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मतदान क्यों ज़रूरी है

राजनीति किसी भी दल की हो, उसकी बदतमीज़ी जनता की निष्क्रियता के बल पर ढिठाई बनने लगती है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में ‘मतदान’ ही एकमात्र अस्त्र है जो जनता के पास है। शेष तंत्र से हताश होकर इस अस्त्र को भी नष्ट कर देना, भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने जैसा है।
जिस क्षेत्र की जनता पूर्ण मतदान कर देगी, उसकी अभिरुचियों और आकांक्षाओं को अनदेखा करना किसी भी दल के लिए असंभव होगा। मध्यमवर्ग की ज़रूरतें किसी भी राजनैतिक दल की वरीयता सूची में इसी कारण नहीं शामिल हो पातीं क्योंकि मध्यमवर्गीय नागरिक मतदान प्रक्रिया से सर्वाधिक उदासीन हैं। राजनीति हमें लोकतंत्र से बाहर करना चाहती है, ताकि अपने कैडर और कार्यकर्ताओं के वोट से ही विधानसभाओं और संसद की सूरत तैयार हो सके। आम मतदाता यदि वोटिंग की प्रक्रिया से न जुड़ा तो उसकी ओर किसी का ध्यान न जाएगा।
इस देश में, आयकर देनेवालों से किसी सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसीलिए बजट बनाते समय आयकर देनेवालों को ही घोड़े से खच्चर बनाया जाता है। इस देश में नियमों का पालन करनेवाले भी सरकार के किसी काम के नहीं हैं, इसीलिए पूरी न्याय व्यवस्था अपराधियों के बचाव में जुट जाती है और पीड़ित को सिद्ध करना पड़ता है कि उसके साथ अपराध हुआ है।
लेकिन इस देश में वोट देनेवाले से हर सरकार को फ़र्क़ पड़ता है, इसीलिए झुग्गियों की पीड़ा हर पार्टी सुन पाती है और हाउस टैक्स भरनेवाला बेचारा दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगाकर टूट लेता है; इसीलिए अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाता है और बिल्डरों को पूरी क़ीमत चुकानेवाला नागरिक किराये के मकान में रहकर, अदालतों के चक्कर काट रहा है। वोट को अनावश्यक समझोगे तो राजनीति के लिए अनावश्यक हो जाओगे। इस देश के लिए न सही, लोकतंत्र के लिए न सही; अपने अस्तित्व के लिए ही सही, वोट ज़रूर डालें।
इससे पहले कि लोकतंत्र फीका हो जाए, अपनी उंगली पर नीला निशान लगवा आओ।

✍️ चिराग़ जैन

कवि प्रदीप

भारतीय सिनेमा की बुनियाद में जो नगीने जड़े हुए हैं, उनमें कवि प्रदीप भी एक हैं। जिन दिनों स्वाधीनता संग्राम चरम पर था, तब भारतीय सिनेमा भी राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। जनता में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भरने के लिए सिनेमा ब्रिटिश हुक़ूमत के खि़लाफ़ मुखर हो उठा।
सन 1940 में बंधन फ़िल्म के लिए कवि प्रदीप ने हिम्मत से भरी चेतावनी को गीत में पिरो दिया। गीत के बोल थे, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है’! यही भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मूल स्वर भी था। अपनी क़लम के इस तेवर से जब वे ब्रितानिया हुकूमत की आँखों में खटकने लगे तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें भूमिगत रहना पड़ा।
प्रदीप जी की लेखनी आमूल-चूल राष्ट्रबोध से सुसज्जित थी। युवाओं में जोश भरने के लिए ‘चल-चल रे नौजवान’ भी लिखा और बच्चों को भारत का दर्शन कराने के लिए ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की’ भी लिखा; गांधीहत्या से आहत होकर ‘दे दी हमें आज़ादी’ भी लिखा और गिरते हुए मानवीय मूल्यों से त्रस्त होकर ‘आज के इस इंसान को ये क्या हो गया’ भी लिखा; आज़ादी की क़ीमत ज़ाहिर करने के लिए ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ भी रचा और भारत-चीन युद्ध के शहीदों को नमन करते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ भी लिखा। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसा उत्साहवर्धक गीत भी प्रदीप जी की ही लेखनी का वरदान था और ‘सैंया प्यारा है अपना मिलन’ सरीखा प्रेमगीत भी उसी लेखनी का क़माल है।
कवि प्रदीप ने फिल्मों में कुछ गीत गाए भी हैं- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’; ‘पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’ और ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ’ जैसे गीत उनके कण्ठ से सँवर उठे हैं।
जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में चीन युद्ध के शहीदों की याद में कार्यक्रम आयोजित हुआ, तब लता जी ने एक गीत प्रस्तुत किया- ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आँख में भर लो पानी’; भावुक माहौल में वह गीत लोगों के दिल को छू गया। प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की आँखें छलछला आईं। पण्डित जी ने अधिकारियों से कहा कि इस गीत के रचनाकार को बुलाओ। अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया। इतना सुनते ही पंडित जी नाराज़ हो गए, और अधिकारियों को डाँटते हुए बोले- ”कवि की कविता इस्तेमाल करते हो और कवि को निमंत्रण भी नहीं भेजते।“
सुनते हैं कि नेहरू जी पहली फ़ुरसत में ही मुंबई जाकर कवि प्रदीप से मिले, उस गीत की रचना के लिए उन्हें बधाई दी और अधिकारियों की लापरवाही के लिए क्षमा मांगी। समंदर के किनारे बैठकर माचिस की डिब्बी पर लिखा गया विचार एक अमर गीत में कैसे तब्दील हुआ यह कहानी कवि प्रदीप ने लम्हा-लम्हा जी है। भारतीय गीतों के इतिहास में कवि प्रदीप का योगदान नक्षत्रों के चूर्ण से अंकित है।

✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्र का बकासुर

यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को बचाए रखने के लिए एक बार में किसी एक प्रदेश की भेंट दे दी जाए। यूँ भी गाँव को बकासुर के आतंक से बचाने के लिए स्वतः ही एक व्यक्ति को बकासुर की भेंट चढ़ा देने के क़िस्से हमें सुनाए गए हैं। शोले में गब्बर सिंह जी ने भी यही समझाया था कि – ‘राजनीति के प्रकोप से हमें अगर कोई बचा सकता है तो वह स्वयं राजनीति ही है। अगर इसके बदले में राजनीति एक बार में एक प्रदेश को तहस-नहस कर देती है तो इसमें क्या बुराई है!’
हमारा लोकतंत्र देश के एक प्रदेश को छकड़े पर लादकर बकासुर के द्वार तक पहुँचा देता है। राजनीति प्रदेश का शिकार करने से पहले उसके साथ किलोल करती है। हम इस किलोल में बकासुर की सहृदयता, देशभक्ति, जनहित-भावना, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ढूंढने लगते हैं। देर तक बकासुर हमें दौड़ाते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम वह भेंट है जिसे कच्चा चबाकर यह असुर अपना पेट भरेगा। जब हम यह बात पूरी तरह भूल जाते हैं तब मुस्कुराते हुए बकासुर ठहाका लगाते हैं, हम कालिया और उसके साथियों की तरह ठहाके में डूब जाते हैं, पूरे वातावरण में शिकार और शिकारी के ठहाके गूंजने लगते हैं और फिर ठांय-ठांय-ठांय की आवाज़ के साथ सिनेमाघर में सन्नाटा पसर जाता है और बकासुर अगली भेंट के स्वागत में खर्राटों का स्वागत-गान गाने लगता है।
बकासुर कहते हैं ‘शू गाय’; हम गाय बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू लिंगायत’; हम धर्म बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू धर्मनिरपेक्षता’; हम मानवता बचाने दौड़ पड़ते हैं। ‘शू सीएए’; ‘शू जनलोकपाल’; ‘शू शाहीन बाग़’; ‘शू पैट्रोल के दाम’; ‘शू प्याज़’; ‘शू चौकीदार’; ‘शू पप्पू’; ‘शू मफ़लर’; ‘शू चायवाला’; ‘शू खाँसी’; ‘शू सीलिंग’; ‘शू पद्मावत’; ‘शू पटेल आरक्षण’; ‘शू जाट आरक्षण’; ‘शू गुर्जर आरक्षण’; ‘शू जीएसटी’; ‘शू बिहारी’; ‘शू पंद्रह लाख’; ‘शू हिन्दू राष्ट्र’; ‘शू गांधी’; ‘शू गोडसे’; ‘शू सावरकर’; ‘शू पटेल’… सरदार बोलता है और हम भागने लगते हैं। हमें लगता है सरदार खुश होगा, शाबासी देगा! लेकिन सरदार ठाने बैठा है कि उसने हमें कहाँ पहुँचाना है। सरदार जानता है कि जो डर गया वो मर गया। इसलिए सरदार हिंदुओ को बताता है कि मुसलमान तुम्हें मार देंगे। मुसलमानों को समझाता है कि हिन्दू तुम्हें भगा देंगे। सरदार कालिया को बताता है कि पद्मावती रिलीज़ हो गई तो संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा। कालिया पद्मावती की रिलीज़ रोकने के लिए जान दे देता है। कालिया के मरते ही सरदार पद्मावती को पद्मावत बनाकर रिलीज़ करवा देता है।
हर बकासुर अपने शिकार को बताता है कि फलां पार्टी का बकासुर शिकार की एक-एक उंगली को तोड़-तोड़ कर खाता है। मैं इतना निर्मम नहीं हूँ कि अपने शिकार को दस बार अलग-अलग नोचूँ। मैं एक ही बार में पूरी बाँह उखाड़ कर चबा जाता हूँ। इतनी करुणा देख हमारी आँखें भीग जाती हैं और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बाँह आगे बढ़ा देते हैं ताकि करुणा का यह पुंज हमारी बोटियाँ नोचकर, हमें उंगलियाँ चबानेवाले बकासुर से बचा ले!

✍️ चिराग़ जैन

वसंतोत्सव

सृष्टि के समस्त सर्जकों को सृजन की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अनवरत आशीष मिले!
वसंत की पहली दस्तक और सरस्वती पूजन के पर्व का सुयोग इस बात का द्योतक है कि सौंदर्य और सकारात्मकता ही सृजन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं।
प्रकृति पर आच्छादित वासंती रंग की सुवास श्वास के साथ घुलकर मन को स्वस्थ करे ताकि सृजन का मानस स्वस्थ हो और तूलिका, लेखनी, वाद्य, कण्ठ, अंगुलियाँ, हथेलियां और ओष्ठ सब कुछ सकारात्मक हो उठे!
बाँस को बाँसुरी न बनाया गया तो वह या तो हथियार बन जाएगा या ज्वाला को जन्म देगा!

✍️ चिराग़ जैन

बहुत टॉप रमेश मुस्कान

ज़िन्दगी जीने के एक रवैये का नाम है – ‘रमेश मुस्कान’! आडम्बर, झूठ, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और औपचारिकता से रहित एक सहज, प्रसन्न, उन्मुक्त और संतुष्ट जीवन का सटीक उदाहरण है रमेश मुस्कान का जीवन।
मंच पर जमने और कविता लिखने की कला किसी से भी सीखी जा सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी तनाव से मुक्त रहने की स्थितप्रज्ञता सिखाने के लिए रमेश मुस्कान के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे आसपास नहीं है।
दृष्टि इतनी तेज़ कि सामने वाले की आँखों में यदि एक पल के लिए भी कोई रंग उतरा हो तो वह अनदेखा नहीं रह सकता। कान इतने तेज़ कि बात करने वाले के शब्दों की सरसराहट में छिपे हुए भाव की आहट भी सुन लें। आकलन इतना स्पष्ट कि उठने के अंदाज़ से किसी के गिरने की अवस्था भाँप लें और अन्वेषण इतना ईमानदार कि जो व्यक्ति अभी-अभी हानि पहुँचा कर गया हो उसके वार की भी प्रशंसा करने से न चूकें।
एक व्यक्ति के रूप में बेहद शानदार और एक कवि के रूप में उतने ही आलसी। शब्द चयन और अन्वेषण की विलक्षण क्षमताओं को देखते हुए अनेक नक्षत्रों ने ठहर कर इनके किसी परिधि पर आने की प्रतीक्षा की, लेकिन पूरी आकाशगंगा चक्कर खाती फिर रही है कि कोई ध्रुवतारा रंचमात्र भी हिले बिना कैसे प्रकाशमान रह पाता है!
जब कोई शुभचिंतक इनके लाभ के लिए इनके श्रमरूप का दर्शन करने की प्रतीक्षा करने लगता है तो ये और अधिक स्थिर होकर उस शुभचिंतक के थक जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रतीक्षाओं की इस स्पर्धा में आज तक रमेश मुस्कान विजयस्थल से टस-से-मस नहीं हुए हैं।
पर्यटन और बतरस उनके प्रिय चाव हैं। यदि पर्यटन का लोभ न होता तो कदाचित इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य के हाथ उतना भी ख़ज़ाना न लगा होता, जितने लिखे को ये महाशय बहुत माने बैठे हैं। बतरस में निश्चित ही इनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन माइक के समक्ष ये एकदम सीरियस हो जाते हैं और माइक के विकिरण से अपनी रक्षार्थ शीघ्रातिशीघ्र अपने आसन पर आ विराजते हैं। माइक से दूर होते ही मंच पर इनकी प्रत्युत्पन्नमति पुनः बांबी में से बाहर निकल आती है।
चूँकि लाभ और रमेश मुस्कान के मध्य आलस्य की एक गहरी खाई है, अतएव सत्य बोलते हुए इन्हें कभी डर नहीं लगता। ये जानते हैं कि कोई चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इस कार्य के लिए ये पूर्णतया आत्मनिर्भर हैं।
इतने सब के बावजूद एक सत्य अकाट्य है कि जिसके पास रमेश मुस्कान जैसा दोस्त हो वह कभी असफल नहीं हो सकता क्योंकि असफल होने के सारे रास्ते रमेश मुस्कान जानते हैं और अपने दोस्तों को कभी उन रास्तों पर जाने नहीं देते।

✍️ चिराग़ जैन

घने जंगल की एक शाम

तंज़ानिया की राजधानी दार-एस-सलाम में शानदार कवि-सम्मेलन सम्पन्न हो चुका था। वहाँ बसे भारतीयों का अपनत्व हमें सहज कर चुका था। यद्यपि इस यात्रा में पाठक जी हमारे मुख्य आयोजक थे लेकिन वहाँ बसे शेष भारतीयों ने भी हमें अकेलापन महसूस नहीं होने दिया।
एक सप्ताह में बेहद खूबसूरत पल जीने को मिले। आयोजकों का अपनत्व, हिंदी के प्रति डी एन पाठक जी का समर्पण, जितेंद्र भारद्वाज का कवि प्रेम, अजय गोयल और शिवि पाठक की काव्य प्रतिभा, पारुल जी की आवाज़, तंज़ानिया में भारत के राजदूत श्री संजीव कोहली जी की सहजता और स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक संतोष जी की सरलता।
तंज़ानिया स्थित स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में सविता मौर्या नामक एक महिला तंज़ानिया के स्थानीय बच्चों को हिंदी सिखाती हैं। सविता जी को यदि तंज़ानिया में हिंदी की मदर टेरेसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। वे अन्य प्रवासी भारतीयों की तरह अपनी आजीविका और घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं, किन्तु इस सब व्यस्तता से बचे सप्ताहांत को वे हिंदी की खेती में उपयोग करती हैं। अनेक वर्ष से यह कार्य अनवरत जारी है। इसके परिणामस्वरूप वहाँ हिंदी बोलने, समझने, लिखने और पढ़ने वाले तंज़ानियन बच्चों का एक समूह तैयार हो गया है। इस महती कार्य को करने वाली सविता जी यह सब अवैतनिक रूप से करती हैं। हाँ, बच्चों के आने-जाने के लिए बस के किराये की व्यवस्था वहाँ के प्रवासियों की श्स्वर्णगंगाश् नामक संस्था करती है और कक्षाओं के लिए स्थान की व्यवस्था स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में निःशुल्क की गई है।
हमने जब इन बच्चों को हिंदी बोलते सुना, हिंदी के गीतों पर भावपूर्ण नृत्य करते देखा, हिंदी सिनेमा के गाने गाते देखा और हिंदी में इनसे बात की तो लगा जैसे कोई स्वप्न साकार हो गया।
कितना कुछ यादों में क़ैद हो गया है। कवि सम्मेलन से पूर्व जब तंज़ानियन बच्चों ने किशोर कुमार के फिल्मी गाने गाए तो मन झंकृत हो गया। कवि सम्मेलन में सैंकड़ों लोगों ने लगभग दो घण्टे तक मुझे और अरुण जैमिनी जी को सुना और सराहा। हम दोनों को विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अगले दिन पाठक जी हम दोनों कवियों को लेकर कुंबु-कुंबु सेल्यूस नामक स्थान के लिए रवाना होनेवाले थे। सेल्यूस तंज़ानिया के उस घने जंगल का नाम है जहाँ सैलानी न केवल जंगल सफ़ारी के लिए जाते हैं बल्कि शिकार के शौकीनों के लिए इस क्षेत्र को स्वर्ग कहा जाता है। यह स्थान दार-ए-सलाम से 220 किलोमीटर दूर था।
रवानगी से ही अरुण जैमिनी जी और मैं रोमांचित थे। शिकार की बात सुनकर मन कुछ खिन्न अवश्य हुआ किन्तु इस बात की प्रसन्नता थी कि जिन वन्यजीवों को भारत में देखना सम्भव नहीं था, उन्हें उन्हीं की भूमि पर स्वच्छंद विचरते देख सकेंगे।
रास्ता लम्बा, ख़ूबसूरत, ऊबड़-खाबड़ तथा कहीं-कहीं भयानक भी था। कई घण्टे राजमार्ग पर चलने के बाद गाड़ी एक कच्ची-सी सड़क पर उतर गयी। शहर पीछे छूट रहा था और हम गहरे जंगल में समाए जा रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर घने पेड़ों के झुरमुठ थे। दिन का समय था लेकिन गाड़ी से उतरने की मनाही थी। मोबाइल का नेटवर्क साथ छोड़ चुका था। जंगल इतना घना था कि रिज़ॉर्ट का मालिक, जिसका नाम ‘अतीत’ था, वह पानी से लेकर बर्फ़ तक हर ज़रूरत की चीज़ गाड़ी में स्टोर करके चला था। वह स्वयं गाड़ी ड्राइव कर रहा था। उसने हमें बताया कि इस ख़राब सड़क पर दो या तीन टूर करने के बाद गाड़ी के काफ़ी सारे पुर्ज़े बदलवाने पड़ते हैं। उसकी बात सुनकर मैंने अरुण जी से आँखों ही आँखों में कहा कि हमें तो इसी टूर के बाद अपने पुर्ज़ों की जाँच करवानी पड़ेगी।
ख़राब सड़क पर रोड़वेज की पुरानी बस में जो खड़खड़ का पार्श्व संगीत बजता रहता है, वही संगीत इस शानदार एक्सयूवी में हमारा सहगामी बना हुआ था। लेकिन हमारा पथ-प्रदर्शक एक गुजराती युवा था जो हमसे अधिक वाचाल, सभ्य तथा उत्सवधर्मी था इसलिए पूरे रास्ते उसने कभी किशोर कुमार के गीतों से तो कभी उस घने जंगल के किस्सों से मन बहलाए रखा।
पाठक जी थोड़े अंतर्मुखी हैं, वे कम बोलते हैं किंतु चिड़चिड़े अभिभावकों की तरह मनोरंजन में व्यवधान उत्पन्न नहीं करते। उल्टे हर गतिविधि में अपने मौन के साथ उपस्थित रहते हैं।
यूँ तो कुंबु-कुंबु रिज़ॉर्ट पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गयी थी लेकिन अतीत भाई के आतिथ्य ने रास्ते भर इतनी आवभगत की थी कि भूख लगभग नदारद थी। लेकिन रसोई में सामर्थ्य हो तो वह अफारे में भी भूख जगा दे। यही हमारे साथ उस दिन हुआ। उस घने जंगल में जहाँ ध्यान भटकाने के लिए मोबाइल नेटवर्क नहीं था, वहाँ ग्रामीण आभा से सुसज्जित उस प्रांगण में ज्यों ही हम खाट पर पसरे, हमारे सामने छाछ के गिलास अवतरित हो गए। सफ़र की थकान में जी भर-भर छाछ गटकने के बाद हम बहुत दिन बाद मोबाइलहीन होकर मनुष्यों से बात कर पा रहे थे।
जंगल की दोपहरी, रिजॉर्ट का खुला आंगन, घने वृक्षों की छाँव में बिछी हुई खाटें, दो पेड़ों के तनों से बंधा हुआ आराम झूला और इस माहौल को भोगते हुए हम। दस मिनिट में ही खाना लगा दिया गया। पेट भरा होने के बावजूद इस निर्जन में ऐसी व्यवस्था करने वाले का अनुरोध टाला न जा सका। अचार से लेकर तरकारी तक, सबमें से थोड़ा-थोड़ा थाली में सजाया तो छप्पन भोग जैसा महसूस होने लगा। ‘जंगल में मंगल’ की अवधारणा का कुछ-कुछ अर्थ हमें समझ आ रहा था।
थकान, माहौल और अन्न ग्रहण के उपरांत पलकों ने झपकने की तैयारी कर ली। लेकिन हमारे होस्ट ने शायद हमारे आलस्य की सुपारी ले रखी थी। ज्यों ही हमने सुस्ताने की बात कही, वह बोल उठा कि एक बार रूफिजी का पानी देख लो, फिर सो लेना।
रूफिजी एक भव्य नदी है, जिसके किनारे यह रिज़ॉर्ट बना हुआ है। यह नदी सेल्यूस के बीच से बहती है। इसमें घड़ियालों और मगरमच्छों के झुंड आसानी से दिखाई दे जाते हैं। हम खाट से उठकर सौ क़दम ही चले होंगे कि हमें इस विशालकाय नदी के दर्शन हुए। प्रकृति को उसका अपना माहौल मिल जाए तो वह कितनी विराट हो जाती है, इस बात का अनुमान हमें नदी के तट पर खड़े होकर हुआ।
कुछ देर इस नदी के सौंदर्य को निहारने के बाद हम अंततः रिज़ॉर्ट में बने कमरों में आकर पसर ही गए। एकाध घण्टे की नींद; जिसे बेहोशी कहना अधिक समीचीन है; उससे ऊर्जा एकत्रित करके हमने चाय का एक सत्र चलाया। चाय पीते-पीते हमें बताया गया कि अब हम इससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत अनुभव से गुज़रने वाले हैं। हम शहरी लोगों के लिए यही स्थान कुंजवन सरीखा आनन्द उपलब्ध करा रहा था, अब इससे अधिक क्या होगा… यह हमारी समझ से परे था।
शाम हो रही थी… हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कल्पना कर रहे थे कि अब आगे क्या होगा। उधर रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों ने काफ़ी सारा सामान नदी तट पर रखी नाव में जमाना शुरू कर दिया। चाय समाप्त होते ही हमें भी एक दूसरी नाव में सवार कर दिया गया। यह नाव एक जानदार मोटरबोट थी, एक नाव में ढेर सारा सामान एक निश्चित दिशा में चल रहा था और दूसरी नाव में हमारा होस्ट हमें रूफिजी की लहरों पर रोमांच करा रहा था।
घड़ियालों से भरी नदी में सूर्य अस्त होने जा रहा था। हल्के बादलोंवाले आकाश में प्रदूषण से मुक्त संध्या अनगिनत रंग बिखेरकर जो दृश्य उत्पन्न करती है उसी के लिए ‘वर्णनातीत’ शब्द की सर्जना हुई होगी। रूफिजी का पाट इतना चौड़ा है कि एकबारगी समुद्र का भ्रम होने लगता है। हमारी मोटरबोट पूरी गति से डूबते हुए सूर्य की दिशा में दौड़ रही थी। पीछे नदी की लहरें मोटरबोट के वेग से एक विशेष आकार बनाते हुए नृत्य कर रही थीं। मोटरबोट पूरे उत्साह में भरकर डूबते सूरज को छू लेने को तत्पर थी और नदी उस तुच्छ मशीन का हाथ पकड़कर उसे रोक लेने को आतुर थीं। हम लहरों पर सवार थे, आँखों में प्रकृति का अनुपम सौंदर्य चमक रहा था, आगे का कार्यक्रम पता नहीं था इसलिए कहीं पहुँचने की जल्दी भी नहीं थी। जब तक सूर्य अस्त न हो गया तब तक हम इसी आनन्द में मग्न रहे। हमारा मोबाइल केवल कैमरा हो गया था।
इधर अंधेरा उजाले पर हावी होने लगा, और उधर हमारा केवट हमें रिज़ॉर्ट ले जाने की बजाय नदी के बीच उग आए एक रेतीले टापू पर ले आया। हम पहली बार इस तरह के टापू पर आए थे इसलिए टापू पर चढ़ने में हम दोनों को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी।
रात हो रही थी और हम निर्जन वन के बीच विशाल नदी पर बने एक टापू पर कुर्सी लगाकर बैठे थे। हमारे पैरों के नीचे हाल ही में बने किसी मगरमच्छ के पंजों के निशान थे। नदी में घड़ियालों की आँखें चमक रही थीं। पानी की गति का जो संगीत होता है, उसकी लय पर पूरा वातावरण अस्ताचल से निकलती धीमी रौशनी में नृत्य कर रहा था।
दूसरी नाव में लादकर टापू पर एक लाइव तंदूर (जिसे आजकल बारबिक्युनेशन बोलते हैं) लाया गया था। शाकाहारी स्नेक्स की दर्जनों वैरायटी के साथ सोमरस की भी व्यवस्था की गई थी। हमें बताया गया कि नॉनवेज खानेवालों के लिए नॉनवेज भी बनवाया जाता है। इसलिए हम दोनों के शाकाहारी होने की बात सुनकर हमारा होस्ट काफी निराश था।
बहरहाल, रात का सन्नाटा। और यह सन्नाटा आपकी कल्पना में उतरे किसी भी सन्नाटे से ज़्यादा रोमांचक था। छोटा सा रेत का द्वीप, उसके चारों ओर पूरे वेग से बहती नदी, नदी के चारों ओर अफ्रीका का घना जंगल, नदी के पानी में चमकतीं मगरमच्छ की आँखें, जंगल से आती शेर की आवाज़, चांदनी रात, तारों से भरा आकाश, सामने रखे तंदूरी आलू, हाथ में जाम और बराबर की कुर्सी ओर रखे सारेगामापा कारवां में किशोर दा का गीत- ये शाम मस्तानी…!
अगली सुबह खुली जीप में हम गेम रिज़र्व में दाखि़ल हुए। हमारा राइडर देव एक अफ्रीकी लड़का था, लेकिन उसका स्वभाव बेहद शालीन था। अंग्रेजी उसे समझ आती थी सो संवाद में कोई ख़ास समस्या नहीं हो रही थी। प्रवेश करते ही इम्पाला हिरणों का एक झुंड चौकड़ी भरते हुए हमारे सामने से गुज़रा। उसके बाद जिराफ़, ज़ेब्रा, जंगली सूअर, जंगली भैंसे, साँप, दरियाई घोड़े, सांभर, बंदर, लंगूर और मगरमच्छ देखते हुए तीन घण्टे का समय बीत गया। देव, मुख्य सड़क पर चल ही नहीं रहा था। ऊबड़-खाबड़ धरती पर उसकी लैंड-क्रूज़र शेर की तलाश में झाड़ियों को रौंदती हुई बढ़ रही थी। अचानक देव ने अपनी भाषा में कुछ कहा। उसके चेहरे की रंगत और आँखों की चमक बता रही थी कि हमारी तलाश ख़त्म होने को है। उसने एक छोटे से टीले के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी। टीले के ऊपर एक पेड़ था, जिसकी छाया में पाँच शेरनियाँ आराम फरमा रही थीं। देव ने उनसे लगभग तीन फीट दूर गाड़ी रोक दी। अरुण जी और मैं इस खूबसूरत ख़तरे को निहारते रहे। हमने खूब फ़ोटो खींची। शेरनियों के साथ पोज़ बनाकर सेल्फियाँ भी लीं। ऐसा लगा मानो कोई संकल्प पूरा हो गया हो।
शेरनियाँ सुस्ती में सोती रहीं और हम आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर पर हमें हाथियों का एक झुंड मिला। यह भी हमसे 10 फीट से ज़्यादा दूर नहीं था। गर्मी से मुक्ति पाने को हाथी अपने ऊपर पानी डालते रहे और हम आराम से उनकी वीडियो बनाते रहे। इसके बाद हमने एक ऐसी जगह पर खाना खाया जहाँ चारों ओर जिराफ़ ही जिराफ़ थे।
सुकून, रोमांच और आंनद जैसे शब्दों के सही मआनी क्या होते हैं; यह बताने में शायद मैं अभी पूरी तरह सफल न होऊँ, लेकिन जब कभी इन शब्दों के बारे में सोचता हूँ तो मेरी कल्पना रूफिजी के बीच बने उस रेतीले टापू पर पहुँचकर घने अंधेरे में गुम हो जाती है।
✍️ चिराग़ जैन

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