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‘वर्चस्व’ के लिए ‘अस्तित्व’ से खिलवाड़

विपत्ति मनुष्य को उसकी लापरवाही पर ध्यान देने का अवसर देती है। संभवतः किसी भी समय में किसी भी पीढ़ी के पास यह अवसर नहीं रहा होगा कि कई-कई सप्ताह तक बिना कुछ काम किये रहा जाए और उससे कोई प्रत्यक्ष हानि न हो। हमेशा समय की कमी का रोना रोनेवाला मानव आज पूरी तरह फ़ुरसत में है। उसकी दुकान बंद है, लेकिन उसे कोई बेचैनी इसलिए नहीं है कि उसके ग्राहक का कहीं और जाने का भय नहीं है। उसकी फैक्ट्री बंद है, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके प्रतिद्वंद्वी की भी फैक्ट्री बंद है। फैक्ट्री ही क्या पूरा बाज़ार बंद है। बाज़ार ही क्या पूरा शहर बन्द है। शहर ही क्या पूरा देश बंद है। देश ही क्या पूरी दुनिया बन्द है। इतनी फ़ुरसत कभी किसी पीढ़ी के मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुई है।
जब इस फ़ुरसत में बोरियत से बचने के समस्त उपायों से बोर हो जाएंगे तब दुनिया पलटकर देखेगी कि जिन कार्यों में हम अब तक इतने व्यस्त थे, वे सब तो हमारे इस संकट में हमारी सहायता कर ही नहीं पा रहे हैं। हम युद्ध की तैयारियों के लिए भयावह अस्त्र-शस्त्र बना रहे थे, लेकिन फिलहाल उनकी कोई सुधि ही नहीं ले रहा है। हम अपने थोथे अहंकार की पुष्टि के लिए समाज को ऊँची-नीची जातियों की अनुसूची में बाँट रहे थे, लेकिन महामारी का यह रक्तबीज न तो अनुसूचित जातियों को बख़्श रहा है न ही अनुसूचित जनजातियों को। हम उनके धर्मस्थल से ज़्यादा भव्य अपना धर्मस्थल बना रहे थे लेकिन यह महामारी मंदिर के फ़र्श से लेकर, मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद है। हम घोटाले और घपले कर-कर के पूंजी बना रहे थे लेकिन आज हमारे पास उस पूंजी को ख़र्च करने का उपाय नहीं है। जो एक बड़ा भूखंड विजय कर चक्रवर्ती बने फिरते थे, वे आज दो कमरों के फ्लैट में बंद हैं। जिनके पास हर काम के लिए नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में ख़ुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं। कितना आश्चर्य है कि सुख के समय में हम अमीर, ग़रीब, हिन्दू, मुस्लिम, सवर्ण, अछूत, शहरी, ग्रामीण, गोरे, काले, साक्षर, निरक्षर, स्त्री, पुरुष और न जाने क्या-क्या संज्ञाएँ तथा विशेषण ओढ़े फिरते हैं; लेकिन दुःख आते ही हम सब ख़ालिस मनुष्य हो जाते हैं।
दो-दो महायुद्ध झेलने के बाद यूरोप ने यह सबक लिया कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किसी भी सरकार का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। सत्ता और वर्चस्व की होड़ में विनाश के भयावह दृश्य देख लेने के बाद यूरोप के देशों ने अपनी सीमाओं पर ख़र्च होनेवाले धन का अधिकतम अंश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर लगाना शुरू किया।
कोरोना के विरुद्ध जारी इस महायुद्ध के समय में हम यह संकल्प तो ले ही सकते हैं कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन तो अवश्य ही हों। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सभी दल जब ‘वर्चस्व’ की लड़ाई लड़ें तो उसका बोझ उस बजट पर न पड़े जो जनता के ‘अस्तित्व’ की रक्षा के लिए निर्धारित हो। युद्ध के लिए अस्त्र ख़रीदे भी जाएँ और बनाए भी जाएँ, लेकिन उन हथियारों को ख़रीदने के लिए किसी अस्पताल या किसी स्कूल का बजट एडजस्ट न किया जाए। हमारा राष्ट्रीय ध्वज मंगल पर भी फहराए और चांद पर भी फहराए; लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोनेवाला कोई परिवार फाके तो नहीं कर रहा।
इन स्थितियों के लिए न तो मैं किसी सरकार पर दोषारोपण करना चाहता हूँ, न ही जनता पर। हमारी प्राथमिकताएँ क्या हों, यह हमें कोविडकाल चीख़-चीख़कर बता रहा है। पीछे पलटकर किसी से शिकायत करने जाने की संभावना शेष नहीं है। अशोक जब कलिंग के बाद संन्यास के पथ पर चले होंगे तब उन्होंने अपने वर्तमान को देखकर ही निर्णय लिया होगा; यदि वे अतीत से उलझते तो अतीत उन्हें कभी भविष्य सुधारने की मोहलत नहीं देता।
मैं वर्तमान को परिवर्तन का कलिंग युद्ध मानकर एक शांत और सुखद भविष्य की ओर क़दम बढ़ाने की संस्तुति करता हूँ। वर्तमान हमें बता रहा है कि लॉकडाउन की इस परिस्थिति में हमारे पास एक ऐसा पुख्ता तंत्र होना चाहिए था कि सरकार कम्प्यूटर पर सबकी यूनीक आईडी के माध्यम से चिन्हित कर पाती कि एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों में से कितने ऐसे हैं जिनके व्यवसाय के कॉलम में ‘दिहाड़ी मजदूर’ लिखा है। यूनिक आईडी के माध्यम से सरकार उन सबके परिवारों की पहचान आसानी से कर लेती और उनके खाते में आवश्यक राशि पहुँचाकर उन्हें मरने से बचा लेती।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारे पास न्यूनतम शिक्षा के साथ-साथ सिविक सेंस विकसित करने की भी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि सरकार को जनता की भलाई के लिए उस पर लाठियाँ न भाँजनी पड़ें।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं के पास इतनी व्यवस्था अवश्य हो कि यदि किसी संकट की घड़ी में पाँच प्रतिशत जनसंख्या किसी महामारी, प्रदूषण, रोग, युद्ध आदि से प्रभावित हो जाए तो उनके उपचार में बाधा न आए।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि सरकार के पास ऐसे अधिकार हों कि ऐसी आपदा के समय निजी विमानन कम्पनियों, निजी अस्पतालों, निजी फार्मा कंपनियों, निजी टेलीकॉम कंपनियों, निजी मीडिया चैनल्स, निजी रिटेल स्टोर्स आदि को सरकारी नियंत्रण में लेकर जनहित में प्रयोग किया जा सके।
जो लोग निजीकरण की वक़ालत करते फिरते हैं, उनसे वर्तमान स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि जब बस्ती में आग लगती है तब व्यापारी केवल अपनी दुकान बचाता है और जैसे ही उसकी दुकान सुरक्षित होती है तो वह पानी की बाल्टियाँ बेचकर बस्ती में धंधा करने लगता है। राजनैतिक दल उस समय आग बुझाने का दिखावा करते हैं ताकि चुनाव के समय बस्ती में वोट मांगने का अधिकार मिल सके। केवल सरकार ही है जो पूरी बस्ती की आग बुझाने के लिए प्रयास करती है।
यह भीषण समय बीतने के बाद यदि हम अपनी मानवता को बलिष्ठ करके घरों से बाहर निकले तो ‘दुनियाबन्दी’ की दुर्घटना मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी; लेकिन इसके बीतते ही यदि हम फिर से ‘मनुष्य’ की बजाय कोई भी अन्य संज्ञा लपेट बैठे तो कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई में शहीद हुए लोगों के बलिदान और हफ़्तों तक घरों में बंद रहकर अवसाद झेल रहे देश की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

Published in Dainik Jagaran of 31 March 2020

हँसना बहुत ज़रूरी है

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कोरोना, दहशत का सबब बन गया है। अमरीका, चीन और इटली जैसे देशों ने सख्ती के साथ जनता को घरों में बन्द कर दिया है। भारत में भी सरकार को कमोबेश सख्ती बरतनी पड़ रही है।
दरअस्ल अनवरत भागती-दौड़ती ज़िन्दगी को टिककर बैठने का अभ्यास ही नहीं रहा है। तेज़ दौड़ती गाड़ी के ड्राइवर को यमुना एक्सप्रेसवे से उतरकर जब आगरा की गलियों में गाड़ी चलानी पड़ती है तो उसे बड़ी कोफ़्त होती है। कुछ ऐसी ही कोफ़्त घर बैठे कामकाजी लोगों को भी हो रही है।
उधर टेलिविज़न के प्रत्येक न्यूज़ चैनल पर चौबीस घण्टे केवल कोरोना ही चल रहा है। कोरोना से संक्रमित लोगों का आँकड़ा, कोरोना से मरनेवालों का आँकड़ा, कोरोना से बचनेवालों का आँकड़ा, लॉकडाउन का सम्मान न करनेवालों की पिटाई, लॉकडाउन का सम्मान करने के लिए सेलिब्रिटीज़ की अपीलिंग वीडियो -इनके अतिरिक्त कुछ नहीं है इन चौबीस घण्टे के पत्रकारों के पास।
जीवन पत्रकारों का भी उतना ही महंगा है, जितना बाक़ी दुनिया का। मीडिया हाउसेज को चाहिए कि इस आपातकाल में अपने न्यूज़ बुलेटिन को चौबीस घण्टे से घटाकर सुबह, दोपहर और शाम को एक-एक घण्टे तक सीमित किया जाए। शेष समय अपने पुराने सुपरहिट शो चलाएँ। यदि कोई महत्वपूर्ण सूचना या जानकारी प्रसारित करनी हो तो रनिंग प्रोग्राम को रोककर, वह सूचना दे दी जाए।
ऐसा करने से अनेक लाभ होंगे, एक तो हमारी ज़िम्मेदार मीडिया को एक-एक नाकाबंदी पर जाकर पुलिसवालों से लोगों को पीटने, प्रताड़ित करने और समझाने की रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ेगी। ऐसे चमत्कार होने बन्द हो जाएंगे कि जब मीडियावाले कैमरा लेकर पहुँचें, ठीक उसी वक़्त विशेष किस्म के बदतमीज़ लोग पुलिसवालों के हत्थे चढ़ें। सारा दिन कोरोना का रोना सुनकर घर बैठी जनता का मानसिक तनाव नहीं बढ़ेगा और अन्य ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रम देखकर उनका ध्यान विकेन्द्रित होगा।
दूसरे, सोशल मीडिया पर अफ़वाह फैलने से रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा जारी व्हाट्सएप हेल्पलाइन के अतिरिक्त कोरोना से सम्बद्ध किसी भी जानकारी का भरोसा न किया जाए। देश में सृजनात्मक लोगों की बहुतायत है। ये लोग टिकटॉक, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि के माध्यम से घर बैठे लोगों का मनोरंजन करें। ‘लॉकडाउन’ के समय अनेक हास्य प्रधान वीडियो आ रहे हैं। इनसे निश्चित रूप से लोगों का तनाव कम हो सकता है। गीत, हास्य, संगीत, सृजन, मोटिवेशन, शेरो-शायरी, फोटोग्राफी, ऐतिहासिक जानकारी, वैज्ञानिक जानकारी, पौराणिक तथ्य आदि के माध्यम से हम घर बैठी जनता की समय बिताने में सहायता कर सकते हैं।
हास्य प्रधान मनोरंजन सामग्री इस समय देश की जनता को एकांत से उत्पन्न होनेवाले तनाव से सुरक्षित रखेगी। गीत, जनता की संवेदनाओं को सजग और सक्रिय रखने में सहयोगी होंगे। संगीत जीवन के प्रति विरक्ति से बचाए रखेगा। तथ्यात्मक और रोचक जानकारियाँ, जिज्ञासाओं को बचाए रखने में मदद करेंगी। हमारे घरों में लोकगीत, लोक कहावतों, लोक संस्कृति के अनेक चिन्ह आज भी मौजूद हैं। इन प्रतीकों को पहचानकर लोगों से सोशल मीडिया पर साझा करें तो भारत की लोक संस्कृति को पुष्ट करने में ये 21 दिन कारगर साबित होंगे।
तनाव की चर्चा से तनाव और बढ़ता है। तनाव पर विजय प्राप्त करनी है तो स्वयं को संयत करना होगा और इसके लिए दहशत की त्यौरियों को पिघलाकर अधरों पर मुस्कान की प्रतिष्ठापना करनी ही होगी। कोरोना से लड़ने के लिए हम सब घरों तक सीमित हो गए हैं। सरकार, पुलिस, अस्पताल, सफाईकर्मी, मीडिया और जनता मिलकर कोरोना का विध्वंस करने का युद्ध लड़ रहे हैं लेकिन घर के भीतर उदासी और बोरियत उत्पन्न न हो इसके लिए ठहाकों का उत्सव जारी रखना हम सबका कर्तव्य है।
21 दिन बोर होकर काटने से बेहतर है कि 21 दिन हँसते-गाते बिता दिए जाएँ। इन 21 दिनों में हमें आपस में मिलने-जुलने से मना किया जा रहा है लेकिन दिलों के मिलने-जुलने पर कोई रोक नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन

Ref : Lockdown declared

लाॅकडाउन

घर पर रहोगे, तो रहोगे

जिस घर के सपने देखे थे, आओ कुछ दिन उस घर में सपने देखें

यह एकांतवास नहीं, तपस्या है

कवि सम्मेलनों को कोरोना से नुक़सान हुआ है, कविता को नहीं

आपदा की इस घड़ी में “ख़ुद को भी छूने से बचें”

कर्फ्यू खुलते ही सबको आधार कार्ड का फोटो बदलवाने के लिए लाइन में लगना पड़ेगा क्योंकि 21 दिन में तो असली चेहरे निकल ही आएंगे!

✍️ चिराग़ जैन

भ्रष्टाचार की परंपरा

कोरोना विश्व भर में महामारी की तरह फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस संकट से उबरने के उपाय खोज रहे हैं। ‘जान है तो जहान है’ के सिद्धांत पर चलते हुए जान बचाने के लिए काम-धंधे, आवागमन, मेलजोल आदि सब बन्द कर दिए गए हैं। दुनिया भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर रहे हैं। लेकिन दुनिया, शेयरों के गिरने की परवाह छोड़कर कोरोना की चपेट में आए लोगों की संख्या का हिसाब रखने में व्यस्त है। अमरीका, इटली, चीन जैसे देशों में आपातकाल घोषित हो गया है। सरकारें अपने बजट का बड़ा हिस्सा इस आफत से निपटने में ख़र्च कर रही हैं। विद्यालयों में परीक्षाएँ महत्वपूर्ण नहीं रह गईं; स्टेडियम के लिए खेल महत्वहीन हो गए; बाज़ार के लिए व्यापार द्वितीयक हो गया; सीमाओं ने आग उगलना बन्द कर दिया; यहाँ तक कि कोई ख़ास आतंकी घटना भी सुखिऱ्यों में नहीं आ रही।
लेकिन इस स्थिति में भी भारतीय जनमानस के रक्त में प्रवाहित बेईमानी पर कोरोना का कोई असर नहीं दिखाई दिया। बात-बात में संस्कृत के श्लोक उध्दृत करनेवाले हम भारतीय इस आपातकाल में भी मास्क पर दस-दस गुना मुनाफ़ा बटोरने में लगे हैं। ‘तुम क्या लाए थे, और क्या ले जाओगे’ के उपदेश देने वाले हम भारतीय सेनिटाइजर में मिलावट करके लोगों के जीवन से खेल रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ‘आत्मा न कभी पैदा होती है, न कभी मरती है।’
हरिश्चंद्र, राजा शिवि, भामाशाह, विक्रमादित्य और अशोक के वंशज हम भारतीय प्रयोग किये हुए मास्क को दोबारा ‘पॉलीथिन’ में पैक करके संक्रमण के प्रसार में सहयोग कर रहे हैं ताकि संविधान में उल्लिखित ‘समानता के अधिकार’ के तहत कोई नागरिक कोरोना के स्पर्श से वंचित न रह जाए। जब सौ-पचास लोग मर लेंगे तब गोदाम में भरे मास्क और सेनिटाइजर महंगे दामों पर बेचे जाएंगे क्योंकि हम जानते हैं कि यदि आज मास्क को तीन सौ रुपये में बेचने का लोभ छोड़ दिया जाए तो परमपिता परमात्मा इस त्याग से प्रसन्न होकर ऐसी परिस्थिति का वरदान देंगे कि वही मास्क हज़ार रुपये में बिक सकेगा।
कितने महान हैं हम। महामारी फैलती है तो हम दवाइयों की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। प्यार फैलता है तो हम वेलेंटाइन डे पर गुलाब की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। दरगाहों और तीर्थों पर मेले लगते हैं तो जेब काटने के टेंडर भरे जाते हैं। बाढ़ और भूकम्प आता है तो पीड़ितों की सहायता के लिए चंदा उगाकर खा जानेवाले समाजसेवी अवतरित हो जाते हैं।
बीमारी आती है तो हमें ज्ञात होता है कि केमिस्ट बेईमान हैं। दंगे होते हैं तो हमें पता चलता है कि पुलिस बेईमान है। नोटबन्दी होती है तो सरकार बताती है कि बैंकर बेईमान हैं। ऑडिट होता है तो पता चलता है कि पूरा दफ्तर बेईमान है। न्यायपीठ बैठती है तो पता चलता है कि जिन दफ्तरों को ईमानदारी की क्लीन चिट मिली है उनका ऑडिटर बेईमान है। नई सरकार बनती है तो पता चलता है कि पिछली सरकार बेईमान थी।
हम किताबों में पढ़ते आए हैं कि भारत विविधता में एकता वाला देश है। किंतु जब ज़िन्दगी पढ़ी तो देखा कि यहाँ विविधता ही विविधता है। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि कोई भारतीय चाहे कोई भी व्यवसाय करे, वह अवसर मिलने पर उसमें बेईमानी ज़रूर करेगा। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि हर व्यवसाय के पास अपने आपको सबसे ज़रूरी, सबसे जनहितकारी और सबसे आध्यात्मिक बताने के लिए जुमले मौजूद हैं। यह भारत का सौंदर्य है कि यहाँ हर नागरिक यह चाहता है कि गुनाहों के बहीखाते में किसी और का नाम लिखा जाए और मुनाफ़े की पंक्ति में पहला नम्बर हमारा हो।
जिला अस्पताल के शवगृह में शव-सुपुर्दगी की पर्ची काटनेवाला बाबू भी रोते-बिलखते परिजनों से सौ रुपैये ऐंठते हुए सरकार के भ्रष्टाचार को गाली देता है क्योंकि ऐसा करने से उसके अपराध की फोकस लाइट फैलकर पूरे परिवेश के धब्बे दिखाने लगती है।
संस्कार, अध्यात्म और परंपरा का फटा ढोल पीटनेवाला हमारा समाज इस योग्य भी नहीं बचा है कि किसी को बेईमान कह सके। यह पूरे समाज की बीमारी है। इसमें कोई एक जाति, कोई एक सम्प्रदाय, कोई एक धर्म, कोई एक विचारधारा, कोई एक वाद, कोई एक भाषा, कोई एक क्षेत्र, कोई एक वर्ण, कोई एक लिंग, कोई एक व्यवसाय या कोई एक पीढ़ी अलहदा नहीं है। बेईमानी ने पूरे देश को एकसूत्र में बांध रखा है।
कोरोना को भारत में प्रवेश किये दो सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। एक बार इस वायरस की शिराओं में यहाँ की आबो-हवा घुल जाने की देर है, फिर यह वायरस भी कुछ ले-दे के लोगों को बीमार करना बंद कर देगा।

*नोट : इस लेख को गणपति भाव से पढ़ें और पूरा अर्थ ग्रहण करने के उपरांत ही प्रतिक्रिया दें। यदि द्रोणाचार्य की तरह आधा पढ़कर बुद्धि के कपाट बंद कर लिए तो युधिष्ठिर के सिर तो केवल अर्द्धसत्यभाषण का पाप आएगा किन्तु आधी बात से निर्णय पर पहुँचने वालों की हानि अधिक होगी।

✍️ चिराग़ जैन

ओ कोरोना

ओ कोरोना
हम पर पहले ही है काफ़ी रोना-धोना
तुम जीवन दुश्वार करो ना!

तुमको क्या लगता है, क्यों बे
हम खाँसी से डर जाएंगे
ऐसी खाँसी करने वाले तो भारत में
सीएम बने फिरा करते हैं

हाथ मिलाने से बढ़ते हो
ताप बढ़े तो मर जाते हो
भारत में टेम्प्रेचर
अड़तालीस डिग्री तक चढ़ जाता है
राख तलक भी नहीं मिलेगी

राजनीति के हाथ अगर तुम चढ़ जाओगे
नामो-निशां नहीं बचने का
ये वज्रोदर
पुल, चारा, शौचालय सब कुछ खा जाते हैं
इनकी महाक्षुधा के आगे
तुम बिन सैनेटाइज़र के ही मिट जाओगे
इन्हें नहीं आता कुछ भी जीवन भर ढोना
ओ कोरोना!

अगर किसी दिन
किसी मीडिया के चैनल में धरे गए तो
प्रश्नों का तूफ़ान उठेगा
उत्तर देने तक का अवसर नहीं मिलेगा
इनके लिए तुम्हारी कोई
चार बुलेटिन से ज़्यादा औक़ात नहीं है
अगली बड़ी ख़बर आने तक
तुम हो इनका खेल-खिलौना
ओ कोरोना!

उत्सव सारे मंद हो गए
खेल-तमाशे बंद हो गए
आना-जाना बंद हुआ है
हँसना-गाना बंद हुआ है
ओ सन्नाटै के उद्घोषक
शर्म नहीं आती क्या तुमको
काफ़ी आफ़त मचा चुके हो
अब तुम जाकर किसी कुँए में डूब मरो ना!
ओ कोरोना!

✍️ चिराग़ जैन

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