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सारे ही सुख थे बगिया में, फिर क्यों तुमने पीर चुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

क्या तुमने भी महसूसा है, एकाकी हो जाना जग में
क्या तुमने जी भर भोगा है, सब अपने खो जाना जग में
क्या तुमने भी भावुकता को लुट कर मरते देख लिया है
क्या तुमने भी अपनेपन का रंग उतरते देख लिया है
क्या तुमने भी जान लिया है अपने ही घर में शकुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

सच बतलाओ क्या तुमने भी चेहरा देखा है रिश्तों का
मुरझाने के बाद कभी क्या सेहरा देखा है रिश्तों का
क्या तुमने भी हर उत्सव के अगले पल सन्नाटा झेला
दिल के व्यापारों का दुनिया की मंडी में घाटा झेला
कोमलता की देह धुने बिन किन कंधों की शॉल बुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

✍️ चिराग़ जैन

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