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चुभन

उथल-पुथल सी मची हुई है
हल जीवन को रौंद रहा है
शायद ईश्वर की आँखों में
फिर से सावन कौंध रहा है
जितना ज़्यादा जोता जाए,
उतना सृजन निराला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा

मिट्टी के कण-कण को निर्मम, दो बैलों के खुर कूटेंगे
फाल निरंतर चोट करेगी, परतों के तन-मन टूटेंगे
जिनमें फलने की इच्छा हो, उन बीजों को गड़ना होगा
तब इस धरती के दामन में आशा के अंकुर फूटेंगे
माटी का तन सीला होगा,
धरती का मुँह काला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा

दिन भर अम्बर आग उगलता, तब आती है शाम सलोनी
फिर सूरज के छिप जाने को, हम कह देते हैं अनहोनी
लेकिन ऐसी हर अनहोनी केवल आँखों का धोखा है
दिन से किस दिन रात रुकी है, रातों ने कब दिन रोका है
कुछ पल रात बितानी होगी,
फिर भरपूर उजाला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा

✍️ चिराग़ जैन

शिक्षकों की परछाईं

जब हम शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, तब शिक्षकों का ख़ूब उपहास करते हैं। कोई ऐसा शिक्षित न मिलेगा जिसने अपने शिक्षकों के विकृत नामकरण न किये हों। किन्तु जब हम संघर्ष की वीथियों पर चलते हैं, तब उन्हीं शिक्षकों के सामान्य व्यवहार में उच्चरित वाक्य हमारी समस्याओं का समाधान बन जाते हैं। यही कारण है कि उद्दण्ड से उद्दण्ड बालक भी जब परिपक्व होता है तो उसके हृदय में अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान अवश्य उपजता है।
मुझे अपने शिक्षकों से अपार दुलार मिला। अनेक शिक्षक ऐसे रहे जो मित्र बनकर मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन गए। मेरे समवयस्कों में मेरे मित्र बहुत कम रहे, इसीलिए मुझे अपनी आयु से दस-बीस-तीस वर्ष अधिक के मित्र भरपूर मिले।
मैंने नवमीं कक्षा में दरियागंज के जैन स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ मुझे ऐसे-ऐसे शिक्षक मिले जिनके स्नेह और आचरण ने मेरे चरित्र का निर्माण किया। संस्कृत के अध्यापक आचार्य गिरीश पुरी गोस्वामी जी से मैंने भाषा का संस्कार और कठिन परिस्थितियों में संयत रहने का गुण सीखा। वे शब्दों के अपव्यय के विरोधी हैं, इसीलिए सही जगह पर बिल्कुल सही शब्द प्रयोग करना उन्होंने मुझे अपने आचरण से सिखा दिया। हिन्दी के अध्यापक श्री राजबल्लभ पचौरी के साथ मेरी घनिष्ठता सबको पता थी। वाद-विवाद से लेकर काव्यपाठ और भाषण तक जिस भी प्रतियोगिता में जाना हो, मुझे उसकी अनुमति में कभी कोई संकट नहीं आया क्योंकि पचौरी सर की ओर से मुझे अभय प्राप्त था।
मेरे क्लास टीचर भी मुझे ‘पचौरी जी का चेला’ कहते हुए खीझते हुए ही सही, लेकिन अनुमति दे ही देते थे। संगीत के अध्यापक श्री चन्द्रकान्त पाटणकर जी का मैं अधिकृत स्टूडेंट नहीं था किंतु ‘लोकोच्चार प्रतियोगिता’ के लिए उनकी जान खाने का अधिकार मुझे उन्होंने सहर्ष प्रदान किया था। एक हमारे अध्यापक थे श्री जी एस अग्रवाल। वे हमें भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। उन्होंने कभी किसी विद्यार्थी को डाँटा नहीं, लेकिन यदि किसी लड़के के प्रति उन्होंने खिन्नता प्रकट भी कर दी तो इससे फ़र्क़ पड़ता था। वे अपने शिक्षार्थियों के प्रति बेहद सजग थे। वे हमारे एक ऐसे अध्यापक थे, जो पाठ्यक्रम रटाते नहीं, बल्कि सिखाते थे। एक बहुत ग़ुस्सेवाले अध्यापक थे श्री वी एस राही। उनकी दहशत पूरे स्कूल के लड़कों को थी, लेकिन जब स्कूल से निवृत्त हुआ तो समझ आया कि उनकी सख़्ती ने हमारे जीवन में अनुशासन के ऐसे बीज बो दिए जिन पर पल्लवित आदतें हमारी सफलता की प्रशस्ति बन गई। इसी विद्यालय के परिसर में श्री राजकुमार चिटकारा से कम बोलकर ज़्यादा करने का गुण ग्रहण किया; श्रीमती अलका गुप्ता और श्रीमती अंजू रगता से अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में ऊर्जा नष्ट न करने का व्यवहार सीखा; श्री राजेश जैन और श्री पी दास से अपने विषय में पारंगत होने का महत्व समझा।
उपप्राचार्य श्री एस सी रस्तोगी से कुशल नेतृत्व की क्षमताएँ और प्राचार्य डॉ बी डी जैन से प्रबंधन की परिवक्वता हासिल की। विद्यालयों में जीवन भर श्रेष्ठ नागरिक तैयार करनेवाले इन अध्यापकों का आभार व्यक्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु आज अपने व्यक्तित्व की परतों का अन्वेषण करता हूँ तो अपने एक-एक शिक्षक को अपने व्यवहार की एक-एक परत में जीवित पाता हूँ।
स्कूल से निकलकर कॉलेज में गया तो वहाँ अनेक शिक्षक ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तित्व के रॉ फ्लैट को डेकोरेट करके शानदार बना दिया। मैं कभी नहीं भूल सकता कि वर्ष 2004 में मुझे ‘जनसंचार के सिद्धांत’ पढ़ानेवाली अतिथि प्रवक्ता श्रीमती ऋतु नानन पाण्डेय को जब यह पता चला कि मैं एक कवि सम्मेलन के लिए बेल्जियम पहुँच रहा हूँ, तो वे नीदरलैंड से अपने परिवार के साथ मुझसे मिलने बेल्जियम आ पहुँची। कवि सम्मेलन करके जब मैं होटल पहुँचा तो पता चला कि एक फैमिली पिछले 2 घण्टे से रिसेप्शन पर बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस घटना ने मुझे एक बार फिर सिखाया कि विनम्रता किसे कहते हैं।
एक और अतिथि प्रवक्ता डॉ संध्या गर्ग ने जीवन में मातृत्व की भूमिका अदा की। आज भी जीवन की हर चुनौती में उनके मार्गदर्शन से समाधान खोज ही लेता हूँ। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके कारण जीवन के इस दुर्गम पथ पर अनवरत बढ़ता जा रहा हूँ। आप भी तलाशिये, आपके भीतर भी आपके शिक्षक किसी न किसी ‘आदत’ के रूप में साँस ले रहे होंगे।

✍️ चिराग़ जैन

क्षमा : एक पर्व

क्षमावाणी मनुष्य इतिहास का सर्वाधिक वैज्ञानिक पर्व है। यह मनुष्यता के लिए सबसे आवश्यक त्योहार है। ‘क्षमा’ मानव के चरित्र निर्माण का सर्वाधिक प्रबल यंत्र है।
क्षमादान कठिन है किन्तु क्षमायाचना उससे भी अधिक कठिन है। क्षमा करनेवाले के पास कहीं न कहीं बड़प्पन का कोई अहंकार हो सकता है, किंतु क्षमा याचना करनेवाला तो हर अहम् से मुक्त होता है। क्षमा मांगने के लिए अहम् को तिरोहित कर देना अपरिहार्य है। जिसने यह कर लिया वह उत्सव का अनुभव कर सकता है।
‘क्षमा’ – लिखना कठिन है, बोलना और भी कठिन है, अनुभूत करना इससे भी अधिक कठिन है और क्षमा कर पाना सबसे कठिन है। व्यवहारिक धरातल पर जब हम जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, उस समय स्थितप्रज्ञ रहकर विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहजता को अक्षुण्ण रखना बेहद दूभर होता है। कई बार आपकी क्षमाशीलता को आपकी दुर्बलता समझ कर विपरीत पक्ष आपको प्रतिक्रिया हेतु विवश करता है। ज्ञानी कहते हैं कि सामनेवाला कुछ भी करे, आपको क्षमाशील बने रहना है। किन्तु मेरा मत है कि मनुष्य ने जितने भी संबंध निर्मित किये हैं, उनमें ‘क्षमा’ का संबंध एक ऐसा संबंध है जिसका द्विपक्षीय होना अपरिहार्य है।
यदि दूसरा पक्ष क्षमा के सूत्र में बंधने को तैयार न हो, और हम इकतरफ़ा क्षमा करते रहें तो धीरे-धीरे क्षमा करने वाले व्यक्ति में स्वयं के महान होने का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगता है। इसके जन्मते ही वह दूसरे को पहले मूर्ख और फिर तुच्छ समझने लगता है। और आगे बढ़ने पर घृणा जन्म लेती है, और अंततः स्थिति पुनः कटुता की ओर बढ़ जाती है। इसलिए क्षमा के संबंध को साधना है तो इकतरफ़ा निबाह से काम नहीं चल सकता।
साँप के काटने पर अहिंसक रहनेवाले तथागत का उदाहरण हमें याद रखना चाहिए किन्तु सौ गालियाँ देने वाले शिशुपाल का उदाहरण भी हमें नहीं बिसारना चाहिए। यह केवल अपने लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु ‘क्षमाभाव’ के वैभव हेतु भी अपरिहार्य है। यदि थोड़ा-सा ध्यान करेंगे तो हमें ऐसी परिस्थितियों के अनेक उदाहरण अपनी ही ज़िन्दगी के आसपास मिल जाएंगे।
जिस शस्त्र से शत्रु को परास्त करना हो, उसकी साधना और उसकी पड़ताल बेहद आवश्यक हैं। हमने ‘मुआफ़ी‘; ‘सॉरी’; ‘क्षमा’ जैसे शब्दों को इतना बेमआनी बनाकर रख दिया है कि न तो बोलनेवाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही सुननेवाले को।
जैनियों के पर्युषण पर्व इस शब्द को प्राणवान करने की साधना है। दस दिन के ये पर्व अवचेतन तक क्षमा के पहुँचने का मार्ग हैं। पहले दिन क्षमा का अर्थ समझना होता है, उसके बाद मार्दव, आर्जव आदि के माध्यम से चित्त को क्षमा मांगने योग्य बनाया जाता है, तब कहीं जाकर क्षमा ‘वाणी’ में साकार होती है।
एक बार मुख पर क्षमा विराजित हुई कि त्योहार हो गया, एक बार जिव्हा ने क्षमा चख ली तो फिर मन इतना हल्का हो गया कि वह नाच उठा। फिर अलग से ढोल-नगाड़े नहीं बुलाने पड़ते। फिर तो भीतर का संगीत झूम उठता है। जिन ग्रंथियों ने मन को जकड़ रखा था, वे इस एक शब्द की गूँज से विलीन हो गईं।
यह प्रयोग बेहद सार्थक है। यह आपने भी यकीनन कभी न कभी आज़माया ही होगा। यदि न आज़माया होता तो आप आज जीवित न होते। क्षमा के अभाव में जीवित रहना असंभव है। क्षमा के बिना जीवन ऐसे ही है जैसे किसी झल्लीवाले की पीठ पर लगातार बोझा बढ़ता रहे और उसे उतारने का कोई उपाय ही न किया जाए। फिर अधिक देर तक पीठ बोझा उठा न सकेगी। यह तो कमर टूट जाएगी या लकवा मार जाएगा। बोझा उतारा न गया तो झल्लीवाला यकीनन मर जाएगा।
हमारा मानस संसार में खड़ा यही झल्लीवाला है। दिन-प्रतिदिन के व्यावहार में इस पर बोझा बढ़ता जाता है। क्षमा मन का बोझा उतार देने का उपाय है। भीतर सड़ांध मारती ग्रंथियों से मुक्त होकर जीवन की सुवास भोगने का ज़रिया है। यही कारण है क्षमादान उतना आवश्यक नहीं जान पड़ता, जितना आवश्यक क्षमा याचना है।
अपने भीतर जो कचरा भर गया है, उसे कचरा मानने के लिए तैयार होना कठिन है। उसकी पहचान करके यह स्वीकार कर पाना कि हमने अपने भीतर कचरा रख लिया था- यह आसान काम नहीं है। इस मूर्खता के लिए सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी पड़ती है। इस विद्रूपता के लिए अपने आप पर हँसना पड़ता है। यह आसान नहीं होता। दूसरे पर हँसना बहुत आसान है, किंतु अपने आप पर हँसना बड़ा श्रमसाध्य काम है। लेकिन इस सोपान के बिना क्षमा का सुख भोगना नामुमकिन होगा।
‘क्षमावाणी’ पर्व के अवसर पर एकांत में बैठकर अपनी ग़लतियों को याद करना। अपने भीतर भरे द्वेष और घृणा के कचरे की पहचान करने का प्रयास करना। जिसके प्रति क्षोभ या अपराध बोध हो, उसके साथ घटित हुई सर्वाधिक कड़वी घटना को याद करना और फिर जिससे मांगनी हो, उसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पूरे चैतन्य मन से क्षमा याचना करना। अगर आज भी रेडीमेड क्षमा मांग ली तो यह पर्व निरर्थक रह जाएगा। अगर आज भी प्राणहीन क्षमा कर के रह गए तो पीठ का बोझा न उतर सकेगा। अगर आज भी खोखली औपचारिकता में फँसे रह गए तो मन को निर्ग्रंथ करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से जाता रहेगा।

✍️ चिराग़ जैन

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