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चैनल के स्टूडियो में बाहर गार्ड तैनात था। उसका काम था अनावश्यक लोगों को स्टूडियो में जाने से रोकना। इसलिए वह प्रत्येक व्यक्ति का परिचय जानकर उसे प्रवेश करने दे रहा था।
पहले व्यक्ति ने बताया कि वह एंकर है, उसे मुद्दे पर प्रश्न पूछने हैं। गार्ड ने उसे प्रवेश दे दिया। दूसरे व्यक्ति ने बताया कि मुझे मुद्दे के पक्ष में बोलना है। तीसरे ने मुद्दे के विपक्ष में बोलना था। चौथा मुद्दे का विशेषज्ञ था। गार्ड ने सबको स्टूडियो में जाने दिया। दर्शक दीर्घा में भी ताली बजाने के लिए जनता की भरपूर व्यवस्था की गई।
अंत में एक बदहवास सा बूढ़ा स्टूडियो में घुसने लगा तो गार्ड ने उससे उसका परिचय पूछा। बूढ़े ने अकड़ते हुए कहा – “मेरे बिना यह बहस शुरू ही नहीं हो सकती। …मैं मुद्दा हूँ।”
बूढ़े की अकड़ देखकर गार्ड को हँसी आ गई। फिर उसे डाँटते हुए बोला- “आगे जाओ बाबा। पैनल पूरा हो चुका है। आपके लिए स्टूडियो में न तो कोई जगह बची है, न ज़रूरत।”
बूढ़ा अपना से मुँह लेकर बाहर खड़ा रह गया। स्टूडियो के भीतर बहस शुरू होने वाली थी। डायरेक्टर के इशारे पर दर्शक दीर्घा मूक बैठी ताली बजा रही थी। डायरेक्टर ने पूरी आवाज़ में चिल्लाया- स्टैंड बाइ… कैमरा रोलिंग… एक्शन!
मैं मुद्दा हूँ।
✍️ चिराग़ जैन

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