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भीष्म प्रतिज्ञा का मीडिया ट्रायल

भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसमें अपने पिता की छवि देखूंगा। भीष्म लकी थे कि उस दौर में कांग्रेसी और भाजपाई लोग नहीं थे। वरना कोई भी चैनल अपने प्राइम टाइम में विरोधी पार्टी वाले किसी बड़बोले को बुलवाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का ऐसा हश्र करता कि भीष्म उसका एक्सप्लेनेशन देने की बजाय इच्छामृत्यु का ऑप्शन सेलेक्ट करना ज़्यादा ईज़ी समझते।
भीष्म की इस प्रतिज्ञा को अवसरवाद का उदाहरण बताकर यह कहा जा सकता था कि यह तो सरासर ओछापन है। चापलूसी की हद है कि जो भी सिंहासन पर बैठेगा उसी को बाप बना लेगा। कोई पात्रा टाइप का प्रवक्ता कहता कि ये तो इनकी पुरानी परंपरा है। इनके पिता ने भी गधे को बाप बनाया था। इनकी दादी ने भी गधे को बाप बनाया था। इनके नाना तो गधे थे ही। …कैसा दोहरा मापदंड है। गधे को बाप बना सकते हो लेकिन गाय को माता नहीं मान सकते। वाह जी वाह… ये सब नहीं चलेगा।
पूनावाला टाइप कोई प्रवक्ता कह सकता था कि बायलॉजिकली यह पॉसिबल तभी है जब डीएनए सेम हो। भीष्म ने इनडायरेक्टली यह कहा है कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसकी शक्ल मेरे पापा से मिलती होगी। यह शुद्ध भाई-भतीजावाद है। बीजेपी हमेशा कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी कहती रही है लेकिन बीजेपी में बेटे-बहुओं को आउट ऑफ टर्न आगे लाया जाता रहा है।
सिन्हा साहब संभाले हुए स्वर के साथ कहते महाभारत में ऐसी कोई प्रतिज्ञा का ज़िक्र ही नहीं मिलता। यह प्रतिज्ञा तो मुग़ल काल में बाबर ने ली थी कि वे रामलला के मंदिर में मस्जिद की छवि देखेंगे। इस तथ्य के ठोस प्रमाण मैगस्थनीज़ के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं कि जब वे बुलेट ट्रेन से दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर उतरे तो उन्हें प्लेटफॉर्म नंबर 7 से अयोध्या के भव्य राममंदिर का स्वर्ण शिखर दिखाई दिया।
उधर ओवैसी इस प्रतिज्ञा पर बोलते हुए बताते कि हिन्दू मैरिज एक्ट में अपनी फेयोंसी से अपने वालिद की शादी कराना ग़ैरक़ानूनी है। इसलिए जनाब भीष्म को और उनके वालिद साहब को इस जुर्म के लिए सज़ा होनी चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ में इस मुद्दे पर तफसील से साफ किया गया है लेकिन भीष्म क्योंकि हिन्दू हैं इसलिए उन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ इम्पलीमेंट नहीं होता।
इन चारों के बयान के बाद बॉय कट हेयर स्टाइल को झटकते हुए एंकर अपना फैसला सुनाती – मतलब साफ है कि भीष्म को सिंहासन पर प्रतिज्ञा नहीं लेनी चाहिए थी। पिता की छवि सिंहासन से सुंदर है। मतलब भीष्म पिता हैं और पितामह भी। इस बुलेटिन में फिलहाल इतना ही देखते रहिये टाइम पास।

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

द ग्रेट तीतरबाज़ डेमोक्रेसी

काफी समय पहले तीतरों के समाज में एक नालायक तीतर ने लड़ाई-भिड़ाई से समय निकाल कर कुछ पढ़ने-लिखने की ठानी। युवा तीतर की इस इच्छा से तीतर समाज बहुत दुखी हुआ। कई बुज़ुर्ग तीतरों ने उसे समझाया कि बेटा, इस पढाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। लड़ाई-झगड़ा करोगे तो कुछ बन जाओगे। आज का फसाद कल तुम्हें मुहल्ले में सम्मान दिलाएगा। पढ़-लिख गए तो कोई तुम्हारे साथ नहीं बैठेगा। सारे में थू-थू होगी। तुम्हारी भलाई इसी में है कि झगड़ा-झमेला करो और अपना आराम से रहो।
इतना समझाने पर भी जब वह तीतर ज़िद्द छोड़ने को तैयार न हुआ तो पूरे तीतर समाज ने यह निर्णय लिया कि यह युवा तीतर जो लड़ना नहीं चाहता इसकी इस हरक़त से बाक़ी तीतरों के बच्चों पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए समाज के हित में और अपनी परम्पराओं की रक्षा हेतु इस उद्दण्ड युवा को यह दण्ड दिया जाता है कि तीतर समाज के किसी झगड़े में इस अधम को नहीं बुलवाया जाएगा और पूरे गाँव में इसका लड़ाई-झगड़ा बंद करके इसे बिरादरी से बाहर निकाला जाता है।
मौक़ा अच्छा था, युवा तीतर ने बिरादरी छोड़ कर इतनी पढाई की कि धीरे-धीरे वह समाज सुधारक बन गया। उसने सब तीतरों को यह ज्ञान दिया कि तीतर लड़ाने वाले ये उस्ताद लोग बड़े उस्ताद होते हैं। चार-चार आने में हम तीतरों की जान आफत में डाल कर मज़े लेते हैं। जिसे तुम जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना लेते हो, वह इनके लिए सिर्फ एक खेल है। इन लोगों की आपस में कोई शत्रुता नहीं होती, ये सिर्फ हमें उकसाने के लिए झगड़ने का अभिनय करते हैं।
समाज सुधारक की ये बातें सुनकर बड़े-बूढ़े तीतरों को चिंता हुई कि यह कुलक्षण ऐसी बातों से हमारी परम्पराओं को आघात पहुँचा सकता है। चिंता के कारण सभी बूढ़े तीतर चिंतित रहने लगे। वे युवा तीतरों को तीतरबाज़ी की महान परम्परा क़ायम रखने का मार्गदर्शन देते और चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी जवानी की लड़ाइयाँ याद कर-करके शेख़ी बघारते। उधर कुछ युवा तीतरों को समाज सुधारक की बातें अच्छी लगने लगीं। वे छुप-छुप कर समाज सुधारक से मिलने लगे। और निरंतर चिंतन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया कि अब वे उस्तादों के साथ वही व्यवहार करेंगे, जो उस्तादों ने उनके पुरखों के साथ किया है।
अब युवा तीतर उस्तादों से मोलभाव करने लगे। एक तीतर ने उस्तादों के बीच जुमला उछाला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे एक साल का वाई-फाई मुफ़्त मिलेगा। सारे उस्ताद तीतरबाज़ी छोड़ कर वाई-फाई के ख्यालों में डूब गए। तभी दूसरा तीतर बोला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे मुफ़्त लेपटॉप मिलेगा। उस्तादों में हड़कंप मच गया। वे एक-दूसरे की लुंगियां फाड़ने लगे। उस्तादों में लट्ठ बजने लगे। कोई उस्ताद फटे हुए सर को पकड़े वाईफाई वाले तीतर के गुण गया रहा था तो कोई पैर पर प्लास्टर बांधे लेपटॉप वाले तीतर के दांव-पेंच बखान रहा था। जैसे ही हंगामा थमता दिखाई देता, कोई न कोई तीतर प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन या बिजली बिल माफ़ जैसी घोषणा करके आराम से बैठ जाता और उस्तादों को लड़ते देख कर मज़ा लेता।
आजकल तीतरों की नई पीढ़ी और भी स्मार्ट हो गई है। घोषणाओं के ओल्ड फैशन्ड तरीके छोड़कर वे उस्तादों को इमोशनल ब्लैकमेल करने लगे हैं। पिछले दिनों एक ओवरस्मार्ट तीतर ने उस्तादों को बताया कि उसके कुनबे के बुज़ुर्ग खुल कर लड़ने नहीं दे रहे हैं। यह बात सुनकर उस्ताद लोग भावुक हो गए। उन्होंने बुज़ुर्ग तीतरों को कोसना शुरू कर दिया। उस्तादों के मन में उत्पन्न घृणा का लाभ उठाकर ओवरस्मार्ट तीतर ने सारे बुज़ुर्ग तीतरों के पर काट दिए और पूरे तीतर समाज का सरपंच बन बैठा। फॉर्मूले की सफलता देख कर आजकल कोई उस ओवरस्मार्ट तीतर की शिकायत उस्तादों से करके सिम्पेथी बटोरता है तो कोई अपनी दादी और पापा की क़ुर्बानी पर टसवे बहा कर उस्तादों को भावुक कर देता है।
हाल ही में एक चतुर तीतर ने अपने चाचा और अंकलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उस्तादों की लड़ाई का माहौल ही बदल डाला। उस्ताद आपस में लड़ रहे हैं, तीतर अपने अपने दड़बों में भीतर ही भीतर जश्न मना रहे हैं। समाज सुधारक तीतर उन्हें आश्वस्त कर रहा है कि अब तुम आराम से दाना-पानी खाते रहो और मौज उड़ाते रहो। क्योंकि अब कभी यह निश्चय नहीं हो सकेगा कि किस तीतर पर दांव लगाना उचित है। सो, न लगेगा दांव, न होगी तीतरबाज़ी।

✍️ चिराग़ जैन

व्यंग्यकार और व्यंग्य

व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है।
किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के लिए आवश्यक है कि मौन रहकर चर्चाकारों के शब्द और उससे भी अधिक उनके मनोभाव को सुना जाए। कई बार व्यंग्यकार चर्चा में इतना वाचाल हो उठता है कि चर्चाकार बोल भी नहीं पाते। ऐसे में व्यंग्य निकालने के प्रयास व्यंग्यकार को निकालने की स्थिति के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अनेक वरिष्ठ व्यंग्यकारों को सीधे-सादे विषय के भीतर से इस प्रकार व्यंग्योक्ति निकालने का प्रयास करते देखा है जैसे कोई प्यासा कौआ पुरानी कहानी से प्रेरित होकर घड़े में कंकर डाल डाल कर प्यास बुझाने की तपस्या कर रहा हो। लेकिन इस प्रयास में काक यह भूल जाता है कि जिस घड़े में कंकर डाले जाएं उसकी तली में इतना जल होना आवश्यक है जो कंकरों का बदन तर करने के बाद चोंच के भीतर आ सकने को पूरा पड़े।
जबरन व्यंग्यकार बनने की चेष्टा में अक्सर कुछ लोग भरी महफिल में कोई जुमला उछालते हैं। जुमला उछालने की प्रक्रिया पूर्ण होते ही वे सदन को मुस्कुरा कर यह भी बताते हैं कि मेरे इस जुमले पर आप सबको इस प्रकार मुस्कुराना चाहिए था। इस सोपान के उपरान्त वे एक एक सदस्य की आँखों में इस भाव से देखते हैं कि इतने सारे मूढ़ों में एक आप तो मुस्कुरा कर मेरी श्रेष्ठ व्यंग्योक्ति समझने की क्षमता सिद्ध करें। अंतिम सदस्य तक पहुँचते-पहुँचते उनकी दृष्टि रिरियाने लगती है। लेकिन इस अपमान से वे हतोत्साहित नहीं होते। बल्कि अपने मुखमंडल पर अजीब सी इतराहत लाकर यह बताते हैं कि अगर तुम अल्पज्ञों में एक भी समझदार मेरे व्यंग्य को समझ लेता तो अब मैं इस प्रकार इतरा रहा होता।
व्यंग्य समाज को आइना दिखा सकता है लेकिन कई व्यंग्यकार उस आईने में चोंच मार मर कर उसे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ते।
एक समय के बाद वे ये अपेक्षा रखने लगते हैं कि उनके बोलने, हंसने, मुस्कुराने, देखने और यहां तक कि उठने-बैठने तक को व्यंग्य समझ कर लोग खींस निपोरते रहें। यदि उनकी एकाध उक्ति प्रचलित हो जाए तो वे आदमी को आदमी क्या शब्द को शब्द नहीं समझते। उनकी सहजता में बैठा व्यंग्यकार उनकी चेष्टाओं में फूलते बदजुबान के आगे धराशायी हो जाता है। इस स्थिति में व्यंग्यकार आनंद कम और कष्ट अधिक देता है। पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाली छैनी भौंथरी होकर कला, कृति और कलाकार तीनों को नष्ट कर डालती है।
✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्र के चार स्तम्भ

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा।
विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी युवतियों को ढँक-ओढ़ कर रहना सिखाने लगे। एक दल का नेता हमें बताता है कि उसकी जेब में राजीव गांधी के ख़िलाफ़ सबूत हैं। हम उसकी बात मानकर उसे प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह काग़ज़ देश के भविष्य की तरह कोरा निकलता है। फिर कोई आता है और हमें कहता है कि वह राम मंदिर का निर्माण कराएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह बस में बैठकर लाहौर की यात्रा पर निकल जाता है। राम जीऔर देश के रामलाल उसकी लीलाएं देखकर ताली पीटते रह जाते हैं। फिर एक व्यक्ति आता है और हमको कहता है कि देश को आर्थिक सम्पन्नता मिलेगी। देश का ग़रीब से ग़रीब शख्स भरपेट खाना खाएगा। हम उसके कहने पर किसी को भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। कोयले से लेकर तकनीक तक की दलाली में घोटाले होने लगते हैं। रोज़ एक नया घोटाला सामने आता है। ग़रीब के हाथ का आख़िरी निवाला भी भ्रष्टाचारियों के गले से नीचे उतर जाता है। ग़रीब विकास करके भुखमरा बन जाता है। सरकारी ईमानदारी का डंका पीटते हुए कलमाड़ी जेल जाते हैं और सरकारी बेईमानी की सुरंग से चुप्पी साध कर छूट जाते हैं। जनता देखती रह जाती है। फिर कोई आता है और हमें बताता है कि वह काला धन हर भारतीय के खाते में डलवा देगा। वह जमाई बाबू को जेल भिजवा देगा। वह स्विस बैंकों में जमा भारत का पैसा वापस लाएगा। वह अच्छे दिन लाएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। वह प्रधानमंत्री बनते ही कुर्सी की जगह हवाई जहाज में बैठता है। स्विस बैंकों का पैसा छोड़ कर छोटे-छोटे बच्चों के पिगी बैंक तुड़वा देता है। जमाई बाबू को गिरफ्तार नहीं कर पाता। जनता उससे पूछती है कि हमारे बैंक खाते में पैसा कब आएगा तो वह कह देता है कि वो तो चुनावी जुमला था। हम ठगे से खड़े रह जाते हैं। वह बोलता हैकि आज से लाइन में खड़े होना है। हम लाइन में खड़े हो जाते हैं। वह कहता है भूखे मरो ताकि विदेशों में देश का नाम हो सके। हम भूखे मरने को तैयार हो जाते हैं।
कुछ लोग पिस-पिस कर मीडिया के पास त्राहिमाम करते हुए जाते हैं। मीडिया उनकी मार्केट वैल्यू के अनुसार उनकी बात सुनता है। फिर अचानक चीखने लगता है। हम खुश हो जाते हैं। मीडिया हमें बोलता है कि सुभाष चंद्र बोस की फ़ाइल मांगो, उससे खुशहाली आएगी। हम फ़ाइल का हल्ला मचा देते हैं। फ़ाइल खुल जाती है। न किसी को जेल होती न खुशहाली आती। हम फिर पूछते हैं, अब क्या करें। मीडिया बोलता है कि राम वाले बयान पर माफ़ी मांगने को बोलो। हम धरने पर बैठ जाते हैं। कुछ दिन तक बैठे रहने के बाद मीडिया हमसे बोर हो जाता है। वह प्रधानमंत्री जी के साथ बेल्जियम जाकर आइसक्रीम खाने लगता है और हम वहीं बैठे रह जाते हैं।
फिर हम सिविल सोसाइटी के पास जाते हैं। एक बूढ़ा बाबा जंतर-मंतर पर बैठ जाता है। हम “जनलोकपाल” के गीत गाने लगते हैं। बूढ़ा फेमस हो जाता है। उसके गुर्गे उसके कन्धों पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। वे हमें बताते हैं कि जनलोकपाल बिल पास कराने के लिए चुनाव लड़ना ज़रूरी है। वे कहते हैं कि वे VIP संस्कृति ख़त्म करेंगे। वे सरकारी कोठी नहीं लेंगे। वे सबकी पोल खोलेंगे। वे फ्री वाई फाई देंगे। वे आम आदमी की गुहार सुनेंगे। हम उन्हें मुख्यमंत्री बना देते हैं। अगले ही दिन वे सायरन बजाती गाड़ियों के काफिले में बैठ नई कोठी से निकलकर विधानसभा जाते हैं और जनलोकपाल के साथ अन्ना बाबा को विदाई देते हैं। हम उसकी खाँसी पर चुटकुले सुन-सुनाकर सन्तोष कर लेते हैं।
कई साल तक सुनवाई के बाद निचली अदालत एक सेलिब्रिटी को अपराधी कहती है। उसके दो घंटे के भीतर ऊँची अदालत केस फ़ाइल करने से लेकर जाँच करने तक और गवाहों की गवाही से लेकर सबूतों की प्रमाणिकता तक सब संपन्न करके उसे रिहा कर देती है। हम बिंधे हुए हिरन से चकित रह जाते हैं।
हम धृतराष्ट्र की तरह संजय रूपी मीडिया कीआँखों से देश का कुरुक्षेत्र देख रहे हैं। संजय बोलता है कोसी में बाढ़ आ रही है। हम भागने लगते हैं। संजय बोलता है नदियां सूख रही हैं, हम प्यासे मरने लगते हैं। संजय बोलता है पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो रहा है। हम इन्वर्टर चार्जिंग करने लगते हैं। संजय बोलता है राहुल गांधी पप्पू है, हम उस पर लतीफ़े गढ़ने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी घुमंतू हो रहे हैं, हम उनकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी शेर हैं, हम उनसे डरने लगते हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों की जनता नेतृत्व और सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में अपनी सूझ-बूझ को भौंथरा कर बैठी है। ख़बर तो दूर की बात है, हम सोशल मिडिया की अफवाहों को प्रमाणिक मानने से पूर्व बुद्धि का प्रयोग करना भूल चुके हैं। ऐसे में कतारों में खड़ा वर्तमान अपने भविष्य की आशंकाओं के लिए राजसत्ता या मीडिया की ओर निहारते समय यह क्यों भूल जाता है कि राजनीति की शतरंज पर कोई प्यादा यदि अनवरत विकास करते हुए विपक्षी हाथी के घर तक पहुँच जाता है तो वह स्वयं भी हाथी बन जाता है और फिर वह प्यादे की सीमाएं भूलकर हाथी जैसा आचरण करने लगता है।

✍️ चिराग़ जैन

नोटबंदी

नोटबंदी की आठवें दिन मैं अपने मकान मालिक को किराया देने पहुँचा तो मकान मालिक अड़ गया, बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा।’ मैंने कहा कि बैंक से पैसे निकल नहीं पा रहे हैं और वैसे भी अब प्रधानमंत्री जी ने नक़द लेनदेन से बचने की अपील की है।
मकान मालिक नहीं माना और बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा, कैश न दे सको तो मकान खाली कर दो।’
मुझे इस ज़िद्दी रवैये पर बहुत क्रोध आया और मैंने पुलिस को फोन मिलाया।
पुलिसवाला आया और दोनों को सामने बैठा कर बोला- “मैं भी कैश ही लूंगा।”

✍️ चिराग़ जैन

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