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इनबाॅक्स के शुभचिंतक

मेरे हितचिंतको! रोज़ सुबह जब मैं मोबाइल उठाता हूँ तो मेरा व्हाट्सएप्प आपके संदेशों से लदा हुआ होता है। मेरे निरुत्तर रहने के बावजूद आप ‘मा फलेषु कदाचन’ का अनुगमन करते हुए बिना मतलब की ‘गुड मॉर्निंग’ भेजना नहीं भूलते। मेरे शुभाकांक्षियो, आपके द्वारा भेजे जा रहे लाल-पीले...

गणतंत्र दिवस

आज राजपथ पर महाराष्ट्र की झाँकी निकली तो महाकवि भूषण के घनाक्षरी से पूरा वातावरण काव्यमय हो गया। अभी भूषण की धमक गूंज ही रही थी कि छत्तीसगढ़ की झाँकी महाकवि कालिदास की विशाल मूर्ति और मेघदूत के श्लोकोच्चार के साथ पुनः कविता का जयघोष करती निकल गई। कल गणतंत्र दिवस की...

चुनाव तंत्र

एक दल बोलता है हमको थमा दो देश हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं एक दल बोलता है हमको थमा दो देश जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल जनता को सपने हसीन बेच देते हैं जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं ✍️ चिराग़...

प्रतीक्षा

ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ...

लोक और तंत्र की रस्साकशी

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं – विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता। विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को...

इतिहास : एक कठपुतली

भारत का इतिहास एक ऐसी कठपुतली है, जिसे कोई भी अपनी उंगलियों पर नचा लेता है। लोकोक्तियों और किंवदंतियों की चोट से घायल इतिहास कराहता रहता है और उसकी कराह को पार्श्वसंगीत घोषित करके, सब अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप राग अलापने लगते हैं। जो स्वघोषित विद्वान लिखी-लिखाई...
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