Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
प्रश्न तो उद्देश्य का है, मोल केवल ध्येय का है
जो मिला आशीष बनकर, अर्थ उस पाथेय का है
मात्र जीने के लिए सब लोग जीकर मर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।
जो सहजता से नियत पथ पार कर उजियार देगी
बस उसी पहली किरण को अर्घ्य का वैभव मिलेगा
बादलों के द्वंद से भी दामिनी उत्पन्न होगी
किन्तु इस हठधर्मिता को मान वैसा कब मिलेगा
एक प्राची की उपज है, एक गर्जन की सहेली
एक को जग पूजता है, एक से सब डर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।
एक गोवर्द्धन उठाकर कृष्ण गिरधारी कहाए
द्रोणपर्वत हाथ पर धर लाए थे हनुमान सारा
किन्तु जब कैलाश को लंका लिवाने चल दिया तो
शक्ति के मद में पगा लंकेश का अभिमान हारा
एक जग कल्याण का था, एक निज अभिमान का था
एक मन भीतर विराजे, एक मन बाहर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कृष्ण ने जिस काल में युग के हृदय पर छत्र पाया
कंस ने उस ही समय में लोकनिंदा पाई जग से
जब युधिष्ठिर धर्म की सीमा समझकर लड़ रहे थे
तब सुयोधन कर रहा था, धूर्तता-चतुराई जग से
एक रावण का अहम था, एक राघव की सरलता
एक ने कुल को डुबोया, एक के पत्थर बहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं
✍️ चिराग़ जैन
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Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
अपने स्वर्ण सरीखे शब्दों में मैं अगर मिलावट कर लूँ
तो चमकीले पत्थर मेरे भी जीवन में जड़ जाएंगे
कुंदन जैसे शुद्ध विचारों में कुछ समझौता घुल जाए
तो मेरे हित नित्य सफलता के आभूषण गढ़ जाएंगे
चंदन कहकर कीकर बेचूँ -लाभ यही है, मंत्र यही है
लोभ प्रपंचों की दुनिया में धर्म यही है, तंत्र यही है
लेकिन ऐसी विजय पताका किन हाथों से फहराऊंगा
दर्पण के सम्मुख आया तो मैं कैसे मुख दिखलाऊँगा
जिस दिन मेरा पेट विवश कर देगा गर्दन के झुकने को
उस दिन मेरी ख़ुद्दारी के दावे झूठे पड़ जाएंगे
नैतिक शिक्षा की पुस्तक का ज्ञान भुलाना आवश्यक है
अपने आदर्शों के शव का कुचला जाना आवश्यक है
भौतिक सुख की नीरस आँखों में काजल शोभा पाएगा
लेकिन अपने अंतर्मन की भस्म बनाना आवश्यक है
मानव का तन कोरा शव है, शेष न हो यदि लाज ज़रा भी
दैहिक सुख तो यहाँ धरा पर पड़े-पड़े ही सड़ जाएंगे
महल-दुमहलों की रंगत से, नेह भरा छप्पर बेहतर है
रेशम के महंगे चोगों से कबिरा की चादर बेहतर है
भीष्म पितामह के सीने पर बाण चलाते अर्जुन से तो
पुत्रविरह में कट कर गिरता द्रोण तुम्हारा सिर बेहतर है
आश्रम में रहकर संन्यासी संबंधों की लाज रखेंगे
महलों में रहकर दो भाई आपस में ही लड़ जाएंगे
✍️ चिराग़ जैन
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सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे
✍️ चिराग़ जैन
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ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो
गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है
दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो
राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है
राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना
द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ जाना
खाण्डववन के तक्षक का विषदंश सतावे तो आ जाना
जमुना तट पर कुंज-लता का बाग प्रतीक्षारत बैठा है
सोने के बर्तन में केवल षड्यंत्रों का द्वंद मिलेगा
पत्तल की सूखी रोटी में जग भर का आनंद मिलेगा
राजमहल के छप्पन भोगों में फंसकर बिसरा मत देना
विदुरों की पावन कुटिया में साग प्रतीक्षारत बैठा है
छींके पर माखन की मटकी अब भी राह निहार रही है
वृद्ध जसोदा आस लगाए आंगन-द्वार बुहार रही है
रण के शोर-शराबे से तुम यह कहकर उठकर चल देना
जसुमति मैया के घर में सौभाग प्रतीक्षारत बैठा है
✍️ चिराग़ जैन
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लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से
उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई
मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला
जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया भर का मेला
जिसका था अनुमान हमें वो हारा-टूटा मिल जाएगा
या तो अब वो नहीं मिलेगा या फिर रूठा मिल जाएगा
जिसको झूठी चमक-दमक में गहरी पीड़ा दे आए थे
उसको हँसते-गाते पाकर शर्मसार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
धरती के शासन की इच्छा जीवन का आधार बनी थी
क्रूर अशोक भयावह जिसकी बर्बरता अख़बार बनी थी
जिसको निर्दोषों का रक्त बहाने मे कुछ क्षोभ नहीं था
जिसको मन की कोमलता के रक्षण का भी लोभ नहीं था
जिसकी अपराजेय कीर्ति को हार कभी स्वीकार नहीं थी
जब वैराग्य घटा तो उसकी जीत-हार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
जिनके दिए उदाहरण हमने, उनके जीवन समतल कब थे
उनकी भाग्य लकीरों में जाने कैसे-कैसे करतब थे
जिसको इधर डुबोया जग ने, उसको उधर उबर जाना है
धड़कन की रेखा सीधी होने का मतलब मर जाना है
समय पुरानी तलवारों को घिसकर पैना कर देता है
जंग दिखे तो यह मत समझो तेज धार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
फिर से द्यूत सजा बैठा है
फिर बदले शकुनि ने पासे
फिर से चूक हुई विदुरों से
फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे
मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की
फिर पांचाली चीख रही है, भीष्म निभाते निष्ठा प्रण की
गुरुओं की गर्दन नीची है, कुल की लज्जा अर्द्धनग्न है
दुर्योधन की जय सुन-सुनकर इक अंधा आनंदमग्न हैं
नीति-नियम की हर परिपाटी का अनवरत मरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
पौरुष दास हुआ बैठा है, अवसरवादी ढीठ रहा है
अपमानित कुण्ठित हठधर्मी अपनी जंघा पीट रहा है
हर पापी ने इस घटना को क्रीड़ा की मदहोशी समझा
जिसने प्रश्न उठाया उसको राष्ट्रद्रोह का दोषी समझा
मातम के बादल घिर आए, यम का आमंत्रण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
यह इक पल ही समरांगण में प्रलयंकर भूचाल बनेगा
यह अपमानित भीम अधम का ध्वंस करेगा काल बनेगा
अब नीचे झुक जाने वाली हर गर्दन कटनी है रण में
केश पकड़ने वाले हाथों की छाती फटनी है रण में
ज्वार रुधिर का आज धमनियों के भीतर हर क्षण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
दुर्योधन की शठता की अनदेखी के परिणाम मिलेंगे
सौ पुत्रों के शव पर रोना, आँसू आठों याम मिलेंगे
आँखों पर पट्टी बांधी है, मधुसूदन को दोष न देना
ममता के आँचल में युग के अभिशापों को पोस न देना
अनुचित हठ के इस पोषण में अपनों का तर्पण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
✍️ चिराग़ जैन