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दीपावली

उत्सव से ऐसे करो, जीवन का शृंगार। ज्यों मावस की रात में, दीपक का उजियार।। ✍️ चिराग़ जैन

कामना

नभ तक पसरे अंधियारे में अनहोनी के भय से आगे आँखों में बस एक सपन है इस अंधे दुर्दांत तिमिर में जिसकी किरण उजाला भर दे वो दीपक मेरा अपना हो वृक्ष सभी निस्पंद खड़े हों निविड़ निशा का सन्नाटा हो श्वानों का मातम सुन-सुनकर अंतर्मन बैठा जाता हो देह गलाती शीतलहर में झींगुर का...

साँकल फँस गई है

सूर्य चलकर आ गया है देहरी तक द्वार की साँकल इसी पल फँस गई है भाग्य सब वैभव लुटाने को खड़ा है किसलिए मुट्ठी इसी पल कस गई है रंग-भू पर जब हुआ अपमान, तब ये आस रक्खी एक दिन रणक्षेत्र में गाण्डीव भी दो टूक होगा शर बताएंगे कभी जब गोत्र मेरी वीरता का राजसी वैभव पगा जयघोष उस...

कन्या कुँवारी

कन्या एक कुँवारी थी छू लो तो चिंगारी थी वैसे तेज कटारी थी लेकिन मन की प्यारी थी सखियों से बतियाती थी शोहदों से घबराती थी मुझसे कुछ शर्माती थी बस से कॉलेज आती थी गोरी नर्म रुई थी वो मानो छुईमुई थी वो लड़की एक जादुई थी वो बिल्कुल ऊई-ऊई थी वो अंतर्मन डिस्क्लोज किया इक दिन...
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