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आतंकवाद का दंश

इस कदर नफ़रत बढ़ी है, हो गये त्योहार घायल रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल ईद को डर है, वजू की हौद में तेज़ाब ना हो शाम की मजलिस कहीं बस दो घड़ी का ख़्वाब ना हो रह नहीं जाएँ नयी नस्लें मिठासों से नदीदी दे न दे कोई क़फ़न की शक्ल में इस बार ईदी मस्जिदों की सीढ़ियाँ...

नये घर में

सुनो! सब कुछ तो बटोर लाया हूँ अपने पुराने मकान से नये मकान में; फिर भी काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं …जस का तस। अलमारी के पीछे जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ अपना घर बदलते हुए। दीवाली की सुबह रसोई की चौखट पर सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;...

अविनय

जो अकारण ही किसी अपमान के भागी बने हैं हो न हो उनसे किसी सम्मान की अविनय हुई है जो बिना चाहे पतन-पथ पर चले आए अचानक उन अभागों से किसी उत्थान की अविनय हुई है थी अतुल क्षमता विजय की, पर पराजय का रहा डर सामने गांडीवधारी थे, तभी रथचक्र जर्जर यदि अचानक मार्ग बदले लक्ष्य को...

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं मेरे सपनों को बांध सके ऐसी दुनिया में डोर नहीं कोमल हूँ कन्यापूजन में चण्डी हूँ दुष्टों से रण में जब ठान लिया तो मिला दिया धरती को अम्बर से क्षण में मुश्किल की कोई भी आंधी मुझको सकती झकझोर नहीं मेरे सपनों का देश अलग...
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