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जब हम बोलते थे कि देश में ग़रीबी बहुत है, तो वे बोलते थे कि बड़े लक्ष्य रखो! देखो देश को विश्व समुदाय में सम्मान मिल रहा है। सुनकर हम ग़रीबी पर मौन हो गए।
हमने कहा कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। वे बोले, दुनिया भारत को देख रही है। ऐसी बातें करके देश का सम्मान कम मत करो। हम भ्रष्टाचार भी पचा गए।
हमने कहा कि देश में महंगाई बर्दाश्त से बाहर हो रही है। वे बोले राष्ट्रप्रेम की बातें करते हो और ज़रा-सी महंगाई नहीं झिल रही। हम अपना-सा मुंह लेकर रह गए।
हमने पूछा कि अच्छे दिन का सपना सच क्यों नहीं हो रहा? वे बोले प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करना अशोभनीय है।
…पठानकोट हमले के बाद हमने पूछा कि कब तक सहन करें? वे बोले कि वेदेशी मुआमलात जल्दबाज़ी में नहीं सुलझाए जाते। सब्र करो।
कश्मीर के मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान के गुण गाए। हमने आहत होकर पूछा कि ये ग़द्दारी क्यों बर्दाश्त की गई? वे बोले कश्मीर की रणनीति का हिस्सा है। समय आने पर उत्तर दिया जाएगा। अब उरी में निहत्थे सपूत मौत के घाट उतार दिए गए। देश पूछ रहा है कि अत्याचारी को कब सबक सिखाया जाएगा? वे बोले सब्र करो। युद्ध अंतिम विकल्प है।
हमने पूछा कि चुनावी रैलियों में निवर्तमान सरकार को कायर कहकर जब हमसे वोट माँगा जा रहा था तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सम्मुख देश की विवशता को क्यों अनदेखा किया गया था?
वे उठे, फोन उठाया, कोई नंबर डायल किया और बोले- “स्वामी जी, देश का रक्तचाप बढ़ रहा है, कुछ ध्यान शिविर आयोजित करो, कुछ ध्यान डाइवर्ट करो।”
इससे पहले कि हम कुछ और बोलते, वे बोले शहीदों की आत्मा की शान्ति के लिए “मौन रखो।”

✍️ चिराग़ जैन

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