+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

वितण्डावाद का ताण्डव

‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय लोकतंत्र : एक ढकोसला

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।

© चिराग़ जैन

जबरन वेक्सिनेशन

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाखि़ल किया है कि किसी को जबरन वेक्सिनेशन नहीं लगाया जा सकता। यह ख़बर टीवी पर देखी और याद आ गया वह सब कुछ जो पिछले कुछ समय में व्यवहार में देखा है।
हवाई जहाज में यात्रा करने के लिए वेक्सीन की दोनों डोज़ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा न हो तो हर बार यात्रा से 48 घंटे पूर्व का आरटीपीसीर दिखाना होगा (मूल्य न्यूनतम 500 रुपये प्रति टेस्ट)। लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि सरकार ने किसी को वेक्सिनेशन के लिए विवश किया है।
सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों, पुलिसवालों के साथ साथ ओला-उबर ड्राइवरों, डिलीवरी बॉय, चौकीदार, अर्बन क्लैप सर्वर व अन्य लोगों के लिए वेक्सिनेशन अनिवार्य किया गया। लेकिन किसी को जबरन वेक्सिनेशन के लिए विवश नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के इस हलफ़नामे को फाइल में सहेज लेगा। आप जब मॉल, दफ़्तर वगैरह पर जाएंगे तो वहाँ गार्ड के व्यवहार से आपको महसूस होगा कि दोनों वेक्सिनेशन के बिना आपकी कहीं कोई इज़्ज़त नहीं है। लेकिन यह तय है कि किसी को वेक्सिनेशन के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
आपके घर पर काम करनेवाली मेड को, आपकी गाड़ी साफ़ करनेवाले को (सरकारी निर्देशों का हवाले देकर) बिना वेक्सिनेशन के सोसाइटी में घुसने नहीं दिया जाएगा लेकिन किसी को भी वेक्सीन लगवाने के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि मेरी यह पोस्ट वेक्सीन अथवा कोविड संबंधी नियमों के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई राय प्रस्तुत नहीं करती। इसका उद्देश्य केवल काग़ज़ी ख़ाना-पूरी और व्यवहारिक परिस्थिति के मध्य का अंतर स्पष्ट करना है।
इस वितण्डे में सभी सरकारें बराबर हैं। दिल्ली में आप कैब में दो से अधिक लोग नहीं बैठ सकते। मैं कई दिन से समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि इससे कोरोना कैसे रुक जाएगा? मैं अपने माता-पिता को लेकर एक ही घर से निकलूँ लेकिन अगर एक ही कैब में बैठकर ट्रेवल करूँ तो कोरोना हो जाएगा।
मैं उन्हें लेकर अपनी गाड़ी में चलूँ या हायर करके टैक्सी में घूमूँ तो भी कोरोना नहीं होगा लेकिन ओला-उबर में बैठते ही कोरोना हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी की चुनावी रैली में पीछे बैनर पर ‘वर्चुअल रैली’ लिख दिया जाएगा और कोरोना उस बैनर को पढ़ते ही चुनाव आयोग के नियमों का सम्मान करते हुए वापस लौट जाएगा।
दिल्ली में दुकानें खुलेंगी तो लोगों की भीड़ से कोरोना फैल जाएगा, लेकिन उन्हीं दुकानों के आगे रेहड़ी-पटरी लगाने पर कोरोना नहीं फैलेगा।
किसी राजनेता की रैली की तैयारी में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ती रहें लेकिन किसी बिटिया की विदाई के लिए आशीर्वाद देने वाली हथेलियों और किसी दिवंगत की शवयात्रा में कंधों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
कोरोना के नाम पर समाज को जागरूक करने की बजाय ये जो ढोंग-ढकोसला चल रहा है, उसके चलते लोग इन नियमों के प्रति कैज्युअल हो रहे हैं। अदालतों में हलफ़नामे देकर आप काग़ज़ों का पेट तो भर देंगे साहब लेकिन आपने अपने आचरण से जनता के मन की इस उलझती गुत्थी को न सुलझाया तो आने वाले चुनावों में यही गुत्थी आपकी जीत की रफ़्तार को उलझा देगी।

~चिराग़ जैन

विघटन

“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।

✍️ चिराग़ जैन

बाँसुरी : माधुर्य की गंगोत्री

बाँसुरी मेरा प्रिय वाद्य है। अपनी ख़ामियों को ख़ूबी बना लेने का श्रेष्ठतम उदाहरण है बाँसुरी। बाँस के खोखलेपन से सुर निकाल लेने का चमत्कार है बाँसुरी।
श्वास की लिपि से मन की भाषा बोलने का यंत्र है बाँसुरी। अंगुलियों पर थिरकते सुरों को उच्छ्वास की ऊष्मा से मीठा करने का जादू है बाँसुरीवादन।
जब कोई बंसी बजाता है तो उसके नयन स्वतः मुंद जाते हैं। पलक गिरते ही भीतर आनन्द का महारास प्रारम्भ होता है। स्थूल दृष्टि से देखने पर केवल अधरों को बाँसुरी बजाते देखा जा सकता है, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो हम पाएंगे कि अधर ही नहीं; अंगुलियाँ, कान, मस्तिष्क, मन और आत्मा तक सब मिलकर बाँस की इस पोरी को रसाल-सा मीठा करने में जुट जाते हैं।
श्वास चौकन्नी रहती है कि कहीं उसके आधिक्य से सुर न बिगड़ जाए। अंगुलियाँ सावधान रहती हैं कि ज़रा-सी इधर-उधर हुई तो तान में व्यवधान हो जाएगा। पलकें बन्द होकर ध्यान से सबकी चौकसी करने में तल्लीन ही जाती हैं। मन तान की सर्जना करता है और कान उसके साकार होने पर हर्ष की रोमावली को जागृत कर देते हैं।
गहरे ध्यान में उतरने की संगीतमयी वीथि है बाँसुरी। भीतर घटित हुए अनहद नाद का सुरावतार है बाँसुरी वादन। संगीत की सर्वाधिक मुँहलगी विधा है बाँसुरी वादन।
जब बाँसुरी बजती है तो पूरा परिवेश कलात्मक हो उठता है। दसों अंगुलियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो दस गन्धर्व किसी बाँस के पुल पर लास्य कर रहे हों। ओंठ की मुद्रा देखकर ऐसा लगता है ज्यों अनंग ने अपने पुष्पधनु पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे तान दिया हो। ग्रीवा हौले से एक दिशा में घूमकर कोई नाट्यमुद्रा की छवि प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर सब कुछ मधुर हो जाता है। शायद इसीलिए वंशवाले कन्हैया के लिए कहा जा सका- ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं!’

✍️ चिराग़ जैन

कुँए में भांग पड़ी है

प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक की घटना पर दोनों तरफ़ के लोग जो ट्रोलिंग कर रहे हैं, वह अधिक दुःखद है। यह विषय देश के सर्वाेच्च नेतृत्व की सुरक्षा से जुड़ा है। इसमें परिहास और उपहास की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि आदर्श स्थिति तो यह थी कि इसमें राजनीति की भी संभावनाएँ न खोजी जातीं।
सीधा-सा मसअला है कि जो विभाग अथवा अधिकारी इसके लिए उत्तरदायी हैं, उन पर कार्रवाई की जावे। लेकिन इसकी बजाय दोनों ओर के लोग इस दुर्घटना को पंजाब चुनाव में भुनाने के लिए कांग्रेसी और भाजपाई होकर दौड़ पड़े हैं।
यह घटना शर्मनाक है। दोनों तरफ़ अतिवाद हावी है। मोदी जी के समर्थक चन्नी की तुलना नवाज़ शरीफ़ से और पंजाब की तुलना पाकिस्तान से करने लगे हैं। तो मोदी विरोधियों ने इसे किसान आंदोलन में हुई मौतों का बदला करार दे दिया। दोनों ही घृणास्पद हैं।
राजनीति जब इस देश के लोक को लोकतंत्र और संविधान का सम्मान सिखाने की बजाय भाजपाई और कांग्रेसी होना सिखा रही थी तब शायद उसे यह नहीं पता था कि इस राह पर कैसे-कैसे मोड़ आ सकते हैं।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के पैर का प्लास्टर मीम और जोक्स का विषय बना था तब भाजपाइयों को यह इल्म न रहा होगा कि उनके लीडर भी हाड़-मांस के ही बने हैं और चोट किसी को भी लग सकती है। कांग्रेसी जब नरेंद्र मोदी के लड़खड़ाने पर चुटकियाँ ले रहे थे तब वे भूल गए थे कि यही जनता, रैली में पत्थर फेंककर एक प्रधानमंत्री की नाक घायल कर चुकी है। तब वे भूल गए थे कि घृणा की जिन वादियों में राजनीति के बीज बोए जाते हैं उनका शिखर ख़ून से लथपथ हो जाता है।
द्वेष और स्वार्थ की इन क्यारियों में लोकतंत्र का बगीचा नहीं फूल पाएगा। हम धीरे-धीरे नहीं, बहुत तेज़ी से वर्गों में बँटते जा रहे हैं। हम इतने संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि जब दूसरे पक्ष के आंगन में मातम होता है तो हम अपने चौक में जश्न मनाने लगते हैं। हम इतने निष्ठुर हो गए हैं कि शवयात्रा पर भी पत्थर फेंकने से नहीं कतराते।
हम मृत्यु के अवसर पर भी अपने-अपने झंडे उठाए गाली-गलौज करने लगते हैं। राहत इंदौरी, ऋषि कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, रोहित सरदाना, विनोद दुआ और न जाने कितने दिवंगतों ने अपनी अंतिम यात्रा में ये बदबूदार गालियाँ झेली हैं।
हमारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी है कि हमने श्मशान और कब्रिस्तान तक को अखाड़ा बना लिया है। हिंदू-मुस्लिम से अधिक बड़ा द्वंद्व कांग्रेसी-भाजपाइयों में चल पड़ा है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी के मध्य तलवारें खिंच रही हैं। सौहार्द और समन्वय की बात करने वाले गाली खा रहे हैं। ऐसे में पंजाब की घटना से पूरे देश के राजनेताओं को यह सीखना पड़ेगा कि जिन रास्तों में नागफनी बोई जा रही है, उनसे कभी ख़ुद भी गुज़रना पड़ सकता है।
ईश्वर एक मनुष्य के रूप में प्रत्येक राजनीतिज्ञ को भी स्वस्थ तथा दीर्घायु रखे और मेरे देश की जनता को विवेक का वरदान दे!

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!