाते हैं।
दो-दो महायुद्ध झेलने के बाद यूरोप ने यह सबक लिया कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किसी भी सरकार का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। सत्ता और वर्चस्व की होड़ में विनाश के भयावह दृश्य देख लेने के बाद यूरोप के देशों ने अपनी सीमाओं पर ख़र्च होनेवाले धन का अधिकतम अंश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर लगाना शुरू किया।
कोरोना के विरुद्ध जारी इस महायुद्ध के समय में हम यह संकल्प तो ले ही सकते हैं कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन तो अवश्य ही हों। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सभी दल जब ‘वर्चस्व’ की लड़ाई लड़ें तो उसका बोझ उस बजट पर न पड़े जो जनता के ‘अस्तित्व’ की रक्षा के लिए निर्धारित हो। युद्ध के लिए अस्त्र ख़रीदे भी जाएँ और बनाए भी जाएँ, लेकिन उन हथियारों को ख़रीदने के लिए किसी अस्पताल या किसी स्कूल का बजट एडजस्ट न किया जाए। हमारा राष्ट्रीय ध्वज मंगल पर भी फहराए और चांद पर भी फहराए; लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोनेवाला कोई परिवार फाके तो नहीं कर रहा।
इन स्थितियों के लिए न तो मैं किसी सरकार पर दोषारोपण करना चाहता हूँ, न ही जनता पर। हमारी प्राथमिकताएँ क्या हों, यह हमें कोविडकाल चीख़-चीख़कर बता रहा है। पीछे पलटकर किसी से शिकायत करने जाने की संभावना शेष नहीं है। अशोक जब कलिंग के बाद संन्यास के पथ पर चले होंगे तब उन्होंने अपने वर्तमान को देखकर ही निर्णय लिया होगा; यदि वे अतीत से उलझते तो अतीत उन्हें कभी भविष्य सुधारने की मोहलत नहीं देता।
मैं वर्तमान को परिवर्तन का कलिंग युद्ध मानकर एक शांत और सुखद भविष्य की ओर क़दम बढ़ाने की संस्तुति करता हूँ। वर्तमान हमें बता रहा है कि लॉकडाउन की इस परिस्थिति में हमारे पास एक ऐसा पुख्ता तंत्र होना चाहिए था कि सरकार कम्प्यूटर पर सबकी यूनीक आईडी के माध्यम से चिन्हित कर पाती कि एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों में से कितने ऐसे हैं जिनके व्यवसाय के कॉलम में ‘दिहाड़ी मजदूर’ लिखा है। यूनिक आईडी के माध्यम से सरकार उन सबके परिवारों की पहचान आसानी से कर लेती और उनके खाते में आवश्यक राशि पहुँचाकर उन्हें मरने से बचा लेती।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारे पास न्यूनतम शिक्षा के साथ-साथ सिविक सेंस विकसित करने की भी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि सरकार को जनता की भलाई के लिए उस पर लाठियाँ न भाँजनी पड़ें।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं के पास इतनी व्यवस्था अवश्य हो कि यदि किसी संकट की घड़ी में पाँच प्रतिशत जनसंख्या किसी महामारी, प्रदूषण, रोग, युद्ध आदि से प्रभावित हो जाए तो उनके उपचार में बाधा न आए।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि सरकार के पास ऐसे अधिकार हों कि ऐसी आपदा के समय निजी विमानन कम्पनियों, निजी अस्पतालों, निजी फार्मा कंपनियों, निजी टेलीकॉम कंपनियों, निजी मीडिया चैनल्स, निजी रिटेल स्टोर्स आदि को सरकारी नियंत्रण में लेकर जनहित में प्रयोग किया जा सके।
जो लोग निजीकरण की वक़ालत करते फिरते हैं, उनसे वर्तमान स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि जब बस्ती में आग लगती है तब व्यापारी केवल अपनी दुकान बचाता है और जैसे ही उसकी दुकान सुरक्षित होती है तो वह पानी की बाल्टियाँ बेचकर बस्ती में धंधा करने लगता है। राजनैतिक दल उस समय आग बुझाने का दिखावा करते हैं ताकि चुनाव के समय बस्ती में वोट मांगने का अधिकार मिल सके। केवल सरकार ही है जो पूरी बस्ती की आग बुझाने के लिए प्रयास करती है।
यह भीषण समय बीतने के बाद यदि हम अपनी मानवता को बलिष्ठ करके घरों से बाहर निकले तो ‘दुनियाबन्दी’ की दुर्घटना मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी; लेकिन इसके बीतते ही यदि हम फिर से ‘मनुष्य’ की बजाय कोई भी अन्य संज्ञा लपेट बैठे तो कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई में शहीद हुए लोगों के बलिदान और हफ़्तों तक घरों में बंद रहकर अवसाद झेल रहे देश की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

Published in Dainik Jagaran of 31 March 2020

हँसना बहुत ज़रूरी है

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कोरोना, दहशत का सबब बन गया है। अमरीका, चीन और इटली जैसे देशों ने सख्ती के साथ जनता को घरों में बन्द कर दिया है। भारत में भी सरकार को कमोबेश सख्ती बरतनी पड़ रही है।
दरअस्ल अनवरत भागती-दौड़ती ज़िन्दगी को टिककर बैठने का अभ्यास ही नहीं रहा है। तेज़ दौड़ती गाड़ी के ड्राइवर को यमुना एक्सप्रेसवे से उतरकर जब आगरा की गलियों में गाड़ी चलानी पड़ती है तो उसे बड़ी कोफ़्त होती है। कुछ ऐसी ही कोफ़्त घर बैठे कामकाजी लोगों को भी हो रही है।
उधर टेलिविज़न के प्रत्येक न्यूज़ चैनल पर चौबीस घण्टे केवल कोरोना ही चल रहा है। कोरोना से संक्रमित लोगों का आँकड़ा, कोरोना से मरनेवालों का आँकड़ा, कोरोना से बचनेवालों का आँकड़ा, लॉकडाउन का सम्मान न करनेवालों की पिटाई, लॉकडाउन का सम्मान करने के लिए सेलिब्रिटीज़ की अपीलिंग वीडियो -इनके अतिरिक्त कुछ नहीं है इन चौबीस घण्टे के पत्रकारों के पास।
जीवन पत्रकारों का भी उतना ही महंगा है, जितना बाक़ी दुनिया का। मीडिया हाउसेज को चाहिए कि इस आपातकाल में अपने न्यूज़ बुलेटिन को चौबीस घण्टे से घटाकर सुबह, दोपहर और शाम को एक-एक घण्टे तक सीमित किया जाए। शेष समय अपने पुराने सुपरहिट शो चलाएँ। यदि कोई महत्वपूर्ण सूचना या जानकारी प्रसारित करनी हो तो रनिंग प्रोग्राम को रोककर, वह सूचना दे दी जाए।
ऐसा करने से अनेक लाभ होंगे, एक तो हमारी ज़िम्मेदार मीडिया को एक-एक नाकाबंदी पर जाकर पुलिसवालों से लोगों को पीटने, प्रताड़ित करने और समझाने की रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ेगी। ऐसे चमत्कार होने बन्द हो जाएंगे कि जब मीडियावाले कैमरा लेकर पहुँचें, ठीक उसी वक़्त विशेष किस्म के बदतमीज़ लोग पुलिसवालों के हत्थे चढ़ें। सारा दिन कोरोना का रोना सुनकर घर बैठी जनता का मानसिक तनाव नहीं बढ़ेगा और अन्य ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रम देखकर उनका ध्यान विकेन्द्रित होगा।
दूसरे, सोशल मीडिया पर अफ़वाह फैलने से रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा जारी व्हाट्सएप हेल्पलाइन के अतिरिक्त कोरोना से सम्बद्ध किसी भी जानकारी का भरोसा न किया जाए। देश में सृजनात्मक लोगों की बहुतायत है। ये लोग टिकटॉक, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि के माध्यम से घर बैठे लोगों का मनोरंजन करें। ‘लॉकडाउन’ के समय अनेक हास्य प्रधान वीडियो आ रहे हैं। इनसे निश्चित रूप से लोगों का तनाव कम हो सकता है। गीत, हास्य, संगीत, सृजन, मोटिवेशन, शेरो-शायरी, फोटोग्राफी, ऐतिहासिक जानकारी, वैज्ञानिक जानकारी, पौराणिक तथ्य आदि के माध्यम से हम घर बैठी जनता की समय बिताने में सहायता कर सकते हैं।
हास्य प्रधान मनोरंजन सामग्री इस समय देश की जनता को एकांत से उत्पन्न होनेवाले तनाव से सुरक्षित रखेगी। गीत, जनता की संवेदनाओं को सजग और सक्रिय रखने में सहयोगी होंगे। संगीत जीवन के प्रति विरक्ति से बचाए रखेगा। तथ्यात्मक और रोचक जानकारियाँ, जिज्ञासाओं को बचाए रखने में मदद करेंगी। हमारे घरों में लोकगीत, लोक कहावतों, लोक संस्कृति के अनेक चिन्ह आज भी मौजूद हैं। इन प्रतीकों को पहचानकर लोगों से सोशल मीडिया पर साझा करें तो भारत की लोक संस्कृति को पुष्ट करने में ये 21 दिन कारगर साबित होंगे।
तनाव की चर्चा से तनाव और बढ़ता है। तनाव पर विजय प्राप्त करनी है तो स्वयं को संयत करना होगा और इसके लिए दहशत की त्यौरियों को पिघलाकर अधरों पर मुस्कान की प्रतिष्ठापना करनी ही होगी। कोरोना से लड़ने के लिए हम सब घरों तक सीमित हो गए हैं। सरकार, पुलिस, अस्पताल, सफाईकर्मी, मीडिया और जनता मिलकर कोरोना का विध्वंस करने का युद्ध लड़ रहे हैं लेकिन घर के भीतर उदासी और बोरियत उत्पन्न न हो इसके लिए ठहाकों का उत्सव जारी रखना हम सबका कर्तव्य है।
21 दिन बोर होकर काटने से बेहतर है कि 21 दिन हँसते-गाते बिता दिए जाएँ। इन 21 दिनों में हमें आपस में मिलने-जुलने से मना किया जा रहा है लेकिन दिलों के मिलने-जुलने पर कोई रोक नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन

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