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भारत देशभक्तों का देश है। किसी भी आपदा की स्थिति में हम आपदा के निवारण करने की बजाय अपनी देशभक्ति साबित करने में व्यस्त हो जाते हैं। हमारे पास देशभक्ति की कसौटी पर कसने के लिए राजनीति है और देशभक्ति के रास्ते पर मिटने के लिए सेना। इसलिए हम अपने हिस्से की देशभक्ति निभाना आवश्यक नहीं समझते।
हम चौकन्ने देशभक्त लोग हैं। देशभक्ति हो या न हो, परंतु देशभक्ति का शोर होता रहना चाहिए। इसीलिए हमारी रुचि स्वयं को देशभक्त बनाने में कम है और शेष लोगों को देशद्रोही साबित करने में अधिक हैं। किसी ने पुलवामा हमले पर श्रद्धांजलि नहीं दी तो वो देशद्रोही हो गया। किसी ने फेसबुक पर प्रोफ़ाइल फ़ोटो में तिरंगा नहीं लगाया तो वह भी देशद्रोही हो गया। हम दूसरों को कसमें दे-देकर देशभक्ति के फ़ॉर्वर्डेड संदेशों के प्रचार हेतु बाध्य करते हैं ताकि मनुष्यों में न सही, पर कम से कम मोबाइलों में तो देशभक्ति भर ही जाए।
हम लालबत्ती जम्प करते समय दिलेर हो जाते हैं और देश के नियमों की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। पूरे देश में कुल तीन प्रतिशत लोग भी टैक्स नहीं भरते लेकिन शत प्रतिशत लोग सरकार की नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगाने को तैयार रहते हैं। ट्रैफिक हवलदार को रिश्वत देने की पेशकश करते समय, देशभक्ति हमारी आत्मा को नहीं धिक्कारती। नक्शा पास कराए बिना चोरी से एक्स्ट्रा कमरा बनाकर हम पूरी सोसाइटी के सौंदर्य का सत्यानाश कर देते हैं। गाड़ी पार्क करते समय देश के अन्य नागरिकों को होने वाली असुविधा का ध्यान नहीं रखते, लेकिन हम देशभक्त हैं।
अफ़वाहों के प्रचार में हम अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स को आगे करके देशभक्ति के शोर में योगदान देते हैं। सड़क पर खड़े होकर ट्रकों से वसूली करता हवलदार भी हर उच्छ्वास के साथ राजनीति को देश की बर्बादी का कारण बता देता है। दफ़्तरों में रिश्वत और कामचोरी को पोसने वाले बाबू भी जब शाम को घर लौटते हैं तो रास्ते भर सरकार को कोसते हुए घर पहुँचते हैं। टैक्सी-रिक्शावाले मीटर से चलने को राज़ी नहीं हैं, लेकिन सरकार से अपेक्षा करते हैं कि सरकार सवारी की जेब का सारा पैसा उनकी झोली में क्यों नहीं डाल देती!
अस्पतालों से इलाज की बजाय बीमारियाँ मिल रही हैं, डॉक्टर्स अंगों का कारोबार कर रहे हैं; दवाई कंपनियों और पैथलैब की कमीशन पर उनका पूरा ध्यान केंद्रित है लेकिन भारत को खोखला करने का आरोप सरकार पर लगता है। इंजीनियर्स और ठेकेदारों ने देश की मज़बूत बुनियाद पर चूना लगाया है। लेकिन देश की कमज़ोरी का जिम्मेदार सिस्टम को माना जाता है। परचूनिया मिलावट से पीछे नहीं हटता, अध्यापक ट्यूशन का धंधा कर रहा है, अधिवक्ता अपराध को अभयदान दे रहे हैं, न्यायालय सेटिंग और जुगाड़ की कार्यशाला बनते जा रहे हैं। पुलिस जनता को जानवर समझती है और जनता पुलिस को चौपाया।
एयरलाइंस जनता को लूटने का पूरा तंत्र विकसित कर चुकी हैं। बैंकर्स नोटबन्दी में कमाने लगे और नोटबन्दी फेल हो गई। सरकारी फ्लैट बनते हैं तो दलालों का नेटवर्क भी साथ-साथ तैयार हो जाता है। बस कंडक्टर टिकट दिए बिना पैसे ले लेता है। प्राइवेट ड्राइवर पैट्रोल चुरा रहे हैं। निगम के पार्कों में लगवाले गए बैंच, झुग्गियों में सोफ़े की भूमिका अदा कर रहे हैं। और उन्हीं बैंचों पर बैठ कर हम चर्चा कर रहे हैं कि- ‘सब साले चोर हैं, देश के लिए कोई नहीं सोचता।’
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय राजनेताओं को स्मृति-नियंत्रण का एक विशेष वरदान प्राप्त है। इसी वरदान के आधार पर वे सत्ता के दुर्ग बना पाते हैं। यह विशेष सुविधा ही उन्हें शर्मिंदा होकर डूब मरने से बचा लेती है अन्यथा हमारा देश राजनेताओं से विहीन हो चुका होता।
लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि नितीश कुमार को यह याद आ गया होता कि चारा घोटाले के उजागर होने पर उन्होंने क्या-कुछ कहा था, तो वे जनता की भलाई के लिए यह गठबंधन कैसे कर पाते। उन्होंने वे सारी गालियाँ गठरी में बांधकर दिल पर रखे पत्थर के नीचे दबा दी और सरकार बना ली। फिर एक दिन अचानक उनकी आत्मा ने उन्हें याद दिलाया कि लालू भ्रष्टाचारी हैं। बस अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर उन्होंने पत्थर के नीचे दबी गठरी खोली, उसमें मोदी को दी जाने वाली गालियाँ बांधकर रख दीं और लालू को दी जाने वाली गालियाँ बाहर निकाल लीं। फिर से अपने दिल पर पत्थर रखकर वे सरकार चलाने लगे।
कितने विवेकशील और परोपकारी नेता हैं। बिहार में आपदा के समय जब नरेन्द्र मोदी ने जनता की सहायतार्थ कुछ सरकारी राशि भेजी थी तो उन्होंने आपातकाल में भी अपनी घृणा की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि वे सरकार बचाने के मार्ग में इस घृणा को प्रकट होने देते। वे बाढ़ से पीड़ित जनता को अपनी व्यक्तिगत घृणा की भेंट चढ़ा सकते हैं, लेकिन कुर्सी को इस संकट में कदापि नहीं डाल सकते। आखि़र कुर्सी पूज्यनीया जो है। बाढ़ तो हर साल आती है। लोग तो हर साल मरते हैं, लेकिन कुर्सी एक बार गई तो पाँच साल तक सूखा झेलना पड़ता है। यदि उन्हें राष्ट्रहित की चिंता न होती तो वे लोहिया जी की विचारधारा के विरुद्ध जाकर दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टी के साथ कदापि गठबंधन नहीं करते। वे जानते हैं कि उनका कुर्सी पर बैठना अनिवार्य है। यदि वे कुर्सी पर न बैठे रहेंगे तो समाज कल्याण के समस्त कार्यक्रम रुक जाएंगे। और यह वे हरगिज़ बर्दाश्त नहीं कर सकते। इस रास्ते में कोई ज़मीर, कोई आत्मा, कोई विचारधारा, कोई निष्ठा, कोई वायदा टांग नहीं अड़ा सकता।
कश्मीर की जनता के कल्याण के लिए भाजपा ने भी दिल पर पत्थर रखा और पीडीपी को गद्दार घोषित करनेवाले अपने सारे जुमलों को भुला दिया। भाजपा जानती थी कि जिस दिन भी गठबंधन टूटेगा उस दिन इन गालियों की दोबारा ज़रूरत पड़ेगी इसलिए महबूबा मुफ्ती के विरुद्ध सारे ज़हर को अपनी शिराओं के कोल्ड स्टोरेज में संभालकर रख लिया और सारे देश ने देखा कि सरकार के गिरते ही वह सारी नफ़रत पूरी ताज़गी के साथ फिर काम आने लगी। कुर्सी पर बैठकर जनता की सेवा करने के महान उद्देश्य को साधते समय भाजपा ने न तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ओर देखा न ही राष्ट्रवाद के नारों की ओर। इसे कहते हैं कर्तव्यपरायणता।
ऐसी ही देशभक्ति के उदाहरण उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती जी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके प्रस्तुत किये। एक बार छले जाने के बावजूद देश के हित में उन्होंने दोबारा उन्हीं धोखेबाज़ों से गठबंधन कर लिया ताकि देश को बचाया जा सके।
उधर अससुद्दीन ओवैसी को अचानक अंबेडकर जैसे दोस्त की दोस्ती दिखाई देने लगी। उसकी दोस्ती के लिए वे महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने की इच्छा को भी त्याग दिया।
रामविलास पासवान इस विषय में संत हैं। उन्होंने विचारधारा, मान्यता, सोच और ख़ेमे वगैरह का टंटा ही नहीं पाला। उन्होंने तो एक ही नीति अपनाई – ‘जिसकी सरकार, उसका पासवान!’ उन्होंने कभी जनता को इस भ्रम में नहीं रखा कि वे किसी महापुरुष, किसी विचार, किसी पंथ पर चलकर देश का कल्याण करेंगे। उनका फंडा साफ है कि सरकार किसी की भी बने, मेरा मंत्री बनना तय है।
अमित शाह जी भी जनता से झूठ बोलने की बजाय सीधे दूसरों के विधायकों के लिए चुम्बक बन जाते हैं। उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से विरोधियों के जीते हुए विधायक उनकी ओर खिंचे चले आते हैं। इस प्रेमभाव के समय विचारधारा, मेनिफेस्टो, वायदे जैसी खरपतवार स्वतः छँट जाती है।
समाज को जाति के ज़हर से सराबोर करनेवाली राजनीति को यह जादू अच्छी तरह आता है कि जिसको गालियों के पत्थर मारे हों, उससे फूल लेकर मिलने की ट्रिक क्या है। सत्ता में बने रहने की इस अंधी होड़ में जनहित और जनपीड़ा की अनदेखी होना स्वाभाविक है।
जनता को भी अब पार्टी और विचारधारा के आधार पर वोट देने की परंपरा को त्यागना पड़ेगा। हम पार्टी का चुनाव चिन्ह देखकर वोट करते रहे हैं। हम विचार का झंडा देखकर वोट करते रहे हैं। इन दोनों ही स्थितियों में ठगा जाना तय है। प्रत्याशी का चरित्र देखकर वोट करेंगे तो कम से कम हमें यह तो पता रहेगा कि अमुक व्यक्ति किस सीमा तक गिर सकता है। क्योंकि पार्टी गिरती है तो सीमाएँ असीम हो जाती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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चैनल के स्टूडियो में बाहर गार्ड तैनात था। उसका काम था अनावश्यक लोगों को स्टूडियो में जाने से रोकना। इसलिए वह प्रत्येक व्यक्ति का परिचय जानकर उसे प्रवेश करने दे रहा था।
पहले व्यक्ति ने बताया कि वह एंकर है, उसे मुद्दे पर प्रश्न पूछने हैं। गार्ड ने उसे प्रवेश दे दिया। दूसरे व्यक्ति ने बताया कि मुझे मुद्दे के पक्ष में बोलना है। तीसरे ने मुद्दे के विपक्ष में बोलना था। चौथा मुद्दे का विशेषज्ञ था। गार्ड ने सबको स्टूडियो में जाने दिया। दर्शक दीर्घा में भी ताली बजाने के लिए जनता की भरपूर व्यवस्था की गई।
अंत में एक बदहवास सा बूढ़ा स्टूडियो में घुसने लगा तो गार्ड ने उससे उसका परिचय पूछा। बूढ़े ने अकड़ते हुए कहा – “मेरे बिना यह बहस शुरू ही नहीं हो सकती। …मैं मुद्दा हूँ।”
बूढ़े की अकड़ देखकर गार्ड को हँसी आ गई। फिर उसे डाँटते हुए बोला- “आगे जाओ बाबा। पैनल पूरा हो चुका है। आपके लिए स्टूडियो में न तो कोई जगह बची है, न ज़रूरत।”
बूढ़ा अपना से मुँह लेकर बाहर खड़ा रह गया। स्टूडियो के भीतर बहस शुरू होने वाली थी। डायरेक्टर के इशारे पर दर्शक दीर्घा मूक बैठी ताली बजा रही थी। डायरेक्टर ने पूरी आवाज़ में चिल्लाया- स्टैंड बाइ… कैमरा रोलिंग… एक्शन!
मैं मुद्दा हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली भारत की राजधानी है। देश के सभी प्रकार के कार्यों को करने के लिए बड़े-बड़े सरकारी दफ्तर इसी शहर में बनाए गए हैं। इस प्रयास में पूरा शहर एक दफ़्तर हो गया है और हर नागरिक एक फाइल। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर के बीच घूमते-घूमते हर नागरिक के व्यक्तित्व पर इतनी खरोंचें पड़ गई हैं कि जब वह ख़ुद को तलाशने के लिए अपने आप पर हाथ फिराता है तो उसका वजूद किसी गली हुई फाइल के कागज़ात की तरह बिखर जाता है। यह देखकर नागरिक घबरा जाता है और उन पुर्ज़ों को जैसे तैसे फाइल कवर में ठूंसकर टेबल टू टेबल चक्कर लगाने लगता है।
एक फाइल सुबह गाड़ी में बैठकर ख़ुद को दफ़्तर की ओर धकेलती है तो रास्ते में साइकिल, ई रिक्शा, ठेले, स्कूटर, मोटर साइकिल और बसों में बैठी फाइलें उसके वक़्त की जेब में सेंध लगाती हैं। वह अपनी ज़िंदगी की पोटली से कुछ लम्हों की पूंजी उन पर ख़र्च करके कुछ गालियों का गुज़ारा भत्ता उनके मुँह पर मारकर आगे बढ़ जाता है।
इस लेनदेन में जब भी किसी एक फाइल की ईगो किसी दूसरी फाइल की ईगो से भिड़ जाती है तो पीछे लगी सभी फाइलें कई-कई घंटे जाम में फँसी रहती हैं। बाद में एक पुलिसिया बाबू उन दोनों से सहायता भत्ता लेकर उनके द्वारा एक दूसरे को दी जा रही गालियों का रुख़ अपनी ओर मोड़ लेता है और पीछे की सभी फाइलों का मार्ग क्लियर करवा देता है।
सरकार ने दिल्ली को स्वच्छ रखने के लिए सड़कों के किनारे कूड़ेदान रखवाए हैं। कूड़ेदान इतने ख़ूबसूरत हैं कि उनमें कचरा फेंकने का मन नहीं करता। इसलिए हम सड़कों पर कचरा फेंककर कूड़ेदान के सौंदर्य को बचा लेते हैं। वो तो भला हो सरकार का कि जनता की भारी मांग के बावजूद सड़कों की हालत सुधारने के निर्देश नहीं जारी किए, वरना हमें ज़रा सा कचरा फेंकने के लिए भी सरकारी दफ़्तरों की ओर दौड़ना पड़ता।
सरकारी दफ़्तरों में आप कहीं भी कचरा फेंक सकते हैं। यूँ भी दफ़्तरों को कचरे से ख़ास लगाव है। यही कारण है कि किसी फाइल के कचरा हो जाने तक कर्मचारी उस पर कार्रवाई नहीं करते। यह सरकारी कर्मचारियों की निष्ठा का ही प्रमाण है कि एक बार किसी आम नागरिक का काम किसी सरकारी दफ़्तर में अटक जाए, उसके बाद पूरी व्यवस्था उसे यह आभास कराने में जुट जाती है कि व्यवस्था के सम्मुख उसका वजूद कचरे से अधिक कुछ नहीं है।
पुराने ढर्रे की सड़ांध मारते इन दफ़्तरों में बैठे बाबुओं की शक्ल भी दिन-प्रतिदिन फाइलों की तरह बासी होती जा रही है। ऐसा लगता है कि ये सभी बाबू लोग स्वयं को व्यवस्था से एकरूप करने पर तुले हैं ताकि कोई दरख़्वास्त करनेवाला यह अंतर न कर पाएं की इस व्यवस्था में बाबू कहाँ शुरू होता है और व्यवस्था कहाँ ख़त्म।
अब दफ़्तरों की सड़ांध फाइलों में छुपकर घरों तक पहुँचने लगी है। घरों से बच्चों में और बच्चों से भविष्य तक यह सड़ांध फैल गई है। और हम नाक बंद किये चुपचाप देख रहे हैं कि हर फाइल दिन में दर्जनों बार बाबू बन जाती है और हर बाबू दिन में दर्जनों बार फाइल बन जाता है।
सरकार की ओर देखना हम छोड़ चुके हैं क्योंकि हम जानते हैं कि दिल्ली भारत की राजधानी है और हर काम को करने के लिए यहाँ बड़े-बड़े दफ़्तर सरकार ने ही बनवाए हैं। यहाँ सब लोग बड़े-बड़े काम ही करते हैं। या यूँ कहें कि यहाँ जो काम होता है वह बड़ा ही होता है। इसलिए आम जनता के छोटे-छोटे काम पीढ़ियों तक अधूरे ही पड़े रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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वैसे दिल्ली दिलवाले मरीजों की राजधानी मानी जाती थी, लेकिन आजकल प्रदूषण ने इसे फेफड़ेवाले मरीजों की फैक्ट्री बना दिया है।
स्मार्टफोन के कैमरे और यूट्यूब से कमाई की ख़बरों ने जिस कौम का सबसे ज़्यादा नुक़सान किया है वह है आशिक़। सफदरजंग मक़बरा, पुराना किला, लोदी गार्डन, कुदसिया पार्क, कालिंदी कुंज, गार्डन ऑफ फाइव सेंसेज़, इंडिया गेट और इंद्रप्रस्थ पार्क जैसे सैंकडों तीर्थस्थल अपने चेहरे पर वीराना लपेटे माहौल सुधरने का इंतज़ार कर रहे हैं। मुहब्बत के रूहानी किस्सों को शरारत की चटपटी कहानियों में तब्दील करने के लिए जिन बगीचों का निर्माण दूरदर्शी राजाओं ने करवाया था वे सवेरे मॉर्निंग वॉक वालों, दोपहर में किन्नरों और शाम को स्मैकियों से भरे रहते हैं। झाड़ियाँ आशिक़ों के इंतज़ार में हरी होती जा रही हैं और आशिक़ मौके की तलाश में मुरझाते जा रहे हैं।
बाज़ार फुटपाथ पर आ गए हैं और लोग बाज़ार में। सरकारी ठेकेदार सड़क बनाते समय दोनों किनारों की चार-छह फुट जगह अनदेखी कर देता है ताकि बरसात का पानी जब भूमिगत होने की चेष्टा करे तो उसे डूब मरने की जगह मिल जाए। बरसात न होने की स्थिति में यही छूटी हुई जगह स्वच्छता के सरकारी दावों पर धूल उड़ाने का काम करती है।
गाड़ियों ने सड़कों पर हमला बोल रखा है और सड़कों ने स्पीड पर। चालीस फुट की सड़क को हमने बहुत बेहतरीन तरीके से विभाजित कर रखा है। दोनों तरफ़ चार-चार फीट उस फुटपाथ के लिए जो किसी को दिखता नहीं, फुटपाथ पर नो पार्किंग के बोर्ड से टो-अवे ज़ोन तक के बोर्ड की दस-दस फीट जगह गाड़ी पार्किंग के लिए, सड़क के बीचोंबीच चार फीट का डिवाइडर, शेष चार-चार फीट जगह वाहनों के लिए बचती है। ऐसी सड़क व्यवस्था देखकर सरकार गर्व कर सकती है कि वाहन चल पाएँ या न चल पाएँ पर हमारी सड़कों पर एलिमेंट सारे मौजूद हैं।
मुहल्लों में लोगों ने पार्किंग की जगह घेरने के लिए पर्यावरण से प्यार करना सीखा। कच्ची कॉलोनियों में घर के बाहर ईंटें भिड़ा-भिड़ाकर किचन गार्डन का शगल किया जाता है जहाँ दिन भर घर की नालियों का पानी सड़ांध मारता है ताकि कोई असामाजिक तत्व उस सुंदर उद्यान को हानि पहुँचाने के लिए खड़ा न हो सके, और रात को वहाँ घर के मालिक का दुपहिया या चौपहिया वाहन स्थापित हो जाता है। फ्लैट्स में रहने वाले लोग पुराने स्कूटर सहेजकर रखते हैं ताकि उन्हें आड़ा खड़ा करके गाड़ी की जगह घेरी जा सके।
सरकार के काग़ज़ों में जो पन्द्रह साल पुराने दुपहिये कंडम हो गए हैं, हमारे शहर में बिना कोई सरकारी नियम तोड़े ही उनका प्रयोग किया जा रहा है। उसे कहते हैं कचरे से बिजली बनाने का हुनर। यह और बात है कि इतनी बढ़िया पार्किंग व्यवस्था के बावजूद हमारे शहर के थानों में गाड़ी पार्किंग से जुड़े मुहल्ले के झगड़ों की कोई कमी नहीं हो सकी है। रात के समय किसी पॉश कॉलोनी में जाकर देखो तो ऐसा लगेगा कि आप किसी बहुत बड़ी पार्किंग ग्राउंड में आ गए हैं, जहाँ बीच-बीच में दस-पाँच घर भी पार्क कर दिए गए हैं।
सरकार ने विदेशों की नक़ल करके एक बीआरटी गलियारा बनवाया। जब यह गलियारा बन रहा था तो मूलचन्द चौक से लेकर चिराग़ दिल्ली वाली पूरी सड़क पर ज़ोरदार जाम लगता था। उस समय हम दिल्लीवाले एक-दूसरे को यह कहकर दिलासा देते थे कि बीआरटी की कंस्ट्रक्शन के कारण जाम लग रहा है। फिर कुछ वर्ष बाद गलियारा बन गया। सड़क के बीच में उगे हुए बँटवारों ने हमें सुख कम, दुःख ज़्यादा दिया। अलग-अलग लेन में चलने की व्यवस्था देखकर हम समझ गए कि सरकार हमें बाँटना चाहती है। सो हमने सरकारी मनसूबों पर ऐसा पानी फेरा कि नयी सरकार को आकर वह कॉरिडोर तुड़वाने का टेंडर निकालना पड़ा। यह है हमारी मिलकर चलने की प्रवृत्ति।
बरसों से काली-पीली टैक्सियों से ऊब कर हमने ऊबर-ओला का हाथ थाम लिया। एयर कंडीशन्ड टैक्सियों में बाइज़्ज़त सवारी करके हम इतने प्रसन्न हो गए कि काली-पीली टैक्सी चालकों के दुर्व्यवहार को सुधारने के सभी प्रयास ध्वस्त कर दिए। जब सबने ऊबर-ओला की एप्लिकेशन डाउनलोड कर ली तो अचानक उतनी ही दूरी के लिए उसी टैक्सी का किराया कम-ज़्यादा होने लगा। ईमानदार कंपनियों ने कहकर हमसे डेढ़ गुना से लेकर तीन गुना तक किराया वसूलना शुरू कर दिया। कैब बुक करने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। आपको कहाँ जाना है? पेमेंट कैश है कि नहीं? आपसे पूरी जानकारी लेने के बाद वह बिना कोई जवाब दिए फोन काट देता है। आप इंटरव्यू का रिज़ल्ट आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। सामान्यतया दस-पंद्रह मिनिट में आपका आवेदन निरस्त कर दिया जाता है। और कई बार बीस-बाइस मिनिट प्रतीक्षा करने के बाद आप अपने हाथों से कैंसिलेशन कर देते हैं। कैब कंपनी आपकी इस धृष्टता के लिए आप पर जुर्माना लगा देती है। इन सब स्थितियों की शिकायत करने में आप समय नष्ट न करें इसलिये इन कंपनियों ने अपना कोई फोन नंबर सार्वजनिक नहीं किया है।
परिवहन की एक अन्य शानदार सवारी के रूप में हमारे पास ई-रिक्शा का विकल्प है। जब ई-रिक्शा की शुरुआत हुई थी तब इनका किराया सामान्य रिक्शा से कम था, क्योंकि यह बिजली से चलती है। अब जब सभी सामान्य रिक्शा वाले ई-रिक्शा धारक हो गए तो इनके किराए सामान्य रिक्शा से लगभग ढाई गुना हैं क्योंकि अब जनता के पास कोई विकल्प नहीं है।
हम ओला, ऊबर, ई-रिक्शा की समस्याओं को लेकर सरकार के पास जाते हैं तो सरकार बताती है कि वह अभी प्रदूषण से निबटने में व्यस्त है। कोरोना के कारण मेट्रो और डीटीसी में कम लोगों को भेजा जाएगा ताकि सोशल डिस्टेन्स मेंटेन किया जा सके। पैट्रोल-डीजल की गाड़ियों पर ईवन-ऑड लागू होगा ताकि प्रदूषण कम हो। ओला-ऊबर में दो से अधिक सवारी नहीं बैठेगी ताकि कोरोना न फैले।
हम सरकार से पूछते हैं कि पूरी परिवहन व्यवस्था चरमरा रही है। सरकार बताती है कि यह सरासर आरोप है। परिवहन व्यवस्था चरमरा रही होती तो सरकार कैसे चलती?
हम अपनी शिकायतें और अपना-सा मुँह लिए खड़े रह जाते हैं और मन ही मन धन्यवाद देते हैं उन कंपनियों को जिन्होंने शिक़ायत करने के लिए कोई नम्बर ही जारी नहीं किया है।
✍️ चिराग़ जैन
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हम भारतीय लोग प्रवृत्ति से विश्वासजीवी हैं। विश्वास दो प्रकार का होता है, एक अटल विश्वास और दूसरा अटूट विश्वास। भाषा के बहुत गहरे विश्लेषण के हाथों मजबूर न हों तो इन दोनों का अर्थ एक ही है किन्तु फिर भी विश्वास दो प्रकार का होता है ऐसा हमारा विश्वास है।
जब हम किसी पर अटूट विश्वास करते हैं तो उसे तब तक अटूट बनाए रखते हैं जब तक वह टूट न जाए। एक बार टूट जाने के बाद हम फिर दोगुनी शक्ति लगाकर अटूट विश्वास करने लगते हैं।
नेता चुनाव में जो वायदे करते हैं, वे झूठे होते हैं -ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए प्रत्येक दल के वायदे सुनने के बाद सबसे बढ़िया झूठ बोलनेवाले नेता को अपना विश्वास मत देकर हम उसे सदन में भेज देते हैं। वह जीतते ही हमारे दुःख-दर्द को भूल चुका होगा- ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए हम उसके विपक्षी पर विश्वास करके उसके खि़लाफ़ नारे लगाने लगते हैं।
जो लोग सरकार के विरोधी हैं वे विपक्ष पर विश्वास करते हैं। जो लोग विपक्ष के विरोधी हैं वे सरकार पर विश्वास करते हैं। जो किसी के विरोधी नहीं हैं वे सब पर विश्वास करते हैं। और जो सबके विरोधी हैं वे ख़ुद पर विश्वास करते हैं।
मुहल्ले के कोई गुंडा भारतीय लोकतंत्र पर टिके हमारे विश्वास की हत्या करे तो हम पुलिस पर विश्वास कर बैठते हैं। जैसे ही हमें हमारी भूल का आभास होता है हम तुरंत अपने विश्वास की आरती का थाल लेकर न्यायालय में घुस जाते हैं। न्यायालय में जब विश्वास की लौ झपकने लगती है तो हम उसे संसद की ओट से बचाने की कोशिश करते हैं। जब संसद में भी विश्वासमत गिरने लगता है तो हम मीडिया के कैमरे के सामने विश्वास की गठरी खोल बैठते हैं। कैमरे के हाथ जब उल्टे हमारी ही गर्दन की ओर बढ़ने लगते हैं तो हम मुहल्ले के किसी गुंडे को लाख-दो लाख रुपये चढ़ाकर अपने विश्वास की रक्षा कर लेते हैं।
कल कुछ विश्वासी नागरिक बोल रहे थे कि सरकार ने सुशासन और सुविधाओं का पार्सल दिल्ली से रवाना किया है। अब समस्या यह है कि जिस ट्रेन से रवाना किया है वह लेट चल रही है।
हमने तार्किक उत्तर का विश्वास रखकर प्रश्न पूछ लिया- ‘पर भैया, जिस सरकार ने पार्सल भेजा है; ट्रेन भी तो उसी सरकार के आदेश पर चलती है।’
प्रश्न सुनते ही वे भड़क गए। बोले, ”तुम जैसे लोगों के कारण ही इस देश का सत्यानाश हुआ है। जब देखो सरकार को उंगली खोंचते रहते हो। और कुछ काम ही नहीं है। तुम साले पाकिस्तान के एजेंट हो। राष्ट्रद्रोही हो तुम। तुम ही सरकार को बदनाम करने के लिए ट्रेनवा लेट कराए हो। तुम्हें खटक रहा है कि कोई आदमी काम कैसे कर ले। तुम्हारी छाती पर तो साँप लोट रहे हैं।”
उनका यह रौद्र रूप देखकर हमें विश्वास हो गया कि सरकार ने सचमुच दिल्ली से पार्सल भेजा है जो एक न एक दिन गाँव तक ज़रूर पहुँचेगा, लेकिन मिलेगा उसी को जिसे सरकार पर अटूट और अटल दोनों तरह का विश्वास होगा।
© चिराग़ जैन